साहित्य अकादेमी का कारपोरेटाइजेशन

केंद्रीय साहित्य अकादेमी और कोरिया की मल्टीनेशनल कंपनी सैंमसंग इंडिया के बीच हुई जुगलबंदी से लेखकों में आक्रोश है। अकादेमी साहित्य का गठन 12 मार्च, 1954 को भारत सरकार द्वारा किया गया था। इसका उद्देश्य भारतीय भाषाओं और भारत में होनेवाली साहित्यिक गतिविधियों का पोषण और समन्वय करना है। अकादेमी के इतिहास में पहली बार कोई मल्टीनेशनल कंपनी पुरस्कार प्रायोजित कर रही है। सैंमसंग इंडिया ने आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं को पुरस्कार देने की घोषणा की है। प्रत्येक वर्ष आठ भारतीय भाषाओं को चुना जाएगा। इस तरह से प्रत्येक भाषा का तीन साल बाद नंबर आएगा। इस वर्ष बांग्ला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, पंजाबी, तेलुगु और बोडो भाषाओं के लेखकों को सम्मानित किया जा रहा है। पुरस्कार कोरियाकी प्रथम महिला द्वारा पंच सितारा होटल ओबेराय में 25 जनवरी को दिया जाएगा। यह पुरस्कार गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की स्मृति में दिया जा रहा है। आयोजन साहित्य अकादेमी के बैनर के नीचे हो रहा है, यही विवाद की जड़ है। कई लेखकों ने समारोह के बहिष्कार का मन बना लिया है। उन्होंने इसकी घोषणा भी कर दी है। इनमें साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त लेखक भी हैं। सुप्रसद्धि साहित्यकार नामवर सिंह, कृष्णा सोबती, मैनेजर पांडेय, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और विश्वनाथ त्रिपाठी आदि इस पुरस्कार का विरोध कर चुके हैं।
साहित्य अकादेमी और विवाद का संबंध वर्षों पुराना है। साहित्य अकादेमी द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कारों को लेकर भी अकसर सवाल उठते रहे हैं। कई बार इस तरह के सवाल भी उठे हैं कि लेखक की महत्वपूर्ण कृति को नजरअंदाज कर दिया गया और उसकी कमजोर कृति को पुरस्कार दे दिया गया। जैसे- यशपाल के ‘झूठा सचÓ के बजाए ‘तेरी मेरी उसकी बातÓ को और विष्णु प्रभाकर की कालजयी रचना ‘आवारा मसीहाÓ के बजाय ‘अर्धनारीश्वरÓ को पुरस्कार दिए गए। लेकिन तमाम विवादों और सवालों के बावजूद लेखकों का प्रयास रहा है कि साहित्य अकादेमी की स्वायत्तता पर आंच न आए। लेखकों को सबसे बड़ा खतरा यही है कि इस जुगलबंदी से संस्था की स्वायत्तता प्रभावित होगी, साहित्य में न केवल कंपनी का बल्कि उद्योग जगत का सीधा दखल शुरू हो जाएगा।
हिंदी के छोटे-बड़े अधिकांश लेखकों की रायल्टी सही ढंग से नहीं मिलने की शिकायत है। देश में सरकारी या गैर सरकारी स्तर पर कोई ऐसी योजना नहीं है कि लेखक को विशेष सुविधा या फंड दिया जाए। वह आर्थिक मुश्किलों का सामना करके भी लिखे जा रहा है तो इसके पीछे कम से कम धन का लालच तो नहीं है। यदि धन की ही लालसा हो तो धंधों की कमी नहीं है। लेखक लेखन के माध्यम से अपसंस्कृति, बाजारवाद, असमानता आदि विसंगतियों का भी विरोध करता है। मल्टीनेशनल कंपनियां इनकी वाहक होती हैं। लेखकों की संस्था और मल्टीनेशनल कंपनी में तालमेल संभव नहीं है। फिर क्या वजह है कि देश की सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था को मल्टीनेशन कंपनी से हाथ मिलाना पड़ रहा है? विरोध का एक प्रमुख कारण यह भी है। 
लेखकों का मानना है कि मल्टीनेशनल कंपनी के दखल से अकादेमी की स्वायत्ता समाप्त हो जाएगी। पूरे देश में निजीकरण का दौर चल रहा है। ऐसे में साहित्य अकादेमी जैसी इक्का-दुक्का संस्थाएं ही इसकी चपेट से दूर थीं। सरकार साहित्य को भी पंचसितारा संस्कृति का अंग बनाने पर तुली है। सरकार की मंशा इसी से पता चलती है कि पहले समारोह का आयोजन पंचसितारा होटल में किया जा रहा है। इस तरह पंच सितारा संस्कृति को बोलबाला होना से आम आदमी की पोंछ से साहित्य दूर हो जाएगा। सरकार चाहती भी यही है कि साहित्य पर उसका वर्चस्व रहे। वही रचा जाए जो वह चाहती है।
गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर का नाम पुरस्कार से जोड़ा जाना भी आपत्तिजनक है। 7 मई, 1861 में जन्मे गुरुदेव के जन्म के 150 वर्ष पूरे होने पर यूनेस्को ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्यक्रम मनाने का निर्णय लिया है। भारत और बांग्लादेश भी संयुक्त रूप से आयोजन कर रहे हैं। एक मल्टीनेशनल कंपनी के साथ मिलकर अकादेमी को टैगौर के नाम पर पुरस्कार देने की क्या जरूरत है? क्या भारत सरकार इतनी दीन-हीन हो गई है कि अपने लेखकों को सम्मानित करने के लिए प्रायोजक की जरूरत पडऩे लगी है? यदि ऐसी स्थिति है तो पुरस्कार ही न दिया जाएं।
