शैक्षिक सरोकारों को समर्पित ‘शैक्षिक दखल’ : रमेश जोशी

shekshik dakhal

शैक्षिक सरोकारों को लेकर प्रकाशित की जा रही है पत्रिका ‘शैक्षिक दखल’ की लेखक रमेश जोशी की समीक्षा-

शिक्षा मानवीय संसाधनों को विकसित करती है। इस दृष्टिकोण को मद्देनजर रखते हुए यदि शिक्षा की व्यवस्था की जाय तो स्वाभाविक है उत्तम मानवीय संसाधनों का विकास होगा और अपेक्षानुरूप हम अपने समाज को ढालने में समर्थ हो सकेंगे। यदि संसाधनों को लेकर या फिर वित्तीय संकट का रोना रोकर कामचलाऊ व्यवस्था पर निर्भर रहा जाय तो परिणाम बहुत अच्छे नहीं हो सकते हैं। जैसे-जैसे तकनीकी का विकास हो रहा है शिक्षा का दायरा भी विस्तृत होता जा रहा है। वर्तमान में शिक्षा देना बहुत आसान नहीं रह गया है, केवल कक्षा-कक्ष में जाकर पाठ्यक्रम से सम्बन्धित बातें बता देना और परीक्षा पास करवाना ही शिक्षा का लक्ष्य नहीं है, बल्कि छात्रों के अन्दर विद्यमान दक्षताओं को पहचान कर उनमें अपेक्षित परिवर्तन करते हुए उनमें जीवन कौशलों को विकसित करना भी है। शिक्षा को कैसा होना चाहिए और छात्रों को किस प्रकार आवश्यकताओं के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण तथा जीवनोपयोगी शिक्षा दी जाय इसको शिक्षक से बेहतर कौन जान सकता है। छात्रों में बहुमुखी प्रतिभा को विकसित करने के लिये शिक्षक को अनेक प्रयोग करने पड़ते हैं। छात्रों की कल्पना शक्ति का विकास करने के लिये शिक्षक को स्वयं भी रचनाशील होना चाहिए। आज भी संसाधनों को दरकिनार करते हुए कई शिक्षक छात्रों के भविष्य को संवारने में लगे हैं और सामाजिक चेतना के माध्यम से अन्य लोगों में भी चेतना का संचार करने में लगे हैं।

रचनात्मकता शिक्षक का प्रमुख गुण है। वह इसके अभाव में वह वर्तमान में विद्यालयों में उचित वातावरण का सृजन नहीं कर सकता है। बच्चों की रचनात्मक प्रवृति को विकसित करने के लिये तथा शिक्षकों में चेतना का संचार करने के लिए शैक्षिक सरोकारों को समर्पित ‘शैक्षिक दखल’ का अंक रचनाधर्मी शिक्षकों के अथक प्रयास से निकल चुका है। इसे लोग पढें विशेषरूप शिक्षकों से निवेदन है कि अवश्य ही इस पत्रिका को पढ़ें तथा अपेक्षित सुधार हेतु अपनी राय दें ताकि इसे और अधिक उपयोगी बनाया जा सके। केवल सम्‍पादक मंडल या इससे जुड़े लोगों के प्रयास से बहुत अधिक सफलता नहीं मिल सकती है। अतः पाठकों की अधिकाधिक संख्या तथा उनकी प्रतिक्रिया सफलता के लिये आवश्यक है।  ‘शैक्षिक दखल’ का यह अंक अपने आपमें काफी सामाग्री समेटे हुए है। पत्रिका का बाह्य आवरण बहुत सुन्दर तथा आकर्षक है। अश्‍वघोष की ‘आजकल’ तथा हरीश चन्द्र पाण्डेय की ‘वहाँ कोई बच्ची नहीं थी’ कविता पत्रिका का निश्चित रूप से वजन बढ़ाती हैं। सम्‍पादकीय में महेश पुनेठा ने ‘ पाठ्य पुस्तकों के बोझ तले सिसकती रचनात्मता’ में विद्यालयों के बोझिल तथा सीमित वातावरण का जिक्र किया है जिससे कि बच्चों की रचनात्मकता बुरी तरह प्रभावित हो रही है। पाठ्य पुस्तकों का बोझ बच्चों को शिक्षा की मौलिक विचारधारा से भटका रहा है तथा उन्हें बोझिल बना रहा है। पुनेठा जी ने लिखा है,‘बच्चा तनाव में है और किसी बोझ से दबा है तो वह नया सोच ही नहीं सकता और जब सोच ही नहीं सकता है तब रचने की बात तो दूर की कौड़ी है।’ वह आगे कहते हैं, ‘बच्चों का मन बहुत करता है कि खुले में विचरण करें, कल्पनाओं की उड़ान भरें, कुछ नया करे पर अध्यापकों-अभिभावकों द्वारा उसे किसी प्रकार से फिर पाठ्यपुस्तक रूपी किले से बाँध दिया जाता है।’ पाठ्य पुस्तकों की निर्भरता पर वह कहते हैं, ‘ एक आम तर्क होता है कि जब पाठ्यपुस्तक ही नहीं हैं तो पढ़ाई कैसे शुरू होगी? यह प्रवृति बच्चे की रचनात्मता को कुंद करती है।’ यहाँ तक कि हमारे शिक्षकों में भी इस बात के लिये नाराजगी होती है कि वे पुस्तकों के अभाव में क्या करें।

