शिक्षा को परीक्षोन्मुखी के बजाय जीवनोन्मुखी बनाने की जरूरत : महेश चंद्र पुनेठा

 

आज की शि‍क्षा विशुद्ध रूप से बाजार के अनुकूल है जि‍सका मूल्‍यों से कुछ लेना-देना नहीं है। इसके कारणों, घातक दुष्‍परि‍णामों और सही शि‍क्षा पद्धति‍ को लेकर युवा लेखक-कवि‍ महेश चंद्र पुनेठा का आलेख-

आज शिक्षा की सबसे बड़ी चुनौती है उसका जीवनोन्मुखी न होकर परीक्षोन्मुखी होना।आज सभी का सारा जोर परीक्षा पास करने या परीक्षा में अधिकाधिक अंक प्राप्त करने में है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे शिक्षा परीक्षा के लिये है न कि जीवन के लिये। शिक्षक हों या अभिवावक या फिर विद्यार्थी सभी का परम लक्ष्य परीक्षा में बेहतर से बेहतर परिणाम प्राप्त करना मात्र रह गया है। पूरी शिक्षा परीक्षा केन्‍द्रि‍त हो चुकी है जिसके कारण पूरा वातावरण घोर गलाकाट प्रतिस्पर्धा से भर गया है। शिक्षक शिक्षण इस तरीके से करते हैं जिससे कि बच्चे परीक्षा में अधिकाधिक अंक प्राप्त कर सकें। यही चाह अभिभावकों की भी रहती है। बच्चे तो फिर बच्चे हैं, अध्यापकों और अभिभावकों की महत्वाकांक्षाओं के हाथों कैद। परीक्षा के अलावा किसी अन्य चीज के बारे में सोचना बच्चों के लिए सम्‍भव ही नहीं। परीक्षा ने बच्चों को महज किताबी कीड़े बना दिया है।

शिक्षा का मतलब किताबी ज्ञान हो गया है। किताब भी केवल वह जो पाठ्यपुस्तक के रूप में लागू हो। पाठ्यपुस्तक के अलावा अन्य पुस्तक पढ़ना समय की बर्बादी मानी जाती है। शिक्षक और छात्र दोनों के लिये पाठ्यपुस्तक ही पाठ्यचर्या हो गयी है। शिक्षक वही पढ़ाते हैं और विद्यार्थी वही पढ़ना चाहते हैं जो परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी हो। परीक्षा में प्रदर्शन के आधार पर ही शिक्षा तथा शैक्षिक संप्राप्ति का मूल्यांकन किया जा रहा है, जिसमें सबसे अधिक बल लिखित परीक्षा को दिया जा रहा है। सभी परीक्षा को साधने में लगे हैं। बच्चे को विषय की समझ कितनी गहरी है, वह सीखी हुई विषयवस्तु को अपने जीवन की बदली परिस्थितियों  में कितना क्रियान्वित कर सकता है, विषयवस्तु को सीखने के बाद उसके व्यक्तित्व में कितना सकारात्मक परिवर्तन आता है, वह कितना बेहतर इंसान या नागरिक बन पाता है, इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जानकारियों को रटना और परीक्षा में उन्हें हू-ब-हू उतार देना सीखने का पर्याय होता चला गया है, फलस्वरूप शिक्षा जीवन से कट चुकी है। जबकि जरूरी यह है कि बच्चे चीजों को समझें। चीजों को करने के रचनात्मक और नये तरीके सोचें। उनमें क्षमता होनी चाहिये कि अपनी समझ और ज्ञान को नई समस्यायें सुलझाने में इस्तेमाल कर पायें। किसी घटना को अलग-अलग दृष्टिकोण से आँककर उसके बारे में मन बना पायें और समस्याओं का विश्‍लेषण करके उन्हें हल करने के लिये नए रचनात्मक तरीके सोच पायें। लेकिन अधिकांश परीक्षाओं में इस क्षमता को नहीं जाँचा जाता।

शिक्षा सम्‍बन्‍धी दस्तावेजों में निहित ‘जीवन के लिए शिक्षा’ एक मुहावरा मात्र बन कर रह गया है। ज्ञान की दो दुनिया बना दी गयी हैं एक स्कूली ज्ञान और दूसरा बाहरी जीवन का ज्ञान। ऐसा वातावरण तैयार कर दिया गया है जैसे कि स्कूल का ज्ञान बाहरी जीवन के ज्ञान से श्रेष्ठ और अलग है। स्कूली ज्ञान से ही जीवन की सफलता-असफलता निर्धारित होती है तथा स्कूली ज्ञान परीक्षा से नियंत्रित है। बच्चों के पास खेलने का समय ही नहीं है। उनकी जिन्‍दगी तो यूनिट टेस्ट, वार्षिक परीक्षा और जैसे कि ये काफी न हो, बोर्ड परीक्षा के आतंक एवं अन्य अनगिनत प्रतियोगी परीक्षाओं से नियंत्रित रहती है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे जीवन प्रतियोगिता के लिये ही बना है। बस दौड़ते रहे हो कहीं कोई दूसरा आपसे आगे नहीं निकल जाये। साथ-साथ आगे बढ़ने की तो कहीं कोई बात ही नहीं। बच्चे का परीक्षाओं में प्रदर्शन माँ-बाप से मिलने वाले प्यार की कसौटी बन गई है।

