वो दीवाना जिसको ज़माना जालिब-जालिब कहता था : मृत्‍युंजय

पाकिस्‍तान के अवाम के शायर हबीब जालिब पर युवा कवि मृत्‍युंजय का आलेख और उनकी कुछ रचनाएं-

“वली दकनी से लगाय आज तलक, सुनने वालों की इतनी बड़ी ज़मात का शायर पैदा नहीं हुआ। वे हकीकतन अवाम के शायर  हैं।”- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
एजाज़ अहमद साहब ने पाकिस्तान के उपरले तबकों के बीच चल रहे सियासी दाव-पेंचों को बखूबी दिखाने के नाते सलमान रश्दी के बहुचर्चित उपन्यास ‘शरम’ की तारीफ़ की है। बात तो सच है, पर मुझे तो इस उपन्यास को पढ़ने के दौरान पाकिस्तान की आम-अवाम का ख्याल आया, जिनकी ज़म्हूरियत की ख्वाहिश पर अयूब,  भुट्टो और जिया से लेकर आज तक के हुक्मरां कहर की तरह नाजिल हैं। उपन्यास में आम-अवाम हाशिये पर भी नहीं है और मैं इसकी मांग करने की बेवकूफी भी नहीं करूंगा। पर यह सवाल तो मौजूं है ही क़ि पाकिस्तानी आम-अवाम की जुबान आखिर है कहाँ? साहित्य जगत में उसकी तरफ से कौन बोलता है? हुक्मरानों के सियासी सवालों के जवाब कौन देता है? बिलाशक हबीब जालिब।
हबीब जालिब मैट्रिक में थे जब देश तक्सीम हुआ। वालिद सूफी इनायतुल्लाह खुद पंजाबी के शायर थे। तक्सीम में जालिब वालिदैन के साथ पाकिस्तान आये। यहाँ जालिब ने कुछ वक्त ‘डेली इमरोज़द’ में प्रूफ रीडरी की और फिर कविता के पूरावक्ती कार्यकर्ता बन गए। मार्क्सवादी-लेनिनवादी जालिब पहले पाकिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे, पार्टी पर प्रतिबन्ध लगा और उसने नेशनल अवामी पार्टी के नाम से काम करना शुरू किया। जालिब अपनी पूरी शिद्दत से इस आन्दोलन में शरीक हो गए। उन्होंने अपना मोर्चा चुन लिया था- कविता का मोर्चा। 1956 में उनका पहला दीवान साया हुआ- ‘बुर्ज ए आवारा’। बाद के तीन संग्रहों अलग-अलग निजामों के दौर में ज़ब्त हुए- ‘ज़िक्र बहते खून का’, ‘गुम्बद ए बेदर’, और ‘सर ए मक्तल’। पाकिस्तान जैसे तानाशाहियों के मारे  अभागे मुल्क में अगर आप प्रतिरोध का परचम उठाते हैं तो जेल जाने से आपको खुदा भी नहीं बचा सकता। इसी मोर्चे पर लड़ते- भिड़ते जालिब बार-बार जेल गए, लगभग सभी हुक्मरानों ने उन्हें इस सम्मान से नवाज़ा। ज़रा उनकी  गिरफ्तारियों के सालों पर नज़र डालिए- 1954, 1964 , 1966, 1973, 1976, 1984  और 1985। सुनते हैं क़ि जालिब साहब के बदन पर पाकिस्तानी निज़ाम की लाठियों के नीलगूं नक्श हमेशा ही दर्ज रहा करते थे। उनकी बिटिया के एक इंटरव्यू से शब्द उधार लें तो ‘अब्बा तकरीबन तीस साल जेल में रहे। आधी उमर जेल में और आधी अस्पताल में।’ यों हेमिंग्वे के कालजयी उपन्यास ‘ओल्ड मैं एंड द सी’ की इस बात को जालिब ने मजबूती से दर्ज किया कि आदमी को मारा जा सकता है, पर उसे हराया नहीं जा सकता।
हुक्मरान चाहे जिस रंग के रहे हों,  हुक्मरानों के बरक्स प्रतिरोध की आवाज़ बुलंद की हबीब जालिब ने। पाकिस्तान में ज़नरल अयूब खान ने जब नया फौजी संविधान बनाया, तो हबीब जालिब ने लिखा- दीप जिसका महल्लात ही में जले/ चंद लोगों की खुशियों को लेकर चले/ वो जो साए में हर मसलहत के पले/ ऐसे दस्तूर को, सुबहे बेनूर को/ मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता।यह नज़्म पाकिस्तान में ज़म्हूरियत का अकीदा है। जन विरोधी कानूनों, जिनसे की आज हिन्दुस्तान-पाकिस्तान और बांग्लादेश, तीनों मुल्कों की अवाम जूझ रही है, के खिलाफ यह नज़्म आज भी उतनी ही मौजूं है। तीनों मुल्कों की सरकारें संविधान को आम-अवाम के खिलाफ खड़ा करने के लिए दृढ-संकल्प रहती हैं। जालिब लोकतंत्र  के सवाल को बहुत ही जमीनी सच्चाइयों से जोड़ देते हैं और तीसरी दुनिया की अवाम की आवाज़ से आवाज़ मिलाते हुए हुक्मरानों और अवाम की दो दुनियायों में से अपना पक्ष चुनते हैं।
