विद्रोही की कविताएं

गंभीर निहितार्थों, भव्य आशयों और महान स्वप्नों वाली रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ की कविताएं-

धरम

मेरे गांव में लोहा लगते ही
टनटना उठता है सदियों पुराने पीतल का घंट,
चुप हो जाते हैं जातों के गीत,
खामोश हो जाती हैं आंगन बुहारती चूड़ियां,
अभी नहीं बना होता है धान,  चावल,
हाथों से फिसल जाते हैं मूसल
और बेटे से छिपाया घी,
उधार का गुड़,
मेहमानों का अरवा,
चढ़ जाता है शंकर जी के लिंग पर।
एक शंख बजता है और
औढरदानी का बूढ़ा गण
एक डिबिया सिंदूर में
बना देता है
विधवाओं से लेकर कुंवारियों तक को सुहागन।
नहीं खत्म होता लुटिया भर गंगाजल,
बेबाक हो जाते हैं फटे हुए आंचल,
और कई गांठों में कसी हुई चवन्नियां।
मैं उनकी बात नहीं करता जो
पीपलों पर घड़ियाल बजाते हैं
या बन जाते हैं नींव का पत्थर,
जिनकी हथेलियों पर टिका हुआ है
सदियों से ये लिंग,
ऐसे लिंग थापकों की माएं
खीर खाके बच्चे जनती हैं
और खड़ी कर देती है नरपुंगवों की पूरी ज़मात
मर्यादा पुरुषोत्तमों के वंशज
उजाड़ कर फेंक देते हैं शंबूकों का गांव
और जब नहीं चलता इससे भी काम
तो धर्म के मुताबिक
काट लेते हैं एकलव्यों का अंगूठा
और बना देते हैं उनके ही खिलाफ
तमाम झूठी दस्तखतें।
धर्म आखिर धर्म होता है
जो सूअरों को भगवान बना देता है,
चढ़ा देता है नागों के फन पर
गायों का थन,
धर्म की आज्ञा है कि लोग दबा रखें नाक
और महसूस करें कि भगवान गंदे में भी
गमकता है।
जिसने भी किया है संदेह
लग जाता है उसके पीछे जयंत वाला बाण,
और एक समझौते के तहत
हर अदालत बंद कर लेती है दरवाजा।
अदालतों के फैसले आदमी नहीं
पुरानी पोथियां करती हैं,
जिनमें दर्ज है पहले से ही
लंबे कुर्ते और छोटी-छोटी कमीजों
की दंड व्यवस्था।
तमाम छोटी-छोटी
थैलियों को उलटकर,
मेरे गांव में हर नवरात को
होता है महायज्ञ,
सुलग उठते हैं गोरु के गोबर से
निकाले दानों के साथ
तमाम हाथ,
नीम पर टांग दिया जाता है
लाल हिंडोल।
लेकिन भगवती को तो पसंद होती है
खाली तसलों की खनक,
बुझे हुए चूल्हे में ओढ़कर
फूटा हुआ तवा
मजे से सो रहती है,
खाली पतीलियों में डाल कर पांव
आंगन में सिसकती रहती हैं
टूटी चारपाइयां,
चौरे पे फूल आती हैं
लाल-लाल सोहारियां,
माया की माया,
दिखा देती है भरवाकर
बिना डोर के छलनी में पानी।
जिन्हें लाल सोहारियां नसीब हों
वे देवता होते हैं
और देवियां उनके घरों में पानी भरती हैं।
लग्न की रातों में
कुंआरियों के कंठ पर