परीक्षा का इतना महत्वपूर्ण होना शिक्षा का नौकरी के हित होने से जुड़ा है। जहाँ से यह सोच विकसित हुई कि शिक्षा इसलिये प्राप्त की जाये ताकि पढ़-लिखकर आने वाले समय में अच्छी नौकरी मिल सके। वहीं से शिक्षा का उद्देश्‍य संकुचित हो गया। अच्छी नौकरी का मतलब भी ऐसी नौकरी से है जिसमें वेतन ऊँचा हो और शारीरिक श्रम कम से कम। आज प्रत्येक अभिभावक की जद्दोजहद है कि वह अपने पाल्य को ऐसी शिक्षा दिलवा सके जिससे उसे ऊँचे वेतन वाली नौकरी मिल सके। जब पढ़ने-लिखने के बाद ऐसा नहीं हो पाता है तो वे शिक्षा को गरियाने लगते हैं । उनको लगता है उन्होंने अपने पाल्य को शिक्षा दिलवाकर समय और धन का अपव्यय किया। औपनिवेशक काल में लिखित परीक्षा में फेल हो जाने का मतलब था सरकारी नौकरी के साथ जुड़े सामाजिक रुतबे और वेतन के साथ आर्थिक दृष्टि से सुरक्षित जीवन जीने से वंचित हो जाना, आज भी वही मानसिकता हावी है। यह ठीक है कि शिक्षा रोजगार का जरिया बने, पर शिक्षा केवल रोजगार के लिये हो यह बात कुछ गले नहीं उतरती।

शिक्षा का नौकरी के हित होना और परीक्षा में प्राप्त अंकों के द्वारा उसकी गुणवत्ता का निर्धारण होना ही वे कारण हैं जिनके चलते बाजार ने शिक्षा को मुनाफे का माध्यम बना लिया है। आज बाजार अलग-अलग गुणवत्ता वाली शिक्षा को लेकर उपस्थित हो रहा है। कम पैसे वालों के लिये अलग शिक्षा है और अधिक पैसों वालों के लिये अलग तरह की। ‘जिसकी आर्थिक हैसियत जैसी है वैसी शिक्षा खरीद ले’, यह बाजार का अघोषि‍त ऐलान है। ट्यूशन या कोचिंग नए धंधे के रूप में अस्तित्व में आया है। अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर इनसे जुड़े संस्थान विद्यार्थियों और अभिभावकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं।‘कुंजी’ और ‘गाइड’ छापने वालों का धंधा खूब फल-फूल रहा है। सभी का जोर एक ही बिन्‍दु पर है कि कैसे परीक्षा में अधिकाधिक अंक प्राप्त किये जा सकते हैं, सभी यही तरकीब बताने में लगे हुये हैं। बच्चों को साँस लेने की फुरसत नहीं है। एक अंधी दौड़ में सभी दौड़ रहे हैं। जो सफल हो गये वे अपने आप को सिकंदर समझ रहे हैं और जो पीछे रह जा रहे हैं वे कुंठा, तनाव, अवसाद से ग्रस्त हो आत्महत्या कर रहे हैं या मानसिक संतुलन खो रहे हैं। यदि शिक्षा परीक्षोन्मुख नहीं होती और उसको प्राप्त करने का  एकमात्र उद्देश्‍य नौकरी की प्राप्ति न होता तब क्या बाजार इसका इतना लाभ उठा पाता, यह विचारणीय प्रश्‍न है।

बाजार में बिक रही शिक्षा का मूल्यों से कुछ लेना-देना नहीं है। यह विशुद्ध रूप से बाजार के अनुकूल शिक्षा है। इसका उद्देश्‍य अर्थ मानव तथा व्यवस्था की मशीन में फिट होने वाले पुर्जे तैयार करना है। शिक्षा की दुकानों में वही शिक्षा बेची जा रही है जिसकी कॉरपोरेट जगत को जरूरत है। बाजार को ऐसा मानव संसाधन चाहिये जो उसकी कंपनियों में लगी अत्याधुनिक तकनीक की मशीनों को सही ढंग से परिचालित कर सके । उसके उत्पादों को खरीदने वाले उपभोक्ताओं को मानसिक रूप तैयार कर सके। ऐसे उत्पादों को भी बेच सके जो उपभोक्ता की आवश्‍यक आवश्‍यकता न हो। बाजार सोचने-समझने वाला संवेदनशील मानव नहीं चाहता। ऐसा मानव उसके किसी काम का नहीं। इसलिये आज की शिक्षा एक कुशल डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक या प्रशासक तो तैयार कर रही है, पर उसे एक संवेदनशील इंसान नहीं बना रही है। न ही शिक्षा सृजनशीलता को बढ़ाने में सफल हो पा रही है। सृजनशीलता के अवसर इस बाजार-निर्भर शिक्षा ने निगल दिये हैं। इस शिक्षा में ऐसी क्षमता नहीं है कि यह किसी को साहित्यकार, कलाकार, संगीतकार, वैज्ञानिक, दार्शनिक या चिंतक बना सके। यह उसकी न मंशा है और न ही जरूरत।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी लोककल्याणकारी, समाजवादी तथा लोकतांत्रिक सरकारें इसी शिक्षा की पैरोकार हैं। आजादी के बाद से लेकर आज तक चल रही दोहरी शिक्षा जो आज बहुपरती शिक्षा में बदल गयी है, इसका प्रमाण है। हाल ही में पारित शिक्षा अधिनियम 2009 ने तो रही सही कसर भी पूरी कर दी है। इस अधिनियम के द्वारा तो एक तरह से शिक्षा को निजी हाथों में सौंपने की पूरी तैयारी कर ली गयी है। जनता के पैंसों से विद्यालयों का आधारभूत ढाँचा विकसित कर प्रबंधन के नाम पर उन्हें निजी हाथों को देने की योजना बन चुकी है। प्रथम चरण में देश भर में स्थापित होने वाले छह हजार मॉडल स्कूलों में से दो हजार पाँच सौ स्कूलों को ‘सार्वजनिक-निजी साझेदारी’ के अंतर्गत किसी कॉरपोरेट क्षेत्र, स्वयंसेवी संगठन, स्वयं सहायता समूह, साझेदारी कंपनी, व्यक्ति और समुदाय आधारित संगठनों को सौंपा जायेगा। भविष्य में इस भागीदारी का बढ़ना निश्‍चि‍त है। इसी तरह कम से कम पच्चीस प्रतिशत गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देने के बहाने निजी स्कूलों को वाउचर प्रदान कर आने वाले समय में सरकारें नये विद्यालय खोलने के अपने दायित्व से भी बचना चाहती है। एक तरह से धीरे-धीरे शिक्षा को निजी क्षेत्र के भरोसे छोड़ कर अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहती है। वाउचर योजना निजी क्षेत्र को लाभ पहुँचाने की योजना है। जिस दिन शिक्षा पूरी तरह निजी हाथों में चली जायेगी और विदेशी संस्थायें हमारे देश में शिक्षण संस्थायें संचालित करने लगेंगी, सोचा जा सकता है शिक्षा का उद्देश्‍य क्या रह जायेगा। शिक्षा में कितनी मूल्यों की बात रह जायेगी और कितनी जीवन की। तब शिक्षा का सम्‍बन्‍ध चेतना से नहीं रह जायेगा। शिक्षा जकड़न को तोड़े इसकी कोई जरूरत महसूस नहीं की जायेगी। बच्चों में विवेकशीलता का विकास शिक्षा का कोई सरोकार नहीं रह जायेगा क्योंकि बाजार की दृष्टि से इनकी कोई उपयोगिता नहीं है। जैसा कि हम अभी भी देख रहे हैं निजी स्वामित्व वाले शिक्षण संस्थानों में शिक्षा के नाम पर पाठ्यचर्या में उन्हीं चीजों को शामिल किया जा रहा है जो उद्योगों के विस्तार और संचालन के लिए जरूरी हैं। वहाँ विज्ञान, भाषा व मानविकी जैसे चेतना विकसित करने व समग्र व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले विषयों की लगातार उपेक्षा की जा रही है। उनके स्थान पर प्रबंधन व तकनीकी विषयों को बढ़ावा दिया जा रहा है। बच्चा जो पढ़ना चाह रहा है उसे वह नहीं पढ़ने दिया जा रहा है, बल्कि बाजार उसे जो पढ़ाना चाह रहा है उसे वह पढ़ना है। बच्चे की सृजनात्मकता और रुचि का कोई ध्यान नहीं रखा जा रहा है।

बड़े-बड़े विज्ञापनों द्वारा छात्र-अभिभावकों का मन तैयार किया जा रहा है। उन्हें हसीन सपने दिखाये जा रहे हैं। इतने बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं कि उन्हें लगता है कि  अमुक पाठ्यक्रम पढ़ने से उनकी किस्मत ही बदल जायेगी। पर पिछले कुछ सालों में अन्य कुछ हुआ हो या नहीं लेकिन यह जरूर देखने में आया है कि जहाँ भी शिक्षा में बाजार का हस्तक्षेप बढ़ा है वहाँ आज्ञाकारिता, बौद्धिकता और व्यक्तिगत उपलब्धियों को बहुत ही महत्वपूर्ण मूल्य के रूप में मानने की प्रवृत्ति स्थापित हुई है। साथ ही एक खतरा और बढ़ा है संविधान में उल्लिखित लोकतांत्रिक व धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की अनेक शिक्षण संस्थाओं ने खूब धज्जियाँ उड़ायी हैं। शिक्षा को कट्टतरता, धर्मान्धता, जातिवाद, भाषाई दुराग्रह एवं क्षेत्रवाद फैलाने का माध्यम बनाया गया है। वि‍शेषरूप से साम्‍प्रदायिक मानसिकता को बोया और विकसित किया जा रहा है। जैसा कि प्रख्यात शिक्षाविद् अनिल सदगोपाल का मानना भी है, ‘शिक्षा के जरिये वर्ग-भेद, जाति-भेद, धार्मिक कट्टता, नस्लवाद, पितृसत्ता, सामंती व गैर-तार्किक सोच, पिछडे़पन आदि विकृतियों के खिलाफ लड़ाई आगे बढ़ाने के सरोकार गौण हो रहे हैं। शिक्षा वैश्‍वि‍क बाजार की ताकतों के हाथ में वर्चस्ववाद, शोषण, साम्‍प्रदायि‍कता व विषमता फैलाने का हथियार बनती जा रही है।’

दरअसल इसका सम्‍बन्‍ध इस बात से है कि हम कैसा समाज चाहते हैं। यदि हम ऐसा समाज चाहते हैं जो रचनात्मक एवं वैज्ञानिक सोच से लैस हो, जहाँ चीजों का वितरण सम्यक एवं न्यायपूर्ण हो तथा सभी को अच्छी शिक्षा-स्वास्थ्य एवं भोजन की गारंटी हो तो शिक्षा प्रणाली भी ऐसी होनी चाहिये जो रचनात्मक एवं वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दे और लोकव्यापी तथा समतामूलक हो । यदि आज ऐसा नहीं है तो यह कहीं न कहीं सत्ताधारियों के हित में है क्योंकि वे नहीं चाहते हैं कि जनता रचनात्मक एवं विवेकशील हो और उनके काम-काज पर प्रश्‍न खड़े करे ।

इधर बच्चों में परीक्षा के बोझ को कम करने की बात की जा रही है। कहा जा रहा है कि परीक्षा को ‘चाइल्ड फ्रेंडली’ बनाया जाये। इस दिशा में एक कदम के रूप में सी.बी.एस.सी. द्वारा हाई स्कूल की परीक्षा में बोर्ड परीक्षा को वैकल्पिक तथा अंकों के स्थान पर ग्रेड पद्धति को लागू किया गया है। पाठ आधारित और क्विज परीक्षा की विधि को बदलने की बात की जा रही है। यह माना जा रहा है कि इससे बच्चों पर परीक्षा का तनाव कम होगा। पर यहाँ एक सवाल खड़ा होता है कि जब तक परीक्षा से बच्चे के स्तर का निर्धारण होता रहेगा या फिर उसे वर्गीकृत किया जाता रहेगा और यह स्तर या वर्गीकरण उसके जीवन को पग-पग पर प्रभावित करता रहेगा, यही जीवन में सफलता असफलता का मानक बना रहेगा, तब तक भला बच्चा उससे निरपेक्ष कैसे रह सकता है। फिर यह स्तर का निर्धारण या वर्गीकरण अंकों के द्वारा हो या ग्रेड द्वारा इससे क्या अंतर पड़ता है। परीक्षा जहाँ होगी वहाँ तनाव अवश्‍य होगा। परीक्षा प्रतिस्पर्द्धा को भी जन्म देती है । प्रतिस्पर्द्धा तनाव का कारण बनती है। एन.सी.एफ. 2005 में स्कूलों में प्रतिस्पर्द्धा को समाप्त करने की बात कही गई है, पर जब तक समाज में यह प्रतिस्पर्द्धा समाप्त न हो जाये तब तक स्कूलों में कैसे हो सकती है।

प्रतिस्पर्द्धा  पूँजीवादी व्यवस्था का मूल्य है। यह माना जाता है कि शिक्षा को अपनी प्रक्रिया और मूल्याँकन में सफलता और प्रतिस्पर्धा के बजाय सहभागिता, सार्थकता और आत्मावलोकन को महत्व देना चाहिये और यह तभी हो सकेगा जब ज्ञान की प्रतिष्ठा उपयोगिता के कारण नहीं, बल्कि आनन्‍द तथा सामाजिक प्रतिबद्धता की वजह से हो। पर जिस व्यवस्था का मूल मंत्र ही प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत सफलता हो, क्या उससे आशा की जा सकती है कि वह सहभागिता, सार्थकता, आत्मावलोकन तथा आनन्‍द को महत्व देगी, इस पर समय रहते सोचे जाने की जरूरत है । शिक्षा को यदि बाजार के मकड़जाल से मुक्त करना है तो जरूरी लगता है कि इसे परीक्षोन्मुखी के बजाय जीवनोन्मुखी बनाया जाये। शिक्षा परीक्षा के लिये न हो, बल्कि परीक्षा शिक्षा के लिये हो जैसे कि परीक्षण स्वास्थ्य के लिए होता है न की स्वास्थ्य परीक्षण के लिये। परीक्षा बच्चे के मूल्याँकन के लिये न होकर शिक्षण पद्धति के मूल्याँकन एवं उसमें सुधार के लिये होनी चाहिये। परीक्षा से प्राप्त परिणामों से बच्चों को वर्गीकृत न किया जाये बल्कि सीखने के कठिन स्थलों का पता लगाया जाये ताकि उन पद्धतियों को विकसित किया जा सके जिससे सीखने की प्रक्रिया सरल और रोचक हो सके जिससे अंततः बच्चा ज्ञान निर्माण की दिशा में आगे बढ़ सके । परीक्षा लिये जाने का तरीका कुछ ऐसा होना चाहिए कि बच्चे को इस बात का पता भी न चले कि उसकी परीक्षा ली जा रही है।

मौजूदा व्यवस्था में ऐसा सम्‍भव नहीं दिखता कि‍ परीक्षा को समाप्त किया जा सके या फिर कभी-कभी लगता है कि परीक्षा की उपयोगिता है बच्चों को खुद को जानने तथा आगे की योजना बनाने की दृष्टि से इसलिए ऐसे उपाय किये जाने चाहिये कि इसके तनाव को कम किया जा सके। इस दृष्टि से एन.सी.एफ. 2005 के सुझाव उल्लेखनीय हैं- परीक्षा हॉल में कागज कलम से ली गई परीक्षा के अलावा मूल्याँकन के बहुविध रूप होने चाहिये। मौखिक परीक्षा और समूह कार्य मूल्याँकन को बढ़ावा दिया जाना चाहिये। खुली-पुस्तक परीक्षा और लचीली समय सीमा परीक्षा को देश भर में प्रायोगिक तौर पर लागू किये जाने की जरूरत है। इस तरह की शुरुआत से स्मृति आधारित परीक्षा से कुछ उच्च योग्यताओं की परीक्षा का मार्ग प्रशस्‍त होगा, जैसे-व्याख्या, मूल्याँकन और समस्या सुलझाना। विद्यार्थियों को उतने ही पत्रों की परीक्षा देने का अधिकार हो जितने की तैयारी हो । तीन साल के दौरान परीक्षा पूरी हो सके। इसको माँग पर परीक्षा प्रणाली के रूप में विकसित किया जा सकता है जिसमें छात्र तभी परीक्षा दे जब वे समझें कि उसके लिये तैयार है।

34 comments on “शिक्षा को परीक्षोन्मुखी के बजाय जीवनोन्मुखी बनाने की जरूरत : महेश चंद्र पुनेठा

  1. Nityanand Gayen says:

    बहुत ही महत्वपूर्ण लेख है ….आज शिक्षा का अर्थ केवल अंक के लिए प्रतियोगिता और अच्छे रोज़गार की तलाश तक सिमट कर रह गया है ….जिसके दुष्परिणाम नज़र आने लगा है ..

  2. umesh says:

    very good artical. kya koi aur rasta ho sakta h.hum sabko lagta h ki agar hamare bacche ke acche number nahi aate to hum dukhi ho jate aur bacche per acche number lane ka presure banate h.

  3. manohar chamoli says:

    sarthak lekh….bhadhayi….

  4. saargrbit our mananiy aalekh hai…

  5. अजेय says:

    ज़रूरी . मैं इसे कुछ शिक्षक मित्रों के साथ शेयर करना चाहूँगा

  6. अच्छा लिखा है आपने. एक ज़रूरी मुद्दा है यह.

  7. प्रकाश मनु says:

    अच्छा और सुलझा हुआ लेख…याद आती हैं, मैथिलीशरण जी की पंक्तियाँ – शिक्षे, तुम्हारा नाश हो, तुम नौकरी के हित बनीं। कितना सही कहा था उन्होंने। सस्नेह, मनु

  8. DR RAKESH GAIROLA says:

    BURNING ISSUE ON RECENT EDUCATION TREND, WHICH IS GOING TO BE COMPLETELY PROFESSIONAL. EDUCATION SHOULD BE TO MAKE A GOOD & IDEAL CITIZEN, NOT FOR A MONEY MACHINE.

  9. PANKAJ MISHRA says:

    PUNETHA JI BHUT ACHCHHA LEKH LIKHA AAP NE .

  10. leena malhotra rao says:

    फिर यह स्तर का निर्धारण या वर्गीकरण अंकों के द्वारा हो या ग्रेड द्वारा इससे क्या अंतर पड़ता है। bilkul sahi kaha aapne mahesh ji.. aaj shiksha kee dukano se shiksha khareedi jaa rahi hai aur bachche poora saal jo niglte hain use pareeksha ke din ulat dete hain.. mark twain ka ye kathan yaad aata hai ‘ let school not interfere with my education’..sundar lekh

  11. vijay gaur says:

    चालू विद्यअलयी शिक्षा को लेकर जो भी बातें आलेख में हैं उनसे असहमति नहीं। लेकिन एक बात है जो कहना जरूरी लग रहा है कि शिक्षा ही क्यों जमाने की बेहतरी के सिद्धांत के बावजूद, मौजूदा व्यवस्था में जो कुछ भी है वह मुनाफ़े को स्वीकारता हुआ है। मूल बात है मुनाफ़े पर टिकी और उसे आदर्श के रूप में गढ़ती व्यवस्था का खात्मा। बाकी के सवाल तो फ़िर होंगे। यानी यह निष्कर्ष कि शिक्षा नीति नाम का कोई नया अध्याय चाहे दूसरा आ जाये चाहे तीसरा, मौजूदा ढांचे में तो उसे मुनाफ़ाखोरों की जमात ही पैदा करना है।

  12. रामजी तिवारी says:

    बेहतरीन लिखा है आपने ..एक जरुरी मुद्दे पर एक जरुरी लेख है यह ..| जाहिर है कि इन सब बातो की जड़ों में वह व्यवस्था ही है , जिसके ऊपर इसको संचालित करने की जिम्मेदारी दी गयी है | अब उन्हें एक चलता फरता रोबोट तो चाहिए ,जिसमे विवेक और मस्तिष्क नहीं हो …उच्च शिक्षा को शातिराना तौर से पीछे धकेलने की यह एक बड़ी वजह है …| अच्छे लेख के लिए आपको बधाई …

  13. PRAN SHARMA says:

    EK AESA GAMBHEER LEKH JO BAHUT KUCHH SOCHNE KO VIVASH
    KARTA HAI .

  14. mahesh chandra punetha says:

    Yougal Pandey
    issi ke vissyy ko lekarr 2-4 din pehle maine bhi socha tha ki school me pdaayi aajkal kewal rojgaar ko dhyaan main dekrr ho rhi he baalpnn aur accha naagrik bnnane ki to koi baat he hi nhi, buchpnn ko to ptta hi nhi kha maar diya gya he.

  15. शिक्षा की वर्तमान दुर्व्यवस्था पर सटीक और चिंतनपरक आलेख

  16. Prem Chand Gandhi says:

    भाई, भारतीय शिक्षा को जिस तरह वैश्‍वीकरण के युग में पूंजीपतियों की इच्‍छा के अनुरूप ढाल दिया गया है, उसके बहुत से कोनों-अंतरों की पड़ताल करता हुआ यह बेहद महत्‍वपूर्ण लेख है… लेकिन परिस्थितियां ऐसी बना दी गई हैं कि आप कुछ नहीं कर सकते… आपने सच में दिल को छू जाने वाली बातें लिखी हैं और मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूं।

  17. Nityanand Gayen says:

    भारतीय शिक्षा प्रणाली की वर्तमान स्तिथि का सीधा -सीधा सम्बन्ध पूंजीवाद से हैं ..विशेष आर्थिक क्षेत्र और मुक्त व्यापर प्रणाली के इस दौर में यह होना स्वाभाविक है ..
    आज सभी महानगरों में वातानुकूलित कक्षाओं में तकनिकी पाठ्यक्रम पर ध्यान दिया जा रहा है ..विदार्थियों के नैतिक और चरित्र निर्माण की चिंता किसी को नहीं न स्कूलों को न् ही माता-पिता को , वे सभी चाहते हैं उनके बच्चों को इच्छी नौकरी मिले . कोचिंग केन्द्रों का विज्ञापन अख़बारों में भरे रहते हैं ….यह दौर अंकों का दौर है

  18. Prempal Sharma says:

    बढि़या।
    आभार।
    प्रेमपाल शर्मा

  19. आज सभी का सारा जोर परीक्षा पास करने या परीक्षा में अधिकाधिक अंक प्राप्त करने में है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे शिक्षा परीक्षा के लिये है न कि जीवन के लिये।
    एक महत्‍वपूर्ण विषय पर महत्‍वपूर्ण आलेख .. आज शिक्षा व्‍यवस्‍था में बहुत बडे बदलाव की जरूरत है !!