हबीब जालिब के शब्दकोश से शक और वहम तब गायब हो जाता है जब वे सियासतदारों से बात करते हैं। गहरे आत्मविश्वास के रथ पर सवार बेख़ौफ़ गूंजती हुई आवाज। इस रथ में ईमान के पहिये हैं, सत्य की पताका है, आन्दोलनों के घोड़े हैं, विचारधारा का चाबुक है, अभय सारथी है और गद्दीनशीनों की हकीकत समझने की कूबत का वेग। ज़रा इस आवाज में यह बेख़ौफ़ टिप्पणी सुनिए- अगर मैं फिरंगी का दरबान होता/ तो जीना किस कदर आसान होता/ मेरे बच्चे भी अमरीका में पढ़ते/ हर गर्मीं में इंगलिश्तान होता/ मेरे बच्चे भी अमरीका में पढ़ते/ हर गर्मीं में मैं इंगलिस्तान होता/ मेरी इंग्लिश भी बला की चुस्त होती/ बला से जो न मैं उर्दूदान होता/ सर झुका के जो हो जाता सर मैं/तो लीडर भी अजीमुस्सान होता/ज़मीनें मेरी हर सूबे में होतीं/मैं वल्लाह सदरे पाकिस्तान होता।लेकिन अवाम से बातचीत करते हुए उनकी आवाज करुणा से भर जाती है और तीखी शैली समझाने-बुझाने में बदल जाती है- छलनी हैं कलियों के सीने खून में लतपत पात/ और न जाने कब तक होगी अश्कों की बरसात/ दुनियावालों कब बीतेंगे दुख के ये दिन रात/ख़ून से होली खेल रहे हैं धरती के बलवान/बगिया लहू लुहान,जैसी नज्मों से गुजरते हुए अपनी पैदाइश से ही कत्लो-गारत झेलते मुल्क की पुरनम आँखें हमारे जिगर में पैवस्त हो जाती हैं।
तक्सीम ने जालिब के मन में गहरे घाव किये थे। फ़ैज़ की ही तरह उनकी शायरी में भी तक्सीम बेहद दुखभरी याद है। न सिर्फ हिन्दुस्तान-पाकिस्तान, बल्कि पाकिस्तान-बांग्लादेश का बंटवारा भी पाकिस्तानी अवाम की किस्मत में बदा था। अपनी ‘जाग मेरे पंजाब’ वाली नज़्म में जालिब बंटवारे के अगले चरणों को रोकने के लिए पंजाब की अवाम को आवाज़ देते हुए बताते है कि हुक्मरानों के ‘इसी चलन से हमसे अलग बंगाल हुआ’। आगे एक शेर में कश्मीर के बारे में वे लिखते हैं-ये जमीं तो हसीन है बेहद/ हुक्मरानों की नीयतें हैं बद हबीब जालिब एक मुश्तरका तहजीब का नाम है। प्रतिरोध की तहजीब। पाकिस्तान के इतिहास में सियासी विपक्ष बार-बार न सिर्फ कमजोर पड़ा बल्कि कई बार तो सिरे से उखाड़ फेंका गया। ऐसे में जालिब की शायरी सियासी विपक्ष की जगह ले लेती  है। यह अनायास नहीं कि लगभग हर दौर के निजामों ने, चाहे वे तानाशाह हों  या भुट्टो जैसे तथाकथित जम्हूरियतपसंद, उनकी मुठभेड़ जालिब की शायरी से हुई। नतीजे में जालिब जेल जाते रहे। और उन्हीं के शब्दों में ‘आमिरों के जो गीत गाते रहे/वही इनामो-दाद पाते रहे’।
तंज़, जालिब की शायरी की खूबसूरती है। पर इस व्यंग्य में हंसी से बेहद  कम है। यह आंसुओं से लथपथ व्यंग्य है। जनता में शामिल जालिब बार-बार उसकी  हकीकतों और सपनों के बीच की आसमान जैसी खाई के अंतर को बुझी-बुझी आँखों से देखते हैं। जनता, जिसे सदियों से अपने लिए ज़म्हूरियत की तलाश है, जो चंद ताकतवर लोगों की कठपुतली की तरह इस्तेमाल की जाती रही है। दूसरी तरफ पाकिस्तानी शासक है, लाशों और खून के अम्बार पर मुस्कुराते हुक्मरां हो गए कमीने लोग।  अपनी प्यारी मातृभूमि और अवाम के हालात एक कवि के लिए भयानक हैं। वह क्या करे? फ़ैज़ साहब ने एक रास्ता लिया, करुणा का और उसमें से उभरते प्रतिरोध का। जालिब ने अपने लिए करुणा से उबरते व्यंग्य का रास्ता चुना। यह व्यंग्य कोई शैली भर नहीं है। गहरी राजनीतिक समझ की सान पर पैनी हो जनता की यह आवाज ‘स्रवन द्वार ह्वै संचरै, बेधै सकल शरीर’ की तासीर पैदा करती है। पाकिस्तानी हुकूमतों के खौफ़ का तसव्वुर किये बगैर इस व्यंग्य की गहराई समझनी मुश्किल है। और तब तानाशाही की लम्बे चलन वाले मुल्क में जालिब सड़कों पर अपने हज़ारों समर्थकों के साथ चीख पड़ते हैं- बिरसे में हमें जो ग़म है मिला, उस ग़म को नया क्या लिखना
