साहित्य की कलम से विज्ञान लिखता हूं: देवेंद्र मेवाड़ी

देवेंद्र मेवाड़ी

7 मार्च 1944 को नैनीताल जिले के एक दूरस्थ पर्वतीय गांव-कालाआगर में जन्‍में वरिष्ठ विज्ञान लेखक श्री देवेंद्र मेवाड़ी के पर्यावरण, कृषि, जीव-जंतु, खगोल विज्ञान और विज्ञान कथा पसंदीदा विषय हैं, जिन पर वे पिछले पांच दशकों से निरंतर लेखनी चला रहे हैं। देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनके वैज्ञानिक विषयों पर 1500 से अधिक लेख प्रकाशित हो चुके हैं। वे अब तक 25 मौलिक पुस्तकें लिख चुके हैं जिनमें प्रमुख है- ‘विज्ञाननामा’, ‘मेरी यादों का पहाड़’ (आत्मकथात्मक संस्मरण), ‘मेरी विज्ञान डायरी’ (भाग-1), ‘मेरी विज्ञान डायरी’ (भाग-2), ‘मेरी प्रिय विज्ञान कथाएं’, ‘भविष्य’ तथा ‘कोख’ (विज्ञान कथा संग्रह), ‘नाटक-नाटक में विज्ञान’, ‘विज्ञान की दुनिया’, ‘विज्ञान और हम’, ‘सौरमंडल की सैर’, ‘विज्ञान बारहमासा’, ‘विज्ञान प्रसंग’, ‘सूरज के आंगन में’, ‘फसलें कहें कहानी’, ‘विज्ञान जिनका ऋणी है’ (भाग-1 तथा भाग-2), ‘अनोखा सौरमंडल’, ‘पशुओं की प्यारी दुनिया’, ‘हॉर्मोन और हम’। प्रस्तुत है मेवाड़ी जी के साथ हुई मनीष मोहन गोरे की बातचीत के अंश-    

उत्तराखंड के दूर-दराज के गांव में जन्मे एक बालक से प्रख्यात विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी बनने का सफर किस तरह तय किया?

आज पीछे पलट कर देखता हूं मनीष जी, तो मुझे अपनी इस पचास वर्ष लंबी यात्रा की राह साफ दिखाई देती है जो मुझे फिर से पहाड़ के मेरे गांव और मेरे बचपन के दिनों में पहुंचा देती है। उत्तराखंड के नैनीताल जिले में पहाड़ के जिस गांव कालाआगर में मेरा जन्म हुआ, वह तब खेतों की हरियाली और घने जगलों से घिरा हुआ था। उन घने जंगलों में असंख्य वन्य जीव होते थे। गांव में चिड़ियां चहचहाती रहती थीं। कितनी तरह की रंग-बिरंगी तितलियां और कीट-पतंगे होते थे। हमारे गांव के सिरमौर जंगल में वसंत आते ही बुरांश के सुंदर लाल फूल खिल जाते थे तो खेतों के आसपास पीले रंग की प्यूली के फूल मन को लुभाने लगते थे। हम नीचे घाटियों से उठता हुआ कोहरा देख सकते थे जो पेड़-पौधों और खेतों से होकर हमसे मिलने के लिए भागता हुआ ऊपर चला आता था। वहां प्रकृति थी और हमारी तमाम जिज्ञासाओं के जवाब प्रकृति ही देती थी। हम बीजों को उगते, फूलों को खिलते, बादलों को उमड़-घुमड़ कर बरसते हुए देख सकते थे। रात में लाखों-लाख तारों भरा आसमान हमारा मन मोह लेता था। आज याद आता है कि कितना कुछ जानना चाहता था मैं तब अपने आसपास की दुनिया के बारे में। मेरे भीतर बैठा वही बालक आज अपने विज्ञान लेखन के जरिए प्रकृति की किताब के बारे में आमजन को बताने की विनम्र कोशिश कर रहा है।

वनस्पति विज्ञान में एम.एस-सी., हिंदी साहित्य में एम.ए. और जनसंचार में उपाधि हासिल करने के बाद आप विज्ञान लेखन की ओर कैसे उन्मुख हुए?

