अश्‍लील: हरिशंकर परसाई

चैनलों पर अश्‍लील और फूहड़ कार्यक्रमों का प्रसारण धड़ल्‍ले से हो रहा है। कॉमेडी के नाम पर द्व‍िअर्थी डॉयलॉग बोलकर जबरदस्‍ती दांत दिखाए जा रहे हैं। स्थिति इतनी खराब हो गई है कि समाचारों में भी इन कार्यक्रमों की बेहूदगियों सुर्खियां बनाई जा रही हैं। हालांकि सड़क से लेकर संसद हर कोई इनका विरोध कर रहा है, लेकिन फिर भी इनका प्रचार-प्रसार बढ़ता जा रहा है। नया कार्यक्रम शुरू होता है तो वह पहले से ज्‍यादा फूड़ह भी होता है और हिट भी। ऐसा क्‍यों हो रहा है। इसका जवाब देता वरिष्‍ठ व्‍यंग्‍यकार हरिशंकर परसाई का व्‍यंग्‍य-

शहर में ऐसा शोर था कि अश्‍लील साहित्‍य का बहुत प्रचार हो रहा है। अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्‍लील पुस्‍तकें बिक रही हैं।

दस-बारह उत्‍साही समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनाई और तय किया कि जहां भी मिलेगा हम ऐसे साहित्‍य को छीन लेंगे और उसकी सार्वजनिक होली जलाएंगे।

उन्‍होंने एक दुकान पर छापा मारकर बीच-पच्‍चीस अश्‍लील पुस्‍तकें हाथों में कीं। हरके के पास दो या तीन किताबें थीं। मुखिया ने कहा- आज तो देर हो गई। कल शाम को अखबार में सूचना देकर परसों किसी सार्वजनिक स्‍थान में इन्‍हें जलाएंगे। प्रचार करने से दूसरे लोगों पर भी असर पडे़गा। कल शाम को सब मेरे घर पर मिलो। पुस्‍तकें में इकट्ठी अभी घर नहीं ले जा सकता। बीस-पच्‍चीस हैं। पिताजी और चाचाजी हैं। देख्‍ लेंगे तो आफत हो जाएगी। ये दो-तीन किताबें तुम लोग छिपाकर घर ले जाओ। कल शाम को ले आना।

दूसरे दिन शाम को सब मिले पर किताबें कोई नहीं लाया था। मुखिया ने कहा- किताबें दो तो मैं इस बोरे में छिपाकर रख दूं। फिर कल जलाने की जगह बोरा ले चलेंगे।

किताब कोई लाया नहीं था।

एक ने कहा- कल नहीं, परसों जलाना। पढ़ तो लें।

दूसरे ने कहा- अभी हम पढ़ रहे हैं। किताबों को दो-तीन बाद जला देना। अब तो किताबें जब्‍त ही कर लीं।

उस दिन जलाने का कार्यक्रम नहीं बन सका। तीसरे दिन फिर किताबें लेकर मिलने का तय हुआ।

तीसरे दिन भी कोई किताबें नहीं लाया।

एक ने कहा- अरे यार, फादर के हाथ किताबें पड़ गईं। वे पढ़ रहे हैं।

दसरे ने कहा- अंकिल पढ़ लें, तब ले आऊंगा।

तीसरे ने कहा- भाभी उठाकर ले गई। बोली की दो-तीन दिनों में पढ़कर वापस कर दूंगी।

चौथे ने कहा- अरे, पड़ोस की चाची मेरी गैरहाजिर में उठा ले गईं। पढ़ लें तो दो-तीन दिन में जला देंगे।

अश्‍लील पुस्‍तकें कभी नहीं जलाई गईं। वे अब अधिक व्‍यवस्थित ढंग से पढ़ी जा रही हैं।

(विकलांग श्रद्घा का दौर से साभार)

9 comments on “अश्‍लील: हरिशंकर परसाई

  1. होते थे पहले भी ऐसे भाईसाहब और भाभियां जो कहते थे रजनीश पाखंडी है और अपने तकिए तले सत्यकथाएं और मनोहर कहानियां दाबे रखते थे। जब तक आदमी अपने-आपसे बेईमान है, यह सब चलता रहेगा।

  2. k.v. mittal says:

    AAJ KA MANUSHYA DOHARA CHARITRA JEETA HAI.USKA VIRODH SAMAJ SE AIK DHIKHAWA HAI, VASTAV MAIN VAH BE USI SAMAJ KA AIK ANG HAI. AGAR IS ASHLILTA KO MITANA HAI TO PAHELE KUD KE UNDER KI GANDAGI KO MITANA HOGA.

  3. मारक व्यंग्य। अद्भुत। शुक्रिया आपका।

  4. pravin saxena says:

    its wonderful story. We have to be serious against such cheap & double meaning programmes for the sake of our children.

  5. ravi buley says:

    बहुत शानदार

  6. a.n.dubey says:

    बस इतना ही कह सकता हूं कि अच्‍छी पेशकश

  7. सुशील राघव says:

    अच्‍छा व्‍यंग्‍य है। अनुराग जी आपका धन्‍यवाद

  8. gaurav tyagi says:

    acha vyang ha anurag ji

  9. vivek tyagi says:

    परसाई जी का व्यंग्य शानदार है। उन्होंने इस छोटे से व्यंग्य के माध्यम से लोगों की मानसिकता की सटीक चित्रण किया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>