  20. पुनेठा जी सबसे पहले तो आपको इस महत्वपूर्ण आलेख के लिए बधाई, आपका आलेख वर्तमान शि‍क्षा एवं परीक्षा प्रणाली पर समग्र दृष्टि है…मैं भी एक मॉडल स्कूल का प्राचार्य हूं एवं लगातार शि‍क्षा संबंधी विभिन्न योजनाओं के निर्माण एवं कार्यान्वयन में सहभागी रहा हूं। शि‍क्षा के व्यावसायिकरण का यह परिणाम है कि अब बाजार में 30 लाख से 50 लाख के बीच एम.बी.बी.एस. में प्रवेश ले डिग्री हांसिल कर सकते है, 5 से 10 लाख में इंजीनियर तैयार किये जा रहे हैं….मेधावी विद्यार्थियों के लिए व्यावसायिक शि‍क्षा दूर की कौड़ी बन गई है…आप की अंटी में पैसा है तो बन जाओ डाक्टर या इंजीनियर यो एम.बी.ए. अब क्या-क्या लिखा जाये पूरी शि‍क्षा व्यवस्था बाजारीकरण की शि‍कार हो गई है….

  21. rajiv says:

    aklan ya mulyankal shiksha shikhan ka ek hisa hai, masla yehan mulyankan ya aklan ke swaroop aur isse sanchaleet karnain vali manyataon ka hai. parstut lekh main isse acche se rekhankeet kiya gaya hai. shiksha aur rojgar ke beech sambandh koi naee bat nahin hai, yeh tou ek swabhaveek parkirya hai parntu swal yeh hai kee kya hamaree shiksha hamen rojgar/vayavsay ke liye tayar kar pa rahi hai, yadi nahin tou vo kon se karak hain jo vartman parsthtiyon ke liye jimaenadr hain. mujhe lagta hai kee shiksha aur vishesh tour par schooli shiksha ko lekar aam jan manas main samvad avam veechar parkirya jis gati se aage badhni chaiye vo abhi kamjor hai. vastav main log us bat main vishwas karte hain jis kee saweekaryata ve smaj main patte hain. abb agar bajjar nakaratmak roop se parbhavi hai tou phir aisee thos suveecharit phal karna jaroori hai jo iss nakartmak tatw ko kamjor kare. jaroori hai sheekhanain sheelhanain kee parkiryaon main badlav karnain kee mujeh nahin lagta kee mulyankan parkiryaon main ittna maada hai kee vo shikshan parkiryaon ko sanchaleet karnain lage. vastav main masla perspective ka hai……. samvad jari

  22. K. Ravindra says:

    महत्वपूर्ण लेख

  23. खुले बाजार की अर्थव्यवस्था में शिक्षा-व्यवस्था और उस पर पड़ने वाले गहरे प्रभावों की जांच करता एक महत्वपूर्ण आलेख ….

  24. Vijay Jayara says:

    bahut sundar lekh vaastv me shiksha bahu aayami honi chahiye keval rojgarmukhi nhi vyvhaarik gyan bhi samahit hona chahiye….tabhi samaj me jeevaan mulya sthapit ho payenge…….tnx

  25. anil rawat says:

    आज के हिसाब से आपने बिलकुल सही स्थिति पर सही लेख लिखा है

    इसके लिए आपको बधाई

  26. sunil srivastava says:

    धन्यवाद पुनेठा जी, शिक्षा व्यवस्था पर यह एक जरूरी लेख है.

  27. आशुतोष उपाध्याय says:

    पुनेठा जी का लेख एक बेहतरीन और ईमानदार शिक्षक की चिंताओं को ज़रूर प्रकट करता है लेकिन एक गहरे अंतर्विरोध से भी घिरा है. आप लिखते हैं कि शिक्षा को जीवनोन्मुखी होना चाहिए. क्या ऐसा नहीं है? आज हमारा समाज ऐतिहासिक कारणों से चरम बाजारोन्मुखी हो चुका है. जन्म से हम भारतवासी भले कि इस धर्म या उस धर्म के अवलंबी हों, मगर व्यावहारिक तौर पर उपभोक्तावाद ही हमारा धर्म है और हम बाज़ार और मुनाफे को ध्यान में रख कर अपनी तमाम योजनायें बनाते हैं. बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और शादी-व्याह में भी इस नए धर्म की रीतियों का अनुसरण करते हैं. यानी हमारा जीवन पूरी तरह बाजारोन्मुखी है. तो फिर शिक्षा को बाजारोन्मुखी क्यों नहीं होना चाहिए? दरअसल समाज व्यवस्था शिक्षा की भूमिका को निर्धारित करती है और औपचारिक शिक्षा के माध्यम से भावी नागरिकों के सोच का रेजीमेंटेशन करती है. अगर आप सतर्क न हों तो यह सृजनात्मकता की हत्या करती है और बच्चों को बंधे-बंधाये दृष्टिकोण और भूमिकाओं की ओर धकेलती है.
    इसलिए शिक्षा के बदलाव का प्रश्न सच पूछो तो समाज के बदलाव से जुड़ा है. जैसा समाज वैसी शिक्षा. पुनेठा जी ने जिस आदर्श शिक्षा की बात की है, वैसी शिक्षा पाने वाले बच्चे मौजूदा समाज में क्या करेंगे? उनके लिए जीना दूभर हो जाएगा या फिर वे अपने माता-पिता से लेकर इस व्यवस्था के मालिकों तक का जीना दूभर कर देंगे. तो आप आज की परिस्थितियों में ऐसी शिक्षा की उम्मीद क्यों करते हैं!

  28. durgesh says:

    बिल्कुल सही मौलीक पढाई का का काल शायद अब खत्म होकर पूंजीवादी पढाई पर आ खडा हुआ है जिसका उद्देश्य सटीक अधीगम न करवाकर पैसा कमाने की लोलुपता पर टीक गया है…

  29. D.P.MISHRA says:

    very good artical.

  30. Dear Punethaa jii,
    Sadar Vandan.
    aapkaa aalekh zabardast hai.badhaaii.
    Basicly I am a teacher &facing all those situations which u have explained in your article.
    Again cong..
    Yours
    Dr.G.P.Sharma’Gunshekhar’

  31. Dear brother,
    Sadar vandan.
    Aapkaa lekh bahut sundar hai.shikshaa kii durdashaa kaa dastaaveziikaran hai.badhaaii..
    Urs
    Dr.G.P.Sharma’Gunshekhar

  32. Ramesh Joshi says:

    लेखक का एक कुशल एवं विद्वान शिक्षक होने का परिचय इस आलेख से मिलता है. शिक्षा के द्वारा ही किसी समाज का अपेक्षित स्वरुप निर्धारित किया जा सकता है. शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त खामियों को लेखक द्वारा बखूबी रेखांकित किया गया है. यह तो सास्वत सत्य है की प्रचलित व्यवस्था के खिलाफ वैसे भी आवाजें उठती रहती हैं, कहने का आशय यह है की वर्त्तमान से व्यक्ति संतुष्ट नहीं होता है. शिक्षा में परीक्षा किस कदर हावी है इसे पुनेठा जी ने बहुत स्पष्ट किया है. साथ ही उन्होंने परीक्षा की अनिवार्यता को भी स्वीकारा है. इस परिस्थिति में ही शायद परीक्षा को इतना महत्त्व दिया गया है. फ़िलहाल आज की तिथि तक तो इसका कोई विकल्प भी नजर नहीं आता है. परीक्षा तो परीक्षा ही है चाहे उसमें अंक दें या ग्रेड. ग्रेड प्रणाली से परीक्षा की भयावहता में कोई खास कमी नहीं आने वाली है. रही बात शिक्षा को जीवनोंमुखी बनाने की तो यह आवश्यक भी है.
    शिक्षा की अनिवार्यता इसलिए नहीं है की उससे कोई अच्छा रोजगार प्राप्त होगा या फिर कोई बड़ा ओहदा मिलेगा बल्कि शिक्षा की अनिवार्यता इसलिए है की उससे मानव मूल्यों का विकास किया जा सके और व्यक्ति अपने में निहित शक्तियों को समझते हुए उनका समुचित उपयोग कर सके. वर्तमान बाज़ार व्यस्था के स्वरुप एवं उसका शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव की भी इस आलेख में चर्चा की गयी है.कुल मिलाकर यह आलेख शिक्षा व्यस्था की अनेक खामियों को उजागर करता है.विषय काफी विस्तृत है इस पर तो कई दिनों तक बहस हो सकती है. इस प्रकार के महत्वपूर्ण आलेख के सृजन के लिए पुनेठा जी को बधाई. अन्य सुधी विद्वजनों लेखकों से भी मेरा अनुराध है कि शिक्षा व्यस्था को सुधारने में अपने सशक्त लेखनी को चलाते रहें.

  33. kiran bala says:

    absolutely true….being a teacher I can easily say that the definition of education” Education is the all round development of a child’s personality” is no longer of any importance…in private schools it is polished as a product to be sold …and in govt schools it is mostly undeveloped…need is to give more imp to the child and its potential…if it is developed properly…he or she can carve his or her own destiny…

  34. श्याम गोपाल गुप्त says:

    प्रासंगिक लेख

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