लेकिन सपने साकार करना बहुत मुश्किल। सपनों को साकार करने के लिए किस तरह की दृढ़ इच्छा शक्ति की जरूरत होती है, कैसे सुख-आराम भूल जाना पड़ता है और किस तरह लगन से काम किया जाता है, इसकी मिसाल हैं- समांतर कोश के कोशकार अरविंद कुमार।
मेरठ के मशहूर लाला के बाजार में कानूनगो खानदान है। इस खानदान के तीन हिस्से हुए। एक लाला वाले, दूसरा पत्थर वाले और तीसरा कोरट (कोर्ट) वाले। इन तीनों के संस्थापक पुरुष लाला घीराज माने जाते हैं। उनके बारे में प्रसिद्ध है कि उनका जन्म मां की चिता पर हुआ। उन्हें घी की घड़े में रखा गया था। इसलिए उनका नाम घीराज पड़ गया। बाद में वह औरंगजेब के लॉ मिनिस्टर बने, इसलिए कानूनगो कहलाये। एक तरफ खानदान के लोगों को गर्व है कि हमारे संस्थापक पुरुष औरंगजेब के लॉ मिनिस्टर थे, दूसरी तरफ वे औरंगजेब से नफरत करते हैं। यह अजीब विरोधाभास है।
लाला बाजार की कानूनगो स्ट्रीट में अरविंद कुमार का जन्म सकट चौथ के दिन 17 जनवरी, 1930 को हुआ। इसलिए बचपन में उन्हें सकटू कहते थे।
मेरठ के बनिये आमतौर पर मुसलमानों से घृणा करते थे, लक्ष्मण स्वरूप जैसे कुछ लोगों को छोड़कर। अरविंद कुमार ने बचपन में अकसर कहानियां सुनीं कि यदि कोई मक्का जाकर संगे असवद पर गंगाजल छिड़क दे तो इस्लाम खत्म हो जाएगा। यह नेक काम करने की बहुत बड़ी आकांक्षाएं थी लोगों की! ऐसे रूढि़वादी समाज में अरविंद कुमार के पिता लक्ष्मण स्वरूप क्रांतिकारी विचारधारा के थे। वह आर्य समाज और कांगे्रस के सक्रिय कार्यकर्ता थे।
जब अरविंद कुमार का जन्म हुआ, तब लक्ष्मण स्वरूप स्वतंत्रता आंदोलन में जेल में थे। छूटे तो उन्हें जेल से सर्टिफिकेट मिला। उन्होंने सर्टिफिकेट फाड़ दिया, ”क्या करना है इसका।ÓÓ उन्होंने बाद में पेंशन नहीं ली। उनका कहना था कि आजादी की लड़ाई अपनी मर्जी से लड़ी थी, पैसे थोड़े ही वसूलने थे।
लक्ष्मण स्वरूप के एक बड़े और दो छोटे भाई थे। एक छोटे भाई एकाउंटेंट थे, दूसरे ओवरसीयर। सबसे बड़े भाई अविभाजित पंजाब में पीडब्ल्यूडी में चीफ इंजीनियर थे। उन्हें राय बहादुर का खिताब मिला था।
लक्ष्मण स्वरूप आठवींं-नौंवी में पढ़ रहे थे। गांधीजी के आह्वान पर स्कूल छोड़ दिया। मेरठ में देवनागरी इंटर कॉलेज की स्थापना हुई। वह इसके संस्थापकों और पहले बैच के विद्यार्थियों में से थे। अकसर जेल जाया करते थे। बाद में कोर्ट में मुख्तारी की। उन्हें लोग मुख्तार साहब कहते थे। उन्हें मुख्तारी आती नहीं थी, कोर्ट में बोल पाते नहीं थे। इस वजह से कोई विशेष आमदनी भी नहीं होती थी। लक्ष्मण स्वरूप को प्रिंटिंग पे्रस खोलने का चाव था। उन्होंने साझे में कई प्रिंटिंग पे्रस खोलीं। हर बार असफलता ही हाथ लगी। क्योंकि एक तो उनको पार्टनर से धोखा मिलता था, दूसरा सीधे-सादे लक्ष्मण स्वरूप को ग्राहकों से पैसा वसूलना नहीं आता था। मजबूरन 1943 में दिल्ली जाकर नौकरी करनी पड़ी। वह सीओडी में दफ्तरी टाइप की कोई मामूली-सी नौकरी थी। देवनगर, करोलबाग में रहते थे। पैदल सराय रोहल्ला जाते थे। वहां से रेल पकड़कर केन्टोनमेंट स्टेशन उतरकर दफ्तर के लिए कई मील पैदल जाना पड़ता।
अरविंद परिवार में पहले बच्चे थे, जिसकी पढ़ाई हिंदी में शुरू हुई। सबको उर्दू पढ़ाई जाती थी। उन्होंने भी उर्दू घर पर मौलवी साहब से सीखी। वह पढऩे में होशियार थे। पत्थर वाले के म्युनिसपैलटी के स्कूल में पढ़ते थे। मास्टरजी के सवाल पूरा करने से पहले ही जवाब दे देते थे। मास्टर जी पूछते- आठ जमा सात…. अरविंद कुमार तुरंत उत्तर देते- पंद्रह।
अरविंद पढऩे में होशियार थे इसलिए लक्ष्मण स्वरूप ने चौथी के बाद सीधा सातवीं में दाखिला करा दिया। तब पहली क्लास का सर्टिफिकेट नहीं मांगते थे। कई बच्चे तो घर पर ही ट्यूटर से आरंभिक शिक्षा पा कर प्रवेश परीक्षा देकर उचित क्लास में दाखिल हो जाते थे। वैश्य स्कूल में दाखिले के इम्तहान में अरविंद पास हो गए। लेकिन तीन सालों के अंतर के कारण वह पढ़ाई में कमजोर हो गए। सातवीं और आठवीं प्रमोशन से पास की। अब देवनागरी स्कूल में नौवीं में दाखिला लिया।
उन दिनों लक्ष्मण स्वरूप दिल्ली आ चुके थे। अरविंद कुमार दादाजी और छोटे भाई के साथ मेरठ ही रहे। उनके पास जूते नहीं थे। उन्होंने पिताजी से कहा। लक्ष्मण स्वरूप ने पत्र लिखा, ‘पे्रस के मैनेजर से आठ आने लेकर जापानी जूते ले आना।Ó
मैनेजर ने पैसे नहीं दिए। अरविंद बिना जूते ही रहे।
मेरठ में दूसरे बाबा के साथ रहते अरविंद का मन पढ़ाई में नहीं लगा। इसलिए वह नौवीं में फेल हो गए। यह फेल होना उनके लिए अच्छा साबित हुआ क्योंकि तीन साल का जो अंतर था, उसे पूरा करने का मौका मिल गया। नौवीं की परीक्षा देकर वह दिल्ली आ गए। यहां करोलबाग गुरद्वारे में नए-नए खुले खालसा स्कूल में नौवीं में दोबारा एडमीशन ले लिया।
अरविंद कुमार छह भाई-बहन थे। उनसे छोटी बहन सरोज को कमर की टी.बी. हो गई थी। कूब निकल आयी थी। अरविंद नौवीं में पढ़ते थे। सरोज का इलाज कराने के लिए पैसे नहीं थे। कमर सीधी करने के लिए लेडी इर्विन (लोकनायक जय प्रकाश) अस्पताल में प्लास्टर चढ़वाया गया। प्लास्टर कटवाने तथा तांगे में जाने के लिए पैसे नहीं थे। इसलिए घर में ही प्लास्टर काट दिया। वह नहीं बची।
26 मार्च, 1945 को अरविंद का दसवीं का इम्तहान खत्म हुआ। 1 अपे्रल को दिल्ली पे्रस में नौकरी कर ली। वह दिल्ली पे्रस में कैसे आया, इसकी भी एक कहानी है।
दसवीं का इम्तहान दे दिया था। उनके सामने सवाल यह था कि आगे पढूं या न पढूं? बहुत बड़ा कारण पैसे की कमी था। परिवार स्वाभिमानी था। ताऊजी पंजाब में पी.डब्ल्यू.डी. में चीफ इंजीनियर थे। उन्होंने अरविंद को आगे पढ़ाने का प्रस्ताव रखा, जिससे वह ओवरसीयर बन जाए। अरविंद जी की मां को किसी का एहसान लेना पसंद नहीं था। उन्होंने कहा कि यह हमेशा आपके एहसानों के नीचे रहेगा। ओवरसीयर बनकर क्या करेगा, रिश्वत खाएगा। मुझे रिश्वत नहीं खिलानी। इस तरह उनके लिए यह रास्ता बंद हो गया।
उस जमाने में लोग मैट्रिक के बाद आमतौर पर क्लर्की करते थे। कोई और विकल्प नहीं था। लक्ष्मण स्वरूप बेटे को क्लर्क नहीं बनाना चाहते थे। चाहे शुरू में पैसे ज्यादा मिलते। उन्होंने अरविंद से कहा, ”तुम्हारे हाथ में कोई हुनर होना चाहिए। तुम कम्पोजिंग सीख लोगे तो कभी भूखे नहीं मरोगे।ÓÓ दिल्ली पे्रस के मालिक अमरनाथ अरविंद के फूफा थे। इसलिए दिल्ली पे्रस को चुना गया।
मोहम्मद शफी डिस्ट्रीब्यूशन के फोरमैन थे। उन्होंने अरविंद को गंडा बांधा। अरविंद ने पांच किलो लड्डू और दस रुपये गुरु दक्षिणा के दिए। बाकायदा सेरेमनी हुई। एक और लड़का बलबीर साथ काम करता था। मोटे थुलथुल शफी साहब बहुत बढिय़ा आदमी थे। अरविंद जी ने इनसे बहुत कुछ सीखा। असल में समांतर कोश की नींव इसी दौरान पड़ी।
उन्होंने दो-तीन बातें सीखीं। अक्षर होते हैं। अंगे्रजी में ए, बी, सी, डी और हिंदी में अ, आ, क, ख, ग आदि। हिंदी के कई शब्द एक से ज्यादा टाइप को जोड़कर बनते। मात्राएं लगाने के कई तरीके होते। बड़ी पेचीदा प्रक्रिया थी। इन सबके खाने होते हैं। खाने केसों में बने होते हैं। अंगे्रजी में दो केसों से काम चल जाता है। हिंदी में चार केस लगते हैं। पहली बात तो यही सीखी कि आवश्यकता पडऩे पर केस घटाए या बढ़ाए जा सकते हैं। इसके अलावा अक्षर कई फौंट के होते हैं। उनके लिए भी बहुत से केस होते हैं। केस बढ़ गए। फिर रूल, लैड, क्वाड होते हैं। गुल्लियां होती हैं। जो छपता है, उसके टाइप को डिस्ट्रीब्यूट करते हैं। आंखों से देखकर मालूम होना चाहिए कि ये कौन सा फौंट है, हाथ की पकड़ से पता चल जाना चाहिए कि किस साइज का है? दूसरी बात यह मालूम पड़ी कि छपा हुआ हिस्सा उठा हुआ होता है। जो चीज नहीं छापनी होती वह गड्ढे में होती है। जो गड्ढे में होती है, उसे स्पेस कहते हैं। ये बातें समांतर कोश पर काम करने के दौरान काम आयीं। अरविंद जी का कहना है कि छापेखाने में मैं अक्षर डिस्ट्रीब्यूट करता था। समांतर कोश बनाते समय मुझे शब्दों को खानों में डालना भर था। कहीं कोई खाना कम दिखा तो नया खाना बना लिया। बस- यही करना था।
अप्रैल के अंत में हाई स्कूल का रिजल्ट आया। अरविंद जी की चार विषयों संस्कृत, गणित, अंगे्रजी और हिंदी में डिस्टिंक्शन थी। बाद में एक चिट्ठी आयी कि अगर आगे दाखिला लेते हो तो तुम्हें 16 रुपये महीना वजीफा मिलेगा। वह बहुत रोए कि अब तो वजीफा मिल गया है, मुझे आगे पढऩा चाहिए।
लक्ष्मण स्वरूप ने कहा, ”बात केवल तुम्हारे पढऩे की नहीं है। चार भाई-बहन भी तो हैं। इनका क्या होगा? इनको भी तो पढऩा है। इनको भी आगे बढऩा चाहिए।ÓÓ
अरविंद डिस्ट्रीब्यूशन में करीब छह महीने रहे। फिर कंपोजिटर बना दिया गए। कंपोजिंग डेढ़ साल की। फोरमैन रामचंद्रजी थे। वह अरविंद को बहुत पसंद करते थे। रामचंद्रजी अरविंद के आदर्श पुरुष थे। उनका लक्ष्य था- मेहनत कर उन जैसा फोरमैन बनूंगा। उनके साथ क्षेत्रपाल, नानक सिंह, नंदकिशोर तिवारी आदि थे। मशीन विभाग के फोरमैन नंदकिशोर भी उन्हें पसंद करते थे। दफ्ती विभाग के साबिर से अरविंद ने बहुत कुछ सीखा। जब ब्लाक मेकिंग डिपार्टमैंट खुला तो शंकर बाबू ने कैमरा का ज्ञान दिया। अरविंद जी ने कभी छापे की मशीन चलाई तो कभी जिल्द बांधीं। मोनो कंपोजिंग आई तो देखा कि किस तरह पहले कागज की रीलों पर डाटा फीड करते हैं और कैसे उस स्पूल में मशीन पूरे जस्टीफिकेशन के साथ एक-एक अक्षर करके पूरी लाइन बना देती है।
करोलबाग में कांगे्रसी नेता डा. शारदा प्रसाद थे। अरविंद जी 1945 में इम्तहान पास कर डा. प्रसाद के साथ कांगे्रस में शामिल हो गए। उनके साथ यशपाल कपूर, आर.एम. सांडल, गजराजसिंह यादव, ओमप्रकाश मंत्री व चिरंजी भाई थे। इन लोगों को लगता कि कांगे्रस बड़ी शांतिवादी सी चीज है इसलिए एक एक्टिव ग्रुप होना चाहिए। इन्होंने मिलकर ‘लाल किला ग्रुपÓ बना लिया।
करोलबाग कांगे्रस सेवादल की एक महीना गांधीजी के आश्रम (हरिजन बस्ती) में ड्यूटी लगी। उस दल में अरविंद भी थे। शाम को वहां प्रार्थना-सभा होती थी। गांधीजी का प्रवचन सुनने के बाद छुट्टी मिलती थी। गांधी आश्रम में नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना आजाद आदि और भी बहुत से लोग आते थे। अरविंद और उनके साथी चरखा कातने में गौरवान्वित महसूस करते और गीता पर विचार-विमर्श करते।
अरविंद पढ़े-लिखे होकर भी कंपोजिंग कर रहे थे। विश्वनाथ को कैशियर की जरूरत पड़ी। उन्होंने उन्ळें कैशियर बना दिया।
अरविंद जी की कुछ असफलताएं उनके लिए बहुत काम की सिद्ध हुईं। 1946 में आर्मी के जनरल हेड क्वार्टर में भर्ती हो रही थी। उस समय अंगे्रज अधिकारी हुआ करते थे। घरवालों को बिना बताए वह दोस्त संतोष के साथ अधिक पैसे की क्लर्क की नौकरी के लिए इंटरव्यू देने चले गए। उस समय उनकी उम्र थी 16 साल, लेकिन देखने में 12-13 साल के लगते थे। संतोष अरविंद कुमार से छोटा था, लेकिन कद-काठी का ठीक था। अधिकारी ने अरविंद कुमार को बच्चा कहकर रिजेक्ट कर दिया और उससे छोटी उम्र के संतोष का एप्वाइंटमेंट हो गया।
कांगे्रस सेवादल में अरविंद के कुछ दोस्त थे। उन्होंने कहा कि शाम को पढऩा चाहिए। उन्होंने प्राइवेट पढ़ाई शुरू कर दी। इस दौरान वह दिल्ली पे्रस में कैशियर थे। उनसे हमेशा गलती होती थी। अकसर पैसे देते और लिखना भूल जाते थे। किसी ने दिए तो आए पैसे लिखना भूल जाते। अरविंद, अमरनाथ और उनके भाई बसेशरनाथ तीनों मिलकर शाम को एकाउंंट मिलाते थे। लेकिन एकाउंट मिलता नहीं था। एक बार साठ रुपये कम हो गए। अमरनाथ अरविंद से यह तो नहीं कह सकते थे कि तुमने चुरा लिए। उन्होंने कहा, ”बेटा, तुम्हारी जेब में तो नहीं हैं।ÓÓ अरविंद जी ने अपनी जेब देखी। जेब में रुपये नहीं थे।
अमरनाथ ने कहा, ”चलो कोई बात नहीं, डाक खर्च में डाल देंगे।ÓÓ अरविंद को एकाउंट की एक बात पता चली कि जो पैसा नहीं मिलता उसे डाक खर्च में डाल दो। डाक खर्च का एकाउंंट नहीं रहता क्योंकि डाकखाना रसीद नहीं देता।