आपको मैं यहां बताना चाहता हूं कि इस तरह प्रकृति की किताब पढ़ते-पढ़ते मैं अपने गांव के सामने के दूसरे पहाड़ पर गोविंद बल्लभ पंत इंटर कालेज मैं पहुंच गया और वहां भी प्रकृति के बीच रह कर विज्ञान के विषयों के साथ इंटर की परीक्षा पास की। पेड़-पौधों और वन्य जीवों से बहुत प्यार था, इसलिए नैनीताल में उच्च शिक्षा के दौरान वनस्पति विज्ञान, प्राणि विज्ञान और रसायन विज्ञान जैसे विषय चुने। फिर वनस्पति विज्ञान में एम.एस-सी की। उन्हीं दिनों की बात है-  मैं कहानियां लिखने लगा था। मेरी कहानियां कहानी, माध्यम, उत्कर्ष आदि पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। विज्ञान मुझे बहुत रोचक लगता था और मेरा मन करता था कि मैं विज्ञान की वे तमाम बातें अपने साथियों और अन्य लोगों को बताऊं। इसलिए मैंने विज्ञान पर लिखना शुरू किया। मेरा पहला लेख सन् 1965 में ‘कुमाऊं और शंकुधारी’ इलाहाबाद की ‘विज्ञान’ पत्रिका में और दो लेख- ‘जानि शरद ऋतु खंजन आए’ तथा ‘शीत निष्क्रियता’ ‘विज्ञान जगत’ मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुए। ‘विज्ञान जगत’ के संपादक प्रो. आर.डी. विद्यार्थी ने मेरे पत्र के उत्तर में लिखा था, “लिखते रहना, कौन जाने किसी दिन तुम स्वयं एक विज्ञान लेखक बनो।” उनके इस वाक्य ने मुझमें विज्ञान लेखन की लौ जगा दी और मैं विज्ञान लेखक बन गया।

50 वर्ष लंबी अबाध विज्ञान लेखन यात्रा के दौरान आपके जीवन में अनेक पड़ाव आये होंगे और आपने संघर्ष किया होगा। कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि जीवन के तमाम झंझावातों और नौकरी-चाकरी के बीच विज्ञान लेखन नहीं हो पा रहा है और इसे छोड़ ही देते हैं।

मैंने तय कर लिया था कि मुझे जीवन में विज्ञान लेखक बनना है, परिवार के भरण-पोषण के लिए मुझे भले ही किसी भी तरह की नौकरी करनी पड़े। विज्ञान लेखक बनने के मेरे संकल्प ने मुझे निरंतर विज्ञान लेखन के लिए प्रेरित किया। मुझे पहली नौकरी भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली) में मिली। वहां मैंने तीन वर्ष तक मक्का की फसल पर शोध कार्य किया। उस बीच मैंने मक्का पर कई लेख लिखे। उसके बाद पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के आमंत्रण पर मैं पूसा इंस्टीट्यूट छोड़ कर पंतनगर चला गया। वहां मैंने तेरह वर्षों तक कृषि की मासिक पत्रिका ‘किसान भारती’ का संपादन किया। इसके अलावा पाठ्य-पुस्तकों के अनुवाद और पत्रकारिता शिक्षण से भी जुड़ा रहा। वहां से मैं देश के सबसे बड़े राष्ट्रीयकृत बैंक पंजाब नैशनल बैंक में जनसंपर्क तथा प्रचार की जिम्मेदारी संभालने के लिए चला गया। वहां 22 वर्ष रहा, चीफ (जनसंपर्क) के रूप में अवकाश प्राप्त करने के बाद एक वर्ष तक विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी विभाग (भारत सरकार) की संस्था विज्ञान प्रसार में फैलो रहा। यह सब इसलिए बता रहा हूं कि नौकरी चाहे कोई भी रही हो, मैं निरंतर विज्ञान लेखन करता रहा क्योंकि यही मेरे जीवन का लक्ष्य था। इन तमाम वर्षों में देश की अग्रणी पत्र-पत्रिकाओं के लिए लगातार लिखता रहा। प्रिंट के अलावा, रेडियो, टेलीविजन तथा फिल्म जैसे माध्यमों के लिए भी लिखा। मैंने हर नौकरी पूरी ईमानदारी और मेहनत से की तथा नौकरी के काम को निर्धारित समय से भी अधिक समय दिया। लेकिन नौकरी के बाद का समय तथा छुट्टियों के दिन मेरे अपने होते थे जिनका मैंने पूरा उपयोग विज्ञान लेखन के लिए किया। एक बात और, विज्ञान लेखन मुझे सदा नौकरी के तनावों से मुक्त होने का सुअवसर देता रहा। बल्कि यों कहूं कि दवा का काम करके मुझे तनाव से मुक्त करता रहा।