साहित्य अकादेमी की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि लेखकों का चयन अकादेमी द्वारा किया जाएगा। इसमें कंपनी का कोई दखल नहीं होगा। हो सकता है कि प्रारंभिक साल-दो साल यह स्थिति रहे भी, लेकिन जो कंपनी पुरस्कार और समारोह में लाखों खर्च कर रही है, उसका दखल रहेगा ही नहीं यह असंभव है। कंपनी का प्रत्यक्ष रूप से भले ही हस्तक्षेप न रहे, लेकिन उसकी इच्छा-अनिच्छा और रीति-नीति तो अंतत: पुरस्कार को प्रभावित करेगी ही।
कोई मल्टीनेशनल कंपनी किसी लेखक के नाम पर पुरस्कार दे रही है तो उस पर भला किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? यह लेखक के विवेक पर निर्भर करेगा कि पुरस्कार ले या नहीं। समसुंग पुरस्कार देना चाहती है तो शौक से दे। वह कोरिया में भी गुरुदेव टैगोर के नाम पर पुरस्कार की शुरुआत कर सकती है। भारत में भी स्वतंत्र रूप से पुरस्कार घोषित कर सकती है, लेकिन उसे साहित्य अकादेमी मंच की जरूरत क्यों पड़ रही है?
असल में हर मल्टीनेशनल कंपनी को भारत में बड़ा बाजार दिखाई दे रहा है। हिंदी के नाम पर नाक-भौं सिकेडऩे वाले भी आज हिंदी को अपनाने के लिए बाध्य हुए हैं। हर चैनल को हिंदी कार्यक्रम दिखाने पड़ रहे हैं। हर प्रोडेक्ट का विज्ञापन हिंदी में आ रहा है। भारत में अपनी पैठ बनाने के लिए कंपनियां हर हथकंड़े अपना रही हैं। साहित्य अकादेमी का मंच अपनाने के पीछे भी यही उद्देश्य है। सूचना प्रौद्योगिकी पर नियंत्रण कर मल्टीनेशनल कंपनियां आम आदमी की सोच को प्रभावित कर चुकी हैं। इसका उपयोग बड़ी सफाई से वे अपने हित में कर रही हैं। लेखक लेखन के माध्यम से इसका जब-तब विरोध करते हैं और लोगों की सोच को सही दिशा दिखाने की कोशिश करते हैं। लेखकों की धार को कुंद करने के लिए ही साहित्यिक संस्था मल्टीनेशनल कंपनी रुचि ले रही है। यह तो शुरुआत है। इस पर सख्ती से अंकुश नहीं लगाया गया तो आने वाले समय में सभी छोटी-बड़ी संस्थाओं और संगठनों को मल्टीनेशनल कंपनी संचालित करेंगी। फिर वही लेखक सम्मानित होंगे, जिन्हें वह चाहेंगी और लेखकों भी उनके हित में लिखने के लिए बाध्य किया जाएगा। साहित्य में भी बाजारवाद हावी होगा। साहित्य को भ्रष्ट कर जनता से विमुख करने की साजिश की जा रही है।
चर्चित संस्मरणकार कांति कुमार जैन का कहना है कि टैगोर बड़ा नाम है। कंपनी उनके नाम का और साहित्य अकादेमी के मंच का उपयोग करना चाहती है। यह ठीक नहीं है। अकादेमी गलत परंपरा शुरू कर रही है। कल यादि माफिया या शराब का ठेकेदार निराला या शरतचंद के नाम से पुरस्कार देना के लिए अकादेमी के मंच का उपयोग करना चाहेगा तो अकादेमी क्या करेगी? क्या उसे भी मंच प्रदान कर देगी?
उन्होंने कहा कि साहित्य अकादेमी की स्वायत्तता और प्रतिष्ठा है। कंपनी इसका उपयोग अपने हित में करना चाहती है। यह साहित्य में हस्तक्षेप होगा। कंपनी पैसा लगा रही है तो उसका बिजनिस इंटरैस्ट है। कंपनी टैगोर से प्रभावित है और साहित्य को प्रोत्साहित करना चाहती है तो खुद क्यों नहीं पुरस्कार देती? टैगोर के नाम और अकादेमी के मंच का उपयोग विज्ञापन के लिए किया जाएगा। स्टेज पर लेखकों के नहीं, कंपनी के पोस्टर लगेंगे।
उन्होंने कहा कि साहित्य अकादेमी के लेखकों के चयन से कंपनी सहमत नहीं हुई तो फिर क्या होगा? राजनीतिक समीकरण बनते-बिगड़ते रहते हैं। किसी कारणवश कोरिया सरकार से भारत के मतभेद हो जाएं और कंपनी पुरस्कार देने से इनकार कर दे तो ऐसी स्थिमि में अकादेमी क्या करेगी? यह जो घालमेल हो रहा है, उचित नहीं है। भविष्य में पुरस्कार को लेकर विवाद अवश्य होगा।
सुप्रसिद्ध लेखक महीप सिंह का कहना है कि सैंमसंग इंडिया द्वारा साहित्य अकादेमी के मंच से पुरस्कार देना अनुचित नहीं है। यदि कोई मल्टीनेशनल कंपनी अकादेमी के सहयोग से लेखकों को सम्मानित कर रही है और साहित्य को प्रोत्साहित करना चाहती है तो उसमें गलत क्या है? इसका विरोध करने का कोई औचित्य नहीं है। यह सहभागिता है। इसे दखलअंदाजी से कैसे कहा जा सकता है?
उन्होंने कहा कि इससे अकादेमी की स्वायत्तता और स्वतंत्रता पर कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि अकादेमी का कार्य क्षेत्र बहुत व्यापक है। उसके बहुत से कार्यक्रम हैं। यदि किसी एक कार्यक्रम में कोई मल्टीनेशनल कंपनी सहयोग कर रही है तो इससे क्या फर्क पड़ जाएगा।
उन्होंने कहा कि यदि भविष्य में कंपनी लेखकों के चयन या किसी और रूप में दखलअंदाजी करती है तो साहित्य अकादेमी को उससे अलग हो जाना चाहिए।



4 comments on “साहित्य अकादेमी का कारपोरेटाइजेशन

  1. bishan papola says:

    लेख पढ़कर अच्छा लगा। जिस तरह से आपने विचार प्रकट किए हैं, वह लाजवाब है। आपकी लेखनी का मैं मुरीद हो गया हूं। ऐसी आप विवेकपूर्ण लेख ब्लाग पर डालते रहिए।

  2. BIJAY says:

    कारपोरेट कल्चर हमारी सृजनात्मकता को खत्म कर चापलूसी को बढ़ता है। इस सत्य से हम सभी भली भांति अवगत हैं। ऐसे में यदि लेखकों ने इसका विरोध किया है तो सही किया है। लेखन कोई धंधा नहीं बाकी समाज का आइना है। इस आइने में सामाजिक परिस्थितियों का दर्प झलकता है। यदि कारपोरेट कल्चर चल निकला तो लेखक भी चापलूसी करते नजर आएंगे।

  3. munish says:

    आपके विचारों मैं भिन्नता नज़र आती है, आपकी आशंका निराधार है. एक तरफ आप लिखते हैं की अगर एक लेखक को धन की लालसा होती तो काम – धन्दे बहुत हैं, और दूसरी तरफ आप लिखते हैं की मल्टीनेशनल के दबाव मैं लेखक लिखने को बाध्य होंगे. सिक्के का दूसरा पहलू ये है की साहित्य अकादमी सहित जो की एक विशिष्ट वर्ग तक सिमित है, उसको एक नया आधार और बड़ा वर्ग मिलेगा, साथ ही नए और युवा लेखक जो रोज़ी रोटी के चक्कर में अन्य कार्य करने के लिए बाध्य हैं दुबारा लिखने के लिए प्रोत्साहित होंगे, नए विचारों के साथ नए साहित्य का भी सृजन होगा.

  4. प्रश्न यह होना चाहिये कि क्या पुरुस्कार की स्वायत्तता बनाई रखी जा सकती है या नहीं ? शुरु से ही यह मान लेना कि सैमसंग के प्रायोजक हो जाने से पुरुस्कार निष्पक्ष नहीं रह जायेंगे , पूर्वाग्रह की निशानी है । यह सैमसंग के भी हित में है कि पुरुस्कार की गरिमा बनी रहे । सिर्फ़ प्रायोजित हो जाने से पुरुस्कार बिकाऊ हो जायें , ऐसा ज़रूरी नहीं है । अमेरिका के अकादमी पुरुस्कार (औस्कर) के पचासों प्रायोजक होते हैं लेकिन फ़िर भी उन की निष्पक्षता पर शायद ही संदेह किया गया हो । यदि सैमसंग के जुड़ने से पुरुस्कार की राशि बढ सकती है तो उस में भी कोई परहेज़ नहीं होना चाहिये । नोबल पुरुस्कार की मान्यता सिर्फ़ इसलिये नहीं है कि वह निष्पक्ष होते हैं बल्कि इसलिये भी होती है कि उन के साथ एक बड़ी राशि जुड़ी है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *