एक आतंकवादी की मौत और अमेरिकी साम्राज्यवाद के मंसूबे : सुधीर सुमन

अमेरिका द्वारा आसोमा को मारने के लिए की गई कार्रवाई के पीछे की सच्‍चाई को उजागर करता और अमेरिका के नापाक इरादे से भारत के राजनीतिज्ञों को आगाह करता वरिष्‍ठ लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन का लेख-

ओसामा मारा गया और भारत में एसएमएस वीर सक्रिय हो उठे। मुझे भी इस तरह के एसएमएस मिले, जिनका आशय था कि मुझे आनंदित होना चाहिए। समझ में नहीं आया कि इसमें इतना ज्यादा आनंदित होने की क्या बात है! ओसामा तो वैसे भी कुछ वर्षों से कमजोर पड़ चुका था, और जिसने बनाया उसने मिटा दिया, इसमें मुझे क्यों खुश होना चाहिए? वैसे मारने वाला भी अमेरिका था और घटना का गवाह भी वही और वही उसे समुद्र में दफनाने वाला भी। आज दुनिया यह जानना चाहती है कि ऐसी हड़बड़ी उसे क्यों थी? इसे लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं और कई तरह की थ्योरी सामने आ रही हैं, लेकिन मेरे लिए तो बड़ा सवाल यह है कि हमें चिंतित क्यों नहीं होना चाहिए कि अमेरिका एकदम पड़ोस में डेरा डाल चुका है और आतंकवादियों को मिटाने के नाम पर वहां अपनी जड़ें और मजबूत करता जा रहा है।

चलिए, मान लिया कि ओसामा के मास्टर माइंड की वजह से ही अमेरिकी चौधराहट को कायम रखने वाला एक केंद्र- वर्ल्ड ट्रेड सेंटर ढह गया था, जिसमें महान अमेरिका के तीन हजार नागरिक मारे गए थे और उसने गुनाहगार को उसके कुकृत्य की वाजिब सजा दे दी। लेकिन मारे गए अमेरिकी नागरिकों के प्रति संवेदना की आड़ लेकर अमेरिकी न्याय के पक्ष में खड़ा कैसे हुआ जा सकता है? जबकि उसके खुद के अन्याय की लंबी फेहरिश्त हमारे सामने है और आज भी उसके द्वारा अन्याय का सिलसिला जारी है। सच तो यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चुनाव से पहले एक उपलब्धि हासिल करने के लिए ही सारे अंतरराष्ट्रीय कायदे-कानून का उल्लंघन करते हुए ओसामा की हत्या की है। ओसामा के हाथ निर्दोषों के खून से सने हुए थे, इसमें कोई शक नहीं है, लेकिन अमेरिकी नेवी सील ने जिस तरह एक लाइसेंसी आपराधिक गिरोह की तरह ओसामा की क्रूरतापूर्ण तरीके से हत्या की है, उससे हम भारतीय लोगों को आह्लादित क्यों होना चाहिए? अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रबल विरोधी विचारक नोम चोम्स्की ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि ‘‘यह अधिक से अधिक साफ होते जाने से कि यह एक योजनाबद्ध अभियान था, अंतरराष्ट्रीय कानूनों के सबसे बुनियादी नियमों के उल्लंघन का मामला भी उतना ही गहराता जा रहा है।…. जिन समाजों में कानून को लेकर थोड़ा भी सम्मान होता है, वहां संदिग्धों को पकड़कर उन्हें निष्पक्ष सुनवाई के लिए पेश किया जाता है। मैं ‘संदिग्ध’ शब्द पर जोर दे रहा हूं।’’ जिस अमेरिका की खुफियागिरी का इतना गौरव-गान हो रहा है, उस अमेरिका से पूछा जाना चाहिए कि जब तालिबान कह रहे थे कि सबूत दो कि ओसामा अफगानिस्तान में है, तब उसने सबूत क्यों नहीं दिए? नोम चोम्स्की तो अमेरिका के इस दावे पर ही संदेह करते हैं कि 9/11 की योजना अलकायदा ने अफगानिस्तान में बैठकर बनाई थी। सच्‍चाई जो भी हो, लेकिन चोम्स्की ने ओसामा की मौत और मौत के बाद की परिस्थितियों का जो आकलन किया है, वह गौर करने लायक है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘मीडिया में वाशिंगटन के गुस्से के बारे में भी बहुत चर्चा हो रही है कि पाकिस्तान ने बिन लादेन को उसे नहीं सौंपा, जबकि पक्के तौर पर फौज और सुरक्षा बलों के कुछ अधिकारी एबटाबाद में उसकी मौजूदगी से वाकिफ थे। पाकिस्तान के गुस्से के बारे में बहुत कम कहा जा रहा है कि अमेरिका ने एक राजनीतिक हत्या के लिए उनकी जमीन में हस्तक्षेप किया। पाकिस्तान में अमेरिका-विरोधी गुस्सा पहले से बहुत है, और इस घटना से वह और बढ़ेगा। जैसा अंदाजा लगाया जा सकता है, लाश को समुद्र में फेंक देने के फैसले ने मुसलिम जगत में गुस्से और संदेह को ही भड़काया है।