आपके लिए लोकप्रिय विज्ञान लेखन के क्या मायने हैं? विज्ञान लेखन करते हुए आपके मन में क्या लक्ष्य रहते हैं?

मेरे लिए लोकप्रिय विज्ञान लेखन का अर्थ यह है कि तकनीकी भाषा में लिखा गया विज्ञान का ज्ञान ‘खग ही जाने खग की भाषा’ न बना रहे। वह वैज्ञानिकों और विज्ञान के शिक्षकों तथा विद्यार्थियों तक ही सीमित न रहे, बल्कि आम जन तक पहुंच सके। यह तभी हो सकता है जब विज्ञान के ज्ञान को सरल-सहज भाषा, रोचक शैली और विविध विधाओं में लिखा जाए। अपनी  लेखन यात्रा में मेरा यही लक्ष्य रहा है।

आपके विज्ञान लेखन की एक अलग पहचान है। इस मुकाम को कैसे हासिल किया आपने?

आपकी यह बात सुन कर मुझे बहुत खुशी हो रही है। असल में मैं यह सोचता रहता था कि मेरे लेखन की एक अलग पहचान बने। मेरी रचना का अगर कोई भी अंश किसी पाठक को मिल जाए तो वह पहचान ले कि यह तो लगता है देवेंद्र मेवाड़ी ने लिखा होगा। इसका सबूत मुझे कई वर्ष पहले मिला था जब पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक दूरस्थ इलाके से किसी सीता बहिन का पत्र मिला। उनके दो बच्चे एक पत्रिका के पन्ने से खेल रहे थे जिसे उनके हाथ से लेकर सीता ने पढ़ा। उसमें लेखक का नाम नहीं था। उसने पत्र में लिखा कि वह पन्ना पढ़ कर मैं समझ गई थी कि वह सब आपने ही लिखा होगा। वह मेरी रचनाएं पढ़ती रही थी इसलिए उसने मेरे लिखने का अंदाज बखूबी समझ लिया था। असल में अपने लेखन को एक अलग पहचान देने के लिए मैंने उसे विविध विधाओं में लिखा और उसमें साहित्य की सरसता भी भरी। इसीलिए मैं कहता हूं कि मैं साहित्य की कलम से विज्ञान लिखता हूं। अपने इस प्रयास में मैं हरसंभव कोशिश करता हूं कि विज्ञान की जो बात मैं पाठकों को बताने जा रहा हूं, वह ऐसी भाषा और शैली में हो कि वे उसे अच्छी तरह समझ लें और उसका आनंद उठाएं।

 साहित्य की कलम से विज्ञान लेखन सचमुच प्रेरक पंक्ति है युवा विज्ञान लेखकों के लिए। आपने 13 वर्ष तक कृषि पत्रिका किसान भारतीका सम्पादन कार्य भी किया है। इस अनुभव ने आपमें किस प्रकार का संस्कार भरा?