उन दिनों अरविंद जी नेकर पहनते थे। उनके पास गरम कपड़े नहीं थे। कभी अम्मा ने स्वेटर बुन दिया तो पहन लिया। सर्दी में खद्दर का कुर्ता और पाजामा पहनते थे। करंडी की पतली पीली चादर ओढ़ लेते थे। दिल्ली पे्रस का दफ्तर कनाट प्लेस में स्टेट्समैन बिल्डिंग के पास था। वह देवनगर (करोलबाग) से पैदल दफ्तर आते थे। करीब तीन मील की दूरी थी। बाद में साइकिल ली थी। वह चोरी हो गई। कुछ दिनों बाद वह दूसरी ले पाए।
इस बीच उन्होंने हिंदी शार्ट हैंड और टाइपिंग सीखनी शुरू कर दी थी। एकाउंट में वह चल नहीं पाए थे। इसलिए टाइपिंग में शिफ्ट कर दिया गया। वहां वह विज्ञापन सर्कुलर भेजने के लिए टेलीफोन डायरेक्टरी से पते टाइप करते थे। ‘कैरेवानÓ में जो लेख आते थे, उन्हें टाइप करते थे। उनके पास कोई स्थायी काम नहीं था।
एक महीने उन्हें काम नहीं दिया गया। तनख्वाह के दिन बताया गया कि तुमने तो कोई काम किया नहीं, पैसे किस बात के दिए जाएं? अरविंद जी ने कहा कि आपने निकाला क्यों नहीं? मुझे कहा थोड़े कि तुम मत आया करो। विश्वनाथ के सामने धर्मसंकट खड़ा हो गया। उन्होंने उन्हें प्रूफ रीडिंग में बैठा दिया। यह उनके लिए परिवर्तनकारी साबित हुआ।
प्रूफ रीडिंग से उन्हें बहुत फायदा हुआ। अभी तक वह कहानी और कविता ही पढ़ते थे। अब सब विधाओं की रचनाएं पढऩी पड़ीं। यहां उन्होंने जो किताबें पढ़ीं, उनमें एक थी बिनोवा भावे के ‘गीता प्रवचनÓ। इसी दौरान उन्होंने इंटरमीडिएट कर लिया। हिंदी और अंगे्रजी दोनों की प्रूफ रीडिंग करते थे। इससे दोनों भाषाओं का ज्ञान बढऩे लगा।
उन्हें हरिवंश राय बच्चन की ‘मधुशालाÓ बहुत पसंद थी। मित्र चिरंजीलाल के जन्मदिन पर ‘मधुशालाÓ गिफ्ट करना चाहते थे। खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। पूरी किताब में 64 छंद हैं। उन्होंने छोटे कागज की किताब बनाई। उसमें हाथ से छंद लिखकर उपहार में दे दी।
‘सरिताÓ का पहला अंक 1945 में दशहरे पर प्रकाशित हुआ। पहले ही अंक से वह लोकप्रिय हो गई। उन दिनों अरविंद जी कंपोजिटर थे।
विश्वनाथ खुद भी काम करते थे। वह भी प्रूफ पढ़ते थे। जो फाइनल करेक्शन आती थी, वह सब के पढ़े प्रूफों को अपने पास मंगाकर मिलान करतेे थे। विश्वनाथ को लगा कि अरविंद जी रीडिंग के दौरान जो निशान लगाते हैं, उनमें संपादकीय गुण हैं।
1948 में अरविंद जी अपने ताऊजी के पास शिमला गए हुए थे। वहां से आए तो आश्चर्यजनक समाचार मिला कि उन्हें उप संपादक बना दिया गया है। उन्हें प्रूफ रीडर के कमरे में नहीं, बल्कि संपादक के कमरे में बैठना है। वह उन दिनों जनपथ पर था।
विश्वनाथ ने अरविंद कुमार को सबसे पहला काम अंगे्रजी कहानी का हिंदी में अनुवाद करने का दिया। वह कहानी कबीर बेदी की मां फ्रेडा बेदी की थी। सह संपादक स्वदेश कुमार ने कांट-छांट कर पूरा अनुवाद लाल कर दिया। उन्होंने विश्वनाथ से कहा कि यह लड़का नहीं चलेगा।
अरविंद जी ने स्वदेश कुमार से कहा, ”आपने बहुत अच्छा किया जो मेरी गलती बता दी। मेरा वायदा है कि छह महीने के बाद आप मेरे लिखे पर कोमा भी नहीं बदल पाओगे।ÓÓ यही हुआ। करीब छह महीने बाद अरविंद का अनुवाद, कहानी, लेख आदि कुछ भी हो, स्वदेश कुमार बिना देखे पे्रस में दे देते थे। उन्हें मालूम था कि कुछ करना नहीं पड़ेगा। परफैक्ट पे्रस कॉपी है।
विश्वनाथ ने अरविंद कुमार को पढऩे के लिए विभिन्न विषयों पर बहुत सी किताबें दीं। सरिता के एक लेखक रतनलाल बंसल थे। उनसे विश्वनाथ ने एक लेख लिखवाया- ‘गोहत्या : आज का सबसे बड़ा देशद्रोहÓ। उस लेख की सामग्री विश्वनाथ ने उपलब्ध कराई थी। यह लेख सरिता में छपा। इसका बहुत विरोध हुआ। कार्यालय पर हमले हुए। विश्वनाथ ने कहा, ”मैंने लेख जान-बूझकर छापा है। गलती न बंसल की है, न ही किसी और की। मैंने सही छापा है।ÓÓ वह अपनी बात पर अड़े रहे।
इसी तरह 1957 में अरविंद कुमार की कविता छपी- ‘राम का अंतद्र्वंद्वÓ। इसको लेकर भी बबाल मच गया। अरविंद कुमार ने कहा, ”मैंने आपको संकट में डाल दिया।ÓÓ विश्वनाथ ने जवाब दिया, ”तुमने संकट में कहां डाला? तुमने लिखी, मुझे दी। मुझे पसंद आयी तो मैंने छापी।ÓÓ उन्होंने चार साल केस लड़ा। बहुत खर्चा हुआ। विश्वनाथ अड़े रहे, ”जिम्मेदारी मेरी है, तुम्हारी नहीं। लेखक तो कुछ भी भेजेगा। जो छाप रहा है उसे सोच-समझकर छापना चाहिए।ÓÓ इन घटनाओं से अरविंद कुमार ने सीखा कि सच बात के लिए दुनिया कितना भी विरोध करे, डरना नहीं चाहिए।
1952 में अरविंद कुमार बी.ए. में पढ़ रहे थे। उनका कैैंप कॉलेज शाम 5.30 बजे से रात 10 बजे तक खुलता था। शाम को पढऩे वाले वह अकेले नहीं थे। कैंप कॉलेज में ही 3000 छात्र थे। उन्हीं दिनों अरविंद कुमार का वास्ता एक अनोखी किताब से हुआ। यह किताब थी- इंगलैंड के पीटर मार्क रोजेट का अंगे्रजी थिसारस। थिसारस ग्रीक शब्द थैजौरस का हिंदीकरण है। इसका अर्थ ही है कोश। शब्दश: थिसारस भी एक तरह का शब्दकोश होता है क्योंकि इसमें शब्दों का संकलन होता है। वास्तव में थिसारस या समांतर कोश और शब्दकोश एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत होते हैं। किसी शब्द का अर्थ जानने के लिए हम शब्दकोश का सहारा लेते हैैं। लेकिन जब बात कहने के लिए हमें किसी शब्द की तलाश होती है, तो लाख शब्दों के समाए होने के बावजूद शब्दकोश हमें वह शब्द नहीं दे सकता। तब थिसारस या समांतर कोश ही हमारे काम आता है।
रोजेट के थिसारस को देख कर अरविंद कुमार अभिभूत हो उठे। उन्हें रह-रह कर खयाल आने लगा- हिंदी का भी अपना ऐसा ही थिसारस होना चाहिए। उसके मन में रह-रह कर उत्कंठा होने लगी- कुछ भी हो हिंदी का अपना थिसारस तो होना ही चाहिए! लेकिन एक अहम सवाल- यह चाहिए, हो कैसे? देर तक उद्वेलित होने के बाद आखिर उन्होंने अपने मन को समझा लिया- कोई न कोई विद्वान इस जरूरत को महसूस करेगा और एक न एक दिन हिंदी का अपना थिसारस जरूर बनेगा!
