कवि‍ता जि‍न्‍दगी की ओर ले जाती है : पवि‍त्रन तीकूनी

पवि‍त्रन तीकूनी

केरल के तीकूनी में जन्मे युवा मलयालम कवि‍ पवि‍त्रन तीकूनी के दस काव्य  संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उन्‍हें कई पुरस्‍कारों से सम्‍मानि‍त कि‍या जा गया है। केरल दिवस के दौरान विशाखपटणम पहुँचे पवित्रन तीकूनी से हिन्‍दी एवं मलयालम कवि व बहुभाषी अनुवादक संतोष अलेक्स द्वारा लिया गया साक्षात्कार-

संतोषः आपने कवितायें लिखना कब शुरू किया ? पहली कवि‍ता कब और कहाँ प्रकाशित हुई ?
पवित्रन: मैं अस्सी के अंतिम दौर में कवितायें लिखने लगा। मेरी पहली कविता ‘चंद्रिका’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। कविता का शीर्षक था- ‘रोसापूवूम मेषुकुतिरियुम़’ (गुलाब का फूल व मोमबत्ती)।

संतोष: ‘मुरीवकलुडे वसंतम’ (घावों का वसंत) से ‘कुरीदिक्कु मुनपु’ (हत्या से पहले) तक की यात्रा को आप कैसे आँकते हैं ?
पवि‍त्रन: मेरा जीवन बहुत ही कठिनाइयों से गुजरा। पिताजी की मानसिक हालत खराब थी, जिसके चलते माँ ने दूसरी शादी की। घर में कमानेवाला कोई नहीं था इसलिये मैं चौथी कक्षा में पढ़ते वक्त घर छोड़कर भाग कर कण्णूर पहुँचा। वहाँ एक होटल में काम करने लगा।

एक नवम्बर की बात है। वहीं पास के एक स्कूल में बाल दिवस पर प्रतियोगितायें हो रही थीं। मैंने भी प्रतियोगिता में भाग लिया और मुझे पुरस्कार मिला। पुरस्कार देते समय मुझसे मेरे स्कूल का नाम पूछा तो मैं चुप रहा। तो मन में फिर से पढ़ने की इच्छा जागी।

मैं घर वापस आ गया। घर के पास स्थित स्कूल में पढ़ने लगा। ‍पि‍ताजी स्कूल जाते हुए बच्चों पर पत्थर फेंकते और गाली-गलोच करते। पिताजी की इस हरकत से तंग आकर मैं घर से बीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित वटटोली हाई स्कूल में पढ़ने लगा। दसवीं कक्षा पहली श्रेणी में पास हुआ। फिर मुंगेरी सरकारी कॉलेज में इंटरमीडिएट के लिये दाखिल हुआ और पहली श्रेणी में पास हुआ।

इस बीच फिर से पिताजी के कारण मुझे घर छोड़कर भागना पडा़। इस बार मैं वयनाड जिले में पहुँचा। वहाँ एक नाई के घर आश्रय मिला। उनके साथ रहकर नाई का काम सीखा। इस बीच माही के सरकारी कॉलेज में बी.ए. में एडमि‍शन मिला। लेकिन मेरा नसीब ठीक नहीं था। मेरी बहन की शादी करवानी थी। घर की आर्थिक स्थिति खराब थी। इसलिये बीस साल की उम्र में मुझे शादी करनी पडी़। मुझे जो कुछ मि‍ला उसे बहन को देकर उसकी शादी करवा दी।

मुसीबत फिर भी नहीं टली। दो साल बाद बहन अपने बच्चे को लेकर वापस घर आ गयी। मैं पूरी तरह टूट गया और अपनी बीवी और दो बच्चों को लेकर अलेप्पी पहुँचा। वहाँ पर अपनी बेटी को नोचकर, रुलाकर भीख मांगी ताकि पापी पेट को पाला जाय।ऐसे में एक दिन भीख मांगते समय मुझे एक आदमी ने पुकारा। वह मुझे समीप के एक कार्यालय में ले गया। वहाँ पर राजन कैलाश नामक कवि ने मुझे गले लगाकर पूछा, ‘‘आप पवित्रन तीकूनी हैं न?’’ मैं अवाक रह गया। उन्होंने मुझे मेरा एक काव्य सग्रंह दिखाया और कहा, ‘‘तुम कवितायें लिखना मत छोडो़। तुम्हारी कविताओं में जिन्दगी है।’’ तब से आज तक मैंने जीने के लिये कई काम किये, लेकिन कविता का सहारा नहीं छोडा़।

आज मैं जो भी हूँ वह कविता के कारण ही है। कविता को जानने से पहले मैंने कविता लिखना शुरू किया। जैसे-जैसे मैं कवितायें लिखता गया, वे प्रकाशित होती गईं। अब मैं कविताओं को जानकर लिख रहा हूँ।

संतोषः आपने किन-किन कवियों को पढा़ है और किन-किन कवियों ने आपको प्रभावित किया है ?
पवित्रन: जैसे मैंने आपको बताया जिन्‍दगी की आपाधापी में मुझे पढ़ने का समय नहीं मिला। इंटरमीडिएट की पढा़ई के बाद अन्य कवियों को पढ़ने लगा। के. सच्चिदानंदन, अयप्प पणिकर, बालचंद्रन चुल्लकाड, कुरीपुषा श्रीकुमार आदि की कवितायें मुझे अच्छी लगती हैं लेकि‍न किसी का खास प्रभाव मुझ पर नहीं है।

संताषः 1990 से 2000 के साल केरल की कविता के इतिहास में अनोखे हैं। इस दौरान आपको मिलाकर ग्यारह कवियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी। वरिष्ठ कवि श्री आटूर रविवर्मा ने इन दस कवियों पर ‘पुदुमोषीवषिकल’ (नये रास्ते) नामक किताब का सम्‍पादन करते हुए इन कवियों को साहित्यिक जगत से परिचित करवाया। इस किताब में आपको शामिल नहीं किया गया। कोई खास वजह?
पवित्रनः मुझे इसका कोई गम नहीं है। मैं किसी भी कवि द्वारा चलाये जी रही संस्थाओं में अपने को शामिल नहीं करता। तब भी और आज भी मैं जि‍न्‍दगी के एक छोटे से रास्ते से गुजर रहा हूँ। मेरा विश्‍वास है कि कविता मृत्यु की ओेर नहीं, बल्कि जिन्‍दगी की ओर ले चलती है।

मैंने और कवि मित्र एस. जोसफ ने ऐसी कवितायें लिखीं जो पहले किसी ने नहीं लिखीं। मछली बाजार, वहाँ का माहौल आदि पर हमने कवितायें लिखीं। कविता के लिये जो जगह मना थी, हम वहाँ चले गये और उन अवस्थाओं पर कवितायें कीं क्योंकि हमारा विश्‍वास था कि वहाँ भी जिन्‍दगी है और वहाँ भी लोग रहते हैं।

इसलिये आपके द्वारा बताए संग्रह में शामिल कवियों की अपेक्षा मेरी कविताओं को पाठकों ने पहचाना और सराहा है। इसके लिये मैं पाठकों का आभारी हूँ। अब तक मेरे नौ काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। सब मिलाकर मैंने अब तक 600 कवितायें लिखी हैं।

संतोषः आपकी कविताओं में मार्क्सवाद का प्रभाव देखा जा सकता है। आपको नहीं लगता कि आज मार्क्सवाद अपनी प्रासंगिकता खो चुका है?
पवित्रनः यह सही है कि मेरी कविताओं में मार्क्सवादी विचारधारा का प्रभाव है। मेरी राय में मार्क्सवाद दुनिया का सबसे उत्कृष्ठ सिद्धान्त है। लेकिन खेद की बात है कि इसको सही मायने में न समझा गया और न ही अमल किया गया। आज मार्क्सवाद अपने सिद्धान्तों से कोसों दूर है।

संतोषः तेलुगु के महाकवि श्री श्री ने इस प्रकार बताया है, ‘कुछ भी कविता बनने में अक्षम नहीं है, लेकिन शिल्प पक्ष मुख्य है।’ आपकी राय में अच्छी कविता क्या है?
पवित्रनः हाँ, यह सही है कि कविता में शिल्प पक्ष महत्वपूर्ण है लेकिन केवल शिल्प पक्ष पर ध्यान देने से कविता नहीं बनती। कविता पढ़ने के बाद पाठक यदि मेरी पक्तियों में अपनी जिन्‍दगी के किन्ही क्षणों या अवस्थाओं से अपने को जोड़ पाये तो मैं अपने को कृतार्थ महसूस करूँगा। मेरी राय में कविता में आप जिन्‍दगी को पढ़ पायें तो वही अच्छी कविता है।

संतोषः आपने कई विषयों पर कवितायें लिखी हैं।आपकी शैली में एकरूपता आती जा रही है। आपके समकालीन कवियों में भी यह समस्या है। क्या आपको नहीं लगता कि इससे बच निकलना है?
पवित्रनः हाँ, मैं यह मानता हूँ, मेरे लिये कविता एक प्रवाह है। मैंने अब तक जो कवितायें लिखी हैं, उनमें से कोई भी कविता जबरदस्ती नहीं लिखी गई है। अपनी शैली से हटना आसान नहीं है। ‘वीटीलेकुल्ला वषीकल’ (घर की ओर का रास्ता) कविता में मैंने एक अलग शैली में कविता लिखी है। यह सही है कि मेरे समकालीनों की शैली में भी एकरूपता है। बदलाव जरूरी है। मेरा विश्‍वास है कि मेरे मित्र भी इससे छुटकारा पाने की कोशिश करेंगे।

संतोषः ‘सौजन्यम’ (मुफ्त), ‘पटटम’ (पंतग) आदि कविताओं में आपने गाँधीजी का जि‍क्र कि‍या है। क्‍या आप मानते हैं कि‍ गाँधी जी आज भी प्रासंगिक हैं?
पवित्रनः गाँधी जी युग पुरुष थे। सत्‍य और अहिंसा के उपासक थे। उनका कहना था कि यदि आपको कोई एक गाल पर तमाचा मारे तो दूसरा गाल भी दि‍खायें। मैं इससे सहमत नहीं हूँ। क्‍योंकि‍ आज के समय में व्‍यक्‍ति‍ इतना वि‍नयशील बनें, यह सम्‍भव नहीं होता। अहिंसा का मार्ग अच्‍छा है लेकि‍न सहने की भी तो एक हद होती है।

संतोष : आज साहि‍त्‍य, राजनीति‍ और धर्म अपने लक्ष्‍यों से हट गये हैं। इसके प्रति‍ आपकी क्‍या प्रति‍क्रि‍या है?
पवि‍त्रन: आज व्‍यक्‍ति‍ अपने स्‍वार्थ के लि‍ये कि‍सी भी राजनीति‍क दल, संस्‍था से जुड़ जाता है। जब कोई दल सत्‍ता में है तो वह कई समस्‍याओं को स्‍वीकारता है, वही दल जब वि‍पक्ष में बैठता है तो उन्‍हीं बातों को नकारता है। आज राजनीति‍ मौकापरस्‍त ज्‍यादा व समाज सेवा कम करती है। जहाँ तक साहि‍त्‍य की बात है, यहाँ भी राजनीति‍ हावी होने लगती है। यही बात धर्म की भी है। राजनीति‍ का हस्‍तक्षेप धर्म और साहि‍त्‍य में नहीं होना चाहि‍ये।

