हौसले की उड़ान : शशि‍ काण्डपाल

खुद को पैदायशी शिक्षिका मानने वाली शशि‍ काण्डपाल दि‍व्यांग

शशि‍ काण्डपाल

शशि‍ काण्डपाल

बच्चों के लि‍ए वि‍शेष रूप से संवेदनशील हैं। वर्तमान में वह दिव्यांग बच्चों के लिए संस्था ‘शाश्वत जिज्ञासा’ से जुड़ी हैं। लखनऊ के नामी स्कूल में पढ़ाने के दौरान उनके संपर्क में आए दि‍व्यांग बच्चे का संस्मरण-

कुछ समय पहले मॉल में बहुत जरूरी सामान ढूंढ़ने की दौड़ में अचानक लगा मानो कोई अजीब सी आवाज़ में मेम, मेम पुकार रहा है। आम इंसान शायद उस मेम शब्द को न समझ पाए, लेकिन मैं जान जाती हूं कि‍ कोई वि‍शेष बच्चा मुझे पुकार रहा है। नज़र घुमाई तो व्हील चेयर से आधा लटका बच्चा मुझे यूं लपकने को तैयार था, मानो जरा सी ताक़त आ जाये तो वो मुझे पकड़ ले।

मैं याद करने की कोशिश में उस तक पहुंची तो हैरान रह गई। वह रुद्रांश था।

मेरा वह वि‍शेष बच्चा, जिसके लिए मुझे कई चट्टानों से टकराना पड़ा था और सबसे बड़ी चट्टान खुद उसका अपना परिवार था, समाज था और स्कूल था। अब वह शरीर से कमजोर नहीं था। अच्छा खासा अठारह साल का नौजवान। आवाज़ भले ही भारी हो गई थी, हँसी वही दूधिया थी।
रुद्रांश एक संभ्रांत परिवार के अत्यंत कामयाब पिता की नाकामयाबी का प्रतीक बन चुका था। वह मुझे तब मि‍ला, जब उसके छोटे भाई के स्टडी टूर के सि‍लसि‍ले में उसके घर गई।

मैं ड्राइंग रूम में बैठी चिंघाड़ने सी आवाज़ें सुन रही थी, जिसे घरवाले कभी बिस्कुट, कभी मिठाई या कभी फालतू के ठहाकों से बहका रहे थे। मुझे वह आवाज़ बार-बार परेशान कर रही थी और लगता था मानो किसी को यातना दी जा रही हो। ऐसे में मेरा बेचैन होना स्वाभाविक था। मैं पूछ बैठी कि‍ आखिर यह क्या हो रहा है? यह आवाज़ किसकी है और क्यों है? क्योंकि आपके जिस बच्चे की रिपोर्ट मुझे स्कूल में जमा करनी है, उसे तब तक पूरा कैसे कर सकूंगी जब तक उसका वातावरण नहीं जानूंगी या आप लोग मुझे सब कुछ सच-सच नहीं बताएँगे। वे सभी अचानक चुप हो गए और एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। मैं मन ही मन डरने लगी कि‍ पता नहीं अब किस सच्चाई से मेरा सामना होगा।

वे लोग मुझे बड़ा सा बरामदा पार कराकर एक कमरे में ले गए। इसकी बड़ी-बड़ी खिडकियों में जालियाँ लगी थीं और जानवर बंद करने के बाड़े सा अहसास दिला रही थीं। उसी के भीतर एक नन्ही सी जान अपनी व्हीलचेयर पर चमड़े की बेल्ट से बंधा  चीख रहा था। शायद वह दिनभर चिल्लाता होगा इसलि‍ए उसका गला बैठ गया था और आवाज घो-घो में बदल गयी थी | वह एडमिशन चाहने वाले अक्षत का बड़ा भाई था, लेकिन दिखता उससे भी छोटा था। उम्र दस साल, लेकिन कद, काठी पांच साल सी। बोलने, चलने, हाथ-पैरों की हरकतों से लाचार, दिमाग से कमजोर लेकिन सुन सकता है। मुझे देखते ही शांत हो गया। मैं स्पेशल एजुकेटर नहीं हूं। लेकिन मानव हूं और उसका इतना परेशान होना मुझे बर्दाश्त नहीं था। उसके पिता और दादा की परिवार के हर सदस्य और नौकरों को सख्त हिदायत थी कि उसे कमरे तक सीमित रखा जाये ताकि उनका सो कॉल्ड सम्मान बचा रहे। लेकिन वह जैसे-जैसे बड़ा हो रहा था, उसकी रुचियाँ बदल रही थीं और उसे संभालना मुश्किल होता जा रहा था।