चढ़ जाता है एक लाल पांव वाला
स्वर्णिम खड़ाऊं,
और एक मरा हुआ राजकुमार
बन जाता है सारे देश का दामाद
जिसको कानून के मुताबिक
दे दिया जाता है सीताओं की खरीद-फरोख़्त
का लाइसेंस।
सीताएं सफेद दाढ़ियों में बांध दी जाती हैं
और धरम की किताबों में
घासें गर्भवती हो जाती हैं।
धरम देश से बड़ा है।
उससे भी बड़ा है धरम का निर्माता
जिसके कमजोर बाजुओं की रक्षा में
तराशकर गिरा देते हैं
पुरानी पोथियों में लिखे हुए हथियार
तमाम चट्टान तोड़ती छोटी-छोटी बाहें,
क्योंकि बाम्हन का बेटा
बूढ़े चमार के बलिदान पर जीता है।
भूसुरों के गांव में सारे बाशिंदे
किराएदार होते हैं
ऊसरों की तोड़ती आत्माएं
नरक में ढकेल दी जाती हैं
टूटती जमीनें गदरा कर दक्षिणा बन जाती हैं,
क्योंकि
जिनकी माताओं ने कभी पिसुआ ही नहीं पिया
उनके नाम भूपत, महीपत, श्रीपत नहीं हो सकते,
उनके नाम
सिर्फ बीपत हो सकते हैं।
धरम के मुताबिक उनको मिल सकता है
वैतरणी का रिजर्वेशन,
बशर्ते कि संकल्प दें अपनी बूढ़ी गाय
और खोज लाएं सवा रुपया कर्ज़,
ताकि गाय को घोड़ी बनाया जा सके।
किसान की गाय
पुरोहित की घोड़ी होती है।
और सबेरे ही सबेरे
जब ग्वालिनों के माल पर
बोलियां लगती हैं,
तमाम काले-काले पत्थर
दूध की बाल्टियों में छपकोरियां मारते हैं,
और तब तक रात को ही भींगी
जांघिए की उमस से
आंखें को तरोताजा करते हुए चरवाहे
खोल देते हैं ढोरों की मुद्धियां।
एक बाणी गाय का एक लोंदा गोबर
गांव को हल्दीघाटी बना देता है,
जिस पर टूट जाती हैं जाने
कितनी टोकरियां,
कच्ची रह जाती हैं ढेर सारी रोटियां,
जाने कब से चला आ रहा है
रोज का ये नया महाभारत
असल में हर महाभारत एक
नए महाभारत की गुंजाइश पे रुकता है,
जहां पर अंधों की जगह अवैधों की
जय बोल दी जाती है।
फाड़कर फेंक दी जाती हैं उन सब की
अर्जियां
जो विधाता का मेड़ तोड़ते हैं।
सुनता हूं एक आदमी का कान फांदकर
निकला था,
जिसके एवज में इसके बाप ने इसको कुछ हथियार दिए थे,
ये आदमी जेल की कोठरी के साथ
तैर गया था दरिया,
घोड़ों की पूंछे झाड़ते-झाड़ते
तराशकर गिरा दिया था राजवंशों का गौरव।
धर्म की भीख,  ईमान की गरदन होती है मेरे दोस्त!
जिसको काट कर पोख्ता किए गए थे
सिंहासनों के पाए,
सदियां बीत जाती हैं,
सिंहासन टूट जाते हैं,
लेकिन बाकी रह जाती है खून की शिनाख़्त,
गवाहियां बेमानी बन जाती हैं
और मेरा गांव सदियों की जोत से वंचित हो जाता है
क्योंकि कागजात बताते हैं कि
विवादित भूमि राम-जानकी की थी।

पुरखे

नदी किनारे, सागर तीरे,
पर्वत-पर्वत घाटी-घाटी,
बना बावला सूंघ रहा हूं,
मैं अपने पुरखों की माटी।
सिंधु, जहां सैंधव टापों के,
गहरे बहुत निशान बने थे,
हाय खुरों से कौन कटा था,
बाबा मेरे किसान बने थे।
ग्रीक बसाया, मिस्र बसाया,
दिया मर्तबा इटली को,
मगध बसा था लौह के ऊपर,
मरे पुरनिया खानों में।
कहां हड़प्पा, कहां सवाना,
कहां वोल्गा, मिसीसिपी,
मरी टेम्स में डूब औरतें,
भूखी, प्यासी, लदी-फदी।
वहां कापुआ के महलों के,
नीचे खून गुलामों के,
बहती है एक धार लहू की,
अरबी तेल खदानों में।
कज्जाकों की बहुत लड़कियां,
भाग गयी मंगोलों पर,
डूबा चाइना यांगटिसी में,
लटका हुआ दिवालों से।
पत्थर ढोता रहा पीठ पर,
तिब्बत दलाई लामा का,
वियतनाम में रेड इंडियन,
बम बंधवाएं पेटों पे।
विश्वपयुद्ध आस्ट्रिया का कुत्ता,
जाकर मरा सर्बिया में,
याद है बसना उन सर्बों का
डेन्यूब नदी के तीरे पर,
रही रौंदती रोमन फौजें
सदियों जिनके सीनों को।
डूबी आबादी शहंशाह के एक
ताज के मोती में,
किस्से कहती रही पुरखिनें,
अनुपम राजकुमारी की।
धंसी लश्क रें, गाएं, भैंसें,
भेड़ बकरियां दलदल में,
कौन लिखेगा इब्नबतूता
या फिरदौसी गजलों में।
खून न सूखा कशाघात का,
घाव न पूजा कोरों का,
अरे वाह रे ब्यूसीफेलस,
चेतक बेदुल घोड़ो का।
जुल्म न होता, जलन न होती,
जोत न जगती, क्रांति न होती,
बिना क्रांति के खुले खजाना,
कहीं कभी भी शांति न होती।

नूर मियां!

आज तो चाहे कोई विक्टोरिया छाप काजल लगाए,
चाहे साध्वी ऋतंभरा छाप अंजन,
लेकिन असली घी का सुरमा,
तो नूर मियां ही बनाते थे ना!
कम से कम मेरी दादी का मानना तो यही था।
नूर मियां जब भी आते थे,
मेरी दादी सुरमा जरूर खरीदती थी।
एक सींक सुरमा आंखों मे डालो,
आंखें बादल की तरह भर्रा जाएं,
गंगा जमुना की तरह लहरा जाएं,
सागर हो जाएं बुढ़िया की आंखें।
जिसमें कि हम बच्चे झांके तो
पूरा का पूरा दिखें।
बड़ी दुआएं देती थी मेरी दादी,
नूर मियां और उनके सुरमे को।
कहती थी-
कि नूर मियां के सुरमे की वहज से तो ही
बुढ़ापे में बिटिहिनी बनी घूम रही हूं,
सुई में डोरा डाल लेती हूं।
और मेरा जी करे कहूं
कि ओ रे बुढ़िया!
तू तो है सुकन्या,
और तेरा नूर मियां है च्यवन ऋषि।
नूर मियां का सुरमा तेरी आंखों का च्यवनप्राश है।
तेरी आंखें, आंखें नहीं दीदा हैं,
नूर मियां का सुरमा सिन्नी है, मलीदा है!
और
वही नूर मियां पाकिस्तान चले गए!
क्यों चले गए पाकिस्तान, नूर मियां?
कहते हैं कि नूर मियां के कोई था नहीं,
तब क्या हम कोई नहीं होते थे नूर मियां के?
नूर मियां क्यों चले गए पाकिस्तान?
बिना हमको बताए?
बिना हमारी दादी को बताए हुए,
नूर मियां क्यों चले गए पाकिस्तान?
और अब न वे सुरमे रहे और न वो आंखें,
मेरी दादी जिस घाट से आई थीं,
उसी घाट गईं।
नदी पार से ब्याह कर आई थी मेरी दादी,
और नदी पार ही जाकर जलीं।
और मैं जब उनकी राख को
नदी में फेंक रहा था तो
मुझे लगा ये नदी, नदी नहीं,
मेरी दादी की आंखें हैं,
और ये राख, राख नहीं,
नूर मियां का सुरमा है,
जो मेरी दादी की आंखों में पड़ रहा है।
इस तरह मैंने अंतिम बार
अपनी दादी की आंखों में
नूर मियां का सुरमा लगाया।

