लूट का स्कूल : संजीव ठाकुर

संजीव ठाकुर

मैं देश के उन लाखों पिताओं में से एक हूँ, जिनके बच्चे लगभग चार साल के हो गए हैं और जिन्हें किसी न किसी पब्लिक स्कूल की शरण में जाने में विलंब की कोई गुंजाइश नहीं है। किसी-किसी पब्लिक स्कूल में अपने बच्चे के लिए प्रकांरातर से अपने लिए एक जगह आरक्षित करवाने की यह कवायद दरअसल तभी शुरू हो जाती है, जब बच्चा ‘थ्री प्लस’ का हो जाता है। और उससे भी पहले स्कूल में भरती होने के लिए तैयार करने के क्रम में हर गली-मुहल्ले में खुल गए ‘प्ले स्कूल’ की शरण में जाना भी लगभग अनिवार्य हो गया यानी बच्चा ‘टू प्लस’ का हुआ नहीं कि उसे ‘शिक्षा’ ग्रहण करने के लिए भेजना अनिवार्य-सा हो गया है। लाख समितियाँ बनें, लाख सिफारिशें की जाएँ, बच्चों का बचपन छीनने की यह प्रक्रिया थमने वाली नहीं लगती, बहरहाल!

पिछले सितंबर से ही प्ले स्कूल वाले लिस्ट भेजने लगे, अमुक स्कूल में अमुक तिथि तक आवेदन करना है, तमुक स्कूल में तमुक तिथि तक! माँ-बाप इंटरव्यू में जाकर कुछ ऐसी-वैसी हरकत न कर जाएँ, इसके लिए बाकायदा काउंसलर को बुलवाकर प्ले स्कूल वालों ने हमारा ‘ओरिएन्टेशन’ (पुनश्चर्या) भी करवाया, छद्म-साक्षात्कार भी। फिर भी हममें से अधिकतर माता-पिता फेल हो गए और मनचाही जगह बच्चे का एडमीशन न करवा पाने की वजह से कुंठित भी। जिन्होंने ‘ब्रांडेड’ स्कूल पाया, उन्होंने चालें टेढ़ी कर सड़कों पर इतराना भी शुरू कर दिया। बाकी भी जहाँ-तहाँ एडमीशन करवाकर निश्‍चिंत हो गए। यह निश्‍चिंतता मन चाहा स्कूल न पा सकने के बावजूद भारी भरकम कीमत देकर प्राप्त करनी पड़ी। बहुत ‘बड़े’ स्कूलों की अनाप-शनाप कीमत से पाँच-सात हजार कम कीमत देकर ही इन्हें पाया जा सका। किसी ने बिल्डिंग फंड के नाम पर दान लिया, किसी ने विकास फंड के नाम पर तो किसी ने किसी शैक्षणिक ट्रस्ट के नाम पर। अपनी ही सेवा करने वाले इन ट्रस्टों के नाम पर ‘सधन्यवाद’ कई हजार लिए गए। धर्म के नाम पर चार आना, आठ आना मात्र निकालने वाले लोगों को भी यहाँ पाँच हजार, आठ हजार निकालने पड़े। बदले में उन्हें धन्यवाद तो मिला ही। वैसे यह धन्यवाद भी वे नहीं देते तो कोई उनका क्या बिगाड़ लेता?

आखिर अप्रैल के प्रथम सप्ताह से बच्चों के सत्र आरंभ हो गए। सत्र आरंभ होने से पहले सभी माता-पिता को बच्चों के वस्त्र लेने बुलाया गया। कोई हजार रुपये के कपड़े, जूते, नैपकिन वगैरह दिए गए। नैपकिन इसलिए कि बच्चे उन्हें स्कूल के डेस्क पर बिछाकर खाना खाएँ और डेस्क गंदे न हों। उन गंदे डेस्कों को साफ करवाने का खर्च स्कूल वालों का बच जाए। सभी बच्चों को ‘स्विमिंग कॉस्ट्यूम’ भी दिए गए। इससे क्या कि अधिकांश स्कूलों में स्विमिंग पूल ही नहीं हैं और वे एक टबनुमा चीज में पानी भरकर बच्चों को उछलने-कूदने की सुविधा देते हैं।

इसके बाद स्टेशनरी की बारी आई। स्टेशनरी के नाम भी हजार रुपये लिए गए और बदले में सात कॉपियाँ, सात जिल्दें, कुछ स्टिकर, दो पुस्तकें और एक लिस्ट दी गई। ये कॉपियाँ वगैरह देने की कृपा इसलिए की गई ताकि माता-पिता उन पर अपने बच्चों के नाम लिख सकें, उन पर जिल्द चढ़ा सकें। और वह लिस्ट इसलिए ताकि माता-पिता देख सकें कि आपके बच्चे किन-किन चीजों का उपयोग स्कूल में करेंगे! वे सभी स्टेशनरी के सामान उनकी क्लास टीचर को सीधे दे दिए जाएँगे। आप उनके दर्शन भी नहीं कर सकते। हाँ, उनके दाम देखकर कुढ़-भुन सकते हैं। तो कुढ़िए-पैंसिल दो पैकेट- बावन रुपये। शार्पनर- तीन रुपये। पेपर सोप- तीस रुपये, कलर पेंसिल-चौबीस रुपये। इरेजर-तीन रुपये इत्यादि, इत्यादि। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि बाजार भाव से तीन गुना में ये सामान आपको स्कूल-काउंटर से खरीदने हैं। और यह पूछने का तो आपको अधिकार ही नहीं है कि पूरे सत्र में, जिसमें कोई चार महीने तो छुट्टियों के ही होंगे, बच्चे इतनी पेंसिलों का क्या करेंगे? इतने पेपर सोप का क्या करेंगे? और उनसे जो एप्रैन के पैसे लिए गए हैं, उनका क्या होगा? पच्चीस रुपये ब्लो पेन क्या सत्र समाप्ति के बाद बच्चों को लौटा दिया जाएगा? नहीं भैये, नहीं! अगले सत्र में आप इससे कुछ ज्यादा रकम ही भरेंगे, क्योंकि आपके बच्चे एक क्लास और ऊपर चढ़ जाएँगे।

स्कूलों में अभी छुटिृयाँ चल रही हैं। स्कूल वाले समर कैंप के नाम पर अलग से बच्चों के माता-पिता को दूह रहे हैं। आखिर छुट‍्टि‍यों का बस का किराया भी तो ले ही लिया है। स्कूल-फीस तो चलो जायज है, ये बस का किराया? करीब दो महीने बसों को देख भी नहीं पाने वाले बच्चों को बस का किराया क्यों देना पड़ा? राम जाने! हमारी सरकार तो ये सब बातें जान ही सकती है। सरकार ने कौड़ियों के मोल जमीनें दे ही दी हैं स्कूल वालों को। इससे ज्यादा वह क्या कर सकती है? स्कूल चलाने वाले कोई बड़े उद्योगपति हैं, कोई राजनेता, कोई माफिया उन पर अंकुश रखना क्या किसी सरकार के वश का है? खैर!

स्कूल का सत्र शुरू होने पर भी लूट का खेल जारी रहा। माता-पिता को मीटिंग के बहाने बुलाया गया और दो सौ बीस रुपये जमा कराने को कहा गया। इसके बदले एक वर्कशीट बच्चों को रोज दी जाएगी, जिसमें वो आकृतियों को जोड़ेंगे, उसमें लिखी उल्टी-सीधी कविताओं को रटेंगे, होम वर्क करेंगे और उन्हें बीस रुपये के एक फाइल कवर में रखेंगे। यानी हजार रुपये के स्टेशनरी आइटम में यह ‘वर्कशीट’ शामिल नहीं थी। सभी पिता की तरह मैंने भी रुपये निष्कासित किए, मन लेकिन खीझता रहा और एक सप्ताह बाद बेटी के बस्ते में जब पैंसठ रुपये और जमा करने का फरमान लिखा आया तो मैं उबल पड़ा- ‘‘इतने-इतने पैसे लिए हैं, एक डायरी तक नहीं दे सकते? आई कार्ड बनाने की जिम्मेदारी क्या उनकी नहीं है?’’ आखिर पत्नी ने शांत कराया और मैं जाकर पैंसठ रुपये और दे आया। मैं जानता हूँ, लूट का यह खेल खत्म नहीं हुआ है। स्कूल के खुलते ही फिर किसी मद में माँग की जाएगी, फिर किसी मद में। लूट का यह खेल तो दरअसल तभी खत्म होगा, जब बेटी बारहवीं पास कर जाएगी। और बारहवीं के बाद शायद लूट के ज्यादा बड़े खेल की तैयारी करनी होगी।

One comment on “लूट का स्कूल : संजीव ठाकुर

  1. Rajiv duboliya says:

    सर शिक्षा व्यवस्था को इतने सरल शब्दों में समझाने के लिए आपको शुक्रिया

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