हम खुद से यह पूछ सकते हैं कि तब हमारी प्रतिक्रिया क्या होती, जब कोई इराकी कमांडो जॉर्ज डब्ल्यू बुश के घर में घुसकर उसकी हत्या कर देता और उसकी लाश अटलांटिक में बहा देता। यह तो निर्विवाद है कि बुश के अपराध बिन लादेन के अपराधों से बहुत अधिक हैं और वह ‘संदिग्ध’ नहीं हैं, बल्कि निर्विवाद रूप से उसने ‘फैसले’ लिये।’’

दरअसल आज अमेरिका के खिलाफ दुनिया में जो नफरत है वह उसके किसी भी दुश्मन को छुपाने का आधार बन सकती है, यह उसे क्यों समझ में नहीं आता? जिस तरह के बदले की कार्रवाई को अमेरिका न्याय की जीत बता रहा है, यही तर्क ओसामा द्वारा किए गए बदले की कार्रवाइयों पर क्यों नहीं लागू हो सकता, आखिर उसे भी ऊर्जा तो अमेरिका द्वारा मुस्लिम देशों में मचाई जा रही तबाही के कारण ही मिल रही थी? बेशक ओसामा साम्राज्यवाद-विरोध की राजनीति करने वाला कोई राजनेता नहीं था, वह एक जुनूनी और कट्टर मुसलमान था, जेहादी था, लेकिन ओसामा के प्रति जन-समर्थन का आधार क्या सिर्फ इस्लामिक कट्टरपंथ था, क्या महज सांप्रदायिक कट्टरता की वजह से ही लोग उसका समर्थन करते थे। इस सवाल की ओर आमतौर पर आज अमेरिका के प्रायोजित शौर्य में डूबे लोग ध्यान नहीं देना चाहते? ओसामा इस्लाम के विजय की ध्वजा फैलाने निकला कोई मध्ययुगीन शहंशाह तो नहीं था। वह तो कई हुकूमतों के बीच चक्कर लगा रहा था, कुछ दिनों के लिए भी अपनी स्थाई हुकूमत तो उसकी भूगोल के किसी हिस्से में नहीं बन पाई थी। वह बुश या ओबामा की तरह किसी राष्ट्र का प्रतिनिधि भी नहीं था। उसकी ताकत के उभार से लेकर पतन तक कोई ऐसा राष्ट्र सामने नहीं आया, जिसने उसे अपना प्रतिनिधि चेहरा बनाया हो। दरअसल ओसामा बिन लादेन और अलकायदा अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप के खिलाफ इस्लामी जगत में हुई जबर्दस्त प्रतिक्रिया के दौर में अमेरिका की सोवियत-विरोधी रणनीति के खतरनाक बाईप्रोडक्ट थे। आज के दौर का जो आतंकवाद है वह प्रायः अमेरिकी रणनीति की सीधी प्रतिक्रिया है, अमेरिका इस पर लगाम नहीं लगा सकता, इसे खत्म नहीं कर सकता, भले ही ओसामा खत्म हो गया हो। कुछ लोग ओसामा के अंत की तुलना हिटलर के अंत और फासीवाद के पराजय से कर रहे हैं। सिर्फ 1 मई को होने वाली मौत की घोषणाओं के कारण की जा रही ये तुलनाएं निराधार हैं। हिटलर का अंत द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत का स्पष्ट संकेत था और दुनिया में फासीवाद के ऐतिहासिक पराजय का भी। लेकिन ओसामा की हत्या न तो आतंकवाद का अंत है और न ही अमेरिकी साम्राज्यवाद का। जाहिर है इराक, अफगानिस्तान, लिबिया और पाकिस्तान में जो कुछ भी अमेरिका कर रहा है, उससे आतंकवाद पैदा होगा, मिटेगा नहीं। ओसामा की हत्या के चंद रोज बाद ही हाल में सत्ताविरोधी लोकतांत्रिक आंदोलन के लिए चर्चित काहिरा में मुस्लिम-ईसाई दंगों की खबरें आई हैं। जाहिर है इससे अमेरिकी रणनीतिकारों को तो हर्ष ही होगा।

ओसामा की हत्या के बाद मुझे एक दूसरा एसएमएस मिला, जिसमें ग्रेट ओबामा की शान में कशीदे काढ़े गए हैं और यह कल्पना की गई है कि अमेरिका एक दिन पाकिस्तान समेत सारे मुस्लिम राष्ट्रों को ध्वस्त कर देगा। उसमें एक बात और कही गई है कि जिस तरह दुनिया में बुश और ओबामा हैं, उस तरह भारत में नरेंद्र मोदी हैं। भारत में मोदी मिजाज वाले ये तथाकथित राष्ट्रभक्त अब पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी शिविरों को अमेरिकी स्टाइल में ध्वस्त करने की हुंकार भरने लगे हैं? पर वे यह क्यों भूल जाते हैं कि अमेरिका ने बाहर से पाकिस्तानी राष्ट्र पर अचानक हमला नहीं कर दिया है, बल्कि वह तो वहां पाकिस्तानी सरकार की मर्जी से मौजूद है। प्रचार तो यही है कि अमेरिका पाकिस्तानी सरकार के साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में साझेदारी निभा रहा है। और लगता है कि भारत भी इसी तरह की घनिष्ठ साझेदारी के लिए लालायित है, क्योंकि कुख्यात एफबीआई और सीआईए के साथ इसकी नजदीकियां कुछ ज्यादा ही बढ़ती जा रही हैं। इसकी शुरुआत एक दशक पहले एनडीए के शासनकाल में ही हो चुकी थी, जिसकी प्रक्रिया यूपीए के शासनकाल में जोर-शोर से जारी है। इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि निकट भविष्य में कुछ आतंकवादी घटनाएं भारत में घटें और अमेरिका यहां भी तारणहार बनकर आ जाए। तब किस तरह का आतंकवाद-विरोधी अभियान चलेगा, पाकिस्तान में हो रहे हमलों को देखते हुए इसकी कल्पना की जा सकती है। जो मारे जाएंगे वे आतंकवादी ही होंगे, इसकी भी कोई गारंटी नहीं होगी। वैसे भी भारत में पिछले दो दशकों में हुई आतंकवादी घटनाओं की गहरी तहकीकात प्रायः नहीं की गई है। अमेरिका की तर्ज पर भारत में भी पूरे मुस्लिम समुदाय को आतंकवाद के लिए संदेह के घेरे में डाला गया, सैकड़ों बेगुनाह नौजवान फर्जी मुकदमों में फंसाए गए और उन्हें यातनाएं दी गईं, लेकिन उन पर न्यायालय में कोई आरोप साबित नहीं किया जा सका, जिससे सरकारों की भद्द भी पिटी। आखिर जिस देश में करीब तीन हजार लोगों की हत्या के लिए जिम्मेवार नरेंद्र मोदी ठाठ से मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं, वहां किस तरह इस्लाम की आड़ में आतंक फैलाने वालों पर पूरी तरह रोक लगाई जा सकती है? क्या यह सच नहीं है कि आजादी के बाद जितने दंगे और सांप्रदायिक कत्लेआम हुए हैं, उसमें मुसलमानों को ज्यादा जानमाल का नुकसान उठाना पड़ा है? ऐसे में अगर कुछ मुसलमान प्रतिक्रिया में आतंकवाद के रास्ते पर चल निकल पड़ते हैं, तो क्या इसके लिए सिर्फ इस्लाम धर्म के बारे में प्रचारित कट्टरता और पाकिस्तान को ही दोषी ठहराया जाए?

इतने वर्षों से भारतीय सरकारें चिल्लाती रही हैं कि पाकिस्तान में आतंकवादियों के प्रशिक्षण कैंप चलते हैं और वही आतंकवादियों को धन देता है, तो ऐसे में महत्वपूर्ण सवाल तो यह है कि खुद पाकिस्तान के पास धन और हथियार कहां से आते हैं ? जहां से धन आता है, उसका विरोध क्यों नहीं किया जाता? और यदि पाकिस्तान आतंकवाद का पनाहगाह है तो आतंकवादी पाकिस्तान में भी कत्लेआम क्यों मचाए रहते हैं? विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने लादेन की हत्या को ‘ऐतिहासिक’ और ‘मील का पत्थर’ बताते हुए कहा कि पिछले कुछ सालों में हजारों निर्दोष पुरुष, महिलाएं और बच्चे इन आतंकवादी गुटों के हाथों मारे गए। विदेश मंत्री का कहना है कि वे अमेरिका पर दबाव डालेंगे। क्या शेखचिल्ली का सपना है! अगर आतंकवाद को बढ़ावा देने में पाकिस्तान का हाथ है और उसके सिर पर अमेरिका का हाथ है, तो अमेरिका से भारत अपनी यारी तोड़ता क्यों नहीं, क्यों अमेरिका के चारण बनने के लिए हमारे नेता भी बेकरार हैं?