कथा देश की …

ढंगों और दंगों के इस महादेश में
ढंग के नाम पर दंगे ही रह गये हैं।
और दंगों के नाम पर लाल खून,
जो जमने पर काला पड़ जाता है।
यह हादसा है,
यहां से वहां तक दंगे,
जातीय दंगे,
सांप्रदायिक दंगे,
क्षेत्रीय दंगे,
भाषाई दंगे,
यहां तक कि कबीलाई दंगे,
आदिवासियों और वनवासियों के बीच दंगे
यहां राजधानी दिल्ली तक होते हैं।
और जो दंगों के व्यापारी हैं,
वे यह भी नहीं सोचते कि इस तरह तो
यह जो जम्बूद्वीप है,
शाल्मल द्वीप में बदल जाएगा,
और यह जो भरत खंड है, अखंड नहीं रहेगा,
खंड-खंड हो जाएगा।
उत्तराखंड हो जाएगा, झारखण्ड बन जायेगा,
छत्तीस नहीं, बहत्तर खंड हो जाएगा।
बल्कि कहना तो यह चाहिए कि
नौ का पहाड़ा ही पलट जाएगा।
न नौ खण्ड, न छत्तीस, न बहत्तर,
हजार खण्ड हो जाएगा,
लाख खण्ड हो जाएगा।
अतल वितल तलातल के दलदल
में धंस जाएगा,
लेकिन कोई बात नहीं!
धंसने दो इस अभागे देश को वहां-वहां,
जहां-जहां यह धंस सकता है,
दंगे के व्यापारियों की बला से
जब यह देश नहीं रहेगा,
कितनी खराब लगेगी दुनिया जब
उसमें भरत खंड नहीं रहेगा,
जम्बूद्वीप नहीं रहेगा,
हे भगवान!
जेएनयू में जामुन बहुत होते हैं
और हम लोग तो बिना जामुन के
न जेएनयू में रह सकते हैं
और न दुनिया में ही रहना पसंद करेंगे।
लेकिन दंगों के व्यापारी,
जम्बूद्वीप नहीं रहेगा तो
करील कुंज में डेरा डाल लेंगे,
देश नहीं रहा तो क्या हुआ,
विदेश चले जायेंगे।
कुछ लोग अपने घाट जायेंगे,
कुछ लोग मर जायेंगे,
लेकिन हम कहां जायेंगे?
हम जो न मर रहे हैं और न जी रहे हैं,
सिर्फ कविता कर रहे हैं।
यह कविता करने का वक्त नहीं है दोस्तो!
मार करने का वक्त है।
ये बदमाश लोग कुछ मान ही नहीं रहे हैं-
न सामाजिक न्याय मान रहे हैं,
न सामाजिक जनवाद की बात मान रहे हैं,
एक मध्ययुगीन सांस्कृतिक तनाव के
चलते
तनाव पैदा कर रहे हैं,
टेंशन पैदा कर रहे हैं,
जो अमरीकी संस्कृति की विरासत है।
ऐसा हमने पढ़ा है,
यह सब बातें मैंने मनगढ़ंत नहीं गढ़ी हैं।
पढ़ा है,
और अब लिख रहा हूं
कि दंगों के व्यापारी,
मुल्ला के अधिकार की बात उठा रहे हैं,
साहूकारों, सेठों, रजवाड़ों के अधिकार की बात
उठा रहे हैं।
इतिहास को उलट देने का अधिकार
चाहते हैं दंगों के व्यापारी।
लेकिन आज के जमाने में
इतिहास को उलटना सम्भव नहीं है,
इतिहास भूगोल में समष्टि पा गया है।
लड़ाइयां बहुत हैं-
जातीय, क्षेत्रीय, धार्मिक इत्यादि,
लेकिन जो साम्राज्यवाद विरोधी लड़ाई
दुनिया भर में चल रही है,
उसका खगोलीकरण हो चुका है।
वह उसके अपने घर में चल रही है,
अमरीका में चल रही है,
क्योंकि अमरीका अब
फादर अब्राहम लिंकन की लोकतंत्र
की परिभाषा से बहुत दूर चला
गया है।
और इधर साधुर बनिया का जहाज
लतापत्र हो चुका है,
कन्या कलावती हठधर्मिता कर रही है,
सत्यनारायण व्रत कथा जारी है।
कन्या कलावती आंख मूंद कर पारायण कर रही हैं
