सरकारी स्कू ल और सरकार : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अद्भुत फैसला सुनाया है कि तमाम राजनेताओं और सरकारी कर्मचारियों को अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ाने होंगे। यदि यह आदेश कार्यान्वित हो गया तो देश की शिक्षा व्यवस्था ही नहीं पूरी व्यवस्था का कायाकल्प हो जाएगा। ‘जाके पांव न फटी विवाई वो क्या जाने पीर पराई’ कोर्ट ने इसी मुहावरे को साकार करते हुए यह निर्णय दिया है। वरना स्कूलों में नकल हो तो सरकार की बला से। बच्चों के सिर पर छत न हो तो कोई असर नहीं। लड़कियों के लिए शौचालय न हो तो इनके चेहरे पर शिकन नहीं, क्योंकि उनके बच्चे तो अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं और वहां से फुर्र से उड़ जाएंगे इंग्लैंड, अमेरिका। नेता और अफसर दोनों मौसेरे भाई हैं, कोर्ट की नजरों में। अच्छा हुआ कोर्ट ने दोनों को एक साथ पकड़ा है।

यहां पहले एक अनुभव। सरकार और सरकारी स्कूलों के खिलाफ गुस्से का ऐसा तीखा अनुभव मेरी कल्पना से बाहर था। दिल्ली में पटरी पर सब्जी बेचने वाले को मैंने सुझाव दिया कि वह अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में दाखिल कराए। उसका आक्रोशित प्रति प्रश्न था, ‘आपके बच्चे कहां पढ़ते हैं? आप तो सरकारी कर्मचारी हैं फिर सरकारी स्कूल में क्यों नहीं पढ़ाते। क्या हम नहीं पढ़ा सकते अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में?’ खिसियाने के सिवाय मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। यह है सरकारी व्यवस्था का आलम। यानी जहां जितनी ज्यादा सरकार उतना ही निकम्मापन, भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, मुकदमे, जातिवाद, अहंकार। सरकारी कर्मचारियों ने कभी अपनी खोल से बाहर झांकने की कोशिश ही नहीं की। क्यों करें जब सारी सुविधाओं के साथ, नौकरी की सुरक्षा है। तकनीक ने सारी सुविधा दी हैं। तुरंत टाइपिंग, फोटोकॉपी, ई-मेल लेकिन फाइलों की स्पीड और धीमी होती गई। सौ साल में पढ़ने-पढ़ाने के रंग-ढंग सुधरने के बजाय और बिगड़ गए हैं।

अच्छा हो यदि कोर्ट का यह आदेश दूसरे सरकारी कर्मचारियों के संदर्भ में सरकारी अस्पतालों पर भी लागू हो। क्या डॉक्टरों का काम सिर्फ मरीजों को निजी अस्पतालों की तरफ भेजने के लिए ही बचा है। हमारे कई दोस्तों का तर्क है कि सरकारी दक्षता में कोई कमी नहीं है। क्या वाकई? यदि ऐसा है तो फिर क्यों नहीं ये सब इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश को मानते? फिर तो इस आदेश से इन सब की बांछें खिल जानी चाहिए। मुंह क्यों लटका रहे हैं? क्या सरकारी स्कूलों में पढ़ाना उन्हें सजा दिखाई दे रही है। आखिर इस दुर्गति तक तुम्हीं ने तो पहुंचाया है।

हर शाख की यही दास्तान है। कभी रेलवे के अपने चार सौ से ज्यादा स्कूल थे। एक से एक अच्छे। आज मुश्किल से सौ स्कूल बचे हैं और वे भी अंतिम सांस गिन रहे हैं। लाल बहादुर शास्त्री मुगलसराय के रेलवे स्कूल में पढ़े थे तो सैकड़ों रक्षा रेलवे के अफसर भी। मसूरी का मशहूर स्कूल ओकग्रोव 1888 में अंग्रेजी सरकार ने रेलवे के अफसरों के लिए बनाया था। आज शायद ही कोई रेल का अफसर वहां पढ़ाता हो अपने बच्चों को। काश! कोर्ट यह आदेश भी दे कि केंद्र सरकार समेत रेलवे के कर्मचारी भी अपने बच्चों को रेलवे के स्कूलों में ही पढ़ाएंगे तो ये भी रातों रात ठीक हो जाएंगे। आखिर ये शिक्षक और स्कूल भी तो उसी देश के हैं जिसके दिल्ली, मेट्रो, कोंकण रेलवे और बैंक के कर्मचारी। ये भी तो ठीक काम कर रहे हैं। व्यवस्था तभी सुधरेगी जब इसका क्रीमीलेयर सुधरेगा। इसमें सरकारी कर्मचारी और राजनेताओं की अच्छी तादाद है। दुनिया भर में राजा के रसोईयों को अपना बनाया हुआ खाना खुद खाना पड़ता है। हमारे यहां सरकारी कर्मचारी सिर्फ दूसरों के लिए ही बनाते हैं और फिर उतनी ही बेशर्मी से कह देते हैं कि ये शिक्षक पढ़ाते नहीं हैं। क्या कभी आम लोगों की समस्याओं को जानने-समझने की कोशिश उन्होंने की? वे हारकर महंगे स्कूल की तरफ उसी निराशा, गुस्से में जाते हैं जैसे दिल्ली का सब्जी वाला। क्या कभी किसी राजनीतिक पार्टी, ब्राव0161ाण सभा, दलित उद्धारक मंच, आयोग ने यह पूछा कि हमारी सरकार इतनी सुस्त गैर-जिम्मेदार क्यों? क्यों भूलते हो कि सरकार बचेगी तो देश बचेगा और उसी में हम सब। वरना सभी डूबने के कगार पर हैं। दुष्यंत कुमार की गजल की लाइन याद आ रही है- मौत की संभावनाएं सामने हैं और नदियों के किनारे घर बने हैं। आरक्षण, संसद, न्यायपालिका के प्रसंग में संविधान की दुहाई देने वालों से भी प्रश्न है कि क्या ऐसी असमान शिक्षा से संविधान की आत्मा का हनन नहीं होता? समान शिक्षा और अपनी भाषा के लिए हम सड़कों पर क्यों नहीं उतरते?