वे तेरह वर्ष मेरे लिए लेखन और संपादन की परीक्षा के वर्ष थे। पत्रिका किसानों की थी, इसलिए मुझे विज्ञान की जानकारी ऐसी भाषा-शैली में उन तक पहुंचानी थी जिसे वे आसानी से समझ सकें। उस दौरान मुझे तरह-तरह की शैलियों में लिखने का मौका मिला। और, यह तो सच है कि किसान विज्ञान की जानकारी का लाभ तभी उठाते जब उन्हें वह जानकारी सरल-सहज भाषा में मिलती। मैंने वही किया।

आपको ऐसा नहीं लगता कि इतर क्षेत्र में रहने से मन में जो तड़प उठती है, वही व्यक्ति से उसके पसंदीदा क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करवाती है।

लगता है, बशर्ते यह हर क्षण याद रहे कि जीवन में मुझे क्या करना है, क्या बनना है। जो चाहा, वह सदा मिलता नहीं। इसलिए जो मिलता है, उसमें समर्पित रूप से काम करते हुए शेष समय में वह किया जा सकता है जो जीवन का लक्ष्य है। इतर क्षेत्र में काम करने पर मन में वह तड़प बार-बार उठती है। वह काम पिछड़ने पर हूक भी उठती है।

आपके लेखन के आरम्भिक दौर में बड़ी पत्रिकाएं थीं, मनीषी संपादक थे, आपने उन पत्रिकाओं में खूब लिखा भी। लेकिन, बाद में वे पत्रिकाएं कम हो गईं, अखबारों में विज्ञान कम हो गया। तब कैसे आपने अपना विज्ञान लेखन जारी रखा?

आप ठीक कह रहे हैं। मेरे लेखन के प्रारंभिक दौर में धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, नवनीत, कादंबिनी और दिनमान जैसी बड़ी प्रसार संख्या वाली मासिक पत्रिकाएं तो थीं ही, सभी अखबार भी रविवासरीय पत्रिका प्रकाशित किया करते थे जिनमें कथा-कहानी, कविता के साथ-साथ विज्ञान भी छपता था। डा. धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी, नारायण दत्त, अज्ञेय और रघुवीर सहाय जैसे मनीषी संपादक भी थे। मेरा सौभाग्य है कि उन मनीषी संपादकों ने मेरे विज्ञान लेखन को न केवल प्रोत्साहित किया, बल्कि उसे संवारा भी। वैसी पत्रिकाओं की कमी हुई तो मैं समाचारपत्रों के रविवारीय संस्करणों और संपादकीय पृष्ठ पर विज्ञान लिखता रहा। मैंने रेडियो के लिए भी विज्ञान खूब लिखा। बाद में टेलीविजन आ जाने पर उसके लिए भी कार्यक्रमों के आलेख लिखे और प्रस्तुत किए।

आपने रेडियो-टेलीविजन का जिक्र किया। इन इलैक्ट्रानिक माध्यमों के लिए आपने लेखन की शुरूआत कैसे की?

वैज्ञानिक विषयों पर रेडियो वार्ताओं से। आकाशवाणी के दिल्ली और लखनऊ केन्द्रों से विज्ञान के विविध विषयों पर मेरी बड़ी संख्या में वार्ताएं प्रसारित हुईं। मुझे याद है, उस दिन जब पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी हमारे देश के प्रथम अंतरिक्षयात्री राकेश शर्मा से सीधे अंतरिक्ष में बात करने वाली थीं तो उस वक्त मैं लखनऊ केन्द्र से ‘अंतरिक्ष में भारत का योगदान’ विषय पर अपनी वार्ता दे रहा था। वार्ता के अंत में मेरे पास एक पर्ची भेज कर श्रोताओं के लिए यह घोषणा करने के लिए कहा गया कि ‘अभी कुछ ही क्षणों के बाद प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी हमारे देश के प्रथम अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा से बातचीत करेंगी। कृपया प्रतीक्षा करें।’ मैंने यह घोषणा की। और, तभी लिंक जुड़ गया और प्रधानमंत्री की राकेश शर्मा से बातचीत शुरू हो गई। वे मेरे लिए रेडियो प्रसारण के यादगार क्षण थे। दिल्ली केन्द्र से मैंने लाइव प्रसारण में वर्ष 1995 के सूर्यग्रहण के विशेषज्ञ की हैसियत से आंखों देखा हाल और ग्रहण से जुड़े वैज्ञानिक तथ्य बताए। ब्रिज-इन और फोन-इन कार्यक्रमों में भाग लिया। विज्ञान पत्रिका कार्यक्रम की प्रस्तुति की और ‘मानव का विकास’ सहित अनेक विज्ञान धारावाहिकों के लिए वर्षों तक पटकथाएं लिखीं। इसी तरह दूरदर्शन, लखनऊ के ‘चैपाल’ कार्यक्रम में नियमित ‘नई बातरू नया चलन’ की धारावाहिक प्रस्तुति दी। दिल्ली आकर ‘विज्ञान दर्पण’ के पचासों एपिसोड लिखे। प्रख्यात फिल्मकार अरुण कौल की संगत में ‘धूमकेतु’ वृत्तचित्र बनाया।

संचार के मुद्रण स्वरूपों की जगह डिजिटल मीडिया ने समाज के लगभग हर वर्ग को अपनी ओर आकर्षित किया और अपना उपयोगकर्ता बनाया है। यह एक बड़ी घटना है। इसके चलते बच्चों और युवाओं में किताबी पठनीयता घटी है और फेसबुक, वाट्सएप जैसे डिजिटल मंचों पर उपस्थिति बढ़ी है। इन मंचों का सहारा लेकर इन्हें लोकप्रिय विज्ञान या ललित विज्ञान साहित्य से कैसे जोड़ा जा सकता है?

यह बात सही है कि विगत कुछ वर्षों में डिजिटल माध्यम की लोकप्रियता बढ़ी है। लेकिन, मैं यह भी मानता हूं कि किताब का अपना अस्तित्व है और वह सदा बना रहेगा। जिन्हें किताब पढ़नी है, वे किताबें पढ़ रहे हैं। हां, हमें समय की जरूरत के अनुसार डिजिटल मीडिया का भी विज्ञान लेखन के लिए भरपूर उपयोग करना चाहिए। मैंने भी कुछ वर्ष पहले से फेसबुक और अपने ब्लाग पर विज्ञान की बातें लिखना शुरू किया। आभासी दुनिया के साथियों ने मेरे इस लेखन में रुचि ली और उनकी संख्या बढ़ती गई। यहां मैं आपको यह भी बता दूं कि अनेक साहित्यकार और साहित्य प्रेमी भी मेरे विज्ञान लेखन के नियमित पाठक हैं। इस तरह मैं विज्ञान और साहित्य के बीच एक सेतु बनने की भी हर संभव कोशिश कर रहा हूं। डिजिटल माध्यम के लाखों-लाख पाठक हैं। हमें इस माध्यम का भरपूर उपयोग करके उन पाठकों तक विज्ञान का ज्ञान पहुंचाने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।

सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर विज्ञान लेखन का कितना प्रभाव है?

सोशल मीडिया विज्ञान की जागरूकता बढ़ाने के लिए एक सशक्त माध्यम के रूप में काम आ सकता है। इस दिशा में कुछ विज्ञान लेखक समर्पित रूप से काम भी कर रहे हैं और उनके ब्लाग सामयिक वैज्ञानिक जानकारी पाठकों को दे रहे हैं। ‘विज्ञान विश्व’ और ‘साइंटिफिक वर्ल्ड’ काफी अच्छे ब्लाग हैं। लेकिन, विज्ञान लेखकों को इस विधा का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए।

विज्ञान डायरी, संस्मरण जैसी अनोखी साहित्यिक विधाओं को आपने विज्ञान लेखन से जोड़कर काम किया है। इस दिशा में काम करने की प्रेरणा आपको कहां से मिली?