विश्वनाथ ने अरविंद कुमार को अंगे्रजी संपादन विभाग में भेज दिया। पहले उप संपादक बनाया, बाद में सहायक संपादक। यहां उन्होंने बहुत कुछ सीखा। हिंदी से अंगे्रजी में बहुत अनुवाद किए। हर महीने ‘सरिताÓ और ‘कैरेवानÓ में अरविंद कुमार की चार-पांच रचनाएं छपती थीं। नाम कभी-कभी दिया जाता था। वरना कोई न कोई नाम गढ़ लेते थे। अरविंद कुमार ने अपने बीसियों नाम गढ़े। उन्हीं दिनों ‘हंसÓ में उनकी चार-पांच कहानियां छपीं। सबमें उनके अलग-अलग नाम थे।
एक बार अरविंद कुमार से ‘कैरेवानÓ का एक फर्मा उलटा छप गया। उन्होंने विश्वनाथ से कहा, ”देखिए मुझसे गलती हो गई है।ÓÓ इस पर विश्वनाथ ने कहा, ”जो आदमी अपनी गलती स्वीकार कर सकता है, उससे खतरा नहीं। वो आदमी सजग और ईमानदार है।ÓÓ खुश होकर उन्हें सरिता, मुक्ता, उर्दू सरिता, कैरेवान सभी पत्रिकाओं का इंचार्ज बना दिया।
लोग बहुत ऐतराज करते थे कि आप लोग हमेशा हिंदू धर्म की निंदा करते हैं। कोई सक्रिय काम नहीं कर रहे हैं। अरविंद कुमार ने संपादकीय विज्ञापन लिखा कि जो आदमी कूड़ा-करकट साफ कर रहा है, वो सकारात्मक काम कर रहा है या नकारात्मक। बुराई को दूर करना भी सकारात्मक काम है। हिंदू धर्म में जो खराबियां आ गई हैं, हम उनको ‘सरिताÓ के माध्यम से दूर कर रहे हैं।
अरविंद कुमार और विश्वनाथ में गहरा मानसिक और सैद्धांतिक संबंध था, लेकिन एक मामूली सी बात को लेकर झगड़ा हो गया। 1962 की बात है। ‘कैरेवानÓ में एक प्रूफ की गलती चली गई थी। पीएलएआईएन और पीएलएएनई, इनमें से एक की जगह दूसरा शब्द चला गया था। विश्वनाथ व्यक्तिगत कारणों से बहुत परेशान थे। उनको पेट में अल्सर की बीमारी भी थी।
सुबह-सुबह किसी बाहरी व्यक्ति ने उनसे गलत तरीके से शिकायत कर दी। वह आदमी खुद आना चाहता था और साबित करना चाहता था कि स्टाफ वालों को कुछ नहीं आता। विश्वनाथ कमरे से निकले। अरविंद कुमार अपनी मेज पर बैठे थे। विश्वनाथ वहां आकर गुस्से में बड़े जोर से बोले, ”अब यह नहीं चलेगा। ऐसा नहीं चलेगा।ÓÓ
अरविंद कुमार ने कहा, ”ऐसा नहीं चलेगा तो बताइए क्या करें?ÓÓ
उन दिनों स्वदेश कुमार जनरल मैनेजर थे। हिंदी संपादन में सी.पी. खरे थेे। वह ‘सरिताÓ के इंचार्ज भी थे। प्रोडेक्शन मैनेजर थे मनमोहन भार्गव। सब लोग परेशान थे कि विश्वनाथजी आजकल गलत टोन में बात कर रह हैं। इन लोगों ने मीटिंग की। सबने तय कर स्वेदश कुमार को अपना प्रवक्ता बनाया। वह विश्वनाथ के पास गए। उन्होंने कहा, ”हम सब महसूस कर रहे हैं कि आप अनुचित सख्ती से बात कर रहे हैं। कई बार बिना मतलब नाराज हो जाते हैं।ÓÓ
विश्वनाथ ने जवाब दिया, ”नहीं, मेरा तो यही रवैया चलेगा।ÓÓ
बाद में अरविंद कुमार ने बात की। उन्होंने कहा, ”मैं इस्तीफा देने के लिए तैयार हूं। लेकिन आप मेरी गे्रच्युटी देंगे या नहीं?ÓÓ
विश्वनाथ सैद्धांतिक तौर पर गे्रच्युटी के खिलाफ थे। उनका मानना था कि गे्रच्युटी मालिक का शोषण है। उन्होंने जवाब दिया, ”गे्रच्युटी तो मैं सुप्रीम कोर्ट तक नहीं दूंगा। तुम लड़ लो।ÓÓ
अरविंद कुमार ने कहा, ”मुझमें तो दम नहीं है। मैं आपसे लडऩा नहीं चाहता। अगर आप गे्रच्युटी देते हो तो मेरा इस्तीफा है अन्यथा मैं इस्तीफा नहीं दूंगा।ÓÓ
विश्वनाथ ने कहा, ”अच्छा, आज से मैं तुम्हें काम नहीं दूंगा।ÓÓ
अरविंद कुमार ने कहा, ”आपकी मर्जी। मैं तो आऊंगा। मेरी तनख्वाह पक्की रहनी चाहिए।ÓÓ
अरविंद कुमार पहले उसी कुर्सी पर बैठते रहे। धीरे-धीरे नीचे एक कमरे में बंद कर दिया गया। कोई मिल नहीं सकता था। दफ्तर से बाहर जाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। अरविंद कुमार ने अपना समय बिताने के लिए बहुत से तरीके निकाले। वह सिगरेट पीते थे। आधी सिगरेट पीते और बाकी सिगरेट को जमीन पर खड़ी कर देते और देखते कि कितनी देर में पूरी जलेगी। उसमें दस-पंद्रह मिनट निकल जाते।
वहां एक खिड़की थी। उसके पास बैठ जाते। रानी झांसी रोड पर उन दिनों तांगे बहुत चलते थे। वह अनुमान लगाते कि दायीं तरफ से कौन सा वाहन आएगा और बायीं तरफ से कौन सा। दसवां वाहन तांगा आएगा या साइकिल आएगी। धीरे-धीरे उन का अंदाज चौसठवें वाहन तक सही निकलने लगा। इनके अलावा वह अनार लाया करते थे। एक दाना निकाला और खा लिया। फिर थोड़ी देर बाद दूसरा दाना निकाला और खा लिया। अरविंद कुमार इस तरह समय व्यतीत कर देते।
दरवाजे के पास एक सोफा पड़ा हुआ था। विश्वनाथ ने परेशान होकर अरविंद कुमार को वहां बैठा दिया। दिल्ली पे्रस में जो लेखक आते थे, उन्हें लेख अरविंद कुमार ही असाइन किया करते थे। लेखक उनके मनमौजीपन से परिचित थे। वह आकर उनके पास बैठ जाते। वह उन्हें लिखने के लिए विषय बता देते और कह देते कि लेख मुझे मत देना, देना विश्वनाथजी को। लेखक लेख लिखकर लाते और विश्वनाथ को दे देते। सभी लेख छपते भी थे। अंतत: अरविंद कुमार काम पत्रिकाओं के लिए ही कर रहे थे। यह विश्वनाथ के लिए साइक्लोजीकल टार्चर हो जाता था। वह किसी से यह भी नहीं कह सकते थे कि अरविंद को ऑथोराइज नहीं किया हुआ है। वह कौन होता है असाइन करने वाला। वह चाहते थे कि अरविंद कुमार परेशान होकर नौकरी छोड़ कर चले जाएं। गे्रच्युटी को भूल जाएं। वह इस तरह से कई लोगों को निकाल चुके थे। अरविंद ने कहा था कि मैं यह रास्ता बंद करके रहंूगा।
इस बीच अरविंद कुमार को ‘टाइम्स ऑफ इंडियाÓ के जनरल मैनेजर पी.के. रॉय ने ‘सारिकाÓ का संपादन करने का ऑफर दिया। अरविंद कुमार ने उत्तर दिया, ”एक तो मैं मानसिक रूप से ‘सारिकाÓ के योग्य नहीं हूं, दूसरे मैं अभी ज्वाइन नहीं कर सकता क्योंकि मेरा विश्वनाथजी से झगड़ा चल रहा है। जब तक वह मुझे गे्रच्युटी नहीं देंगे, मैं नौकरी नहीं छोड़ूंगा।ÓÓ
पी.के. राय ने कहा, ”ठीक है। मैं आपकी स्थिति समझता हूं।ÓÓ
गेट पर चपरासी वाला एक स्टूल था। विश्वनाथ ने देखा कि अरविंद कुमार नहीं मान रहा है तो उन्होंने कहा, ”तुम यहां बैठो।ÓÓ
अरविंद कुमार ने कहा, ”जहां मालिक बिठाएगा, वहीं बैठेंगे। हमारी क्या इज्जत? हमारी इज्जत तो हमारा काम है।ÓÓ वह वहीं बैठने लगे। उन्हें इस बात का कोई अफसोस नहीं था। वह आराम से हंसते-बोलते रहते थे।
अरविंद कुमार के साथ पुराने साथी डिस्ट्रीब्यूटर बनवारी लाल, कंपोजिटर नानक चंद, क्षेत्रपाल, मशीनमैन दलेर सिंह आदि सभी कर्मचारियों की सहानुभूति उन्हीं के साथ थी। उन दिनों मार्निंग शिफ्ट शुरू हो गई थी। उसका लंच टाइम दस बजे शुरू होता था। दस बजे ग्राउंड फ्लोर पर एक मेज-कुर्सी पर विश्वनाथ बैठ कर काम देखते थे।
कर्मचारी दस बजे निकलते थे। पहले विश्वनाथ की कुर्सी पड़ती थी। बाद में गेट पड़ता था, जहां अरविंद कुमार बैठते थे। कर्मचारी बाहर निकलते समय विश्वनाथ की तरफ पीठ कर लेते। वे अरविंद कुमार के पास जाकर दुआ-सलाम करते, तब बाहर जाते। यह बात विश्वनाथ को खलने लगी। आखिरकार उन्होंने पर्सनल मैनेजर की ओर से पत्र लिखवाया कि तुम इस्तीफा दे दोगे तो तुम्हारी गे्रच्युटी सेटल कर देंगे। यह चिट्ठी अरविंद कुमार को शाम के चार-पांच बजे मिली। वह आराम से उठे। विश्वनाथ के कमरे में जाकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया और कहा कि जब एकाउंट सेटल कर देंगे, मैं आकर ले जाऊंगा।
पी.के. राय दिल्ली आए हुए थे। अरविंद कुमार ने अगले दिन फोन किया, ”राय साहब, अब मैं फ्री हूं। बोलिए।ÓÓ
वह बोले, ”हमारा इरादा बदल गया है। जो नई फिल्मी पत्रिका निकाल रहे थे, अब नहीं निकाल रहे हैं।ÓÓ
पांच-छह महीने बाद अरविंद कुमार को पी.के. राय का संदेश मिला कि नई पत्रिका निकालने का फैसला हो गया है। उन्होंने कहा कि मैं बम्बई जाकर आपका नियुक्ति-पत्र भेज दूंगा। अरविंद कुमार ने कहा कि आप कह रहे हैं कि पत्रिका जनवरी में निकालनी है। नवंबर आ गया है। आप नियुक्ति पत्र भेजेंगे। फिर मैं ट्रेन में टिकट बुक करूंगा। इस तरह से बहुत समय खराब हो जाएगा। आप नियुक्ति पत्र मत भेजिए। मैं अपने आप आ जाऊंगा।
1963 में दिवाली के दिन अरविंद कुमार मुम्बई पहुंच गए। शनिवार का दिन था। पी.के. राय के घर फोन किया। राय ने कहा कि आप सोमवार से ऑफिस आ जाएं।
अरविंद कुमार ने 20 तारीख को ज्वाइन किया। उन्हें बाकायदा सब अधिकारियों से मिलवाया गया। एक अलग कमरा और स्टाफ दे दिया गया। एक तारीख को पर्सनल मैनेजर वी.जी. कार्णिक का फोन आया कि आपकी कोई एप्लीकेशन नहीं है। गे्रड का हमें पता नहीं है। अरविंद कुमार ने कहा कि मुझसे एप्लीकेशन मांगी नहीं गई इसलिए मैंने दी नहीं। क्या गे्रड है, मैंने पूछा नहीं। आपको जो भी कार्यवाही करनी है, खुद कर लो। मैं एप्लीकेशन नहीं दूंगा। पर्सनल मैनेजर ने एपाइंटमेंट लेटर बनाकर भेज दिया।
जनवरी, 1964 में ‘माधुरीÓ का पहला अंक प्रकाशित हुआ। उसकी काफी तारीफ हुई। तब उसका नाम ‘सुचित्राÓ था। यह नाम बाद में एक मुकदमे के कारण बदलना पड़ा। कंपनीज बोर्र्ड की मीटिंग हो रही थी। पहला अंक देखकर अरविंद कुमार को इन्क्रीमेंट दिया गया।
उन दिनों मां-बाप सोचते थे कि फिल्में देखना पतन है और फिल्मी पत्रिका पढऩा घोर पतन। अरविंद कुमार ने ‘माधुरीÓ के विज्ञापनों की एक पूरी सीरिज बनाई कि सिनेमा बीसवीं सदी की सर्वश्रेष्ठï कला है। अपने बच्चों को इस कला से परिचित होने का मौका दीजिए। ‘माधुरीÓ एक ऐसी पत्रिका है, जिसको बाप और बेटी एक साथ पढ़ सकते हैं।
अरविंद कुमार ने ‘माधुरीÓ में विमल राय पर लेख प्रकाशित किए। गजानन जागीरदार व के.एन. सिंह की जीवनी छापी। उस समय कोई फिल्म पत्रिका इस तरह की चीजें प्रकाशित नहीं करती थी। वो लोग केवल हीरो-हीरोइन के गोसिप छापते थे। अरविंद कुमार ने गायक मुकेश, लता मंगेशकर, निर्देशक व्ही. शातांराम, एक्सट्रा कलाकारों, संगीतकारों और बाल कलाकारों को ही नहीं, हास्य अभिनेता महमूद और चरित्र अभिनेता ओमप्रकाश को कवर पर छापा। फिल्म पत्रकारिता में यह एक नई दृष्टिï थी।
अरविंद कुमार ने फिल्मों के कलात्मक स्वरूप को भी पहचाना। उन दिनों कला फिल्म आंदोलन शुरू होने वाला था। ‘माधुरीÓ कला फिल्मों का मुख पत्र बन गई। ‘तीसरी कसमÓ, ‘शहर और सपनाÓ जैसी फिल्मों के बारे में हर अंक में कुछ न कुछ छपता। सेंटर स्पे्रड ‘शहर और सपनाÓ को दिया गया। इससे पाठकों को लगा कि यह छिछोरी पत्रिका नहीं है। ‘माधुरीÓ की सफलता का यही कारण बना।
अरविंद कुमार फिल्मों के बारे में कम जानते थे। उन्होंने सोचा कि जो मेरी जिज्ञासा है, वो हर पाठक की होगी। इसलिए उन्होंने फिल्म निर्माण के तकनीकी पहलुओं से संबंधित फोटो फीचर बनवाए। फिल्म कैसे शूट होती है, इसका फोटो फीचर बनवाया। फोटो ऐसे खिंचवाया जिसमें कैमरामैन, एक्टर, डायरेक्टर, असिस्टेंट डायरेक्टर, क्लेपर ब्वाय कहां खड़े हैं, विजुअली दिख सकें। इस तरह से विजुअल देकर एक नई एप्रोच बनाई। बड़े लेखकों से कहा कि फिल्मों के बारे में लिखो। जैनेंद्र कुमार ने ‘माधुरीÓ में बहुत लिखा। मन्मथनाथ गुप्त ने लिखा। और भी बहुत से लेखकों ने लिखा।
अरविंद कुमार लेखकों को चिट्ठी लिखते कि आप फिल्मों के बारे में अपनी राय लिखिए या आपने कोई फिल्म देखी है तो उसके बारे में लिखिए। फिर अरविंद कुमार ने एक आंदोलन शुरू किया- साहित्य-सिनेमा संगम। इसका काम था कि फिल्म वालों को बताएं कि साहित्य में क्या है? साहित्य में इल्मी-फिल्मी का चक्कर चल रहा था। साहित्यकारों को बताया कि इल्मी-फिल्मी एक हो सकता है। उन दिनों आर्ट फिल्मों की बात चल रही थी। फिल्म फाइनेंस कारपोरेशन के चेयरमैन वी.के. करंजिया थे। अरविंद कुमार करंजिया को लेकर दिल्ली आए। साहित्यकारों के साथ एनडीएमसी हॉल में मीटिंग की गई कि फिल्म फाइनेंस कारपोरेशन आपकी फिल्मों को फाइनेंस करने के लिए तैयार है। आप विषय सुझाएं और प्रोड्यूसर भी साथ लेकर आएं। अन्य अनेक फिल्मों के साथ-साथ अरविंद कुमार ने जैनेन्द्र की फिल्म फाइनेंस कराई थी- त्यागपत्र। ‘त्यागपत्रÓ का प्रोड्यूसर बेकार निकला। अच्छी फिल्म नहीं बनी।
अरविंद कुमार की समझ में यह बात आई कि हीरो की बात डायरेक्टर टाल नहीं सकता। धर्मेन्द्र फिल्म फेस्टीवल के लिए दिल्ली आया। उसके कमरे में कवियों को बुलवाया। रामावतार त्यागी, देवराज दिनेश, बालस्वरूप राही वगैरह आए थे। उसको कविताएं सुनवाईं। कोई साहित्यकार बंबई जाता था तो उसे सब लोगों से मिलवाते।
मन्नू भंडारी के उपन्यास ‘आपका बंटीÓ पर गायक मुकेश फिल्म बनाना चाहते थे। अरविंद कुमार ने बात की। मन्नू भंडारी राजी नहीं हुई। ‘आपका बंटीÓ पर फिल्म नहीं बन सकी। धर्मवीर भारती ने ‘अंधायुगÓ किसी को नहीं दिया। अरविंद कुमार ने अरुण कौल से बात कराई। भारती ने दस्तखत भी कर दिए कि अरुण कौल ‘अंधायुगÓ पर फिल्म बनाएंगे और डायरेेक्ट करेंगे। इस बीच अमिताभ ने अपने तत्कालीन सेक्रेटरी भाटिया से बात कर ली। भारती अपनी बात से मुकर गए। अरुण कौल को ‘अंधायुगÓ नहीं दिया। ‘अंधायुगÓ पर फिल्म बनी। वह बहुत घटिया साबित हुई।
दस साल ‘माधुरीÓ में काम करके अरविंद कुमार उससे ऊब चुके थे। वह बार-बार सोचते कि क्या मैं फिल्मी पत्रिका में काम करने के लिए ही पैदा हुआ हूं? तब उन्हें थिसारस की याद आई।
अरविंद कुमार के दिमाग में आया कि हिंदी में किसी ने थिसारस नहीं बनाया तो इसका मतलब मुझे बनाना है। इच्छा मेरी है तो मैं ही पूरी करूंगा।
वे सुबह घूमने के लिए हैंगिंग गार्डन जाते थे। 26 दिसंबर, 1973 की सुबह उन्होंने अपनी पत्नी कुसुम कुमार से इस योजना का जिक्र किया। वह इसके लिए तुरंत तैयार हो गईं। अब दोनों दंपती होने के साथ-साथ सहकर्मी हो गए। तभी दोनों ने तय कर लिया कि यह काम उन्हें ही करना है। यह भी तय हुआ कि आवश्यकता हुई तो अरविंद कुमार अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़ देंगे और पूरा परिवार अपने घर दिल्ली चला जाएगा। उन्होंने योजना बनाई कि दो लाख रुपये हों तो दो हजार रुपये महीना ब्याज आता है। इससे घर का काम चल जाएगा। बेटे सुमीत की डाक्टरी की पढ़ाई और बेटी की पढ़ाई भी हो जाएगी। काफी सोच-समझकर तय किया कि मार्च-अपै्रल 1978 का समय ठीक रहेगा। तब तक सुमीत 12वीं पास कर लेगा और बेटी मीता आठवीं। कार का कर्जा भी उतर जाएगा।
अब बरबाद करने के लिए एक पल भी नहीं था। महा प्रयास की तैयारी की जाने लगी। पहली जरूरत अधिक बचत की थी, ताकि यथासंभव स्वतंत्र अर्थव्यवस्था खड़ी हो सके। सोफासैट खरीदने का कार्यक्रम था। उसे रद्द किया। फालतू खर्च बंद किए। भविष्य निधि 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत कटाने लगे।
तैयारियां पूरी हो गईं तो श्रीगणेश करने के लिए वे सपरिवार नासिक गए। वहां 19 अप्रेल, 1976 की सुहावनी सुबह गोदावरी नदी में स्नान करने के बाद पहला कार्ड बनाया और काम बकायदा शुरू हो गया।
पूर्व योजना के अनुसार अरविंद कुमार ने ‘माधुरीÓ से त्यागपत्र दे दिया। मई, 1978 को अरविंद कुमार सपरिवार दिल्ली चले आए। इस समय उनके पास दो लाख इस रूप में थे कि प्रोविडेंट फंड मिलना था। गे्रच्युटी मिल गई थी। कुछ महीने की तनख्वाह बकाया थी। जब यहां आए तो खयाल आया कि बेटी की शादी का तो कोई इंतजाम किया ही नहीं। तैंतीस हजार रुपये निकालकर डाकखाने में जमा करा दिए।
दिल्ली पहुंचकर यह दंपती काम में जुट गया। छह फुट ऊंची एक छोटी-सी मियानी थी। बहुत गरम मियानी थी। दोपहर में आग बरसती थी। वे यहीं काम करते थे। सितंबर, 1978 में मॉडल टाउन में भयानक बाढ़ आई। दो मीटर पानी चढ़ आया। घर का सारा सामान बाढ़ की चपेट में आकर खराब हो गया। कुछ बचा तो मियानी में रखे समांतर कोश के कार्ड बचे। पांच दिन पूरा परिवार इस छोटी सी मियानी में ही रहा। उन्हें लगा कि यमुना के कोप से जो नष्टï हुआ, वह उनका विगत था। और यमुना की कृपा से जो बचा, वह है उनका भविष्य। और भविष्य है समांतर कोश, जो होकर रहेगा।
दूसरी बात यह हुई कि अरविंद कुमार मुंबई से यह सोचकर आए थे कि मॉडल टाउन में अपना मकान है। उसमें रह कर काम करेंगे। दाल-रोटी में गुजारा करना है। लेकिन लक्ष्मण स्वरूप ने वह मकान बेच दिया। उन्होंने कहा कि अपना मकान बनाओ। प्रोविडेंट फंड मिला नहीं था। एक लाख रुपये बचे थे, जो कंपनियों में डिपाजिट के रूप में थे। जमीन खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। अरविंद कुमार ने टाइम्स ऑफ इंडिया वालों को पत्र लिखा कि मेरा प्रोविडेंट फंड पहले भेज दो। उन्होंने बकाया में से चालीस हजार रुपये भेज दिए।
अरविंद कुमार ने 32 हजार में चंद्रनगर, गाजियाबाद में जमीन खरीद ली। इस समय वह अपने छोटे भाई सुबोध कुमार के साथ सूर्यनगर में रह रहे थे। मकान बनाना था। लेकिन पैसा नहीं था। लोन मिलने की कहीं से उम्मीद नहीं थी।
एक दिन वह मॉडल टाउन के पुराने मकान में गए। वहां उन्हें एक पोस्टकार्ड मिला। यह पोस्टकार्ड अंगे्रजी लेखक खुशवंत सिंह का था। लिखा था कि ‘रीडर्स डाइजेस्टÓ वाले उसका हिंदी संस्करण ‘सर्वोत्तमÓ निकालना चाहते हैं। वे लोग चाहते हैं कि इसका संपादन अरविंद कुमार करें।
वे ‘सर्वोत्तमÓ को बंबई से निकालना चाहते थे। अरविंद कुमार ने इनकार कर दिया कि वे अपना काम छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। अंतत: करीब छह महीने बाद वे लोग ‘सर्वोत्तमÓ को दिल्ली से निकालने के लिए सहमत हो गए। पांच साल उन्होंने वहां काम किया। मकान बन गया था। जब लगा कि स्वतंत्र रूप से रह सकते हैं तो 1985 में नौकरी छोड़ दी। ‘माधुरीÓ के बाद ‘सर्वोत्तमÓ दूसरी पत्रिका थी, जिसकी अरविंद कुमार ने शुरुआत की और उसे भी सफलता के शिखर पर पहुंचाया।
अब अरविंद कुमार पूरे मन से कोश के काम में जुट गए। हर कोटि के लिए एक कार्ड बनाना था। धीरेे-धीरे कार्डों की संख्या बढ़ती गई। उनके चारों ओर मेजों पर समांतर कोश के कार्डों की ट्रे रखी रहतीं। हर ट्रे में अलग-अलग खाने बने थे। उनमें भी कई उपखाने थे। प्रमुख विषय, उसके शीर्षक, उपशीर्षक- सब अलग-अलग खानों में। इनमें भी व्याकरण के कारकों के अनुसार उपशीर्षक, संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, विशेषण आदि थे। सबसे बड़ी समस्या थी कि 60 हजार कार्ड और करीब अढाई लाख शब्द हो गए थे। टाइप के लिए देंगे तो क्रम तय करना होगा। हाथ से नंबर डालेंगे। टाइपिस्ट कोई कार्ड गायब कर देगा। टाइप स्क्रिप्ट की करेक्शन की जाएगी। फिर दोबारा टाइप। फिर गलती होगी। उसके बाद किताब पे्रस में जाएगी। इतना काम कैसे होगा? यह सोचकर अरविंद कुमार दंपती परेशान थे।
सुमीत मुंबई से डाक्टरी करके आ गया था। वह राम मनोहर लोहिया अस्पताल में काम कर रहा था। उसने कहा, ”पापा, इसका एक रास्ता है कि इसे कंप्यूटराइज किया जाए।ÓÓ कंप्यूटर के लिए पैसा चाहिए। उन दिनों कंप्यूटर डेढ़ लाख में आता था। वे लोग दाल-रोटी या खिचड़ी बनाकर गुजारा करते थे। दिन भर काम करते थे। इतना होश नहीं था कि खाना बना सकें। माता-पिता और बेटी साथ में थी। कंप्यूटर खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। इसके लिए सुमीत ने ईरान में नौकरी की और कंप्यूटर लायक पैसे जुटाए। पैसे जुट गए तो दिल्ली आ गया। कंप्यूटर खरीदा। अब कंप्यूटर के प्रोग्राम के लिए पैसे नहीं थे।
समांतर कोश को कंप्यूटराइज करने के बारे में 1990 में सोचना शुरू किया था। इससे पहले कंप्यूटर पर समांतर कोश बन ही नहीं सकता था। हिंदी के प्रोग्राम वर्ड प्रोसेसिंग के थे। डाटा बेस संभव नहीं था। डाटा बेस संभव हुआ जिस्ट (जेआईएसटी) कार्ड बनने के बाद। जिस्ट कार्ड ऐसी सुविधा है, जिसका संबंध इस बात से है कि उसके जरिए डाटाबेस बनाया जा सकता है। लेकिन इससे वर्ड प्रोसेसिंग नहीं होती। इसकी खोज 1989 में हुई थी। उनकी एक रिश्तेदार योजना आयोग में कंप्यूटर में काम करती थी। उसने बताया कि जिस्ट कार्ड नाम की चीज आयी है। लेकिन प्रोग्राम के लिए पैसे नहीं थे। सुमीत ने कहा कि वह प्रोग्रामिंग सीखेगा। उसने किताबें पढ़-पढ़कर सीखा और प्रोग्राम बनाया।
1993 में कंप्यूटर पर काम शुरू हो गया। उन्हें जो टाइपिस्ट मिला उसका नाम दलीप था। वह सुबह आठ बजे आता था। आते ही कंप्यूटर पर बैठ जाता था। एक बजे दोपहर में लंच के लिए उठता था। बीच में पानी पीने के लिए भी नहीं उठता था। अरविंद कुमार उसे कार्ड देते रहते थे। दलीप टाइप करता रहता था। वह आधे घंटे के लिए लंच पर जाता था। उसके बाद पांच बजे तक काम करता था। उसने साठ हजार कार्ड ग्यारह महीने में फीड कर डाले। अरविंद दंपती को चाय पीने तक के लिए समय नहीं मिलता था। एक बार चाय पीकर उनकी पत्नी अगली बार के लिए पानी का भगौना चूल्हे पर रख आती ताकि केवल आग जलानी पड़े। दलीप लंच में जाता तो जल्दी-जल्दी खिचड़ी बनाकर दोनों खा लेते। फिर काम में लग जाते। शाम को दलीप चला जाता। इसके बाद देखते कि क्या काम हुआ है। आठ-नौ बज जाते थे। कुछ और काम करने की फुरसत नहीं मिलती थी। प्रिंट निकालते। अरविंद कुमार देखते कि कहां गलती हुई। उनकी पत्नी रात को प्रूफ रीडिंग करतीं।
ग्यारह महीने दलीप ने टाइप किया। उसके बाद अरविंद कुमार दंपती बेटे के पास बंगलौर चले गए। वहां करीब अढाई साल तक अरविंद कुमार ने डाटा ऐंटरी की।
काम पूरा होते-होते अंत समय एक दुर्घटना हुई। डिस्क नष्टï हो गई। सौभाग्य से दो दिन पुराना बैकअप मिल गया। जान में जान आई।
शब्द रथ है भाव का, विचार का, इस रथ पर सवार होकर बात एक आदमी से दूसरे तक पहुंचती है। इस रथ पर सवार होकर ज्ञान और विज्ञान सदियों के फासले तय करते हैं और मानव समाज प्रगति के पथ पर बढ़ता है। भाव के सही संपे्रषण के लिए सही अभिव्यक्ति आवश्यक है। और सही अभिव्यक्ति के लिए सही शब्द का चयन, शब्दों का अध्ययन और संकलन की परंपरा वेदों जितनी पुरानी है।
जब भारत में एक प्रगतिशील, सक्रिय और सचेतन समाज था, तब महान वैयाकरण और भाष्यकार हमारी भाषाओं को भी समृद्ध कर रहे थे। संसार के सबसे पहले शब्द संकलन और थिसारस भारत में ही बने। वैदिक युग के निघंटु और निरुक्त संसार के प्राचीनतम थिसारस हैं। उस महान शृंखला की सशक्त कड़ी है अमर सिंह कृत नामलिंगानुशासन या त्रिकांड, जिसे सारा संसार अमर कोश के नाम से जानता है।
आधुनिक काल में थिसारसों की परंपरा यूरोप में आरंभ हुई, जिसने औद्योगिक क्रांति से संसार को नई गति दी। इंग्लैंड में पीटर मार्क रौजेट के अंग्रेजी थिसारस का पहला संस्करण 1852 में प्रकाशित हुआ। भाषा के इस नए शक्तिशाली उपकरण का महत्व वहां के लोगों ने तत्काल समझा। तबसे पश्चिम के देशों में थिसारसों की शृंखला का विकास और संवर्धन निरंतर हो रहा है।
‘समांतर कोशÓ हिंदी का पहला थिसारस है। पाठकों, छात्रों, अध्यापकों, लेखकों और अनुवादकों को शब्दों का अभूतपूर्व उपहार देने वाले इस कोश में 1100 शीर्षकों के अंतर्गत 23,759 उप शीर्षक हैं और उनमें कुल मिलाकर 1,60,850 अभिव्यक्तियां संकलित हैं। इनका चयन रचेता दंपती द्वारा अपै्रल, 1976 से सितंबर, 1996 तक बीस वर्षों में एकत्रित 5,40,000 अभिव्यक्तियों के विशाल संकलन में से किया गया है।
समांतर कोश में कोटियों और उपकोटियों में परस्पर संबंध की स्थापना के लिए एक पूर्णत: मौलिक आयोजन का विधान किया गया है। यह विधान रौजेट और अमर सिंह के विधान से बिल्कुल भिन्न है।
समांतर कोश की रचना की मूल पे्ररणा का स्रोत अंग्रेजी थिसारस ही था। इसलिए इसकी रचना में पहले रौजेट के विधान का ही अनुसरण करने का प्रयास किया गया था, लेकिन कुछ ही महीनों बाद उसे त्याग देना पड़ा। कारण यह कि अंग्रेजी में बहुत से शब्दों से जो संदर्भ निकलते हैं, हिंदी में भारतीय मानस में वे कुछ अन्य संदर्भ बनते हैं।
इसके बाद रचेताओं ने अमर कोश के विधान को अपनाने की कोशिश की। लेकिन उसे भी त्यागना पड़ा। निश्चय ही अमर कोश अपने काल की एक महान रचना है। लेकिन उसकी रचना वर्ण व्यवस्था के चरम काल में हुई थी। उसका विधान अपने युग का दर्पण है। उसमें मानवीय क्रियाकलाप और गतिविधियों के वर्गीकरण का आधार है वर्ण व्यवस्था। पूजा-पाठ, धर्म-कर्म ब्राह्मïण वर्ग के अंतर्गत, युद्ध, शस्त्रास्त्र क्षत्रीय वर्ण के अधिकार में, व्यापार, कृषि वैश्यों के जिम्मे और सेवा शुद्रों के हिस्से। स्पष्टï है, यह वर्गीकरण आज के भारत में न तो चल सकता है, न ही सही शब्दों की तलाश में सहायता दे सकता है।
समांतर कोश में शब्दावलियों को इस प्रकार पिरोया गया है कि समानता और विपरीतता के आधार पर आधुनिक भारतीय जनमानस बड़ी स्वाभाविकता से एक संदर्भ से दूसरे संदर्भ तक जा सके। जैसे विवाह से विवाह विच्छेद, सगाई, घुड़चढ़ी आदि रस्मों तक। और क्योंकि विवाह एक संस्कार होता है, इसलिए मुंडन, उपनयन आदि सोलह संस्कारों तक। गृहस्थ आश्रम के साथ-साथ संन्यास, वानप्रस्थ और ब्रह्मचर्य आश्रमों तक। विवाह निष्ठïा, अनिष्ठïा, परनारी, परपुरुष, वेश्या, वेश्यालय, कुटनी तक भी। यहीं से चरित्र, चरित्रहीनता, आचरण, सत्य, असत्य, पाप, पुण्य आदि शब्द समूहों तक। समांतर कोश पूर्णत: भारतीय है और पूरी तरह समकालीन।
स्पष्टï है कि समांतर कोश के इस आयोजन क्रम तक पहुंचना कोई आसान काम नहीं था। अरविंद कुमार दंपती के सामने कोई उपयुक्त आदर्श नहीं था। तरह-तरह से करके देखने और गलतियों से सीखने के अलावा कोई रास्ता न था। कम से कम पांच बार काम का ढर्रा बदलना पड़ा। कामचलाऊ ढांचा बनते-बनते चौदह वर्ष निकल गए।
समांतर कोश पर काम आरंभ करने का निर्णय मुंबई में दिसंबर 1973 में लिया गया था, लेकिन काम की विधिवत शुरुआत 16 अपै्रल, 1976 को नासिक तीर्थ में गोदावरी स्नान के उपरांत हुई। यह नासिक, मुंबई, दिल्ली, गाजियाबाद और बेंगलूर में लिखा गया। इसका विमोचन दिल्ली में हुआ। इस तरह यह पूर्णत: अखिल भारतीय कृति है।
1991 में ‘हंसÓ में अरविंद कुमार की एक लेखमाला छपी थी कि आजकल मैं क्या कर रहा हूं। इसे पढ़कर ‘नेशनल बुक ट्रस्टÓ के निदेशक अरविंद कुमार ने समांतर कोश प्रकाशित करने में रुचि दिखाई। अरविंद कुमार ने पत्र लिख दिया कि अभी किताब देने की स्थिति में नहीं हूं। दो-तीन साल और लगेंगे।
बंगलौर में काम लगभग पूरा हो गया तो उन्होंने नेशनल बुक ट्रस्ट के अरविंद कुमार को चिट्ठी लिखी। उनका तुरंत फोन आया। दस सितंबर को अरविंद कुमार ने समांतर कोश की भूमिका लिखी। दस अक्तूबर के आसपास वे दिल्ली आ गए थे। उस दिन समांतर कोश के बारे में खुशवंत सिंह का लेख ‘हिन्दुस्तान टाइम्सÓ में छपा था। उन लोगों ने 11-12 अक्तूबर को किताब नेशनल बुक ट्रस्ट को दे दी। 13 दिसंबर, 1996 को तत्कालीन राष्टï्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा ने इसका विमोचन किया। इस तरह अपनी मेहनत, लगन और असीम धैर्य से अरविंद कुमार ने अपना महत्वाकांक्षी सपना साकार कर लिया। समांतर कोश के प्रकाशित होते ही इसे अपार जनसमर्थन मिला। पांच हजार प्रतियों का संस्करण लगभग दो महीने में बिक गया और शीघ्र ही दस हजार प्रतियों का पुनर्मुद्रण बाजार में लाना पड़ा।
तभी से यह दंपती अपने हिंदी डाटा को द्विभाषी बनाने में लग गया था। हिंदी के शब्दों के समकक्ष अंगे्रजी शब्द डालने थे। आरंभिक इनपुट बेटी मीता ने दिया। उसने समांतर कोश के सभी शीर्षकों और उपशीर्षकों के समकक्ष अंग्रेजी शब्द लिख दिए थे। उन्हें आधार बना कर अरविंद कुमार अंगे्रजी के पर्याय खोजते। कुसुम कुमार कोशों में खोजने में सहायता करतीं।
मई, 2007 में बाइलिंग्वल थिसारस प्रकाशित हुआ। इसमें ए-4 साइज में, चार कॉलम में 3,140 पेज हैं। इनमें 9088 शीर्षक के अंतर्गत करीब 29000 कोटियां हैं। संसार में किसी के पास भी इतना समृद्ध बाइलिंग्वल डाटा नहीं है।
अरविंद कुमार दपति के कदम अभी रुके नहीं हैं। वे एक और चमत्कारिक काम में जुटे हैं। संभावना है कि मई तक यह पूरा हो जाएगा।
सपने देखना आसान है।


आदरणीय अरविंद जी हमारे युग के युगपुरुष हैं । उनकी ऊर्जा, लक्ष्य के प्रति साधना देख कर आश्चर्य होता है । उनके द्वारा बनाया गया समान्तर कोष नियमित रूप से प्रयोग करता हूँ , निश्चित रूप से यह उनका आने वाली पीढियों के लिये एक उपहार है जो उन्हें सदा जीवित रखेगा । कोष के इलेक्ट्रोनिक संस्करण का इंतज़ार है ।
उनके विषय में इतनी रोचक सामग्री उपलब्ध करवाने के लिये आभार। अरविंद जी को उनके जन्म दिन के लिये बहुत बहुत बधाई।
अनूप भार्गव
प्रिंसटन, न्यू जर्सी, अमेरिका
समांतर कोश के लिए अरविंद जी ने मुंबई के ग्लैमरस जीवन को ठुकरा दिया। ऐसा माद्दा हर किसी में नहीं होता। उन्होंने वह कर दिखाया जो आज तक एक संस्था भी नहीं कर पाई। अरविंद जी के इस तप के कारण ही हिंदी भाषा को समांतर कोश के रूप में अनमोल खजाना मिला है।
उनके जन्मदिन पर बहुत-बहुत शुभकामनाए!
हिंदी की महान तपस्या के लिए अरविंद दंपति को नमन।
अरविंद जी को जन्मदिन पर हार्दिक बधाई।
हम प्रतिदिन समांतर कोश का उपयोग करते हैं। अरविंद कुमार परिवार को नमन।
इस नए ब्लॉग के साथ आपका हिन्दी ब्लॉग जगत में स्वागत है .. आपसे बहुत उम्मीद रहेगी हमें .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!
अरविन्द जी के ऊपर लिखी हुई काफी अच्छी रचना..उनके संघर्ष को पूरी तरह उजागर करता हुआ आलेख…हमारी हिंदी अरविन्द कुमार जैसे महान लोगों की वजह से ही अपना सर गर्व से तान के खड़ी है…समान्तर कोश के रूप में उन्होंने हिंदी को एक अमूल्य निधि दी है. हिंदी को ऐसे अगर एक दर्ज़न समर्पित व्यक्ति मिल जाएं तो हिंदी धन्य-धन्य हो उठेगी.
बढ़िया और रोचक आलेख।
इतना कुछ सीखने को मिला इस लेख में।
शुक्रिया।
बहुत बहुत बधाई हो अनुराग भाई। आपने कमाल कर दित्ता। गजब का जोश है अरविंद जी में और साथ ही लेख पढ़ कर आपके भी जोश को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इतनी मेहनत कर आप ने अपने समाज के ही एक विद्वान को जो सम्मान दिया है उससे निश्चय ही मैं प्रेरित हुआ हूं। अरविंद जी को बहुत-बहुत बधाई हो।
अरविंद कुमार दंपति ने महत्वपूर्ण काम किया है। भारत सरकार और हिंदी समाज को उन्हें विशेष रूप से सम्मानित करना चाहिए।
मेरा सौभाग्य है कि मैं अरविंद कुमार दंपति से मिला हूं। वह बेहद सहज और सरल हैं। उन्होंने लगन और परिश्रम से सामांतर कोश के रूप में अनमोल खजाना दिया है।
अरविन्द जी की कहानी उनकी साधनामयता के रहस्य को उजागर करती है. यह हम लोगों का सौभाग्य है कि वे हिन्दी के समसामयिक महानतम कोश-निर्माता है. उनका कोशनिर्माण विपुल और प्रामाणिक है.
सुरेश कुमार
रोहिणी,दिल्ली
अनुराग भाई, अरविंद जी की अनोखी जीवन-कथा प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद। उनका काम और जीवन बहुत कुछ सिखाता है।
यह मंच अच्छा लगा। अच्छी सामग्री दे रहे हैं।
अरविंदजी को जन्मदिन की विलम्बित बधाई।
उनका काम हिन्दी वालों की पीढ़ियों को धन्य करने वाला है।