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अगर निर्दोष पुरुष, महिलाएं और बच्चों की हत्या करने वालों का विरोध ही भारत का मकसद है, तो उसकी उंगली सबसे पहले अमेरिका पर क्यों नहीं उठती? आखिर पाकिस्तान से हमारे देश को ज्यादा खतरा है या अमेरिका से? आतंकवादी क्या हमारे लिए उन अमेरिकापरस्त नीतियों को लागू करने वाले शासकवर्ग से भी ज्यादा खतरनाक हैं जिनकी वजह से लाखों किसानों ने आत्महत्या कर ली है? क्या कुछ सिरफिरे आतंकवादियों द्वारा मारे गए लोगों के प्रति संवेदित होना ही काफी है, या उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि भारत में प्राकृतिक संपदा और जीविका के संसाधनों को अमेरिकी और अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले कर देने का जो खतरनाक खेल चल रहा है, उसका तीखा विरोध किया जाए? क्या अब भीषण लूट और भ्रष्टाचार के खिलाफ उभर रहे जनता के प्रतिरोध का मुकाबला यहां की सरकारें आतंकवाद-विरोधी अभियानों के जरिए करेंगी? छत्तीसगढ़ में तो इसका रंग-रूप हम देख ही रहे हैं। क्या हमारे शासकवर्ग का जो निरंतर अमेरिकीकरण हो रहा है, वह खतरनाक नहीं है?

इस देश की शासकवर्गीय पार्टियां ही नहीं, आमतौर पर भारतीय उपमहाद्वीप की मीडिया भी तुरंत भूल गई कि ओसामा की हत्या के ठीक एक दिन पहले नाटो ने लिबिया में हमला करके गद्दाफी के सबसे छोटे बेटे सैफ अल अरब और तीन पोतों को मार डाला, जबकि गद्दाफी ने नाटो से बातचीत की पेशकश की थी। इस पर नाटो कमांडर का कहना था कि नाटो ने गद्दाफी के परिवार को नहीं, बल्कि सैन्य ठिकाने को निशाना बनाते हुए हमला किया था। यह एक अपवाद घटना नहीं है, जितना अकेले वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में लोग मारे गए उससे कहीं अधिक बेगुनाह नागरिक अमेरिकी सेना द्वारा हाल के वर्षों में इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में मारे जा चुके हैं? आखिर इसकी सजा अमेरिका को क्यों नहीं मिलनी चाहिए?

ओसामा ऑपरेशन के बाद भारत में 26/11 के मास्टर माइंड लोगों के खिलाफ सीधी कार्रवाई की मांग उठने लगी है। और हद है कि भारतीय सेना और एयरफोर्स के चीफ ने इस तरह के गैरजिम्मेदार बयान दिए हैं कि भारत भी इसी तरह का ऑपरेशन पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादियों के खिलाफ कर सकता है। इस तरह से युद्धोन्माद बढ़ेगा, जो पाकिस्तान को पता नहीं कितना नुकसान पहुंचाएगा, पर अमेरिका को जरूर फायदा दिलाएगा। जबकि भारत को इस वक्त चाहिए कि जो व्यवहार अमेरिका ने पाकिस्तान में किया है, उसके आलोक में वह अमेरिका के साथ अपने संबंधों की समीक्षा करे। बेशक भारत पाकिस्तान से आतंकवादियों के प्रत्यर्पण की मांग करे, लेकिन खाली खबर बनाने के लिए उन्हें आतंकवादियों की बड़ी लिस्ट देने के बजाए, कुछ आतंकवादियों के बारे में ठोस सबूत दे। कुछ खुफियागिरी की काबलियत तो हमारी सरकारें भी दिखाएं। ओसामा ऑपरेशन के पहले रेमंड डेविस के मामले में भी पाकिस्तान की संप्रभुता और आजादी का माखौल उसके साझेदार अमेरिका ने खुलकर उड़ाया। दो बेगुनाह पाकिस्तानी नागरिकों की दिनदहाड़े हत्या करने वाले इस सीआईए एजेंट को पाकिस्तान में कोई दंड नहीं मिला। ओबामा ने बाकायदा पाकिस्तान पर दबाव डाला और कहा कि वह अमेरिकी राजनयिक था, इसलिए उस पर स्थानीय कानून के अनुसार मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अब तो अमेरिका के सारे सहयोगियों और उसके साथ गलबहियां होने को आतुर भारत को सावधान हो जाना चाहिए। आतंकवाद और साम्राज्यवाद एक समान खतरे हैं पाकिस्तान और भारत के लिए। इसका सामना इन देशों को खुद मिलकर करना होगा। अमेरिका को दक्षिण एशिया से बाहर खदेड़ना बेहद जरूरी है, वर्ना उसकी बर्बरता का अखाड़ा यह इलाका बनेगा और मध्यपूर्व की तरह हमें भी भीषण तबाही झेलनी पड़ेगी।