यह जानकर खुशी हुई कि आपका ध्यान इस ओर गया है। केवल लेखों के रूप में विज्ञान प्रस्तुत करने की एकरसता को तोड़ने के लिए मैंने डायरी के रूप में विज्ञान लिखना शुरू किया। इस विधा में मेरी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। डायरी के रूप में विज्ञान लिखने पर उसमें एक व्यक्तिगत लगाव और अधिक विश्वसनीयता आ जाती है। पाठक उसे लेखक के निजी बयान के रूप में लेता है। इसी तरह मैंने संस्मरण की विधा में निकट से देखे विज्ञान लेखकों के बारे में लिखा है जिनमें उनका पूरा व्यक्तित्व और कृतित्व उजागर होता है। इसके अलावा मैंने नाट्य विधा में भी काफी विज्ञान लिखा है और शीघ्र ही मेरे रेडियो नाटकों की पुस्तक ‘नाटक-नाटक में विज्ञान’ प्रकाशित होने जा रही है। विगत दो वर्षों से मैं स्कूल-कालेजों और विश्वविद्यालयों में जाकर विज्ञान की किस्सागोई यानी स्टोरी टेंलिंग भी कर रहा हूं। अब तक पांच हजार से अधिक बच्चों को मैं सौरमंडल की सैर कराने के साथ-साथ विज्ञान की कहानियां भी सुना चुका हूं। जहां तक प्रेरणा का सवाल है, वह तो अंतःप्रेरणा ही है। जब मन कुछ नया करने के लिए बेचैन होता है तो नई विधा के रूप में रास्ता सामने दिखाई देने लगता है।

अनुवाद एक महत्वपूर्ण काम है। इसमें दो भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है, लेकिन जब वैज्ञानिक साहित्य के अनुवाद की बात आती है तो इसमें विज्ञान की जानकारी का तीसरा आयाम जुड़ जाता है। मेरी चिंता है कि विज्ञान साहित्य के अनुवादकों को कैसे तैयार किया जाना चाहिए?

बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया आपने। अनुवाद एक बेहद गंभीर कार्य है। वैज्ञानिक साहित्य का अनुवाद करते समय अनुवादक की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। भारत में हिंदी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक साहित्य के अनुवाद की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। इस ओर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। यहां पर विज्ञान संचार की सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।

जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण जैसी मौजूदा सार्वभौमिक समस्याओं के लिहाज से विज्ञान लेखकों और विज्ञान संपादकों के दायित्व को आप किस तरह देखते हैं?

जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण जैसे खतरों से जन सामान्य को आगाह करने में विज्ञान लेखक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं। विज्ञान संपादक ऐसे जानकारीपूर्ण विज्ञान लेखों को लिखवाने और उन्हें प्रकाशित करने में अहम योगदान दे सकते हैं।

वैज्ञानिक साहित्य सृजन में मानवीय पहलुओं और मूल्यों का संपोषण कितना अहम है? पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक शोध की दिशा में इनकी भूमिका को आप किस प्रकार महसूस करते हैं?

विज्ञान और प्रौद्योगिकी को मनुष्य के जीवन तथा समाज से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। ये हमारे जीवन और समाज से अभिन्न रूप से जुड़े हुए विषय हैं। वहीं दूसरी ओर यह भी उतना ही सच है कि वैज्ञानिक अनुसंधान के दौरान यह सुनिश्चित किया जाए कि इससे पर्यावरण और जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर संकट न आने पाए।

विज्ञान लेखन की कौन-कौन सी सशक्त विधाओं में काम करने की संभावना है?

