आइसक्रीम का नाम सुनते ही बच्चों ही नहीं, बड़ों के मुँह में भी पानी आ जाता है। आइसक्रीम की दिलचस्प कहानी बयां कर रहे हैं कथाकार प्रकाश मनु-
अगर आज बच्चों से उनकी सबसे प्रिय खाने की चीज के बारे में पूछा जाये, तो ज्यादातर बच्चों का जवाब होगा—आइसक्रीम! खाने-पीने की कोई शानदार पार्टी हो, या फिर कोई मेला या उत्सव, बच्चों की उत्सुक निगाहें सबसे पहले आइसक्रीम को ढूँढ़ती हैं। खाने-पीने को कुछ और मिले या न मिले, मगर आइसक्रीम जरूर चाहिए। और जी भरकर आइसक्रीम खाने के बाद भी उनकी तबीयत होती है—काश, थोड़ी-सी फलाँ आइसक्रीम या सॉफ्टी या चॉकबार और मिल जाती, तो मजा आ जाता! यों भी किसी को वैनिला और स्ट्राबरी पसंद है, तो किसी को कसारा, चॉकबार और केसर पिस्ता! और ऐसे बच्चे भी कम नहीं जो वैनिला या स्ट्राबरी खाते हुए मन-ही-मन खयालों में उड़ रहे होते हैं कि काश, इसके बाद कसारा या केसर पिस्ता और मिल जाती तो क्या कहने!
यों आइसक्रीम अब कोई दुर्लभ चीज नहीं रही। शायद ही कोई छोटा या बड़ा शहर या कसबा हो, जहाँ रोशनी में जगमगाता आइसक्रीम पार्लर या फिर लुभावने पोस्टरों से सजे, किस्म-किस्म की स्वादिष्ट आइसक्रीम बेचने वाले ठेले न हों! हालाँकि बच्चे अपनी इस पसंदीदा चीज को मजे से खाते हुए शायद ही कभी सोचते हों, कि यह आइसक्रीम जो आज इतनी असानी से मिल जाती है, कभी इतनी दुर्लभ थी कि बड़े-बड़े राजाओं के दरबारों या फिर धनी लोगों की पार्टियों में ही नजर आती थी। ज्यादातर लोग इस ‘ठंडी स्वादिष्ट मिठाई’ के लिये तरसते थे! और सच तो यह है कि आइसक्रीम की कहानी कोई सौ-दो सौ साल पहले की नहीं, बल्कि तकरीबन ढाई हजार साल पुरानी है और इतिहास में अनेक महान हस्तियों के साथ, अनेक प्रसंगों में उसका जिक्र मिलता है।
शुरू में बगैर दूध के आइसक्रीम बनाने का चलन था। यह आइसक्रीम कभी ठोस रूप में होती तो कभी आधी जमी हुई। इसमें फलों का रस, चीनी और पानी का इस्तेमाल होता था। सदियों पहले चीन, तुर्की, भारत और एशिया के कई देशों में आइसक्रीम का प्रचलन था। उसके बाद यूरोपीय देशों में भी आइसक्रीम का प्रचलन हुआ और निरन्तर बढ़ता गया।
आइसक्रीम की कहानी का एक छोर ढाई हजार बरस पहले, विश्वविजयी सिकंदर से जुड़ता है। सिकंदर ने जब मिस्र को जीता, तो उसने जीत का जश्न मनाने के लिये ढेर सारी आइसक्रीम तैयार करने का आदेश दिया। हालाँकि यह आज की आइसक्रीम से अलग थी। सिकंदर के आदेश पर पंद्रह बड़े-बड़े गड्ढे खोदे गये। फिर उन्हें पहाड़ के ऊँचे शिखरों से लाई गई मुलायम, दूधिया बर्फ से भरने के लिये कहा गया, ताकि महान सिकंदर इस ठंडी मिठाई का भरपूर आनंद ले सके।
यों आइसक्रीम की कहानी आज से कोई ढाई हजार बरस पहले से शुरू होती है। कहा जा सकता है कि किसी न किसी रूप में तब आइसक्रीम या ऐसी ही कोई चीज एक स्वादिष्ट मिठाई के रूप में मौजूद थी। इसके बाद तो आइसक्रीम के होने के काफी पक्के प्रमाण मिलने लगते हैं। ईसा की पहली शताब्दी में रोम के शासक नीरो ने अपने सेवकों को आदेश दिया था कि पहाड़ों से बर्फ लाई जाये और उसे फलों के रस और शहद में मिलाकर यह ठंडी मिठाई तैयार की जाए!