यह हठधर्मिता है लोगों!
मुझे डर है कि
जामाता सहित साधुर बनिया
जलमग्न हो सकते हैं,
तब विलपती कन्या कलावती के उठने
का कोई संदर्भ नहीं रह जाएगा,
न ही इंडिया कोलम्बिया हो पाएगा।
सपना चकनाचूर हो जायेगा
स्वप्न वासवदत्ता का!
कभी अमरीका में नॉवेल पायनियर हेमिंग्वे
ने आत्महत्या की थी,
क्यों की थी हेमिंग्वे ने आत्महत्या?
कुछ पता नहीं चला।
अमरीका में सिर्फ बाहरी बातों का ही पता
चलता है।
अंदर तो स्कूलों में बच्चे मार दिये
जाते हैं,
पता नहीं चलता।
हां, इतना पता है
कि हेमिंग्वे 20 वर्ष तक फिदेल
कास्त्रो के प्रशंसक बने रहे।
अब ऐसा आदमी अमरीका में
तनाव मुक्त नहीं रह सकता।
और टेंशन तो टेंशन,
उपर से अमरीकी टेंशन!
तो क्या हेमिंग्वे व्हाइट हाउस
का बुर्ज गिरा देते?
हेमिंग्वे ने इंडिसन कैम्प नामक गल्प लिखा।
मैं अर्जुन कैम्प का वासी हूं,
अर्जुन का एक नाम भारत है,
और भारत का एक नाम है इंडिया।
अर्जुन कैम्प से इंडियन कैम्प तक,
इंडिया से कोलंबिया तक,
वही आत्महत्या की संस्कृति।
मेरा तो जाना हुआ है दोस्तो,
गोरख पाण्डेय से हेमिंग्वे तक
सब के पीछे वही आंतक राज,
सब के पीछे वही राजकीय आतंक।
……..             ………
दंगों के व्यापारी
न कोई ईसा मसीह मानते हैं,
और न कोर्ट अबू बेन अधम।
उनके लिए जैसे चिली, वैसे वेनेजुएला,
जैसे अलेंदे, वैसे ह्यूगो शावेज,
वे मुशर्रफ और मनमोहन की बातचीत भी करवा सकते हैं,
और होती बात को बीच से दो-फाड़ भी
कर सकते हैं।
दंगों के व्यापारी कोई फादर-वादर नहीं
मानते,
कोई बापू-सापू नहीं मानते,
इन्हीं लोगों ने अब्राहम लिंकन को भी मारा,
और इन्हीं लोगों ने महात्मा गांधी को भी।
और सद्दाम हुसैन को किसने मारा?
हमारे देश के लम्पट राजनीतिक
जनता को झांसा दे रहे हैं कि
बगावत मत करो!
हिंदुस्तान सुरक्षा परिषद् का
सदस्य बनने वाला है।
जनता कहती है-
भाड़ में जाये सुरक्षा परिषद!
हम अपनी सुरक्षा खुद कर लेंगे।
दंगों के व्यापारी कह रहे हैं,
हम परिषद से सेना बुलाकर
तुम्हें कुचल देंगे।
जैसे हमारी सेनाएं नेपाल रौंद रही हैं,
वैसे उनकी सेनाएं तुम्हें कुचल देंगी।
नहीं तो हमें सुरक्षा परिषद का सदस्य
बनने दो और चुप रहो।
यही एक बात की गनीमत है
कि हिंदुस्तान चुप नहीं रह सकता,
कोई न कोई बोल देता है,
मैं तो कहता हूं कि हिंदुस्तान वसंत का दूत
बन कर बोलेगा,
बम की भाषा बोलेगा हिंदुस्तान!
अभी मार्क्सवाद जिंदा है,
अभी बम का दर्शन जिंदा है,
अभी भगत सिंह जिंदा है।
…………            ………….
मरने को चे ग्वेरा भी मर गए,
और चंद्रशेखर भी,
लेकिन वास्तव में कोई नहीं मरा है।
सब जिंदा हैं,
जब मैं जिंदा हूं,
इस अकाल में।
मुझे क्या कम मारा गया है
इस कलिकाल में।
अनेकों बार मुझे मारा गया है,
अनेकों बार घोषित किया गया है
राष्ट्रीय अखबारों में, पत्रिकाओं में,
कथाओं में, कहानियों में