माँ का दिल भर-भर आता कि‍ उसके बच्चे का क्या होगा? कैसे जियेगा? मेरे पूछने पर कि‍ उसे आज तक स्कूल क्यों नहीं भेजा गया या कोशिश क्यों नहीं की गई, का जवाब मिला कि हालत तो आप देख ही रही हैं। दो-चार स्कूलों में बात की थी तो उन्होंने ये बवाल लेने से साफ़ मना कर दिया और बड़ा होने पर किसी स्पेशल स्कूल भेजने का मशविरा दे दिया।

मैंने रिसर्च में पढ़ा था कि‍ यदि ऐसे बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ रखा जाये तो इनमें ना सिर्फ सुधार आता है, बल्कि कई चीजें सीख भी जाते हैं। सामान्य बच्चे भी इनके साथ रह कर अपनी जिम्मेदारी समझ पाते हैं और आपसी समझ का वातावरण पैदा होता है। आखिर, समाज के इतने बड़े हिस्से को समाज से काटने का अपराध हम कैसे कर सकते हैं?

उसकी माँ ने मेरी भावुकता का फायदा उठाते हुए कहा कि‍ क्या मैं इसे अपनी क्लास में दाखिला दिलवा सकती हूं? मैंने उन्हें स्कूल आने का न्योता और सहायता का आश्वासन दिया। हालाँकि, मैं खुद नहीं जानती थी कि स्‍कूल प्रशासन मेरी इस सिफारिश को कैसे लेगा?

दूसरे दिन मेरी रिपोर्ट और रुद्रांश का केस प्रिंसिपल ने मीटिंग बुलाकर सबके सामने रखा। मेरी सोच से परे वहां हर इंसान के मुह पर सिर्फ ना थी। हर टीचर इस पचड़े से दूर रहने की राय दे रहा था। यह स्कूल का माहौल बिगाड़ने की कोशिश थी। जो बच्चे यहाँ ऊँची फीस देकर पढ़ रहे हैं, उनकी पढा़ई में खलल डालने का हक़ मुझे किसने दिया, यह पूछा जा रहा था। जब वह चिलाएगा, तब आप क्या कर पाएंगी? कितनी कक्षाएं डिस्टर्ब होंगी, आपने सोचा है? क्या हमारे यहां बच्चों की कमी है, जो हम ऐसे बच्चों को दाखिला देने लगें? आखिर आपके सि‍र पर यह समाज सेवा का भूत क्यों सवार है? मेरी कम जानकारी और भावुकता पर ताने थे और व्‍यावाहरि‍क बनने की सलाह थी।

उसके बाद मेरी साम दाम दंड भेद की लड़ाई खुद और स्कूल से हुई। मैंने ना सिर्फ क़ानून के कुछ अंश और विकलांगों से सम्बंधित कुछ तथ्य उनके सामने रखे, बल्कि खुद के इस्तीफे की पेशकश भी कर डाली। उसमें लिखा कि‍ मैं असंवेदनशील लोगों के साथ काम नहीं कर सकती। उसके बाद रुद्रांश मिड सेसन में मेरा शिष्य बना, छोटी सी कुर्सी में चमड़े की बेल्ट से बंधा।

एडमिशन के बाद मुझे दूसरी जंग लड़नी थी। रुद्रांश दिनभर चिल्लाता, तो क्लास के बाकी बच्चे डिस्टर्ब होते और तमाम शिकायतें करते। उनके घरों से भी फोन आते- क्या आपने किसी पागल को एडमिशन दिया है? और यह सब सुनकर मैं आहात होती। प्रिंसिपल धमकाने का कोई मौका नहीं छोड़ती, लेकिन मुझे लगता हमारे इसी असंवेदनशील रवैये ने इन वि‍शेष बच्चों को समाज की मुख्यधारा में जोड़ने का काम नहीं किया। न उनकी जरूरतों का ध्यान रखा और न सहारा देने की कोशिश की।

स्कूल ऑफिस में रुद्रांश के साथ रोज मेरी भी पेशी होती, लेकिन मेरे प्रयोग जारी थे। कुछ टीचर अब मेरी मंशा और कोशिश से सहमत थे और यदा कदा उसकी व्हीलचेयर को क्लास तक पंहुचा देते। उससे हंस कर बात कर लेते, हालाँकि वह सिर्फ टुकुर-टुकुर ताकता। लेकिन आश्चर्य था कि उसे स्कूल का वातावरण पसंद आ गया था और लोगों को देखना उसे अच्छा लगता था। वह प्रार्थना के दौरान चिल्लाता, सो उसे स्कूल लगने के आधा घंटे बाद लाने की हिदायत दी गई। इसे मैंने मान लिया क्योंकि क्लास के और बच्चे भी बहुत छोटे थे और उनका ख्याल रखना जरूरी था। रुद्रांश गाड़ी से किलकता हुआ आता तो आया भी उसे भुनभुनाते हुए लेने जाती।

एक दिन जब रुद्रांश बहुत अशांत था, मैंने वह बेल्ट खोल दी जो उसे कुर्सी से बांधे रखती थी। वह आजादी की ख़ुशी में गिर पड़ा, लेकिन शांत भी हुआ। उसे मैंने चीजें छूने को दी- पुराने अखबार, ब्लॉक्स, फ़ुटबाल, रबर के जानवर और फल। वह बहुत खुश होता। अक्सर अपने दोनों हाथों से मेरा चेहरा छूता मानो कुछ तसल्ली चाहता हो। वह मेरा सब्जेक्ट बन चुका था और मैं अनगढ़ हाथों से उसको संवारने में लगी थी।

उसे खाना-पीना, बाथरूम जाना, कुछ नहीं आता था। लेकिन बच्चों को देखकर अब उसके कांपते हाथ हरकत करते- खाने को मुंह चलता और शैतानियाँ भी सीख गया था, क्योंकि खाली जो रहता था।

पिता यूं फोन करता मानो अपनी कीमती थाती मुझे सौंप चुका हो और मैं उसको नुकसान न पंहुचा दूं। बच्चे क्लास में जोर-जोर से पढ़ते और वह सुन सकता था। रुद्रांश घरघराती आवाज़ में दिनभर घर में रट्टा लगता और माँ को निहाल करता।

धीरे-धीरे क्लास के बच्चे रुद्रांश का साथ देने लगे। वे उसको एक सामान्य बच्चे की तरह समझाते और वह कुछ न समझ के भी हँसता और खुश रहता। उसकी देखभाल होती। ढेर सारे दोस्त जो थे, उसके पास अब।

आज रुद्रांश ने अपने साथियों का हाथ पकड़ खड़े होने की कोशिश की, आज वह गिर पडा़ और उसके अति कोमल घुटने छिल गए, यह सब चलता। लेकिन मैंने अब डरना बंद कर दिया था क्योंकि हम दोनों एक-दूसरे का साथ जो देने लगे थे।

पोयम्स के दौरान रुद्रांश हंसता, तरह-तरह से मुंह बनाता, हाथों को नचाता और पैर भी चलाता। टुकड़े करके देने पर रोटी खाने लगा। कलाई से चम्मच बाँध देती और वह चावल, मैगी खा लेता। आश्चर्यजनक परिवर्तन थे।

कानून भी कहता है कि‍ यदि कोई वि‍शेष बच्चा, नार्मल बच्चों के साथ पढ़ना चाहे तो स्कूल को उसे जगह देनी पड़ेगी और यही कानून मेरा सहारा था। हालाँकि, मैं जानती थी कि इन बच्चों के लिए वही स्कूल ज्यादा उपयुक्त हैं, जहां उनके लिए बाथरूम, टूल्स, पठन सामग्री, सहायता और टेकनीक्स उपलब्ध हैं, लेकिन मैं तो बस उसे पहले उस अँधेरे कमरे से बाहर लाना चाहती थी और खुद की क्षमता भी देखना चाहती थी।

एक और जंग…एक साल के बाद रुद्रांश को उसके जैसे अच्छे वि‍शेष स्कूल में दाखिला दिलाने के लिए उसके दादा और पिता को राजी करना और दबाव डालना। उन्हें कतई  गवारा न था कि विशेष स्कूल की बस रोज उनके दरवाजे पर आये और एक दिव्यांग यहाँ रहता है, यह सब जाने।…हाय रे झूठी शान!