लगभग तीन वर्ष पहले तमिलनाडु के एक नौजवान कलक्टर ने लीक से हटकर एक आदर्श प्रस्तुत किया था। अपनी चार वर्षीय बेटी के दाखिले के लिए वह आम जनता की तरह सरकारी स्कूल की लाइन में लगे थे। किसी ने पहचान लिया और जैसा कि स्वाभाविक था अफरा-तफरी मच गई। कलक्टर साहब का जवाब था- ‘मैं ऐसे ही सरकारी स्कूल में पढ़ा हूं। मेरे बच्चे भी आम नागरिक की तरह वहीं पढ़ेंगे।’ बताते हैं कि इस घटना के बाद न केवल उस स्कूल, बल्कि तमिलनाडु के अन्य स्कूलों में आश्चर्यजनक सुधार हुए हैं। क्या हंिदूी पट्टी और दूसरे राज्यों में भी बिना कोर्ट के आदेश के कोई ऐसा उदाहरण बनेगा?
निजीकरण की आंधी का सबसे बुरा असर शिक्षा पर पड़ा है। बीस बरस पहले 80 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे सरकारी स्कूलों में थे। आज केवल 50 प्रतिशत रह गए हैं। इसलिए सरकारी अफसर, नेता और निजी स्कूलों का प्रबंधन हाई कोर्ट के आदेश को हर हाल में चुनौती देंगे। समान शिक्षा के सभी पैरोकारों को राष्ट्रीय स्तर पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के पक्ष में तुरंत गोलबंद और सक्रिय होने की जरूरत है।

4 comments on “सरकारी स्कू ल और सरकार : प्रेमपाल शर्मा

  1. आप तो वर्षों से इन मुद्दों के लिए लोगों को जागरूक करते रहे हैं लेकिन कहीं कोई फर्क नहीं पड़ा है मुगलसराय में जब आप रेलवे स्कूल में इंस्पेक्शन कर रहे थे तो याद होगा सिर्फ आठ-दस बच्चे ही रेल कर्मचारियों के थे ।वे भी उन्हीं रेलकर्मियों के जो प्राइवेट स्कूल अफोर्ड नहीं कर सकते हैं । मैंने अपने बच्चों को केन्द्रीय विद्यालय में ही पढ़वाया । तब मेरे सहकर्मी कहते थे कि क्या भैया आप पढ़े-लिखे होकर भी ‘गदहिया स्कूल ‘ में नाम लिखवा दिया है ! वे अपनी जगह सही भी थे क्योंकि उन दिनों विद्यालय मे पढ़ाई-लिखाई चौपट थी । मैंने विद्यालय में अभिभावक के रुप में हस्तक्षेप किया । PTA को सक्रिय करवाया । संयोग से उन्हीं दिनों नये प्राचार्य आये तो स्कूल में काफी सुधार हुआ । उन्होंने संगठन से अनुशंसा करके मुझे VMC का एक सदस्य बनवाया । कुछ गैर-जिम्मेदार शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई हुई तो विद्यालय में पढ़ाई पटरी पर लौटी । उन दिनों भी प्रायः अभिभावक इसलिए नहीं बोलते थे कि उनके बच्चे के साथ शिक्षक रंजिश पालेंगे ! मेरा तो मानना है कि आज भी सरकारी स्कूलों में ज्यादा योग्य शिक्षक हैं । जरूरत है उनपर निगरानी की । हाईकोर्ट का आदेश लागू हो जाये तो यह एक क्रांतिकारी कदम होगा ।

  2. प्रेमपाल शर्मा says:

    पूरी सहमति, लेकिन हार मानने की जरूरत नहीं हैं। दिल्ली सरकार ने कदम उठाए हैं। काश, आप बड्डे-बड्डे पुरुस्कृत लेखक UP, बिहार सरकारों पर भी कुछ ऐसा दबाब बनाएँ।

  3. Rajesh says:

    यह तो वही बात हुर्ह कि‍ मैं ईमानदार हूं, लेकि‍न मौका मि‍लते ही घुस लेने लगते हैं सभी।

  4. Sanjay Sharma says:

    पढाई सरकारी स्कूल में व नेता-अधिकारीयो का इलाज भी सरकारी अस्पताल में होना ही चाहिए। आपसे पूर्णतः सहमत

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