लेख और फीचर लेखन के अलावा ललित विज्ञान भी लिखा जाना चाहिए ताकि लोग उस सरस विज्ञान को पढ़ने के लिए लालायित हों। इससे पाठकों की संख्या तो बढ़ेगी ही, वैज्ञानिक जागरूकता का भी प्रसार होगा। इधर मैं यात्रावृत्तांतों के रूप में विज्ञान लिख रहा हूं जिसे आभासी दुनिया के साथी काफी पसंद कर रहे हैं। इस तरह यात्रा के बहाने यात्रा के दौरान देखी गई तमाम चीजों से जुड़े विज्ञान की जानकारी भी पाठकों को मिल जाती है। विज्ञान नाटकों के क्षेत्र में भी लिखने की बहुत गुंजाइश है। हिंदी में मंचन के लिए स्तरीय विज्ञान नाटकों की बहुत कमी है, इस दिशा में भी काम किया जाना चाहिए। विज्ञान कथाओं का बहुत अभाव है, इसलिए इस विधा में भी लिखने की बहुत संभावना है। लेकिन, विज्ञान कथा लिखते समय यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि वह विज्ञान कथा ही है और कहानी की परिभाषा के भीतर आती है।

अपनी भावी योजनाओं के बारे में बताएं।

मैं फिलहाल विज्ञान की विविध विधाओं में निरंतर विज्ञान लेखन कर रहा हूं और यह क्रम भविष्य में भी जारी रहेगा। ‘मेरी विज्ञान डायरी भाग-3‘ को पुस्तक रूप में तैयार कर रहा हूं और अपने यात्रावृत्तातों पर आधारित किताब की पांडुलिपि को भी संजो रहा हूं। विज्ञान कथाएं और उपन्यास लिखने का भी मन है। सोचता हूं, विज्ञान पर कुछ ऐसा लिखूं जिसे लोग कथा-कहानी की जैसी रोचकता के साथ पढ़ सकें। कुछ योजनाएं और भी हैं, जो पूरी हो जाने के बाद विश्वास है पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करेंगी।

युवा विज्ञान लेखकों के लिए आपके क्या सन्देश हैं?

विज्ञान लेखन की अपार संभावनाएं हैं और सच पूछिए तो भविष्य विज्ञान लेखन का है, क्योंकि दुनिया में विज्ञान का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है। नई पीढ़ी को स्वयं जागरूक होने के लिए और समाज में वैज्ञानिक जागरूकता फैलाने के लिए, विज्ञान लेखन के क्षेत्र में आगे आना चाहिए। इस तरह वे समाज में वैज्ञानिक चेतना जगाने का उत्तरदायित्व पूरा कर सकेंगे। आज जनसंचार माध्यमों में और विशेष रूप से अनेक निजी चैनलों में जिस तरह भूत-प्रेत, आत्माओं, इच्छाधारी नाग-नागिनों और आत्माओं का महिमामंडन किया जा रहा है, उससे आगे बढ़ते समाज को बहुत नुकसान हो रहा है। विकसित देशों में जहां युवा पीढ़ी समंदरों के गर्भ में झांकने, पृथ्वी के अनजाने रहस्यों को बूझने और अंतरिक्ष में सौरमंडल तथा उसके पार ब्रह्मांड की अबूझ पहेलियों को सुलझाने के सपने देख रही है, वहां हमारी युवा पीढ़ी को चैनलों पर यह सब दिखाया जा रहा है। इसका प्रतिगामी प्रभाव पड़ेगा। यह दुखद स्थिति है। इसलिए नई पीढ़ी को मशाले-राह बन कर सामने आना चाहिए। कल की दुनिया वह होगी जिसे आज की नई पीढ़ी बनाएगी।

2 comments on “साहित्य की कलम से विज्ञान लिखता हूं: देवेंद्र मेवाड़ी

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर …. आभार।।

  2. साधुवाद देवेंद्र जी और उनकी कलम के लिये।

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