जालिब की आवाज में एक ख़ास जादू है। गहरी बेचैनी से भरी मीठी आवाज में उनकी शायरी अपने हर सुनने वाले से सीधे संवाद करती है, उनके दिल में उतरती चली जाती है। इसलिए भी जालिब जैसे शायरों पर लिखना बेहद मुश्किल काम है  क्योंकि उनकी शायरी और अवाम के बीच फासला लगभग न के बराबर है। शुरुआत से ही  कविता मूलतः सुनने की विधा रही आयी है। सीधे अपनी अवाम से बात करने के लिए, उससे मुखातिब शायर को इस फ़न की जरूरत है। जालिब ने कविता के इस मूल  गुण को पकड़ा और अवाम से सीधे संबोधित हुए।  फ़ैज़ साहब चाहे अपने कलाम बहुत अच्छी तरह न पढ़ते रहे हों,  इससे कौन इनकार करेगा क़ि  हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के तमाम फनकारों ने उनके कलाम को लोगों को सुनाया और समझ बढ़ाई।
जालिब ने कभी-कभार फिल्मों के लिए भी गीत लिखे पर उन गीतों में भी जालिब की ख़ास बेचैनी की मुहर लगी होती। इस सिलसिले में ‘ज़रक़ा’ फिल्म का एक गीत मौजूं  है, मेहदी हसन साहब ने इसे आवाज़ दी है- तू कि नावाकिफे-आदाबे-गुलामी है अभी/रक्स जंजीर पहन कर भी किया जाता है। प्रसंग यह कि नीलू नाम की अभिनेत्री को पश्चिमी पाकिस्तान के गवर्नर, कालाबाघ के नवाब अमीर मोहम्मद खान ने अपने विदेशी मेहमानों के सामने रक्स करने के लिए बुलवाया। नीलू ने आने से मना किया तो पुलिस पहुँची। नीलू के सामने मुश्किलें बढ़ती गयीं और इस सबके नतीजतन आखिरकार उस खुद्दार महिला ने  खुदकुशी की कोशिश की। इसी घटना पर यह नज़्म जालिब ने लिखी थी।
हबीब जालिब का कहा हुआ पहला शेर गौर फरमाएं- ‘वादा किया था आयेंगें इन शब जरूर वो/वादाशिकन को देखते वक्ते सहर हुआ’। यह उर्दू शायरी की खासियत है क़ि वह इंसानी जज्बातों और रिश्तों के नाज़ुक पेंचो-ख़म के मुहाविरे को इतना फैला देती है क़ि बड़ी-बड़ी घटनाएं और कौमी तजुर्बे शायरी में घुल-मिल जाते हैं। शायरी की यह रवायत उर्दू शायरी की जान है। ग़ालिब के एक शेर के मार्फ़त बात थोड़ी और साफ़ करने की कोशिश करता हूं। ग़ालिब, दो दुनियाओं के बीच खड़े थे. संक्रमण का दौर. अंग्रेज आ रहे थे और देशी निज़ाम ढह रहा था. ग़ालिब की तरफदारी कोई साफ़ न थी। ऐसे में शेर में  बंधीं इस उपमा को देखिये- ‘चलता हूं थोड़ी दूर हर एक तेज रौ के साथ/ पहचानता नहीं हूं अभी राहबर को मैं’। फ़ैज़ हों या जालिब, यह अर्थ-संभावनाएं इन सभी कवियों को विरासत में मिलीं। इश्क के कभी पुराने न पड़ने  वाले मुहाविरे में लिखे गए जालिब के ऊपर के शेर के वादा शब्द को ज़रा उनकी काफी बाद की  ग़ज़ल के एक शेर के ‘वादे’ के संग मिलाकर पढ़िए- या वादा था हाकिम का/या अखबारी कालम था। यहां ‘वादा’ शब्द की अर्थ छवियाँ माशूक के वादे की याद दिलाती तो हैं, पर उसका बहुत बेहतरीन रूपांतर अपने ही मुल्क की सियासत की वादाफरोशी के लिए कर लिया गया है। अर्थ के रूपांतरण की इस गली में बात थोड़ी और आगे तक जाती है क़ि माशूक जालिम होता आया है। सियासतदान भी जालिम  हैं। पर ‘वादे’ के माशूक वाले अर्थ में माशूक से इश्क ही असली बात है। जालिब इस अर्थ के एक ही हिस्से को अपनाते हैं क़ि सियासतदान इसी मुल्क के  हैं पर उनसे इश्क की बात को पलट देते हैं। वह ऐसा कैसे कर पाते हैं ? इसके लिए वे तंज़ का सहारा लेते हैं। पूरी ग़ज़ल, जिसका शेर ऊपर दर्ज है, जनरल जिया के समय हुए जनमत-संग्रह का मज़ाक उड़ाते हुई कही गई है- ‘शहर में हू का आलम था, जिन था या रिफरेंडम था’। ज्यों-ज्यों आप ग़ज़ल पढ़ते जाते हैं, तानाशाह पर तंज़ और जनता के प्रति करुणा का एक विस्तार खुलता जाता है। इस संरचना से गुजरते हुए जब  आखिर में वादा’ वाला शेर आता है, तब तक पाठक सत्ता की कारगुजारियों से खूब वाकिफ हो चुका होता है। अब ‘वादा’ को मनचाहे अर्थ में इस्तेमाल किया जा सकता है, और जालिब ने यही किया। इसी तरह ‘धर्म के मुहावरे के साथ काव्यात्मक छेड़छाड़ करने की उर्दू कविता की पुरानी रवायत को वह अपने तईं  बरतते हैं। फ़ैज़ ने  ऐसा अपने चर्चित तराने ‘हम देखेंगें’ में बेहद खूबसूरती से किया। ज़रा जालिब का प्रयोग देखिये- ‘एक नजर अपनी ज़िंदगी पर डाल/एक नजर अपने अर्दली पर डाल, फासला खुद ही कर ज़रा महसूस/यूं न इस्लाम का निकाल जुलूस!’ एक तानाशाह को दी गई इस सीख में एक टुकड़े को गौर से  देखिये। ‘इस्लाम का जुलूस’, जुलूस माने चौकी। हास्यास्पद बना देना। बराबरी के बुनियादी इस्लामी उसूल को जालिब अपनी शायरी के चुनते हैं और उसे हुक्मरानों के खिलाफ खड़ा कर देते हैं। याहिया खान के लिए कहा गया एक और शेर यों रहा- ‘जो शख्स तुम से पहले यहाँ तख़्तनशीं था/उसको भी खुदा होने पर, इतना ही यकीं था। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं क़ि जालिब उर्दू शायरी की धर्म संबंधी तीखी आलोचनाओं के वारिस नहीं हैं। वह धर्म के आधुनिक रूप को देख रहे थे। हिन्दुस्तान की ही तरह पाकिस्तान में भी धर्म को राजनीति के औज़ार की तरह  इस्तेमाल किया जाता रहा है। एक ज़माना पाकिस्तान में ऐसा भी गुजरा जब पार्टियों को इस्लामी और गैर-इस्लामी में बांटा जा रहा था। जालिब ने अपनी शैली में ग़ज़ल कही- ‘खतरे में इस्लाम नहीं। और अब जालिब की शायरी में दर्ज अआधुनिक मौलाना के भी ज़रा दर्शन करते चलें- ‘नहीं मैं बोल सकता झूठ इस दर्जा ढिठाई से, यही है जुर्म मेरा और यही तक़सीर मौलाना/ हक़ीक़त क्या है ये तो आप जानें और खुदा जाने, सुना है जिम्मी कार्टर आपका है पीर मौलाना
12 मई, 1993 को अवाम के इस शायर का इंतकाल हुआ। सरकारों ने चैन की सांस ली और मरने के बाद 1996 में निशान ‘ए इम्तिआज़’ और 2009 में निशान ‘ए हिलाल पुरस्कार’ देकर जालिब की कविता को दूर अतीत में फेंकने की कोशिश की। नवाज़ शरीफ ने जालिब की शायरी की कीमत 25 लाख रूपये लगाई, पर उनकी खुद्दार बेगम साहिबा को जालिब के उसूल प्यारे थे। उन्होंने यह खैरात लेने से मना कर दिया। जालिब की कवितायें हमेशा पाकिस्तानी ही नहीं,  हुक्मरानों की किसी भी जाति को चुभती रहेंगी। जालिब को पचा पाना असंभव है। जब भी पाकिस्तान की आम अवाम अमन और जम्हूरियत के लिए अपने शासकों के खिलाफ बगावत का परचम उठायेगी, जालिब की कवितायें उसकी संगी होंगी। यह उसकी कविता की ताकत थी क़ि उसके कवि मित्रों ने मुल्क के इस हिरावल शायर को इस तरह याद किया-
अपने सारे दर्द भुलाकर औरों के दुःख सहता था
हम जब गज़लें कहते थे वो अक्सर जेल में रहता था
आखिरकार चला ही गया वो रूठ के हम फरजानों से
वो दीवाना जिसको ज़माना जालिब जालिब कहता था
-कतील शिफाई

हबीब जालिब की कुछ रचनाएं-

दस्तूर1

दीप जिसका महल्लात2 ही में जले
चंद लोगों की खुशियों को लेकर चले
वो जो साये में हर मसलहत के पले

ऐसे दस्तूर को सुब्हे बेनूर को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता
मैं भी ख़ायफ़ नहीं तख्त-ए-दार3 से
मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़ियार से
क्यूँ डराते हो जिन्दाँ4 की दीवार से

ज़ुल्म की बात को, जेहल की रात को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता
फूल शाख़ों पे खिलने लगे, तुम कहो
जाम रिंदों को मिलने लगे, तुम कहो
चाक सीनों के सिलने लगे, तुम कहो

इस खुले झूठ को जेहन की लूट को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता
तूमने लूटा है सदियों हमारा सुकूँ
अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फुसूँ
चारागर दर्दमंदों के बनते हो क्‍यों
तुम नहीं चारागर, कोई माने मगर
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता
1. संविधान, 2.  महलों, 3. फांसी का तख्ता, 4. जेल

मुशीर1

मैंने उससे ये कहा
ये जो दस करोड़ हैं
जेहल का निचोड़ हैं

इनकी फ़िक्र सो गई
हर उम्मीद की किरन
ज़ुल्मतों2 में खो गई

ये खबर दुरुस्त है
इनकी मौत हो गई
बेशऊर लोग हैं
ज़िन्दगी का रोग हैं
और तेरे पास है
इनके दर्द की दवा