कि विद्रोही मर गया।
तो क्या मैं सचमुच मर गया!
नहीं, मैं जिंदा हूं,
और गा रहा हूं,
कि
कहां चला गा उ सादुर च बनिया,
कहां चली गयी कन्या कलावती,
संपूर्ण भारत भा लता-पात्रम्।
पर वाह रे अटल चाचा! वाह रे सोनिया चाची!!
शब्द बिखर रहे हैं,
कविताएं बिखर रही हैं,
क्योंकि विचार बिफर रहे हैं।
हां, यह विचारों का बिफरना ही तो है,
कि जब मैं अपनी प्रकृति की बात सोचता हूं
तो मेरे सामने मेरा इतिहास घूमने लगता है।
मैं फण्टास्टिक होने लगता हूं
और सारा भूगोल,
उस भूगोल का
ग्लोब, मेरी हथेलियों पर
नाचने लगता है।
और मैं महसूसने लगता हूं
कि मैं खुद में एक प्रोफाउण्ड
उत्तर आधुनिक पुरुष पुरातन हूं।
मैं कृष्ण भगवान हूं।
अन्तर सिर्फ यह है कि
मेरे हाथों में चक्र की जगह
भूगोल है, उसका ग्लोब है।
मेरे विचार सचमुच में उत्तर आधुनिक हैं।
मैं सोचता हूं कि इतिहास को
भूगोल के माध्यम से एक कदम आगे
ले जाऊं
कि भूगोल की जगह
खगोल लिख दूं।
लेकिन मेरी दिक्कत है कि
जैसे भूगोल को खगोल में बदला जा सकता है,
वैसे ही इण्डिया को कोलम्बिया
नहीं शि‍फ्ट किया जा सकता।
कोलम्बिया- जो खगोल की धुरी है
और सारा भूगोल उसकी परिधि है
जिसमें हमारा महान देश भी आता है।
महान इसलिए कह रहा हूं
क्योंकि महान में महानता है।
जैसे खगोल की धुरी कोलंबिया है,
वैसे इस देश के महान विद्वान लोग
महानता की धुरी इण्डिया को मानते हैं।
अब यह विचार मेरे मन-मयूर को
चक्रवात की तरह चला रहा है कि
भगवान, देवताओं!
इण्डिया को कोलम्बिया शि‍फ्ट करना ठीक रहेगा,
कि स्वयमेव कोलम्बिया को ही
इण्डिया में उतार दिया जाय।
यह विचार है
जो बिफर रहा है।
इसमें इतिहास भी है,
और दर्शन भी,
कि आप जब हमारे यहां आएंगे
तो हम क्या देंगे,
क्योंकि हमारे पास बिछाने के लिये बोरियां भी नहीं हैं
मेरे महबूब अमरीका!
और जब हम आपके यहां आयेंगे
तो क्या लेकर आयेंगे,
क्योंकि मुझ सुदामा के पास
तंडुल रत्न भी नहीं है कॉमरेड कृष्ण!
इसलिए विचार बिफर रहे हैं
कि जब हमारा महान देश
सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य
बनेगा, जब उसे वीटो पावर
मिलेगी,
तब तक पिट चुका होगा,
लुट चुका होगा,
बिक चुका होगा।
जयचंद और मीर जाफर
अब इतिहास नहीं
वर्तमान के खतरे बन चुके हैं।
इससे भविष्य अंधकारमय दिखायी पड़ रहा है।
कालांतर में इस देश को
खरीद सकता है अमरीका,
नहीं, इटली का एक लंगड़ा व्यापारी
त्रिपोली।
तोपों के दलाल
साम्राज्यवाद के भी दलाल हैं।
वे काल हैं और कुण्डली मारकर
शेषनाग की तरह संसद को
अपने फन के साये में लिए बैठे हैं।
मुझे यह अभागा देश
कालिंदी की तरह लगता है
और ये सरकारें,
कालिया नाग की तरह।
विचार बिफर रहे हैं कि
हे फण्टास्टिक कृष्ण!
भगवान विद्रोही!
तुम विद्रोही हो,
कोई नहीं तो तुम क्यों नहीं
कूद सकते आंख मूंद कर
कालिया नाग के मुंह में।

तुम्हारा भगवान

तुम्हारे मान लेने से
पत्थर भगवान हो जाता है,
लेकिन तुम्हारे मान लेने से
पत्थर पैसा नहीं हो जाता।
तुम्हारा भगवान पत्ते की गाय है,
जिससे तुम खेल तो सकते हो,
लेकिन दूध नहीं पा सकते।

कवि

न तो मैं सबल हूं,
न तो मैं निर्बल हूं,
मैं कवि हूं।
मैं ही अकबर हूं,
मैं ही बीरबल हूं।

कविता और लाठी

तुम मुझसे
हाले-दिल न पूछो ऐ दोस्त!
तुम मुझसे सीधे-सीधे तबियत की बात कहो।
और तबियत तो इस समय ये कह रही है कि
मौत के मुंह में लाठी ढकेल दूं,
या चींटी के मुह में आंटा गेर दूं।
और आप- आपका मुंह,
क्या चाहता है आली जनाब!
जाहिर है कि आप भूखे नहीं हैं,
आपको लाठी ही चाहिए,
तो क्या
आप मेरी कविता को सोंटा समझते है?
मेरी कविता वस्तुतः
लाठी ही है,
इसे लो और भांजो!
मगर ठहरो!
ये वो लाठी नहीं है जो
हर तरफ भंज जाती है,
ये सिर्फ उस तरफ भंजती है
जिधर मैं इसे प्रेरित करता हूं।
मसलन तुम इसे बड़ों के खिलाफ भांजोगे,
भंज जाएगी।
छोटों के खिलाफ भांजोगे,
न,
नहीं भंजेगी।
तुम इसे भगवान के खिलाफ भांजोगे,
भंज जाएगी।
लेकिन तुम इसे इंसान के खिलाफ भांजोगे,
न,
नहीं भंजेगी।
कविता और लाठी में यही अंतर है।

परिभाषा

कविता क्या है
खेती है,
कवि के बेटा-बेटी है,
बाप का सूद है, मां की रोटी है।

नई खेती

मैं किसान हूं
आसमान मैं धान बो रहा हूं।
कुछ लोग कह रहे हैं,
कि पगले आसमान में धान नहीं जमता,
मैं कहता हूं कि
गेगले-घोघले
अगर जमीन पर भगवान जम सकता है,
तो आसमान में धान भी जम सकता है।
और अब तो
दोनों में एक होकर रहेगा-
या तो जमीन से भगवान उखड़ेगा,
या आसमान में धान जमेगा।
(विद्राही जी की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक नई खेती से साभार)

नोट- विद्रोही जी की कुछ कविताएं जसम के लिंक पर  सुनी जा सकती हैं- http://jsmav.blogspot.com/search/label/VIDROHI

3 comments on “विद्रोही की कविताएं

  1. awadhesh says:

    sach baat to ye hai ki awadhi samaj kee gahan samvedna aur sahi rajneetik dristikon shayad pahli bar hindi samaj se ru-ba-ru hai. dekhna hai ki kavita ka nagar bodh ise kahan tak bardast kar pata hai.

  2. kewal tiwari says:

    bahut achhi kavitayein

  3. जनकवि विद्रोही जी को शतशत नमन।

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