संतोष : आपकी कवि‍ताओं का अनुवाद हि‍न्‍दी, अंग्रेजी और अन्‍य भारतीय भाषाओं में हुआ है। क्‍या कवि‍ता का अनुवाद न्‍यायोचि‍त है ?
पवि‍त्रन: मैंने अनुवाद पढ़ा है। तमि‍ल कवयि‍त्रि‍यों तथा स्‍पेन की एक हजार साल पुरानी कवि‍ताओं का मलयालम अनुवाद पढ़ा है। उसी प्रकार हि‍न्‍दी में केदारनाथ सिंह और एकांत श्रीवास्‍तव की कवि‍ताओं को अनुवाद के माध्‍यम से पढ़ा। कवि‍ताओं का अनुवाद बहुत ही कठि‍न काम है। एक पौधे को उसकी मि‍ट्टी से उखाड़ कर दूसरी मि‍ट्टी में लगाना अनुवाद है। अगर यह ध्‍यान से नहीं कि‍या गया तो नतीजा बुरा हो सकता है। आप अनुवाद के क्षेत्र में सराहनीय काम कर रहे हैं। साहि‍त्‍य जगत को आप जैसे अनुवादक की जरूरत है जो बडे़ लगन और नि‍ष्‍ठा से अनुवाद के क्षेत्र में कार्यरत हैं। अनुवादक की बदौलत ही एक भाषा का रचनाकार को दूसरी भाषा से परि‍चि‍त हो पाता है।

संतोष : मछली बेचना आपका पेशा है। क्‍या आपको लगता है कि‍ कहीं-न-कहीं एक कवि‍ की छवि‍ को इससे ठेस पहुँची है?
पवि‍त्रन : पाठकों से मेरा अनुरोध है कि‍ मेरी कवि‍ताओं को स्‍वीकारें, न कि‍ मेरे पेशे पर जायें। पापी पेट को पालने के लि‍ये मैं बाजार में मछली बेचता हूँ। हाँ, कभी-कभी साहि‍त्‍यि‍क खेमों में मुझे अपने पेशे के कारण वह आदर नहीं मि‍लता जो मुझे मि‍लना चाहिये।

लेकि‍न यह बताते हुए मुझे गर्व महसूस होता है कि‍ केरल में खासकर मलबार इलाके के कई प्रसि‍द्ध कॉलेजों में मुझे मुख्‍य अति‍थि‍ के रूप में आमंत्रि‍त कि‍या गया। मुझे कई साहि‍त्‍यि‍क कार्यक्रमों का उद्घाटन करने का सौभाग्‍य मि‍ला। यह सब इस बात का सबूत है कि‍ लोग मेरे पेशा नहीं, बल्‍कि‍ मेरी कवि‍ताओं को चाहते हैं। यही नहीं केरल में इंटरमीडि‍एट और बी.ए. मलयालम के लि‍ये मेरी कवि‍ताओं को चुना गया है। इससे ज्‍यादा खुशी मेरे लि‍ये क्‍या हो सकती है।

संतोष : आपको अब तक प्राप्‍त पुरस्‍कारों के बारे में कुछ बताएं?
पवि‍त्रन: मुझे अब तक लगभग बारह पुरस्‍कार मि‍ल चुके हैं। उनमें प्रमुख हैं- कनक श्री पुरस्‍कार, इंडि‍यन जेसीस पुरस्‍कार, आशान पुरस्‍कार, रहीम एचेरी पुरस्‍कार, पंतजलि‍ पुरस्‍कार और कैरली पुरस्‍कार।

संतोष : आपकी नई योजनाएं क्‍या हैं? कोई नया काव्‍य संग्रह नि‍कट भवि‍ष्‍य में प्रकाशि‍त होने वाला है?
पवि‍त्रन : डी.सी. बुक्‍स की ओर से मेरा नया कवि‍ता संग्रह प्रकाशि‍त होने वाला है। पहली बार एक उपन्‍यास लि‍ख रहा हूँ। इस यात्रा (आंध्र प्रदेश की यात्रा) के आधार पर आंध्र प्रदेश के स्‍कैचस शीर्षक से कुछ नई कवि‍तायें लि‍खी हैं और कुछ वापस जाकर लि‍खूँगा।

संतोष : आशा करता हूँ कि‍ आप ज्‍यादा कवि‍तायें लि‍खें और आपको ज्‍यादा कामयाबी मि‍ले। आपने समय दि‍या इसके लि‍ये आभारी हूँ।
पवि‍त्रन : धन्‍यवाद आपको भी। अनुवाद के क्षेत्र में आप और भी नये रचनाकारों को परि‍चि‍त करायें।

One comment on “कवि‍ता जि‍न्‍दगी की ओर ले जाती है : पवि‍त्रन तीकूनी

  1. बढ़िया लगा

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