हमारे परिवेश से भिन्न होने के कारण अंग्रेजी माध्यम से होने वाले नुकसान के बारे में उनका कहना है कि,‘ अंग्रेजी माध्यम के चलते बच्चे की चिंतन मनन की प्रक्रिया बाधित हुई है। एक ऐसी भाषा जो मातृभाषा से इतर है, बच्चे कि लिये उसमें चिंतन और कल्पना करना स्वाभाविक नहीं है।’

राजीव जोशी के समन्वयन में ‘स्वाधीन हुए बिना रचनात्मकता सम्‍भव नहीं’ विषय पर कई छात्रों, शिक्षकों, लेखकों, पत्रकारों ने प्रतिक्रिया व्यक्त की है तथा लेखन व सृजन के लिए स्वतंत्रता के महत्व को स्वीकारा है। साथ ही स्वतंत्रता के असली मायनों को भी परिलक्षित किया है। स्वतंत्रता के सम्बन्ध में युवा उपन्यासकार राजीव रंजन कहते हैं, ‘स्वतंत्र होकर मिट्टी में जैसे दबाव नहीं डाला जा सकता उसे गढ़ने की स्वतंत्रता तो है पर इस प्रक्रिया में वह निश्चित दबाव, आकार, चाक की गति आदि की अवहेलना नहीं कर सकता।’ बातचीत में प्रोफेसर ए.के. जलालुद्दीन ने कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्रदान की हैं जो कि शिक्षक के लिये बहुत जरूरी हैं और इनका ध्यान यदि कक्षा-कक्ष में दिया जाय तो हम सफल शिक्षक की जिम्मेदारी का निर्वाहनआसानी से कर सकते हैं। शिक्षक को शिक्षण के इतर दी गयी जिम्मेदारियों पर भी कई लोगों ने ध्यान आकृष्ट किया है और इस पर सोचना वास्तव में बहुत जरूरी हो गया है।

बच्चों की छोटी-छोटी गलतियों पर अभिभावक या शिक्षक उसे कितना बड़ा दण्ड देते हैं इसका वर्णन ‘किस्सा गुलफाम उर्फ टोलम का’ में किया गया है। हमें समस्या की तह में जाने की आवश्यकता है और उसके उपरान्त ही हम कोई निर्णय लें ताकि किसी का भविष्य खराब न हो सके। कविता की सार्थकता पर मोहन श्रोत्रिय ने प्रकाश डाला है। वह कहते हैं, ‘कविता सृजन का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक कर्म है तो उसे सामाजिक सरोकार भी होंगे ही। इन सरोकारों की खुली अभिव्यक्ति भी पाठकों से कवि, कविता की निकटता और जुड़ाव को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है।’ शिक्षक के व्यवहार की महत्ता को परिलक्षित करता खजान सिंह का आलेख बताता है कि विद्यालय में शिक्षक के लिए छात्रों के साथ मधुर व्यवहार कितना उपयोगी होता है। यदि आज भी छात्र विद्यालय के वातावरण को अनाकर्षक मानते हैं तथा पढ़ने से दूर भागते हैं तो निश्चित रूप से शिक्षक को अपने व्यवहार को पुनः सुधारने की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त भी कई महत्वपूर्ण आलेख इस पत्रिका में दिये गये हैं जो कि पठनीय हैं।

‘आते हुए लोग’ के सम्बन्ध में मेरा सुझाव है कि इसमें और अधिक लोगों के विचारों को स्थान दिया जाय। शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वालों के अनुभवों को इसमें शामिल किया जाय साथ ही व्यक्तिगत आक्षेपों से बचा जाय। व्यवस्थागत खामियों को उजागर करना ठीक है परन्तु व्यक्तिगत रूप से अल्प अनुभव को आधार मानकर कोई सार्वजनिक सिद्धान्त स्वतः निकाल लेना तर्क संगत नहीं होता है। मेरा सम्पादक मंडल से अनुरोध है कि इस प्रकार की खामियों से बचा जाय।
कुल मिलाकर पत्रिका में उपलब्ध सामाग्री पठनीय है। शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वालों के लिए कई महत्वपूर्ण सामाग्री इसमें समाहित है। ‘समाचार पत्रों में शिक्षा जगत की मौजूदगी’ डॉ. दिनेश जोशी का संकलन भी बहुत कुछ कहता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आप शिक्षक हों चाहे अभिभावक शिक्षा जगत में नित बदलती तस्वीर के लिये तथा अपने नौनिहालों के भविष्य के लिए इस पत्रिका को अवश्य पढ़ें।

पत्रिका का नाम : शैक्षिक दखल
सम्‍पादक : महेश चंद्र पुनेठा और दिनेश कर्नाटक
सम्‍पर्क : महेश चंद्र पुनेठा, जोशी भवन, नि‍कट लीड बैंक, पि‍थौरागढ़-262501, मोबाइल नम्‍बर- 09411707470
सहयोग राशि‍: 20 रुपये(प्रति‍ अंक), 100 रुपये(चार अंकों के लि‍ये), 1000 रुपये(आजीवन)



One comment on “शैक्षिक सरोकारों को समर्पित ‘शैक्षिक दखल’ : रमेश जोशी

  1. PARMOD says:

    DEAR SIR REALLY GOOD INITIATIVE
    REGARDS
    PARMODKUMAR
    STATE PROGREMME OFFICER
    RIGHT TO EDUCATION
    DIRECTORATE OF ELEMENTARY EDUCATION
    HARYANA

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