संजय ग्रोवर की चार गजलें

युवा गजलकार संजय ग्रोवर की चार गजलें-

1

पद सुरक्षा धन प्रतिष्‍ठा हर तरह गढ़ते रहे
और फिर बोले कि हम तो उम्र भर लड़ते रहे
काग़ज़ों की कोठरी में कैद कर डाला वजूद
फिर किसी अखबार में तारीफे-खुद पढ़ते रहे
मंच पर जिन रास्तों के थे मुखालिफ उम्र भर
मंच के पीछे से वो ही सीढ़ियां चढ़ते रहे
नाम पर बदलाव के इतना इज़ाफा कर दिया
रोज़ तस्वीरें बदल कर चौखटे जड़ते रहे
इन अंधेरों में भी होगी प्यार की नन्हीं सी लौ
बस इसी उम्मीद में मेरे क़दम बढ़ते रहे

2.

कोई भी तयशुदा क़िस्सा नहीं हूं
किस्सी साजिश का मैं हिस्सा नहीं हूं
किसी की छाप अब मुझपर नहीं है
मैं ज़्यादा दिन कहीं रुकता नहीं हूं
तुम्हारी और मेरी दोस्ती क्या
मुसीबत में, मैं ख़ुद अपना नहीं हूं
मुझे मत ढूंढना बाज़ार में तुम
किसी दुकान पर बिकता नहीं हूं
मैं ज़िन्दा हूं मुसलसल यूं न देखो
किसी दीवार पर लटका नहीं हूं
मुझे देकर न कुछ तुम पा सकोगे
मैं खोटा हूं मगर सिक्का नहीं हूं
तुम्हे क्यूं अपने जैसा मैं बनाऊँ
यक़ीनन जब मैं ख़ुद तुमसा नहीं हूं
लतीफ़ा भी चलेगा गर नया हो
मैं हर इक बात पर हंसता नहीं हूं
ज़मीं मुझको भी अपना मानती है
कि मैं आकाश से टपका नहीं हूं

3.

जब तलक अनकही, अनसुनी धूप है
दिल को ऐसा लगे गुनगुनी धूप है
बेटियों ने सहारा दिया बाप को
देखो सूरज के सर पे तनी धूप है
‘जन्मदाता ही बेटी से बेज़ार है !’
लेके सूरज को, यूं, अनमनी धूप है
दादियों नानियों सबको समझा रही
देखो ज़ेहन की कितनी ग़नी धूप है
बेईमानी के बादल हैं चारों तरफ
खबरे-ईमान सी सनसनी धूप है
जानलेवा है गरमी औ’ फुटपाथ पर-
मुफलिसों के लिए कटखनी धूप है
सर पे सूरज है और चाँद खिड़की में है
यानि जां पे मेरी आ बनी धूप है

4.

जहाज़ कागज़ी ताउम्र नहीं चलने का
संभल भी जा कि अभी वक्त है संभलने का
अगर तू भेड़चाल में ही इसकी शामिल है
ज़माना तुझसे कोई चाल नहीं चलने का
वो जो बदलाव के विरोधियों के मुखिया थे
कि ले उड़े हैं वही श्रेय युग बदलने का
वो सियासत में साफगोई के समर्थक हैं
सो उनको हक़ है सरे-आम सबको छलने का
जो उनसे हाथ मिलाते हैं जानते ही नहीं
कि वक्त आ रहा है जल्द हाथ मलने का


14 comments on “संजय ग्रोवर की चार गजलें

  1. Pradeep says:

    मुझे अच्छी लगीं . आज के माहौल में यही सच है. मैंने मेरे फेसबुक पर डाली हैं

  2. संजय जी,
    बहुत शानदार गजलें हैं। मजा आ गया।
    धन्यवाद

  3. anjule says:

    काफी वक़्त हूवा ये ग़ज़ल शायद हंस में पढ़ी थी…तब से इसकी कई लाइने दिमाग में चक्कर katti रही हैं…

  4. बहुत शानदार गजलें है । आभार।

  5. pummy says:

    It’s all realy very nice & impressive.

  6. nadeem says:

    तुम्हे क्यूं अपने जैसा मैं बनाऊँ
    यक़ीनन जब मैं ख़ुद तुमसा नहीं हूं

  7. nadeem says:

    बहुत उम्दा

  8. Dr C P Rai says:

    जो उनसे हाथ मिलाते है जानते ही नहीं कि जल्द वक्त आ रहा है हाथ मलने का,
    बहुत खूब, बधाई

  9. sakhi says:

    बहुत achi gazle likhi

  10. वीरेन्द्र जैन says:

    जो उनसे हाथ मिलाते हैं जानते ही नहीं
    कि वक्त आ रहा है जल्द हाथ मलने का

    बहुत तरीके से कह दिया है। बधाई

  11. सभी की सभी गज़लें लाजवाब…बेहतरीन…..

    बड़ा ही आनंद आया पढ़कर…

    आभार आपका पढवाने के लिए..

  12. Kamlesh Jha says:

    मंच पर जिन रास्तों के थे मुखालिफ उम्र भर
    मंच के पीछे से वो ही सीढ़ियां चढ़ते रहे

    वो सियासत में साफगोई के समर्थक हैं
    सो उनको हक़ है सरे-आम सबको छलने का

    जो उनसे हाथ मिलाते हैं जानते ही नहीं
    कि वक्त आ रहा है जल्द हाथ मलने का

    ….बहुत शानदार गजलें है । आभार।

  13. प्रेमचंद सहजवाला says:

    सभी गजलें बहुत अच्छी. आज के माहौल पर करार तमाचा. ऐसी अच्छी गजलें साया करना के लिये लेखक मंच को बधाई. मैं हाल ही में इस मंच से जुड़ा हूँ, पढ़ कर खुशी हुई कि हर स्तंभ में सामग्री अच्छी है.

  14. sumit says:

    4 number ki gazal bahut hi acchi hai

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