समर्थों को जीने का सलीका सिखाती निरीहों की दुनिया : रामदेव शुक्ल

वरि‍ष्‍ठ लेखक और एंथ्रोपॉलोजि‍स्‍ट प्रबोध कुमार ने करीब पैंतालीस वर्षों से न लि‍खने के बाद उपन्‍यास लि‍खा- नि‍रीहों की दुनि‍या। बेहतर दुनि‍या की तलाश करने वाले इस उपन्‍यास पर डॉ. रामदेव शुक्‍ल का आलोचनात्‍मक आलेख-

लोकतंत्र अबतक आजमाई गयी सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली है, किन्तु बीसवीं सदी में यह प्रणाली जितनी विकृत हुई है, उसकी कल्पना भी पहले कभी नहीं की गई। लोकतंत्र को भ्रष्ट करने वाले कौन हैं और कौन लोग सबसे ज्यादा लोकतंत्र के शत्रुओं के हाथों छले जाते है? इससे भी आगे बढ़कर वे उपाय कौन से हैं जो लोकतंत्र की बहाली कर सकते हैं? इन सवालों और इन जैसे अनेक सवालों के जवाब के लिए पंचतंत्र के शिल्प में एक उपन्यास प्रकाशित हुआ है- ‘निरीहों की दुनिया’, जिसके लेखक प्रबोध कुमार छठे-सातवें दशक में मानव-मन की अतल गहराइयों में झाँकने वाली कहानियाँ लिखने के लिए पहचाने जाते थे। इस कथा में प्रबोध कुमार कछुआ, कछुई, खरगोश और चिड़ियों के मन की गहराइयों में प्रवेश करके उनके अनुरूप भाव का अनुभव करते हैं। आधार सूत्र है किसी समय कछुआ और खरगोश की दौड़ में अप्रत्याशित रूप से खरगोश की हार और कछुए की जीत की कहानी। उन दोनों की दौड़ में आदमी का हस्तक्षेप लेखक ने इब्ने इंशा के माध्यम से दिखाया है, जिसने हार-जीत के निर्णय को एक शर्त के साथ जोड़ दिया कि जो जीतेगा, वह हारने वाले के कान काट लेगा। इस दौड़ में गंतव्य स्थल तक खरगोश पहले पहुँच गया और जब लम्बी प्रतीक्षा के बाद हारने वाला कछुआ नहीं आया तो मरने से पहले खरगोश वसीयत कर गया कि कछुआ जब भी वहाँ पहुँचे, उसके कान काट लिए जाएँ। उपन्यास में तीसरी दौड़ का सस्पेंस परी कथा में व्याप्त है। खरगोश नीम के टीले पर पहुँच गया है, कछुआ अपने ऊपर हुए पत्थरों के आक्रमण के बीच अपनी जान बचाकर कछुई के पास लौट आया है। आगे की बात सोची जा रही है। यहीं से चलकर कथा चक्राकार-भारतीय अवधारणा में काल-गति के अनुरूप सम्पन्न हो जाती है और पाठक कथा-रस के साथ अपनी शक्ति और सीमा के अनुसार लोकतंत्र के प्रति अपनी भूमिका को लेकर बेचैन हो उठता है।

कथाकार की अनेक बड़ी उपलब्धियों में एक है बच्चों को अपनी पकड़ में लेकर उनके दिलदिमाग पर छा जाने वाली सरल, तरल भाषा। हिन्दी में मुहावरा है- ‘यह बात उसने एक साँस में कह दी।’ इस उपन्यास की भाषा अर्द्धविराम आदि से लगभग मुक्त है। लगातार अनेक वाक्यों तक बातें ऐसी सरपट दौड़ती हैं कि जब पूर्ण विराम आता है, तभी पाठक को साँस लेने की सुधि आती है। ‘निरीहों की दुनिया’ की बोलती-बतियाती भाषा भावावेग के दबाव में उमड़ती-घुमड़ती बच्चों की भाषा है, जो पाठक की चेतना पर छा जाती है। ऐसी भाषा में प्रौढ़ों की गम्भीर समस्याओं को कदम-कदम पर इस कदर बिम्बित कर दिया गया है कि उनकी अर्थ व्यंजना बेचैन करती है और इस दारुण समय की विडम्बनाओं का रेशा-रेशा उधेड़ कर रख देती है।

उपन्यास शुरू होता है, रास्ते में सड़क पर अपने ऊपर की गई पत्थरों की बौछार से बचकर अपने अड्डे लौट रहे कछुए को देखकर कछुई के गुस्से से। ‘कछुई के फूले मुँह को देख कछुआ बोला कुछ नहीं, बस एक ठंडी साँस ले उसके पास जा लेटा और आसपास में इधर-उधर भागने की कोशिश में बादलों की हर पल बनती-बिगड़ती शक्लें देखने लगा। कछुई का गुस्सा चिंता में बदल गया। दौड़ बीच में छोड़कर पहले वह जब भी अड्डे पर लौटा था तो सफाई देने के नाम पर किसी मजेदार घटना का वर्णन कर उसने खुश कर दिया था उसे और फिर दौड़ जारी करने तक का समय उन्होंने बच्चे पैदा करने में लगाया था। जरूर कोई गम्भीर बात है नहीं तो भला बच्चे पैदा करने का ऐसा अवसर कछुआ छोड़ता, यह सोच उसने कछुए की पीठ सहलाते जानना चाहा कि वह लौट कैसे आया ? कोई स्नेह से पीठ सहलाए तो सभी प्राणियों को अच्छा लगता है, उनका मनमरापन गायब हो जाता है और मन में छिपा रखा सब कुछ उड़ेल देने की इच्छा होने लगती है। कछुए के साथ भी यही हुआ।’

कछुए कछुई का यह शारीरिक मानसिक सहचार दाम्पत्य-रस का आस्वादन कराने वाला है, जो अन्य प्राणियों में तो अभी तक सुरक्षित है, किन्तु ‘सभ्य वैज्ञानिक’ होते जा रहे मनुष्य-समाज में दुर्लभ होता जा रहा है। कोई गम्भीर बात न होती तो इस अवसर को वे दोनों बच्चे पैदा करने के अवसर में बदल देते। इसी का नतीजा है कि ‘उसका कुटुम्ब इतना बड़ा हो गया है कि अब पोखरे में मुश्किल से समा रहा है।’ पृथ्वीरूपी पोखरे में यही हाल मानुष बच्चों के कारण भी हो रहा है, जिनके माता-पिता उस वर्ग के हैं जिनके जीवन में सुख के नाम पर केवल ‘रति सुख’ बचा है। इसका कारण यह है कि दुनिया की सत्तर फीसदी दौलत उनके कब्जे में है, जिनका श्रम केवल ‘रति श्रम’ है। श्रम और सुख की यह विषमता ही धरती को रसातल की ओर लिए जा रही है। कछुए ने दौड़ से लौटने का जो कारण बताया, वह सभ्य मनुष्य के असभ्य आचरण का नमूना है जो आज के समाज में निरंतर बढ़ता जा रहा है। ‘यही कारण है कि अपने स्वाभाविक आवास से कटा हुआ हर प्राणी मनुष्य की छाया से भी दूर रहने में अपना कल्याण समझता है।’ यह उपन्यास कथाप्रवाह में यह भी बता देता है कि सृष्टि के अन्य प्राणियों के दारुण भय का कारण मनुष्य क्यों और कैसे बनता जा रहा है। कछुए-खरगोश की मस्ती भरी दुनिया में ‘आदमी’ के हस्तक्षेप से उपजी समस्या पर सोचने के लिए कछुई पोखरे में जाती है तो अनगिनत बच्चों में से एक उसकी पीठ पर सवार होकर वह सवाल पूछता है जो उसने पतंग उड़ाने वाले बच्चे के बाप से सुना है- ‘दुनिया में एक भी पेंच ऐसा नहीं है, जिसकी काट न हो।’ बच्चा जानना चाहता है कि यह बात वह जानती है या नहीं। प्रबोध कुमार यहाँ बालपन में उगने वाले प्रश्‍नों, उनके अचेतन मन में चले जाने और जीवन भर प्रभावित करते रहने को लाक्षणिक रूपक में रचते हैं। ‘बात मामूली थी लेकिन बचपन में ऐसी बातों को अद्भुत मान बच्चे हर किसी को इतनी बार सुनाते हैं कि बात बेचारी घबरा कर उनके मन की पिटारी में ऐसे छिपकर बैठ जाती है कि लाख ढूँढ़ने पर भी नही मिलती।’ कछुई के बहाने कथाकार भारतीय समाज की स्त्रियों की मनोदशा की एक तस्वीर बनाता है- ‘कछुई को औरतों की तरह पतंगबाजी से चिढ़ थी, जिसकी एक वजह यह भी थी कि पतंग की तरह वह आसमान में उड़ नहीं सकती थी।’ व्यथा भारी है कछुई की या औरतों की?

चतुर कछुई की सुरक्षा का पुख्ता प्रबन्ध करने के लिए कछुए को मुखिया तथा अपने को मुखिनी घोषित कर देती है। पूरे कछुआ समाज में इसे प्रसारित करा देती है। सत्ता का खेल शुरू होते ही ‘सत्ता के दलाल’ का प्रवेश होता है। ‘कछुई की चौथी बेटी के सातवें बेटे के भेष में स्कूल के बच्चों से सुन-सुनकर वह अंग्रेजी बोलने लगा है पर देसी बोली कामचलाऊ जानता है, क्योंकि वे बच्चे उसमें ज्यादा बात नहीं करते।’ भारत की शिक्षा ओर सारे ज्ञान पर एकाधिकार जताने वाले विलैती ज्ञानियों की एक झलक है यह। अंग्रेजीभाषी कछुआ मुखिनी से कछुआ समाज में अपने लिए नम्बर तीन का पद पक्का कर लेता है और अपना नाम डबल ओ सेवन (007)  चुन लेता है। आदमियों ने अपने लिए नम्बर से पहचाना जाना स्वीकार कर लिया है, इसलिए कछुआ समाज में भी नाम के लिए नम्बर का चलन होगा। मनचाहे नम्बर देने के लिए कछुओं से घूस लेने का काम अंग्रेजीभाषी कछुआ खुद ही शुरू कर देता है। अंग्रेजीभाषी कछुआ पूर्णतः निरीह कछुआ समाज को आधुनिक अंग्रेजी (विलायती) सभ्यता के सारे दुर्गुण सिखा देना चाहता है। इसके लिए जासूसी ऐय्यारी हथकण्डों से लेकर हथियार जमा करने और भ्रष्टाचार को सबकी चाहत बना देने की कोशिश करता है। उसका आखिरी लक्ष्य है प्रगाढ़ मित्र कछुआ और खरगोश में मित्रभेद उपजा कर कछुआ समाज का मुखिया बन जाना। खरगोश और कछुआ मित्र हैं, एक दूसरे के लिए त्याग करने को तत्पर रहते हैं। उनके लिए खेल मनोरंजन और त्याग भाव से युक्त है। अंग्रेजीभाषी कछुआ (007) खेल में किलर इंस्टिंक्ट (प्रतिस्पर्धी के प्रति घृणा और उसको मार कर जीतने की हिंसक भावना) की सीख देना चाहता है। आधुनिक सभ्य आदमियों की सारी बुराइयों से कछुआ समाज को भर देने की इच्छा से परिचालित डबल ओ सेवन किसी तरह शान्त, सुखी, सहज कछुआ-खरगोश, चिड़ियों की दुनिया मे जहर घोलना चाहता है। अंत में वे निरीह कैसे अपना बचाव करते हैं और अंग्रजीभाषी सत्ताकामी की परिणति क्या होती है, इसे जानने के लिए पाठक को उपन्यास का आखिरी शब्द तक पढ़ना पड़ेगा। चमत्कार यह कि उपन्यास पढ़ने के लि‍ए पाठक को अपनी ओर से प्रयत्‍न नहीं करना पडे़गा। एकबार पढ़ना शुरू करने पर उसकी पकड़ से छूटना गैरमुमकिन है।

मुक्तिबोध ने रचना को सभ्यता-समीक्षा कह दिया। हिन्दी आलोचक इस पर इतना लुब्ध हुआ कि आज लगभग हर किताब ‘सभ्यता-समीक्षा’ बताई जाती है। ‘निरीहों की दुनिया’ किस अर्थ में ‘सभ्यता-समीक्षा’ है ? यह उपन्यास बार-बार बताता है कि सभ्य आदमी कितना बर्बर हो गया है ओर सभ्यता की छाया से भी दूर निरीह पशुपक्षी परस्पर व्यवहार में कितने शिष्ट, भावनाप्रवण, सहनशील, त्यागी, सहज बचे हुए हैं। आदि काल से अब तक संतों ने जिस ‘रहनी’ की बात की है, वह अब पशुपक्षियों में ही सुरक्षित रह गयी है। आदमी तो इतना ‘सभ्य’ हो गया है कि लगभग ‘भस्मासुर’। इसीलिए पशुपक्षी आपस में तय करने जा रहे हैं कि जहां वे जन्मे और पले बढ़े हैं, उस जगह को छोड़ने की जरूरत न पड़े। इसके अलावा भी क्या कोई उपाय अपनाया जा सकता है जिससे आदमियों के बीच सुरक्षित रहा जा सके।’ मुखिया कछुआ सोचता है- ‘डबल ओ सेवन को उसके अपराधों के लिए कड़ी से कड़ी सजा देना जरूरी है नहीं तो कछुआ समाज को आदमि‍यों में दिन पर दिन बढ़ती उन बुराइयों से बचाना मुश्किल हो जाएगा जिन्हें फैलाने की वह कोशिश कर रहा है।’ सभ्य मनुष्यों के समाजों ने अपनी-अपनी भाषाओं में इस प्रकार के मुहावरे गढ़ लिए हैं जिससे किसी ‘कदाचारी’ आदमी को ‘जानवर’ कह दिया जाता है। यह उपन्यास ऐसे मुहावरों को उलट कर ‘आदमियत’ की रक्षा करने की जुगत बताता है। इस समय सुविधा सम्पन्न नागरजन अपने बच्चों पर कितना अमानवीय अत्याचार कर रहें हैं, उन्हें ‘बड़ा’ बनाने की कोशिश में, इसे वे जानते भी नहीं। ‘‘कछुआ और खरगोश समाज में बच्चों को बच्चों की ही तरह पलने बढ़ने दिया जाता है, माने बच्चों की आदतों पर कोई लगाम नहीं लगाई जाती और इसीलिए इन समाजों में बच्चे बिल्कुल बच्चों की तरह प्यारे, नटखट, शैतान होते हैं और जैसा कि होना भी चाहिए। झगड़ते, मचलते ओर रूठते भी हैं।’’ बच्चों से आज उनका बचपन क्रूरतापूर्वक छीना जा रहा है, इसका रोना सभी रोते हैं। कछुआ और खरगोश अपने बच्चों को कैसे बढ़ने देते हैं आदमी उनसे सीख सके तो मनुष्यता नष्ट होने से बच सकती है। आदमियों को कछुआ सलाह देना चाहता है कि ‘‘टी.वी., कम्प्यूटर, मोबाइल के ऊपर भरोसा न कर वे अपना अधिक से अधिक समय अपने बच्चों के साथ बिताएं। इससे दोनों को फायदा होगा। बड़ों की बातें बच्चे अपनी यादों की पिटारी में सहेज कर रख लेंगे और जब बड़ा बनने का मन हुआा तो पिटारी में से उन्हें निकाल लेंगे। बड़े भी बच्चों के साथ मिलते-जुलते रहने से अपने मन में कहीं गहरे दबी बचपन की यादों को ढूँढ़ निकालेंगे और अपनी ढलती उम्र की ऊब से राहत पाने के लिए उन यादों की मदद से कभी-कभी बच्चे बन जा सकेंगे।’’

‘शिक्षित’ और ‘समझदार’ बनाने के नाम पर आदमी अपने बच्चों को क्या बना देता है, मुखिनी कछुई का एक बयान यह बताने के लिए काफी है। ‘‘वह अभी तक यह समझती थी कि आदमी जन्म से ही बदमाश होते हैं, लेकिन जिस प्यार से पतंग उड़ाते एक लड़के ने उसके एक छोटे बच्चे को अपनी जेब में रखा और जिस प्यार से स्कूली लड़के-लड़कियां उसे खिलाते-पिलाते हैं और नई-नई बातें सिखाते हैं उससे अब वह इस नतीजे पर पहुंच रही है कि बालिग आदमियों से उनके लड़के-लड़कियों की जात अलग होती है।’’

निरीहों की दुनिया की आचार संहिता वही है, जिसका सपना मानव समाज के सच्चे पथप्रदर्शक सदा से देखते रहे हैं। कछुआ, खरगोश और चिड़ियों के समाज में किसी के ऊपर हंसना बुरा माना जाता है। अभिव्‍यक्‍ति‍ की स्वतंत्रता का कछुआ समाज में यह आलम है कि ‘किसी को भी बोलने से नहीं रोकना चाहिए।’ कछुआ समाज में कोई अपने को और कछुओं से ऊंचा समझे, इसे अच्छी बात नहीं माना जाता। डबल ओ सेवन आदमियों की नकल करके कछुआ समाज को बांटना चाहता है तो उसे दंड मिलना ही चाहिए। कछुआ समाज नंबर वाली बात को नकार देता है क्योंकि कछुआ समाज में तो नामों की जरूरत भी नहीं है। उनके लिए इतना जानना काफी है कि वे नर हैं या मादा, बच्चे हैं या बूढ़े। कछुआ समाज में बच्चों को भी दंडित नहीं किया जा सकता। खरगोश यहां तक सोचता है कि किसी का बच्चा कभी नहीं मरे। चिड़िया भी नहीं चाहती कि कोई मरे या घायल हो। आदमियों के समाज में बड़ी आसानी से उन्हें भी मुखिया बना दिया जाता है, जो कोई सजा काट चुके होते हैं, कछुआ समाज में ऐसा नहीं होता। कथाकार वर्तमान राजनीति के धुरंधरों की ‘राजनीति’ की एक झलक देते हैं- ‘‘कछुआ समाज में सबको पता रहता है कि अगला मुखिया कौन बनेगा’’ जबकि आदमियों के समाज में अपने लिए जेल जाने का अवसर आने पर मुख्यमंत्री अपनी निरक्षर पत्नी को मुख्यमंत्री बना देता है। आदमियों के समाज में मानवीय भावनाओं के नाम पर अमानवीय कृत्य के अनेक उदाहरण मिलते हैं। एक है ‘भावनाओं का आहत होना’। एक फिल्म को और एक कला प्रदर्शनी के चित्रों को दर्शकों सहित जला दिया गया। कारण बताया गया कि फिल्म और चित्रों से जलाने वालों की भावनाएँ आहत हुई हैं। खरगोश एक खास बात यह बताया है कि दोनों जगहों की आक्रामक भीड़ के सभी सदस्यों के हाथों में कोई न कोई हथियार था, जबकि दर्शक पूरी तरह निहत्थे थे। वास्तव में जिनकी भावनाएँ आहत हुईं, फिल्म बनाने वाले, चित्रकार और दर्शक- उनकी ओर से कौन बोले? चिड़ियों का बसेरा उजड़ते देखकर खरगोश काटे गए पेड़ के शेष साथियों के पास जाकर कहता है- ‘‘एक निरीह अन्य निरीहों को सांत्वना छोड़कर और दे ही क्या सकता है?’’

यह उपन्यास ऐसे ही मर्मभेदी घटना-विन्यास के माध्यम से आत्मघाती दौड़ में शामिल सभ्य नागरिकों को आचरण की सभ्यता सिखाता चलता है।

पाठक की चेतना में अपनी बात बिठा देने के लिए कथाकार किस प्रकार के बिंब रचता है। एक उदाहरण- खरगोश अपने दोस्त कछुवे को बताना चाहता है, ‘‘बातों के भूखे को जबतक कोई सुनने वाला नहीं मिलता, तब तक वह उस मछली की तरह तड़पता है जिसे तपती बालू पर छोड़कर कोई कछुआ अपनी बीड़ी सुलगाने लगा हो।’’ ‘रेत की मछली’ हिन्दी भाषा का समर्थ मुहावरा है। इसी नाम का एक उपन्यास भी है। प्रबोध कुमार ने तपती रेत पर तड़पती मछली और बगल में अपनी बीड़ी सुलगाते कछुवे को साथ रखकर जीवन्त बिंब निर्मित कर दिया है। इस उपन्यास की भाषा एक शब्द में भी बिंब रचती है। मनमरापन, गुत्थमगुत्था, खोजीपने की आदत, लादीपोटी जैसे देशी शब्द पूरे दृश्य को मूर्त कर देते हैं।

वकील और पत्रकार बुद्धि व्यवसाय और लेखन कौशल के बल पर स्याह को सफेद करने को अपनी उपलब्धि मानते हैं। डबल ओ सेवन वकील की सलाह मुखिया कछुआ को सुनाता है- ‘‘मुखिया यदि हारी बाजी जीतना चाहता है तो उसे अपने में किलर इंस्टिंक्ट पैदा करना होगा और उसके लिए यह जरूरी है कि मुखिया खरगोश से इतनी नफरत करने लगे कि उसे मार डालने के लिए तैयार हो जाए।’’ वह आगे कहता है कि ‘‘वकील बहुत लालची होते हैं और उनसे भी बढ़कर लालची होते हैं पत्रकार, जिनकी जरूरत असली खरगोश को नकली साबित करने के लिए पड़ेगी।’’ जघन्य अपराधों का वर्णन करते समय ‘‘पत्रकार मसालेदार, दिलचस्प और रोचक जैसे शब्दों का इस्तेमाल धड़ल्ले से करते हैं।’’ दूसरी ओर खरगोश को बेहोश करके उसके पेट से सभी अंग काटकर निकाले जाने के बाद भी खरगोश की नींद न टूटने को ‘मजेदार बात’ कह देने के लिए खरगोश माफी माँगता है।

हिंसा, आतंक, प्रदूषण, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के अमानवीय शोषण जैसी ज्वलंत समस्याएँ इस कथा में पशुपक्षियों की जबानी बच्चों की समझ में आने वाली झरने की तरह प्रवाहित प्रसन्न भाषा में मूर्त कर दी गई है। इस अद्भुत कथा को पढ़कर 1909 ई. में लिखी महात्मा गाँधी की किताब ‘हिन्द स्वराज’ याद आती है। उसमें वकील, जज, डॉक्टर आदि को आदमी के स्वास्थ्य और सहज न्याय का वध करने वालों के रूप में देखा गया है। विश्‍वविख्यात शिकारी और कथा लेखक जिम कारबेट ने अपने संस्मरणों के संग्रह ‘माई इण्डिया’ में आदिवासियों के चित्त में बसी न्याय-भावना के उत्कृष्ट उदाहरण देकर बताया है कि अंग्रेजों के आने से पहले भारतीय समाज में सहज न्याय भावना थी। उसे अंग्रेजों ने अपने कानून और उसके व्यवहार से नष्ट कर दिया। पशुपक्षियों के रूपक में लिखी विश्‍वविख्यात व्यंग्य कथा ‘एनीमल फार्म’ को भी स्मरण किया जा सकता है। जार्ज आरवेल ने कम्युनिस्ट व्यवस्था के मॉडल की परिणति बताई है। एक फार्म हाउस के दो युवा सूअर नेपोलियन और स्नोबाल दो पैर वालों के विरुद्ध वि‍द्रोह करके सभी जानवरों के नेता बन जाते हैं। अंतिम दृश्य में वे दोनों मोटे गद्दों पर लेटकर सेब का रस पीते हुए दिखाई पड़ते हैं और श्रमिक बैल, घोड़े सूखी घास चबाने की नियति झेल रहे हैं। ‘निरीहों की दुनिया’ अत्याचारियों के प्रति न घृणा का पोषण करती है, न व्यंग्य का। इस दुनिया में दुश्मन के प्रति भी करुणा और मैत्री की अंतःसलिला प्रवाहित है। हथियार को सबकुछ मानने और उसी की तिजारत के बल पर पूरी पृथ्वी को विनाश की कगार पर ला खड़ा करने वालों को अभ्यासवश मनुष्य भले कह दिया जाय, उनकी असलियत क्या है, यह बात ‘निरीहों की दुनिया’ इस तरह बयान करती है- ‘‘आदमियों का कोई भरोसा नहीं। खरगोशों और कछुओं को तो वे मारते ही हैं पर उनसे भी बहुत बहुत ज्यादा वे उन आदमियों को मार डालते हैं जो बिल्कुल उन्हीं जैसे होते हैं। सच तो यह है कि आदमी ने पता लगा लिया है कि हथियार से बढ़कर कोई ताकत दुनिया में नहीं है और जिसके पास हथियार है वह जो मन चाहे कर सकता है।’’ पाठक की चेतना में कुवैत, ईराक, अफगानिस्तान जैसे दृश्य अपने आप उभर आते हैं। खरगोश आगे कहता है- ‘‘हथियार हाथ में होने से वह खरगोशों, कछुओं की कौन कहे बड़े-बड़े जानवरों और अच्छे बुरे सभी तरह के लोगों की हत्या कर सकता है। ऐसे में खरगोश और कछुए जैसे निरीह प्राणी उससे अपनी रक्षा कैसे कर सकते हैं ?’’

कथा के आखिरी पृष्ठ पर मुखिनी कहती है- ‘‘आदमी से बचने का सबसे सरल उपाय उसके हथियार से दूर रहना है, क्योंकि बिना हथियार के वह उन्हीं जैसे निरीह होता है।’’ कछुआ उस दुनिया के बारे में सोचने लगता है जो सिर्फ निरीह प्राणियों की होगी। विश्‍व से सारे हथियारों के मिट जाने के बाद आदमी भी निरीह प्राणियों में शुमार हो जाएगा। तब उसके पास प्रेम, सहजीवन और त्याग की अपराजेय शक्ति होगी। खरगोश कछुए की तीसरी दौड़ खारिज कर दी जाती है। कथाकार बच्चों की कथालिप्सा का पोषण करते हुए मुखिनी से कहलवाते हैं- ‘‘यह खारिज दौड़ जब भी हो तो निरीहों की दुनिया की पहली खरगोश और कछुए की दौड़ होगी।’’

यह पंचतंत्र-परम्परा की वह कथा है जो कूटनीति को भी हथियार की तरह ही त्याज्य समझकर खारिज कर देती है। अपने समय की जटिलता से सहमे हुए, बेहतर दुनिया की तलाश करने वाले प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति को यह उपन्यास बेहद आत्मीय लगेगा। लेखक के प्रति कृतज्ञता और प्रकाशक को बधाई।

पुस्तक : नि‍रीहों की दुनि‍या, पृष्ठ  : 136, मूल्य  : 70 रुपये
प्रकाशक- रोशनाई प्रकाशन, 212 सी.एल./ए., अशोक मि‍त्र रोड,
कांचरापाड़ा, उत्तर 24 परगना, पश्‍चि‍म बंगाल


One comment on “समर्थों को जीने का सलीका सिखाती निरीहों की दुनिया : रामदेव शुक्ल

  1. sumit says:

    बहुत अच्‍छी समीक्षा है।

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