विवेक भटनागर की दो गजलें

युवा लेखक और पत्रकार विवेक भटनागर की दो गजल-

गांव में कठपुतलियों के

क्यों भयानक हैं इरादे उंगलियों के
खलबली है गांव में कठपुतलियों के
 
और रंगों के लिए रंगींतबीयत
गिरगिटों ने पर तराशे तितलियों के
 
देखिये पक्षी तड़ित चालक हुए तो
हल नहीं होंगे मसाइल बिजलियों के
 
चांद की आंखों में डोरे सुर्ख तो थे
कम न थे तेवर सुहानी बदलियों के
 
आज गांवों ने किए सौदे शहर से
नथनियों के, पायलों के, हंसलियों के
 

बेहतर होगा जुबां फेंक दो

खिड़की-रोशनदान फेंक दो
ऐसा सब सामान फेंक दो
 
किसी बंद कमरे के अंदर
हवादार दालान फेंक दो
 
अच्छे से जीने की खातिर
बचा-खुचा सम्मान फेंक दो
 
बेहतर होगा जुबां फेंक दो
या फिर अपने कान फेंक दो
 
महरूम सभी चीजों से होकर
खालीपन का भान फेंक दो

34 comments on “विवेक भटनागर की दो गजलें

  1. Sanjay Joshi says:

    वाह क्या बात है- दिल औ दिमाग फेन्क दो.

  2. अवैद्यनाथ दुबे says:

    उम्‍दा गजलें। इससे ज्‍यादा क्‍या कहूं।

  3. sunil kumar says:

    चांद की आंखों में डोरे सुर्ख तो थे
    कम न थे तेवर सुहानी बदलियों के शेर अच्छा लगा बधाई

  4. nidhi singh says:

    बहुत सरल पर उतनी ही गहरी गजल। बहुत उम्दा

  5. उम्दा .. बेहतरीन गजल हैं दोनों…

  6. prabhat says:

    दोनों गज़लें खूब हैं। अच्छे से जीने की खातिर, बचा-खुचा सम्मान बेच दो। और..आज गांवों ने किए सौदे शहर से, नथनियों के, पायलों के, हंसलियों के…ये दोनों गहरी मारक क्षमता वाली हैं। एक पल में ही इंसान को बौना बना देती हैं।

  7. मीत says:

    बहुत खूब ! उम्दा ग़ज़लें !!

  8. sumit says:

    acchi gazal hai dono… inka to audio casstle nikalna chaiye

  9. ashok mishra says:

    बहुत अच्छे, तुम्हारी दोनों गजल अच्छी हैं। बधाई। बस इसी तरह लिखते रहें। मेरी शुभकामनाएं।

  10. क्यों भयानक हैं इरादे उंगलियों के
    खलबली है गांव में कठपुतलियों के

    किसी बंद कमरे के अंदर
    हवादार दालान फेंक दो

    बेहतर होगा जुबां फेंक दो
    या फिर अपने कान फेंक दो

    आसान जुबान मे उम्दा गज़ले !

  11. sandeep rauzi says:

    बस एक शब्द अल्टीमेट…

  12. अनुगता says:

    बेहतरीन। विवेकजी की कुछ और गजलों का इंतजार रहेगा।

  13. swadesh kumar says:

    जुंबा फेंक दो, बहुत ही शानदार गजल लिखी है विवेक जी आपने। कुछ कहने के लिए छोडा ही नहीं। उम्‍मीद करते हैं कि लेखक मंच आपकी और गजलों से हमलोगों को रूबरू कराता रहेगा।

  14. रतन says:

    जो भी कही, खूब कही…। उम्मीद है आगे भी कहते रहेंगे।
    रतन

  15. खिड़की-रोशनदान फेंक दो
    ऐसा सब सामान फेंक दो

    -गजब!! दोनों ही गज़लें-बहुत उम्दा!!

  16. shivakant says:

    विवेक भाई
    kalam ko rukne na do behtareen ghazlen isi tarah fekte raho.
    hardik badhaai.

  17. pratibha says:

    क्यों भयानक हैं इरादे उंगलियों के
    खलबली है गांव में कठपुतलियों के…
    विवेक जी, हमेशा की तरह बहुत शानदार गजलें लिखी हैं आपने. लिखते रहिए बस इतना ही कहना है. हर शेर पर वाह, हर शेर पर आह…क्या कहूं आपकी पुरानी फैन हूं…

  18. ravi buley says:

    बहुत बढ़िया विवेक जी। सरल और सहज होने के बावजूद तीखे तेवर। बधाई। कम शब्दों में बहुत कुछ कहने के लिए।

  19. seema jha says:

    खामोशी से बहुत कुछ कह गए आप। कुछ गंभीर, कुछ गमगीन और…कुछ तीखे तेवर लिपटे हुए ।
    बस यूं ही लिखते रहिए।
    शुभकामनाएं।

  20. विजय झा says:

    पहले आपके व्‍यवहार पर फिदा था,अब लेखनी ने हमें आपका और भी प्रशंसक बना दिया है। मैं तो आपसे यही विनम्र निवेदन करूंगा कि आप अपनी लेखनी को और आगे तक ले जाइए। इस गजल को पढने के बाद मेरे पास शब्‍द नहीं हैं आपके लिए। सिवा प्रशंसा के। वाकई लाजवाब………………….

  21. बेहतर होगा जुबां फेंक दो
    या फिर अपने कान फेंक दो
    बहुत बढ़िया.

  22. mahadev says:

    vivek ji aap ne jo bhi bheka dil tak pahuncha.shabd samnvay behtarin hai.prashansa.

  23. क्यों भयानक हैं इरादे उंगलियों के
    खलबली है गांव में कठपुतलियों के…
    Apki yah gagal wakai laajavaab hai
    meri shubh kamnaye.

  24. Mahendra Awdhesh says:

    Bahut khoobsurat gazalein hain bhai! hum bhee pahunch gaye aapke adde par.

  25. Plato says:

    “बेहतर होगा जुबां फेंक दोया फिर अपने कान फेंक दो
    महरूम सभी चीजों से होकरखालीपन का भान फेंक दो”

    “आज गांवों ने किए सौदे शहर से नथनियों के, पायलों के, हंसलियों के”

    “”बेहतर होगा जुबां फेंक दो या फिर अपने कान फेंक दो”

    जवान फेंकने का विकल्प हो बाकी है ही नहीं। वह तो भारत के इंडिया बनने के बाद गोरों को राजसिंहासन पर स्थापित करते ही काट कर फेंक दी थी। हां, कान में रुई तो बहुत भरी, लेकिन आवाजें फिर भी अंदर आ ही जाती हैं।

  26. shaffkat alam says:

    कई बार ऐसा होता है, अच्छी रचना सुन कर/पढ़ कर आप पर अटैक सा होता है. दिल में उतर जाता है रचना की खूबसूरती का अहसास .शब्द साथ छोड देते हैं .में तो सचमुच अच्छे शेर पर दाद तक देना भूल जाता हूँ. विवक साब जनाब क्या गहरी और मानीखेज गज़लें लिखी हैं

    शफ्फ्कत

  27. pakkikhabar says:

    very nice ……

  28. brajesh says:

    कमाल की गजलें लिखते हैं हम तो काफी पहले से आप के मुरीद हैं। शिकायत यही है कि बहुत कम लिखते हैं। लगातार लिखते रहें। वैसे भी हिंदी गजल को आप जैसों की तलाश है।

  29. arunima soni says:

    GREAT!! VIVEK G..
    AAG HI PADHI…BHUT ACHCHI HAIN..!!

  30. Kamlesh Jha says:

    kafi samvedanseel or uddevelit karne wali hain. please isko jari rakhain.

  31. ajit azad says:

    bahut hi behtarin gazlen hain bhai…waah

  32. gurdarshan singh says:

    naa jindagi se payar hai naa moht se darr lagta hain,ab toh har pal hamehe behimana sa lagta hain.naa gum hamehe dara sakta hain naa khushi humehe behla sakti hain. abh to andhi bhi mere irradoo ko nahi jhukha sakti hain. mera mann karta hain kyu na main pahmana ban jahu apane liye nahi kyu naa dusaroo ke liye kuch kar jahu.par kudha bhi mujhse khafa sa lagta hain tabhi toh woh meri koi baat nahi puri karta hain. hain agar dussaro ke liye kuch mangna gunah toh yeh gunnah mujhe kabul hain mere nehk errado ki pakar abh bhi majboot hain.

  33. Harikrishan says:

    उम्‍दा गजलें। बहुत खूब

  34. sumit says:

    बेहतर होगा जुबां फेंक दो
    या फिर अपने कान फेंक दो

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