इसके बाद सातवीं शताब्दी में चीन के राजा तांग ने बर्फ और दूध को मिलाकर आइसक्रीम बनाने का तरीका खोज निकाला। सारी दुनिया में स्वादिष्ट आइसक्रीम बनाने की कला को लेकर चीन का दूर-दूर तक नाम हो गया। तब चीन से आइसक्रीम यूरोप में पहुँची और तरह-तरह के रूपों में इटली और फ्रांस के राज दरबारों में पेश की जाने लगी।
कहा जाता है कि प्रसिद्ध विश्व-यात्री मार्को पोलो जब लंबे समय तक चीन में रहने के बाद इटली लौटा, तो अपने साथ-साथ आइसक्रीम तैयार करने की कला लेकर गया था। और इस तरह आइसक्रीम देखते ही देखते दुनिया के दूसरे देशों में जा पहुँची। कैथेरीन मेडिसी फ्रांस की रानी बनीं, तो उनके साथ आइसक्रीम बनाने की कला फ्रांस भी जा पहुँची। और फिर देखते ही देखते फ्रांस के राज दरबार और रईसों की पार्टियों में भी आइसक्रीम नई सज-धज के साथ सामने आने लगी।
आधुनिक काल में आइसक्रीम को लोकप्रियता दिलाने में अमेरिका का बड़ा हाथ है। अमेरिका में न सिर्फ आइसक्रीम बनाने की नई-नई विधियाँ खोजी गईं, बल्कि दावतों और पार्टियों में आइसक्रीम परोसने और मेलों में आइसक्रीम बेचने के नये-नये अंदाज सामने आने लगे। सन् 1750 में मैटीलैंड के गवर्नर ब्लैडन ने अपने मेहमानों को आइसक्रीम की दावत दी थी। अठारहवीं शताब्दी के आखिर में फिलिप लेजी नाम के लंदन के एक मिठाई बेचने वाले व्यापारी ने ‘न्यूयार्क’ अखबार में घोषणा की कि वह आइसक्रीम समेत किस्म-किस्म की मिठाइयाँ बेचने जा रहा है। उसकी इस घोषणा ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। अमेरिका में पहला आइसक्रीम पार्लर भी अठारहवीं शताब्दी में ही खुला और उसके बाद तो सचमुच आइसक्रीम की कहानी को पंख लग गये। सब ओर उसकी धूम मच गई। कहा जाता है कि अमेरिका की बड़ी हस्तियाँ, जिनमें जॉर्ज वाशिंगटन भी थे, आइसक्रीम के खासे शौकीन थे।
आइसक्रीम को यह नाम कैसे मिला? इसका श्रेय भी अमेरिका को ही जाता है। पहले इसे ‘आइस्ड क्रीम’ यानी ‘ठंडी की गई क्रीम’ कहा जाता था। पर बाद में धीरे-धीरे संक्षिप्त होकर इसका कहीं अधिक सुंदर और आकर्षक नाम ‘आइसक्रीम’ हो गया, जो अब पूरी दुनिया में फैल चुका है।
अब तक आइसक्रीम बनाने की नई से नई विधियाँ खोज ली गई थीं। जब पैडल से चलने वाला लकड़ी का फ्रीजर बना, तो इसके निर्माण में एकाएक तेजी आ गई। सन् 1832 में फिलेडेल्फिया के एक मिष्ठान्न निर्माता ऑगस्टस ने आइसक्रीम बनाने का एक नया तरीका खोजा। किन-किन चीजों को, किस अनुपात में मिलाने से स्वादिष्ट आइसक्रीम तैयार होती है, उसने यह खोज की। यह आइसक्रीम बहुत कुछ आज मिलने वाली आइसक्रीम जैसी थी।
नैन्सी जॉनसन नाम की इंग्लैंड की एक महिला ने सन् 1846 में हाथ से चलने वाले फ्रीजर की खोज की। इससे आइसक्रीम बनाने का सही, वैज्ञानिक तरीका खोज लिया गया, जो कमोबेश आज भी इस्तेमाल होता है। नैन्सी जॉनसन ने तो अपने आविष्कार को पेटेंट नहीं करवाया, पर आगे चलकर विलियम जी. चंच ने सन् 1848 में जॉनसन द्वारा निर्मित आइसक्रीम फ्रीजर को उसी के नाम के साथ पेटेंट करवाया।