मैंने उससे ये कहा
तू ख़ुदा का नूर है
अक्ल है शऊर है
क़ौम तेरे साथ है
तेरे ही वज़ूद से
मुल्क की नजात है
तू है मेहरे सुबहे नौ3
तेरे बाद रात है
बोलते जो चंद हैं
सब ये सरपसंद4 हैं
इनकी खींच ले ज़बां
इनका घोंट दे गला

मैंने उससे ये कहा
जिनको था ज़बां पे नाज़
चुप हैं वो ज़बां दराज़
चैन है समाज में
वे मिसाल फ़र्क है
कल में और आज में
अपने खर्च पर हैं क़ैद
लोग तेरे राज में
आदमी है वो बड़ा
दर पे जो रहे पड़ा
जो पनाह मांग ले
उसकी बख़्श दे ख़ता

मैंने उससे ये कहा
चीन अपना यार है
उस पे जाँ निसार है
पर वहाँ है जो निज़ाम
उस तरफ़ न जाइयो
उसको दूर से सलाम
दस करोड़ ये गधे5
जिनका नाम है अवाम
क्या बनेंगे हुक्मराँ
तू यक़ीं ये गुमाँ
अपनी तो दुआ है ये
सदर तू रहे सदा

मैंने उससे ये कहा
1.  सलाहकार, 2.  अंधेरा, 3.  नई सुबह का सूरज, 4.  शरारती तत्व,  5. जब यह नज़्म लिखी गई उस वक्त पाकिस्तान की आबादी दस करोड़ थी।

भए कबीर उदास

इक पटरी पर सर्दी में अपनी तक़दीर को रोए
दूजा जुल्फ़ों की छाओं में सुख की सेज पे सोए
राज सिंहासन पर इक बैठा और इक उसका दास
भए कबीर उदास

ऊँचे ऊँचे ऐवानों में मूरख हुकम चलाएं
क़दम क़दम पर इस नगरी में पंडित धक्के खाएं
धरती पर भगवान बने हैं धन है जिनके पास
भए कबीर उदास

गीत लिखाएं पैसे ना दे फिल्म नगर के लोग
उनके घर बाजे शहनाई लेखक के घर सोग
गायक सुर में क्योंकर गाए क्यों ना काटे घास
भए कबीर उदास

कल तक जो था हाल हमारा हाल वही हैं आज
‘जालिब’ अपने देस में सुख का काल वही है आज
फिर भी मोची गेट पे लीडर रोज़ करे बकवास
भए कबीर उदास

ख़तरे में इस्लाम नहीं

ख़तरा है जरदारों को
गिरती हुई दीवारों को
सदियों के बीमारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

सारी जमीं को घेरे हुए हैं आख़िर चंद घराने क्यों
नाम नबी का लेने वाले उल्फ़त से बेगाने क्यों

ख़तरा है खूंखारों को
रंग बिरंगी कारों को
अमरीका के प्यारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

आज हमारे नारों से लज़ी है बया ऐवानों में
बिक न सकेंगे हसरतों अमों ऊँची सजी दुकानों में

ख़तरा है बटमारों को
मग़रिब के बाज़ारों को
चोरों को मक्कारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

अम्न का परचम लेकर उठो हर इंसाँ से प्यार करो
अपना तो मंशूर1 है ‘जालिब’ सारे जहाँ से प्यार करो

ख़तरा है दरबारों को
शाहों के ग़मख़ारों को
नव्वाबों ग़द्दारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं
1. घोषणा पत्र

मौलाना

बहुत मैंने सुनी है आपकी तक़रीर मौलाना
मगर बदली नहीं अब तक मेरी तक़दीर मौलाना

खुदारा सब्र की तलकीन1 अपने पास ही रखें
ये लगती है मेरे सीने पे बन कर तीर मौलाना

नहीं मैं बोल सकता झूठ इस दर्जा ढिठाई से
यही है जुर्म मेरा और यही तक़सीर2 मौलाना

हक़ीक़त क्या है ये तो आप जानें और खुदा जाने
सुना है जिम्मी कार्टर आपका है पीर मौलाना

ज़मीनें हो वडेरों की, मशीनें हों लुटेरों की
खुदा ने लिख के दी है आपको तहरीर मौलाना

करोड़ों क्यों नहीं मिलकर फ़िलिस्तीं के लिए लड़ते
दुआ ही से फ़क़त कटती नहीं जंजीर मौलाना
1.   उपदेश, 2. पाप

बगिया लहू लुहान

हरियाली को आंखे तरसें बगिया लहू लुहान
प्यार के गीत सुनाऊँ किसको शहर हुए वीरान
बगिया लहू लुहान

डसती हैं सूरज की किरनें चांद जलाए जान
पग पग मौन के गहरे साये जीवन मौत समान
चारों ओर हवा फिरती है लेकर तीर कमान
बगिया लहू लुहान

छलनी हैं कलियों के सीने खून में लतपत पात
और न जाने कब तक होगी अश्कों की बरसात
दुनियावालों कब बीतेंगे दुख के ये दिन रात
ख़ून से होली खेल रहे हैं धरती के बलवान
बगिया लहू लुहान

बीस घराने

बीस घराने हैं आबाद
और करोड़ों हैं नाशाद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद

आज भी हम पर जारी है
काली सदियों की बेदाद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद

बीस रूपय्या मन आटा
इस पर भी है सन्नाटा
गौहर, सहगल, आदमजी
बने हैं बिरला और टाटा
मुल्क के दुश्मन कहलाते हैं
जब हम करते हैं फ़रियाद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद

लाइसेंसों का मौसम है
कंवेंशन को क्या ग़म है
आज हुकूमत के दर पर
हर शाही का सर ख़म है
दर्से ख़ुदी देने वालों को
भूल गई इक़बाल की याद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद

आज हुई गुंडागर्दी
चुप हैं सिपाही बावर्दी
शम्मे नवाये अहले सुख़न
काले बाग़ ने गुल कर दी
अहले क़फ़स की कैद बढ़ाकर
कम कर ली अपनी मीयाद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद

ये मुश्ताके इसतम्बूल
क्या खोलूं मैं इनका पोल
बजता रहेगा महलों में
कब तक ये बेहंगम ढोल
सारे अरब नाराज़ हुए हैं
सीटो और सेंटों हैं शाद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद
गली गली में जंग हुई
ख़िल्क़त देख के दंग हुई
अहले नज़र की हर बस्ती
जेहल के हाथों तंग हुई
वो दस्तूर1 हमें बख़्शा है
नफ़रत है जिसकी बुनियाद
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद
1. संविधान

हबीब जालिब की आवाज में कुछ नज्‍म सुनने के लिए क्लिक करें-

http://video.google.com/videoplay?docid=-7992173788748993874#

11 comments on “वो दीवाना जिसको ज़माना जालिब-जालिब कहता था : मृत्‍युंजय

  1. बहुत खूब…. लाजवाब…

  2. sandeep rauzi says:

    bahut shandar

  3. अवैद्यनाथ दुबे says:

    दिल बाग-बाग हो गया

  4. खूब जम के लिखा है। हबीब साहब की रचनाओं को लाल बैण्ड के साथियों ने भी गाया है।

  5. g n singh says:

    hakikat hai

  6. sumit says:

    bahut hi acchi hai

  7. sumit says:

    वो दस्तूर1 हमें बख़्शा है
    नफ़रत है जिसकी बुनियाद

    ye line mujhe bahut acchi lagi

  8. hamaare mahboob shaayae par itanaa umdaa likhane ke liyee aabhaar. urdu shaayaree par is tarah doob kar thahar kar likhaa kam milataa hai . is ko aur aage badhaao pyaare.

  9. rishabh naithani says:

    Habib Jalib ke bare mein padhar kar acha laga.

  10. राजीव says:

    हबीब जालिब को पहली बार प्रणय दा से सुना और फिर संगठन के कुछ लोगों से….फिर उनको सुनने का ऐसा शौक चर्राया कि कुछ दिनों तक सिर्फ जालिबमय माहौल ही बना रहा. अब भी जालिब को सुनते हुए जो सुकून मिलता है उसको बताया नहीं जा सकता पर आपके इस जबर्दस्त आलेख ने जालिब के बारे में ‘और जानने’ के प्यास को बहुत सुकुन पहुँचाया है.
    उम्दा आलेख साथी. बधाई.

  11. Daulat Ram says:

    shukriya bhai

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>