विवेक भटनागर की तीन गजलें

एक

यह नहीं देखा कि कंधों पर खड़ा है
लोग यह समझे कि वो सबसे बड़ा है

पुण्य के आकाश की सीमा नहीं है
पाप जल्दी भरने वाला इक घड़ा है

भूख क्यों हर रोज लगती है, न जाने
इस गरीबी का ये मुश्किल आँकड़ा है

देवता को हम भला क्यों पूजते हैं
पूजिए, मजदूर का ये फावड़ा है

साँप मिलते हैं विषैले उस जगह पर
जिस जगह पर भी किसी का धन गड़ा है

यह वही है जो कि कंधों पर खड़ा था
भीड़ के पैरों तले कुचला पड़ा है।

दो

अपना खुद से सामना है
इसलिए मन अनमना है

सब तनावों की यही जड़
खुद का खुद से भागना है

इसको भी तुम जीत मानो
खुद से कैसा हारना है

अपनी नजरों में गिरा जो
उसको फिर क्या मारना है

डूब जाने को सतह तक
लोग कहते साधना है।

तीन

वो आशियानों में घर रखेंगे
कि आसमानों के पर रखेंगे?

तुम्हारे कदमों के नीचे काँटे
तुम्हारे कदमों पे सर रखेंगे

तुम्हारा साया दगा करेगा
जो रास्ते में शजर रखेंगे

कि तुम भी शायद मुकर ही जाओ
हम आँखें अश्कों से तर रखेंगे

इधर है सोफा उधर है टीवी
ईमानदारी किधर रखेंगे?

तुम अपने पैरों को बाँध रक्खो
तुम्हारे आगे सफर रखेंगे

जो खुद ही खबरों की सुर्खियां हैं
वो क्या हमारी खबर रखेंगे।

13 comments on “विवेक भटनागर की तीन गजलें

  1. pooja shrma says:

    teeno gajlen bhut achi he

  2. तुम्हारा साया दगा करेगा
    जो रास्ते में शजर रखेंगे

    कि तुम भी शायद मुकर ही जाओ
    हम आँखें अश्कों से तर रखेंगे…sunder panktiya

  3. देवता को हम भला क्यों पूजते हैं
    पूजिए, मजदूर का ये फावड़ा है

    तुम्हारा साया दगा करेगा
    जो रास्ते में शजर रखेंगे

    अपनी नजरों में गिरा जो
    उसको फिर क्या मारना है

  4. PRAN SHARMA says:

    GAZALEN ACHCHHEE HAIN LEKIN EK GAZAL KE MATLE MEIN KAAFIYA ` SAAMNA `
    AUR ` ANMNA ` KEE PUNRAVRITI KAA DOSH HAI .

  5. amrish kumar trivedi says:

    ye panktiyan dil ko chu gayi

  6. यह नहीं देखा कि कंधों पर खड़ा है
    लोग यह समझे कि वो सबसे बड़ा है——क्या बात है– समझ को आयना दिखा दिया आपने

  7. Kamal Joshi says:

    यह नहीं देखा कि कंधों पर खड़ा है
    लोग यह समझे कि वो सबसे बड़ा है

    यह वही है जो कि कंधों पर खड़ा था
    भीड़ के पैरों तले कुचला पड़ा है।

    behtareen

  8. Krishna Kumar Singh Mantoo says:

    विवेक जी

    गजलें बेहतरीन है, अच्छा लगा।

  9. साँप मिलते हैं विषैले उस जगह पर
    जिस जगह पर भी किसी का धन गड़ा है

    परंपरा से मिले प्रतीकों और रूपकों के ज़रिये अपने समय के यथार्थ को स्वर देने का सार्थक प्रयास है. जारी रखें.

  10. अवैद्यनाथ दुबे says:

    देवता को हम भला क्यों पूजते हैं
    पूजिए, मजदूर का ये फावड़ा है

    बहुत खूबसूरत।

  11. yatharthvadi gazale hai…achchhi lagi par isame kavytatv-kala pakshki sithilata hai,jo hindi gazalme adi hui hai…..baki achhi hai..dhanyavad

  12. sazid ali says:

    Bahut achhi gajal h

  13. sazid ali says:

    दाे शेर मेरे भी-
    न छत थी न साया था
    धूप तेज थी फिर भी वाे
    मजदूर का बच्चा चैन से सोया था

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