इसके बाद आइसक्रीम के निर्माण में एक बड़ी छलाँग सन् 1851 में दिखाई दी। कारण यह था कि इसी वर्ष बाल्टीमोर के जेकब फसेल ने बड़ी मात्रा में आइसक्रीम तैयार करने का व्यापारिक संयंत्र कायम किया। जाहिर है, इसके साथ ही आइसक्रीम के निर्माण और प्रचार में आश्चर्यजनक तेजी आई। दूसरे व्यापारियों में भी इसी तरह के संयंत्र लगाकर आइसक्रीम बनाने की होड़ नजर आने लगी। इसे आइसक्रीम की विश्व-यात्रा का एक बड़ा और महत्त्वपूर्ण पड़ाव कह सकते हैं।
अब सभी का ध्यान आइसक्रीम को खूबसरत ढंग से सर्व करने की ओर गया और उसे परोसने के लिये आकर्षक, डिजायनदार कप तैयार करने की कोशिशे हुईं। आखिर उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में अल्फ्रेड एल. क्रेल ने खूबसूरत ढंग से आइसक्रीम ‘सर्व’ करने के लिए सुंदर डिजाइन वाले कप-प्लेट ईजाद किये, जिससे आइसक्रीम का पूरा आनंद लिया जाये। जाहिर है, अब तक आइसक्रीम का खूब प्रसार होने के साथ-साथ वह सभ्य समाज की पहचान भी बन चुकी थी।
इसके बाद फ्रिज या रेफ्रिजरेटरों की ईजाद और उनके घर-घर पहुँचने पर तो आइसक्रीम को जमाना एक साथ सस्ता और आसान भी हो गया। इस दिशा में एक बड़ी कामयाबी तब मिली, जब आइसक्रीम जमाने का ऐसा फ्रीजर बना लिया गया, जो बिना रुके, लगातार काम करता था और व्यावसायिक रूप से सस्ता भी था। फिर तो आइसक्रीम की सब ओर दुंदुभी बजने लगी।
इसके बाद आइसक्रीम के नये-नये लुभावने रूप खोजे गये। इनमें सबसे लोकप्रिय हुआ आइसक्रीम कोन, क्योंकि यह बेहद सुविधाजनक था और मेले तथा उत्सवों में चलते-फिरते उसका आनंद लिया जा सकता था। सन 1904 में लुइस विश्व मेले में सबसे पहले ऐसे कोन देखे गये, जिनमें आइसक्रीम भरकर उन्हें चलते-फिरते खाया जा सकता था। कई व्यापारी अच्छे से अच्छे, सुंदर और कलात्मक कोन बनाकर उनमें आइसक्रीम पेश करने लगे, ताकि उनकी बिक्री बढ़े। इनमें लेबनान का एक व्यापारी अबे ड्रमर भी था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि आइसक्रीम कोन बनाने की मशीन तैयार करने वाला पहला शख्स अबे ड्रमर ही था। यों आइसक्रीम कोन बनाने का इतिहास खासा लम्बा है और किसी एक को उसका श्रेय देना मुश्किल है। कई लोग इस दिशा में एक साथ सोच रहे थे, ताकि आइसक्रीम की लोकप्रियता से ज्यादा से ज्यादा लाभ हासिल किया जा सके। धातु के सुन्दर और आकर्षक कोन बनाने के साथ-साथ, कागज के कोन भी बनाए गये।
सन् 1904 में सेंट लुइस स्थान के चार्ल्स ई. मेचेंस के मन में ‘पेस्ट्री कोन’ बनाने का विचार आया और उसी ने पहला आइसक्रीम कोन बनाया। कहा जाता है कि इस साल सेंट लुइस विश्व मेले में कम से कम पचास जगहों पर ऐसे आइसक्रीम कोन मिल रहे थे। इससे पता चलता है कि एक ही समय में कई लोगों ने एक साथ आइसक्रीम का यह रूप खोजा था, जो आज भी खासा लोकप्रिय है। खासकर मेलों और उत्सवों का तो यह खास आकर्षण ही है और हलकी धूप वाले गुनगुने मौसम में, इसे टहलते हुए खाने का आनंद ही कुछ और है! बहरहाल, इतना तय है कि बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में सेंट लुइस के विश्व मेले में कोन प्रसिद्ध हुए और एकाएक दुनिया भर में छा गये थे।
इसके बाद आइसक्रीम का युग आया। इसके आविष्कार की कहानी भी खासी रोचक है। इसे बनाने का विचार आयोवा के एक दुकानदार के मन में आया। यह सन् 1920 के आसपास की बात है। हुआ यह कि एक बच्चा उसके पास आइसक्रीम खरीदने आया। उसे यह तय करने में मुश्किल आ रही थी कि वह आइसक्रीम सेंडविच ले या फिर चॉकलेट बार? तब नेल्सन के मन में एक नया विचार आया। उसने एक आइसक्रीम बार खोज निकाली, जिसके ऊपर चाकलेट की हलकी सी परत थी। सन् 1934 में चाकलेट से मढ़ी हुई यह नये ढंग की, अनोखी आइसक्रीम बार खोज ली गई, जो आज भी ज्यादातर बच्चों की पहली पसंद है। और अब तो लोगों की जरूरतों के हिसाब से ऐसी आइसक्रीम भी खोज ली गई हैं, जिनमें चीनी नहीं है तथा जो कतई मोटापा नहीं बढ़ाती।
आइसक्रीम की लोकप्रियता बढऩे के साथ-साथ, तरह-तरह की आइसक्रीम खोजने की जो होड़ लग गई। सन् 1960 में रुबेन मैट्स ने एक अलग तरह की आइसक्रीम खोजकर उसे अनोखा नाम ‘हैगन डाज’ दिया। इसी समय लियो स्टीफेनस ने ‘डब बार’ खोजी। इससे भी मजेदार थी ‘गुड ह्यूअर आइसक्रीम बार’ की खोज। इसे बेचने का भी एक नायाब तरीका खोज निकाला गया। सफेद ट्रकों का एक खूबसूरत काफिला उन्हें बेचने के लिये निकला। इन ट्रकों पर मीठी ‘रुन-झुन, रुन-झुन’ करने वाली घंटियाँ लगी थीं और एक ही तरह की पोशाक वाले ड्राइवर बैठे थे, जो खरीदने वालों को अपने इस अनोखे रूप से चकित और आकर्षित करते थे। जाहिर है, इस आइसक्रीम का जैसा दिलचस्प नाम था, उसे बेचने का तरीका भी वैसा ही मनोरंजक था, जिसने सभी को लुभाया। कुछ इतिहासकार इसी को पहली आइसक्रीम बार मानते हैं।
बेशक आइसक्रीम आज अपनी लोकप्रियता के शिखर पर है और उसने प्रसिद्धि की दौड़ में दुनिया की सारी स्वादिष्ट मिठाइयों को पीछे छोड़ दिया है। बड़े हों या बच्चे, सभी आइसक्रीम के दीवाने हैं—शायद इसलिए कि यह ऐसी लाजवाब चीज है, जिसे कितना ही खाओ, मन नहीं भरता! इसलिए आइसक्रीम की कहानी जो पिछले ढाई हजार सालों से चली आती है, उम्मीद है, अभी हजारों सालों तक मनुष्य के साथ-साथ यात्रा करेगी। उसके नये-नये लुभावने रूप सामने आएँगे तथा उसका स्वाद और आनंद कभी कम न होगा!
(‘अनोखी कहानियाँ ज्ञान-विज्ञान की’ से साभार)
सभी चित्र : कीर्ति मित्तल, कक्षा 11





रोचक एवं उपयोगी जानकारी! आभार!
रोचक ज्ञानवर्धक जानकारी, मजेदार शैली में. मनुजी का आभार, आभार कीर्ति का भी जिन्होंने इस आलेख को चित्रों से सजाया है.
BHARPOOR JAANKAAREE DENE KE LIYE MANU JI KO BADHAAEE AUR SHUBH KAMNA.
आइसक्रीम का रसास्वादन तो लोगों ने खूब किया होगा, लेकिन शायद ही किसी को इसका इतिहास मालूम रहा होगा। मनु जी ने आइसक्रीम के बारे में विस्तार से जानकारी देकर इसकी शान और बढ़ा दी। इसी बात पर तपती गरमी हो जाए एक-एक आइसक्रीम।
बहुत बढ़िया