- काव्य पाठ करते उपेन्द्र कुमार। साथ में मैनेजर पांडेय।
नई दिल्ली : कवि उपेन्द्र कुमार की कविता की बनावट और उनके विषयों में विविधता है। अपनी सहजता और संवेदनशीलता से वह केवल मन को ही नहीं, बुद्धि को भी छूती हैं। प्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पांडेय ने यह विचार 15 जून 2012 को इंडियन सोसायटी ऑफ ऑथर्स के मासिक कार्यक्रम ‘मैं कौन हूँ’ में उपेन्द्र कुमार की कविताओं पर टिप्पणी करते व्यक्त किये। वह इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुए इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे। उन्होंने कहा कि उपेन्द्र कुमार की कविता में ग्रामीण जीवन की झलक और व्यंग्य की धार उसे और तीखा कर देती है। उनकी कविताओं पर नागार्जुन और भवानी प्रसाद मिश्र, दोनों के प्रभावों को महसूस किया जा सकता है।
इससे पहले कवि और व्यंग्यकार उपेन्द्र कुमार ने अपनी लेखन यात्रा पर चर्चा करते हुआ कहा की मैं अपने लेखन में भोजपुरी समाज को पुनर्जीवित करना चाहता हूँ। इस समाज की दीनता, करुणा और पौरुष की समझ ने मेरी कवि दृष्टि को निरंतर विकसित और समृद्ध किया है। अपने प्रारंभिक कविता लेखन, कविताओं की वापसी और अपने पहले कविता संग्रह ‘बूढ़ी जड़ों का नवजात जंगल’ के लिये अज्ञेय, अमृता प्रीतम और भवानी प्रसाद मिश्र से दो शब्द लिखवाने के मर्मस्पर्शी संस्मरण सुनाते हुए उन्होंने अपनी कविताओं ‘सत्तू’, राजनीतिक व्यंग्य की कवितायें ‘खेल’, ‘संसद’, ‘पूछ मत लेना’, ‘बांकेलाल’ आदि सुनाईं। श्रोताओं के अनुरोध पर अंत में कुछ छोटी-छोटी कई प्रेम कवितायें भी प्रस्तुत कीं।
1947 में बिहार के बक्सर में जन्में उपेन्द्र कुमार का पहला कविता संग्रह 1980 में प्रकाशित हुआ। तब से अब तक आपके सात कविता संग्रह और दो गज़ल संग्रह आ चुके हैं। हिन्दी अकादमी, दिल्ली के कृति और साहित्यकार सम्मान से सम्मानित उपेन्द्र कुमार कहानी और समीक्षा लेखन में भी सक्रिय हैं।
कार्यक्रम का संचालन सोसायटी ऑफ ऑथर्स के अध्यक्ष दिनेश मिश्र ने किया व अन्य व्यवस्थाओं का प्रबंध सचिव विवेक गौतम ने किया। कार्यक्रम में गंगाप्रसाद विमल, मदन कश्यप, वीरेन्द्र वरनवाल, भारत भारद्वाज, कमल कुमार आदि उपस्थित थे।
प्रस्तुति: अजय कुमार शर्मा



बहुत सही कहा है पाण्डेय जी ने .