स्वतंत्रता, संवाद और विश्वास : महेश पुनेठा

पिछले दिनों फेसबुक पर मैंने एक प्रश्न पोस्ट किया कि आप अपना कोई भी कार्य किन परिस्थितियों में सबसे बेहतरीन रूप में कर पाते हैं? इसके उत्तर में लगभग दो दर्जन लोगों ने अपनी राय व्यक्त की, जिन्हें मोटे रूप में हम दो वर्गों में बांट सकते हैं। पहला वर्ग- जिनका कहना था कि वे दबाव, विपरीत परिस्थितियों, चुनौतीपूर्ण और विरोध के माहौल में अपना कार्य सबसे बेहतरीन रूप में कर पाते हैं। दूसरा वर्ग- जिनका कहना था कि वे जब मनचाहा काम हो और मनचाहे ढंग से करने की आजादी हो, अनुकूल परिस्थितियां हों, समय-समय पर प्रोत्साहन और मार्गदर्शन मिल रहा हो, किसी तरह का कोई दबाव न हो और भयमुक्त वातावरण हो, ऐसे में बेहतरीन रूप में कार्य कर पाते हैं। दूसरे वर्ग के लोगों की संख्या अधिक थी। पहले वर्ग की बातें मुझे आदर्शवादी अधिक लगीं। कहने-सुनने में तो ये बातें अच्छी लगती हैं, लेकिन वास्तविकता से काफी दूर हैं। ऐसे व्यक्ति अपवाद ही होंगे, जो भय-दबाव-अविश्‍वास और विपरीत परिस्थितियों में अपना बेहतरीन या सर्वश्रेष्‍ठ दे पाएं। कम से कम रचनात्मक कार्य तो बिल्कुल ही नहीं। यदि ऐसा होता तो दुनिया के सारे बेहतरीन काम गुलामों के खाते में होते। वास्तविकता यह है कि हम किसी भी कार्य को उन्हीं परिस्थितियों में बेहतरीन रूप में कर सकते हैं, जब हमें उस काम को करने के लिए पूरी स्वतंत्रता प्रदान की जाय, किसी तरह का कोई शारीरिक और मानसिक दबाव न डाला जाय, जहां भी उस कार्य को संपादित करने के लिए हमें कुछ जानने-समझने की जरूरत महसूस हो, उसके लिए हमें आवश्‍यक संवाद करने के पूर्ण अवसर दिए जायें। हम पर इस बात का विश्‍वास किया जाय कि हम उस कार्य को करने की क्षमता रखते हैं अर्थात हम उस कार्य को कर सकते हैं। बात-बात पर यदि हमारी ईमानदारी और निष्‍ठा पर शक किया जाता है, तो उसका प्रभाव हमारी कार्यक्षमता पर पड़ता है।

जैसा कि हमारा सरोकार शि‍क्षा से है और जब हम सीखने-सिखाने के संदर्भ में उक्त प्रश्‍न को देखते हैं, तो यहां भी दूसरे वर्ग के लोगों के उत्तर ही सटीक प्रतीत होते हैं। स्वतंत्रता, विश्‍वास और संवाद, सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के मूल तत्व हैं। इन तीनों तत्वों के सही तालमेल के बिना सीखना-सिखाना संभव नहीं लगता है। यह बात शि‍क्षक और शि‍क्षार्थी दोनों पर बराबर रूप से लागू होती है। शि‍क्षक सिखाने की प्रक्रिया में स्वतंत्रता, संवाद और विश्‍वास चाहता है तो बच्चे सीखने की प्रक्रिया में। एक शि‍क्षक अपने शि‍क्षण और स्कूल प्रबंधन के दौरान तमाम तरह के प्रयोग तभी कर सकता है, जब उसे ऐसा करने की आजादी दी जाय, उस पर विश्‍वास व्यक्त किया जाय। साथ ही शि‍क्षक को खुद पर भी विश्‍वास हो तथा एक ओर उच्च अधिकारियों तो दूसरी ओर बच्चों के साथ निरंतर संवाद स्थापित करने के उसे अवसर प्रदान किए जायें। आज सरकारी शि‍क्षा का सबसे बड़ा संकट यही विश्‍वास का संकट है, जिसे एक सोची-समझी चाल के तहत पैदा किया गया है। इसी के बलबूते शि‍क्षा का बाजार फल-फूल रहा है।

शि‍क्षण एक कला है। कोई भी कला तब तक पूर्णरूप में विकसित नहीं हो सकती है, जब तक उसके लिए दबावमुक्त वातावरण न हो। इधर ‘जबावदेही’के नाम पर शि‍क्षक पर जिस तरह के नियंत्रण लगाए जा रहे हैं, वे उस पर दबाव ही अधिक बनाते हैं। बच्चों के परीक्षा-परिणामों को तो पहले से ही उसकी वेतन-वृद्धि और पदोन्नति से जोड़ा जा चुका था, अब उसकी कक्षा-शि‍क्षण प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए सी.सी.टी.वी. कैमरे लगाने तक की बात की जा रही है। संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों ने इन उपायों पर अमल करके भी देख लिया है। इसके नाकारात्मक परिणाम ही देखने में आए। फिर भी इसका अनुकरण किया जा रहा है। दरअसल, इस तरह के उपाय शि‍क्षक की रचनात्मकता को प्रभावित करते हैं। उसे दायरे से बाहर जाकर कुछ नया करने से रोकते हैं। उसे स्वाभाविक नहीं रहने देते हैं। यह समझा जा सकता है कि अपनी वेतन वृद्धि-पदोन्नति और नौकरी बचाने के भय से ग्रस्त अध्यापक कभी भी बच्चों को भयमुक्त वातावरण नहीं दे सकता है। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि भय हमेशा कमजोर की ओर संक्रमित होता है।

दुनियाभर के शि‍क्षाविद् इस बात पर बल देते हैं कि बच्चों को भयमुक्त वातावरण दिया जाय। इसके पीछे यह तर्क है कि सीखने के लिए जिस अवलोकन, चिंतन और विश्‍लेषण की आवश्‍यकता होती है, वह दबावमुक्त वातावरण में ही हो संभव है। यदि बच्चों का मन-मस्तिष्‍क किसी भी प्रकार के दबाव में होता है तो वह एक तरह से व्यस्त होता है।ऐसे में बच्चे अवलोकन और विश्‍लेषण नहीं कर सकते हैं। अवलोकन और विश्‍लेषण के लिए मन का अवकाश में होना जरूरी है। साथ ही बच्चों की क्षमताओं पर विश्‍वास किया जाय, यह कतई न कहा जाय- ‘वे बच्चे हैं यह उनके वश की बात नहीं है।’ उनसे खुला संवाद किया जाय।लेकिन खाली स्वतंत्रता और विश्‍वास तब तक कारगर साबित नहीं होंगे, जब तक उनसे सार्थक संवाद न हो और उन्हें प्रश्न करने को प्रोत्साहित न किया जाय। साथ ही जहां उन्हें प्रोत्साहन की जरूरत है, वहां प्रोत्साहन और जहां मार्गदर्शन की जरूरत है, वहां मार्गदर्शन दिया जाय। दूसरे शब्दों में जब बच्चे जिस तरह की मदद चाहें,  उन्हें उस तरह की मदद देने के लिए तैयार रहा जाए। बच्चों की जिज्ञासा को जागृत किया जाय। अब यहां पर सवाल उठता है कि तमाम तरह के दबावों से दबा शि‍क्षक क्या ऐसा कर सकता है?

कतिपय शि‍क्षक-अभिभावक बच्चों को स्वतंत्रता प्रदान करने की बात पर चुटकी लेते हुए कहते हैं कि अब बच्चों को रोकना-टोकना नहीं है, वे जो चाहे उन्हें करने देना है, उनसे अब कुछ कहना नहीं है क्योंकि अब तो भयमुक्त वातावरण बनाना है। दरअसल, यह बात का सरलीकरण करना है। स्वतंत्रता का मतलब यह कतई नहीं है कि बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाय, वे जैसा चाहें, वैसा करते रहें। बच्चों के लिए स्वत्रंतता के साथ-साथ खुला संवाद भी बहुत जरूरी है। ध्यातव्य है, ‘संवादहीन स्वतंत्रता’को अराजकता में बदलने में देर नहीं लगती है। बच्चों को स्वतंत्रता देने के साथ ही उनसे और अधिक संवाद करना जरूरी हो जाता है। ऐसे में शि‍क्षक-अभिभावक की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उसे पहले से अधिक रचनात्मक और कल्पनाशील होना पड़ता है। उसे संवाद के माध्यम से एक बड़ी दुनिया से बच्चों का परिचय कराना होता है। उनके हर प्रश्‍न का उत्तर देने की कोशि‍श करनी होती है। बच्चों के भीतर यह आत्मविश्‍वास पैदा करना पड़ता है कि वे चाहें तो बहुत कुछ कर सकते हैं। उनके भीतर अपार क्षमता है और वे अपनी क्षमताओं को पहचानें और खुद पर विश्‍वास करें। इस जिम्मेदारी को शि‍क्षक-अभिभावक तभी अच्छी तरह से निभा सकते हैं, जब बच्चों से अधिक से अधिक दोस्ताना संवाद स्थापित करें।

इस अंक को हमने कुछ ऐसे विद्यालयों पर केंद्रित किया है, जिनका कार्य अन्य विद्यालयों से हटकर है। जहां सीखने-सिखाने के नए तरीके अपनाए गए या अपनाए जा रहे हैं। आप पाएंगे कि इन सभी विद्यालयों के बीच सबसे बड़ी समानता यही है कि सभी के मूल में स्वतंत्रता, संवाद और विश्‍वास निहित है, जिनके अभाव में इस तरह के विद्यालयों की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। इन्हें इस सिद्धांत के प्रमाण के रूप में देखा जा सकता है। इन विद्यालयों में बच्चों को दबाव मुक्त रखने और स्वतंत्रता देने के उद्देश्‍य से कक्षा-परीक्षा और स्कूल आने-जाने के समय तक में भी छूट दिखाई देती है।

इस अंक में हमारी कोशि‍श थी कि हम अधिक से अधिक ऐसे स्कूलों के बारे में जानकारी दें, जिनकी कार्यप्रणाली और शि‍क्षण प्रक्रिया परम्परागत पद्धति से हटकर है, जिन्हें ‘नवाचारी स्कूल’कहा जा सकता है। लेकिन हमें सरकार द्वारा तय मानकों के हिसाब से बहुत अच्छा कार्य कर रहे ‘अच्छे स्कूल’ तो बहुत सारे  मिले पर ‘नवाचारी स्कूल’ गिने-चुने ही। इस पर चिंतन करने की जरूरत है कि आखिर शि‍क्षा जैसे रचनात्मक क्षेत्र में भी नवाचार का इतना अभाव क्यों? क्यों नहीं हम लीक से हटकर सोच पा रहे हैं? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? ‘क्या सख्ती से पेश आओ’नीति पर चलकर यह संभव है?

(शैक्षि‍क दखल, अंक-10, जुलाई 2017 से साभार)



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