अमेरिकी सेना किसी आतंक-वातंक को मिटाने और स्वतंत्रता व लोकतंत्र की रक्षा के लिए बनी ही नहीं है, बल्कि अमेरिकी पूंजी के विस्तार और दुनिया के संसाधनों की लूट को ध्यान में रखकर ही उसका इस्तेमाल किया जाता है, आखिर इस सच से आंखों को कैसे मूंदा जा सकता है? जिन खतरों का प्रचार करके उसने इराक पर हमला किया और सद्दाम हुसैन की हत्या की, वे प्रचार तो सही साबित नहीं हुए। कोई रासायनिक हथियार तो नहीं मिला। बल्कि दुनिया के अधिकांश लोग यह अच्छी तरह जानते हैं कि खाड़ी में अमेरिकी आतंक का मकसद क्या है? क्या महज तेल पर अपने वर्चस्व के लिए ही उसने मध्यपूर्व में सीधे सैनिक हमलों और प्रतिबंधों के जरिए लाखों लोगों की हत्या नहीं की है? जब तक अमेरिकी साम्राज्यवाद है, क्या हम दुनिया में अमन की उम्मीद कर सकते हैं? ओसामा जैसों से लाख गुना खतरनाक है अमेरिकी साम्राज्यवाद, जिसके कारनामों की विस्तार से चर्चा करती और अमेरिकी नागरिकों की मौतों के प्रति संवेदित लोगों को संबोधित करती एम्मानुएल ओर्तीज की लंबी कविता- ‘एक मिनट का मौन’ के साथ मैं इस लेख को समाप्त करना चाहता हूं। यह कविता 9/11 की घटना के बाद लिखी गई थी। कवि असद जैदी ने इसका अनुवाद किया है-

एक मिनट का मौन

इससे पहले कि मैं यह कविता पढ़ना शुरू करूं
मेरी गुजारिश है कि हम सब एक मिनट का मौन रखें
ग्यारह सितंबर को वल्र्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन में मरे लोगों की याद में
और फिर एक मिनट का मौन उन सबके लिए जिन्हें प्रतिशोध में
सताया गया, कैद किया गया
जो लापता हो गए जिन्हें यातनाएं दी गईं
जिनके साथ बलात्कार हुए एक मिनट का मौन
अफगानिस्तान के मजलूमों और अमेरिकी मजलूमों के लिए
और अगर आप इजाजत दें तो
एक पूरे दिन का मौन
हजारों फिलस्तीनियों के लिए जिन्हें उनके वतन पर दशकों से काबिज
इस्राइली फौजों ने अमरीकी सरपस्ती में मार डाला
छह महीने का मौन उन पंद्रह लाख इराकियों के लिए, उन इराकी बच्चों के लिए,
जिन्हें मार डाला ग्यारह साल लंबी घेराबंदी, भूख और अमरीकी बमबारी ने

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूं
दो महीने का मौन दक्षिण अफ्रीका के अश्वेतों के लिए जिन्हें नस्लवादी शासन ने
अपने ही मुल्क में अजनबी बना दिया।
नौ महीने का मौन
हिरोशिमा और नागासाकी के मृतकों के लिए, जहां मौत बरसी
चमड़ी, जमीन, फौलाद और कंक्रीट की हर पर्त को उधेड़ती हुई,
जहां बचे रह गए लोग इस तरह चलते फिरते रहे जैसे कि जिंदा हों।
एक साल का मौन वियतनाम के लाखों मुर्दों के लिए….
कि वियतनाम किसी जंग का नहीं, एक मुल्क का नाम है…..
एक साल का मौन कंबोडिया और लाओस के मृतकों के लिए जो
एक गुप्त युद्ध का शिकार थे…. और जरा धीरे बोलिए,
हम नहीं चाहते कि उन्हें यह पता चले कि वे मर चुके हैं।
दो महीने का मौन
कोलंबिया के दीर्घकालीन मृतकों के लिए जिनके नाम
उनकी लाशों की तरह जमा होते रहे
फिर गुम हो गए  और जबान से उतर गए।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूं।
एक घंटे का मौन एल सल्वादोर के लिए
एक दोपहर भर का मौन निकारागुआ के लिए
दो दिन का मौन ग्वातेमालावासियों के लिए
जिन्हें अपनी जिंदगी में चैन की एक घड़ी नसीब नहीं हुई।
45 सेकेंड का मौन आकतिआल, चिआपास में मरे 45 लोगों के लिए,
और पच्चीस साल का मौन उन करोड़ों गुलाम अफ्रीकियों के लिए
जिनकी कब्रें समुंदर में हैं इतनी गहरी कि जितनी ऊंची कोई गगनचुंबी इमारत भी न होगी।
उनकी पहचान के लिए कोई डीएनए टेस्ट नहीं होगा, दंत चिकित्सा के रिकार्ड नहीं खोले जाएंगे।
उन अश्वेतों के लिए जिनकी लाशें गूलर के पेड़ों से झूलती थीं
दक्षिण, उत्तर, पूर्व और पश्चिम
एक सदी का मौन
यहीं इसी अमरीका महाद्वीप के करोड़ों मूल बाशिंदों के लिए
जिनकी जमीनें और जिंदगियां उनसे छीन ली गईं
पिक्चर पोस्टकार्ड से मनोरम खित्तों में…..
जैसे पाइन रिज वूंडेड नी, सैंड क्रीक, फालन टिंबर्स, या ट्रेल ऑफ टियर्स।
अब ये नाम हमारी चेतना के फ्रिजों पर चिपकी चुंबकीय काव्य-पंक्तियां भर हैं।
तो आप को चाहिए खामोशी का एक लम्हा
जबकि हम बेआवाज हैं
हमारे मुंहों से खींच ली गई हैं जबानें
हमारी आंखें सी दी गई हैं
खामोशी का एक लम्हा
जबकि सारे कवि दफनाए जा चुके हैं
मिट्टी हो चुके हैं सारे ढोल।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूं
आप चाहते हैं एक लम्हे का मौन
आपको गम है कि यह दुनिया अब शायद पहले जैसी नहीं रह जाएगी
इधर हम सब चाहते हैं कि यह पहले जैसी हर्गिज न रहे।
कम से कम वैसी जैसी यह अब तक चली आई है।
क्योंकि यह कविता 9/11 के बारे में नहीं है
यह 9/10 के बारे में है
यह 9/9 के बारे में है
9/8 और 9/7 के बारे में है
यह कविता 1492 के बारे में है।
यह कविता उन चीजों के बारे में है जो ऐसी कविता का कारण बनती हैं
और अगर यह कविता 9/11 के बारे में है, तो फिर:
यह सितंबर 9, 1973 के चीले देश के बारे में है,
यह सितंबर 12, 1977 दक्षिण अफ्रीका और स्टीवेन बीको के बारे में है,
यह 13 सितंबर 1971 और एटिका जेल, न्यूयार्क में बंद हमारे भाइयों के बारे में है।
यह कविता सोमालिया, सितंबर 14, 1992 के बारे में है।
यह कविता हर उस तारीख के बारे में है जो धुल-पुंछ रही है और मिट जाया करती है
यह कविता उन 110 कहानियों के बारे में है जो कभी कही नहीं गईं,
110 कहानियां इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में जिनका कोई जिक्र नही पाया जाता,
जिनके लिए सीएनएन, बीबीसी, न्यूयार्क टाइम्स और न्यूजवीक में कोई गुंजाइश नहीं निकलती।
यह कविता इसी कार्यक्रम में रुकावट डालने के लिए है।

आपको फिर भी अपने मृतकों की याद में एक लम्हे का मौन चाहिए?
हम आपको दे सकते हैं जीवन भर का खालीपन:
बिना निशान की कब्रें
हमेशा के लिए खो चुकी भाषाएं
जड़ों से उखड़े हुए दरख्त, जड़ों से उखड़े हुए इतिहास
अनाम बच्चों के चेहरों से झांकती मुर्दा टकटकी
इस कविता को शुरू करने से पहले हम हमेशा के लिए खामोश हो सकते हैं
या इतना कि हम धूल से ढंक जाएं
फिर भी आप चाहेंगे कि
हमारी ओर से कुछ और मौन

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो रोक दो तेल के पंप
बंद कर दो इंजन और टेलिविजन
डूबा दो समुद्र सैर वाले जहाज
फोड़ दो अपने स्टॉक मार्केट
बुझा दो ये तमाम रंगीन बत्तियां
डिलीट कर दो सारे इंस्टेंट मैसेज
उतार दो पटरियों से अपनी रेलें और लाइट रेल ट्रांजिट।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन, तो टैको बैल की खिड़की पर्र ईंट मारो,
और वहां के मजदूरों का खोया हुआ वेतन वापस दो। ध्वस्त कर दो तमाम शराब की दुकानें,
सारे के सारे टाउन हाउस, व्हाइट हाउस, जेल हाउस, पेंटहाउस और प्ले बॉय।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो रहो मौन ‘सुपर बॉल’ इतवार के दिन
फोर्थ ऑफ जुलाई के रोज
डेटन की विराट 13 घंटे वाली सेल के दिन
या अगली दफे जब कमरे में हमारे हसीं लोग जमा हों

और आपका गोरा अपराधबोध आपको सताने लगे।
अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो अभी है वह लम्हा
इस कविता के शुरू होने से पहले।
(11 सितंबर, 2002)

जाहिर है कि 9/11 की घटना के लिए अमेरिका द्वारा दोषी करार दिए गए ओसामा की हत्या के बाद भी अमेरिका से यारी बढ़ाने की बजाए उसकी शैतानियत की लंबी फेहरिश्त के मद्देनजर उसके वास्तविक मंसूबों पर निगाह रखना ज्यादा जरूरी है। आतंकवाद की सचाइयों और साम्राज्यवाद के साथ उसके रिश्ते के आधार को जानना-समझना भी जरूरी है, जैसा कि फिल्मकार माइकल मूर ने अपनी बेहद लोकप्रिय डाक्यूमेंट्री फैरेनहाइट 9/11 में इसका खुलासा किया था कि किस तरह बुश और ओसामा के खानदान के बीच तेल के धंधे में साझीदारी थी। और उनके बीच टकराव में इस धंधे की भी बड़ी भूमिका रही। एक बाद तो तय है कि ओसामा जैसों का आतंकवाद दुनिया से साम्राज्यवाद का नाश नहीं कर सकता और अमेरिकी साम्राज्यवाद जब तक रहेगा तब तक आतंकवाद खत्म नहीं हो सकता।

6 comments on “एक आतंकवादी की मौत और अमेरिकी साम्राज्यवाद के मंसूबे : सुधीर सुमन

  1. Sabyasachi Mishra says:

    आपका लेख अच्छा है, मगर शीत युद्ध के इस नाजायज़ संतान से क्या भारत त्रस्त नहीं है? मोदी का मैं समर्थक नहीं हूँ, मगर कई मामलों में तीस्ता खुद ही सवालों के घ्रेरे में घिर चुकी है. भारत में आतंकवाद का प्रमुख श्रोत कहाँ है, और कौन कौन से समूह हैं? कृपया अपने लेख में इस पर भी लिखते, तो बात पूरी होती. हम अमरीका नहीं हैं, मगर कसाब और अफजल गुरु जैसे आतंकवादियों को खिला रहे हैं , जिनके खिलाफ पुख्ता सबूत हैं. अगर आप भगवा आतंकवाद (जिसके सिर्फ दो या तीन मामले हैं,) कहते हैं, तो हरा या इस्लामी आतंकवाद लिखने का भी साहस कीजिये.

    ओसामा ने अमरीकियों को घर में घुस कर मारा था, अमरीका ने इसका माकूल जवाब दिया. हम कब देंगे?

  2. Sabyasachi Mishra says:

    हाँ, कभी मौका मिले, तो सोचिये कि अगर किसी के हिन्दुस्तानी पासपोर्ट हो तो हिंदुस्तान से बाहर उसके साथ क्या सलूक होता है? और अगर वही आदमी अपना पासपोर्ट बदल ले, तो क्या सलूक होगा. अगर एक अमरीकी को कहीं कुछ होता है, तो अमरीका उसके आन बान के लिए कुछ भी कर देता है, और विदेशों में भारतीय दूतावासों में ही हिन्दुस्तानियों को इज्ज़त नहीं मिलती, दूतावास से बाहर क्या खाक मिलेगी?

  3. Sushil Vihaan says:

    sudhir suman ji ne bilkul thik likha.

  4. Dr.O.P.Vyas says:

    Sbhi ko Prem Se Rhna Chahiye / Mrna To Sbhi Ko Ek Din Jb Pakka Hai /To Aaj To Dhang Se Rhen /Sb Ko Milbaith Kr Tai Krna Hi Pdega /Vrna Ye Silsila Chalta Hi Rhega /..Sb Ko Snmti De Bhagwan /Alla Ishwar Tero Nam //…Dr. O.P.Vyas /18/5/2011/ Brampton Ontario Canada //

  5. GS Bisht says:

    अगर आप भगवा आतंकवाद (जिसके सिर्फ दो या तीन मामले हैं,) कहते हैं, तो हरा या इस्लामी आतंकवाद लिखने का भी साहस कीजिये.

  6. munish says:

    आदरणीय अनुराग जी,
    आपका शुक्रिया की आपने सुधीर सुमन जी के विचारों से अवगत कराया. लेकिन साथ ही साथ जब तक आप अपने विचारों को स्पष्ट न करें तब तक इस लेख की सार्थकता पूरी नहीं होती. कृपया लेख के पक्ष और विपक्ष मैं अपने भी विचार प्रस्तुत करें वर्ना ब्लॉग का क्या फायदा समाचार पत्र ही ज्यादा श्रेयस्कर होगा.
    सुमन जी के लेख को पढ़कर ऐसा लगा जैसे भारतीय या अमेरिकी परिवेश में न होकर तालिबान और ओसामा से ज्यादा प्रभावित हैं. यदि कोई आतंकवादी मारा जाता है तो उसका विरोध क्यों, और ख़ुशी क्यों न मनाएं। ठीक है यदि ओसामा को पैदा करने वाला अमेरिका था तो उसने उसे ख़त्म करके अपनी गलती को सुधरने की कोशिश ही की है. अमेरिका ने ओसामा को मारकर समुद्र में फैकने में कोई हड़बड़ी नहीं की है बल्कि दूरदर्शिता का परिचय दिया है……. क्या आप चाहते थे कि भारतीय सरकारों की तरह आतंकवादियों पालते रहें और फिर कोई प्लेन हाइजैक हो, या किसी का अपहरण हो और उन आतंकवादियों को बाइज्ज़त छोड़ना पड़े…….. तो फिर सुमन जी की बुद्धिवादिता पर तरस आता है.
    आप लिखते हैं की भारत को पाकिस्तान से खतरा है या अमेरिका से…… तो साहब स्पष्ट खतरा तो सबसे पहले चीन से है………पकिस्तान को तो कभी भी भारतीय सेनायें जमिन्दोज़ कर सकती हैं परन्तु चीन में और अमेरिका में क्या फर्क है जरा इस बात का स्पष्टीकरण लेखक महोदय करें. क्या चीन स्पष्ट तौर साम्राज्यवादी नीति पर नहीं चल रहा है. हांगकांग को उसने निगल लिया. तिब्बत का वजूद ख़त्म कर दिया, मंगोल नक्शे से गायब, नेपाल में उसका हस्तक्षेप, म्यांमार में उसका हाथ, और अब भारत में लद्दाख की ज़मीन दबा रखी है अरुणांचल की ज़मीन दबा रखी…….. तो सुमन जी जरा स्पष्ट करें की चीन को वश में करने का स्पष्ट उपाय क्या हैं जबकि माओवादियों और नक्सलियों के रूप आतंकवादियों को भारत में प्रोत्साहित कर रहा है.
    भारत का एक मात्र दोस्त सोवियत संघ का वजूद ख़त्म हो गया, रूस इस लायक नहीं है कि अकेलेदम चीन को रोक सके और शायद भारत तो एक बार चीन के धोके में आकर हार का मुंह भी देख चुका है, अतः राजनीति कहती है की निश्चित ही सिरपर बैठे दुश्मन दबाने के लिए किसी ताकतवर से दोस्ती कर लो………..
    हिटलर भी साम्राज्यवादी था लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ मदद के लिए नेताजी सुभाषचंद्र बोस उसके पास गए थे……..शायद यही सोचकर…….
    पता नहीं जितने भी बुद्धिजीवी भारत में हैं वो सब क्या चीन की तरफ से आँख मूंदकर बैठे हैं और उन घटनाओं पर हायतौबा मचाते हैं जिन से दूरगामी लाभ ही होना होता है. ……..अब मोदी जी के पीछे तो ऐसे पड़े हैं की अगर वो हट जाएँ तो मुख्यमंत्री की गद्दी उन्हें ही मिलेगी………. ये क्यों नहीं सोचते की दंगों के बाद से तीन-तीन बार चुनाव जीतकर आ चुके हैं……. अकेले गुजरात की GDP चीन की GDP से भी अधिक है……… भारत में सबसे ज्यादा सुरक्षित और रहने लायक राज्य वही है. …….. लगातार, देश के पहले नम्बर के मुख्यमंत्री चुने जाते हैं और आज तक वहां दंगों को दोहराया नहीं जा सका वर्ना भारत के हर राज्य में दंगे हुए हैं….
    अब चलते चलते ये कविता उन बुद्धिजीवियों के नाम जो खाते इस देश की हैं बजाते दूसरे देश की हैं
    जिनके पेट में दर्द तब होता है जब कोई
    आतंकवादी मरता है,
    आम आदमी के लिए तो मुहं पर ताला रहता है.

    और अनुराग जी से अनुरोध है की जैसे उन्होंने सुधीर सुमन जी के विचारों से अवगत कराया है कृपया हमारी ये विशेष टिप्पणी भी उन तक पहुंचा दें और अपने विचारों से अवगत अवश्य कराएं वर्ना ये ब्लॉग भी मेरे ही हवाले कर दें मैं अपनी विशेष टिप्पणी जरूर दूंगा…..हा हा हा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>