लेकिन अब हम तीन थे- मैं, रुद्रांश और उसकी माँ। परिवर्तनों से उसकी माँ का आत्मविश्वास भी बढ़ चुका था। काफी हुज्जत के बाद स्पेशल स्कूल चुना तो गया, लेकिन दिल्ली शहर में।

रुद्रांश चला गया।

तीस बच्चों के बावजूद क्लास में सन्नाटा था। अब मुझे हर समय मुस्कुरा कर देखने वाला कोई नहीं था। इस बीच सभी को रुद्रांश से लगाव हो गया था। प्रिंसिपल अक्सर उस भोले बच्चे की मुस्कान याद करतीं। इंटरवल में टीचर्स उसे देखने आती थीं। वह हेल्लो कहना और हाथ मिलाना भी सीख गया  था। अक्सर टीचर्स के दुपट्टे  या साडी़ का छोर पकड़ कर हँसता और सबको अपने मोह में बाँध लेता। अब सब उसे मिस करते थे।

रुद्रांश तो चला गया, लेकिन उसके जाने के बाद कई वि‍शेष बच्चों को लेकर उनके माँ-बाप आगे आये। उनकी आशा और हिम्मत के लिए रुद्रांश एक रास्ता खोल कर चला गया था।

जब लोग अपने बच्चों के 90 प्रति‍शत मार्क्स पर हताश होते हैं, तो मुझे रुद्रांश जैसे बच्चे बहुत याद आते हैं, जिनके माँ-बाप उनके मुंह से सिर्फ एक संबोधन सुनने को तरसते हैं। वो अपना नाम बता दें तो क्या कहने! वो खुद कुछ आराम से खा ले तो माँ निहाल।
सच्चाई तो यह है कि‍ ज्यादातर लोग इन बच्चों को अपनी अज्ञानता से घरों में बंद करके उन्हें और भी अक्षम बना देते हैं और दोष बच्चों पर मढ़ देते हैं या ऊपर वाले पर।

जानकर बहुत अच्छा लगा कि‍ रुद्रांश जिसे मैंने पेन्सिल पकड़वाने में अपना पूरा जोर लगा दिया था, उसने कला में रुचि दिखाई और स्पेशल स्कूल ने उसे खूब प्रेरित किया। उनकी और अपनी माँ की सहायता और जिद की वजह से रुद्रांश  अपने पिता की परवाह किये बिना दिल्ली के एक नामी फ़ास्ट फ़ूड सेण्टर में लोगों की आवभगत का काम करता है। स्कूल इन बच्चों को ना सिर्फ शिक्षित करता है, बल्कि अपने पेरों पर खड़े होने में भी सहायता करता है। रुद्रांश  आज भी बोल नहीं पाता, लेकिन प्रभावशाली मुस्कान से सबको अपना बना लेता है। वहां आये बच्चो के स्केच बना कर उन्हें खुश और फिर से आने को प्रेरित करता है। हॉस्टल में रहता है। घर नहीं आना चाहता। शायद वो काली यादें उसे डराती हैं।

इस बातचीत के दौरान वह लगातार मेरा हाथ अपनी हथेलियों में पकडे रहा मानो अब कभी नहीं छोड़ेगा। लेकिन माँ के समझाते ही अपना मोबाइल निकाल कर हिलते हाथो से मेरा फोटो लिया। मेरे पूछने पर कि‍ इसे मैं कैसे याद रही तो पता चला उन्होंने क्लास ग्रुप की इनलार्ज फोटो बनवा कर उसे दी है, जिसे वह अपने साथ रखता है।

मुझे लगा कि‍ मेरे संघर्ष का फल अगर ये वाला रुद्रांश है, तो मैं जीवन भर संघर्ष करने को तैयार हूं।

रुद्रांश…मेरी आँखें खोलने और मुझे गौरान्वित करने का शुक्रिया बच्चे!!
शुभकामनायें!!

शशि‍ काण्डपाल

शशि‍ काण्डपाल

शशि‍ काण्डपाल

शशि‍ काण्डपाल



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *