सरल-सहज भाषा में विज्ञान – ‘विज्ञान और हम’ : सुन्दर नौटियाल

‘विज्ञान और हम’ विज्ञान गल्प के सिद्धहस्त जाने-माने वैज्ञानिक-लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी जी की ‘लेखक मंच प्रकाशन’ से प्रकाशित विज्ञान पुस्तक है। विज्ञान की पुस्तकों और लेखों में सरल-सहज हिंदी के प्रयोग से विज्ञान की जटिलता के हौवे को दूर करते मेवाड़ी जी का पाठक समाज को ये एक बेहतरीन तोहफा है। यह किताब बच्चों तक विज्ञान के सन्दर्भों को पहुँचाने की सरस और रोचक कोशिश है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि यह किताब केवल बच्चों के लिए ही बनी है। न जाने कितने ही प्रसंगों को कल्पना, तथ्यों, संस्मरणों, नाटकों, कवितांशों आदि के माध्यम से सामान्य विज्ञान और तत्कालीन पर्यावरणीय चुनौतियों से रूबरू करवाती यह किताब पाठक में मानवीय मूल्यों, तर्कपूर्ण चिंतन, सामाजिक दायित्वों, जीवों के प्रति दया, जैव विविधता की समझ आदि विकसित करती है। साथ ही यह नए पाठकों को और अधिक पढ़ने की प्रेरणा के साथ-साथ अपने संस्मरणों को लिखित रूप देने के लिए भी प्रोत्साहन देती है।

19 विभिन्न शीर्षकों से प्रस्तुत सन्दर्भ बहुत ही व्यवस्थित ढंग से सजे हुए हैं। ‘सुनो मेरी बात’ शीर्षक से जहाँ लेखक ने अपने जीवन के अंशों को बच्चों के साथ साझा किया है, अपने आंचलिक शब्दों के प्रयोग से मात्रभाषा के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त किया है, वह किसी भी नव पाठक को अपनी मातृभाषा पर गर्व करने और इसे प्रसारित करने के लिए योगदान देने के लिए प्रेरित करता है। किताब के पन्ने दर पन्ने आगे बढ़ता पाठक देवीदा के साथ कभी ‘अनोखे सौरमंडल’ के तथ्यों से विस्मित होता है तो कभी एलियन के साथ कल्पना के यान पर सवार हो ‘प्यारी और निराली धरती’ की समझ विकसित करने आकाश में उड़ने लगता है। देवीदा की आँखों से उनकी लेखनी के शब्द समुंदर में ‘समन्दर के अन्दर की अनोखी दुनिया’ देख आता है, तो कभी ‘लो आ गया वसंत’ पाठ में शब्दों के गुलदस्तों में सजे फूलों, कलियों और नयी अंगडाई लेती धरती की महक को महसूस करता है। वसंत के खुशनुमा अहसास से पाठक अचानक ही गर्म होती धरती की उष्मता से पसीने में नहाने लगता है, जब वह रूबरू होता है ‘क्यों तपती है धरती’ से | बादलों के बनने-बरसने की घटनाओं से परिचय करने के लिए पाठक ‘कैसे-कैसे मेघ’ पढ़ता है और अचानक ही ‘आये पंछी दूर देश से’ पढ़कर प्रवासी पक्षियों के साथ सायबेरिया से भारत तक की यात्रा पर उड़ चलता है। घर के आंगन में गौरैया के घोंसले में नवान्गंतुक बाल पक्षी की पहली उड़ान ‘उड़ गयी गौरैया’ तो किसी भी उम्र के पाठक को सरल, सहज भाषा में अपने अनुभवों को संजोने की अद्भुत प्रेरणा दे जाती है। देवीदा के साथ ‘पेड़ों को प्रणाम’ करते गार्गी, शेफाली, गौरव, माधवी जैसे बच्चे चिप्स खाते-खाते बच्चों के साथ पाठक भी ‘आलू की कहानी’ सुनने लगता है, चिप्स, नमकीन, बिस्कुट खाते-खिलाते बच्चे फ्रैंक स्मिथ द्वारा खोजी गयी ‘फूलों की घाटी में’ कब पहुँच जाते हैं, उनके साथ-साथ पाठक को भी पता नहीं चलता। आगे के पाठों में ‘बच्चों का विज्ञान और कवि के कबूतर’ उड़ाते बच्चे, ‘आ गये रोबोट’ पाठ से मानव जीवन में मशीनी मानवों की धमक को महसूस करते हैं। ‘ताबीज़’ पहने एक बेरोजगार युवक कहानी के माध्यम से समाज में फैले ‘चमत्कार या विज्ञान’ के अन्धविश्वास पर तो कटाक्ष करता ही है, साथ ही में मजबूरी को अन्धविश्वास से जोड़कर भी दिखाता है। एक नाटक में बच्चों को ‘पर्यावरण के प्रहरी’ बनाकर ‘वृक्ष बचाओ-वृक्ष लगाओ’ की प्रेरणा देते लेखक जाते-जाते बच्चों को ‘आर्यभट्ट’ और ‘मेघनाथ साहा’ जैसे भारतीय विभूतियों से परिचित करवाते हैं और ‘माइकल फैराडे’ की जीवनी के एक प्रेरक प्रसंग ‘अनजान से बना महान’ से बच्चों को आत्मविश्वास से सरोबार कर जाते हैं |

विशेष– सुन्‍दर नौटि‍याल पेशे से शि‍क्षक हैं। उन्‍होंने मवोड़ी जी की यह किताब अपनी एक छात्रा नवमी को पढ़ने को दी। उसके अन्दर इस किताब से उमड़े-उपजे भावों की झलक देखने लायक है–

किताब में लिखे गये एक संस्मरण ‘उड़ गयी गौरैया’ को पढ़कर वह कहती है –“सर! हमने भी कई बार चिड़ियों को घोंसले में बच्चों को दाना देते और उन्हें उड़ाते हुए देखा है। आपने लिख दिया और हम लिखते नहीं हैं, परन्तु यह पाठ पढ़कर मुझे विश्वास हो गया है कि हम भी ऐसा ही अच्छा लिख सकते हैं |”

वैज्ञानिक, विज्ञान कथा लेखक को सम्बोधित करते हुए वह लिखती है– “सर! आपकी लिखी हुई किताब बहुत ही सरल भाषा में लिखी हुई है और इसमें कोई भी पाठ ऐसा नहीं था, जिसे मैं समझी न हूँ। आपने अपने बचपन की बातें लिखीं जो मुझे बहुत अच्छी लगीं। अनोखा सौरमंडल, फूलों की घाटी, ताबीज़, रोबोट और मेघनाथ साहा, ये सब कहानियां बहुत ही अच्छी लगीं।”

“हमारे सर भी आपके जैसे ही हैं। उन्होंने एक कविता लि‍खी जो मुझे बड़ी अच्छी लगी। उन्होंने मेरी एक कविता भी अपने पास रखी हुई है। शायद उनका सपना हमें आपके जैसा वैज्ञानिक बनाने का है।”

वह देवीदा से गुजारिश करती है– “आपसे बस यह कहना है कि सर ! यदि कभी मौका मिले तो हमारे विद्यालय में जरूर आना। हम आपसे सवाल करना चाहते हैं, आपसे कुछ सीखना चाहते हैं। शायद! हमने आज तक वैज्ञानिक नहीं देखे हैं, किन्तु हमारे सर हमारे लिए दुनिया के सबसे बड़े और सबसे अच्छे वैज्ञानिक हैं। हमारे सर हमसे कहानियां पढ़वाते हैं, गाना गाने को कहते हैं, हमें नयी चीज़ें दिखाते हैं और सबसे बड़ी बात– हमे लिखने पर जोर देते हैं।”

इस पुस्तक से प्रभावित होकर उसने इस लेख में तीन कवितायें भी लिखीं– ‘बच्चों का अपना सपना है’, ‘ये दुनियां किसकी?’ और ‘वैज्ञानिक सोच’।

वैज्ञानिक सोच’

सर तक लदे विज्ञान से,
फिर भी कहे भगवान है।
जीवित हैं विज्ञान से,
फिर भी कहें भगवान है।
विज्ञान तो हर तरफ बस चुका,
भगवान कहाँ है आपका?
कोई दर्शन करवा दे भगवान के,
हम घुटने टेकें, माफ़ी मांग के।
बस सोच का फरक पड़ चुका
अन्धविश्वास बहुत ही बढ़ चुका।
वैज्ञानिक सोच अपनाकर बनें
वैज्ञानिक नए विचार के।
दुनियां चाहे कुछ भी कहे,
हम वैज्ञानिक नये संसार के।

नवमी, कक्षा 9
रा.इं.का. कोटधार गमरी, उत्तरकाशी



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