रैन भई चहुँ देस : घनश्याम शर्मा

घनश्याम शर्मा

अमीर खुसरो के काव्‍य की वि‍शेषताओं को रेखांकि‍त करता डॉक्‍टर घनश्‍याम शर्मा का आलेख-  

अमीर खुसरो न केवल खड़ी बोली हिन्दी के प्रथम कवि हैं; बल्कि ‘दरबार और दरग़ाह’ के बीच खड़े आम आदमी और उसकी अपनी भाषा के कवि भी है, क्योंकि एक ओर वह ज़लालुद्‍दीन, अलाउद्दीन ख़िलजी और तुग़लक शासकों के राजकवि थे, तो दूसरी ओर सूफी संत निज़ामुद्दीन औलिया के प्रमुख शिष्य भी। इस कारण वह न केवल सत्ता-समाज के ज्ञान से वाक़िफ़ थे, बल्कि लोकजन की सम्‍वेदना से भिज्ञ भी। मुक्‍तिबोध की भाषा में कहें तो खुसरो ‘ज्ञानात्मक सम्‍वेदना या सम्‍वेदनात्मक ज्ञान’ के कवि हैं। ऐसा लगता भी है कि शायद खुसरो के काव्य का अध्ययन-विश्‍लेषण करने के बाद ही मुक्‍तिबोध ने साहित्य-सृजन के लिए उक्त शब्द-युग्म की कल्पना-स्थापना की हो, क्योंकि मुक्‍तिबोध ने ही एक अन्य स्थान पर लिखा है ‘अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने ही होंगे, अब तोड़ने होंगे गढ़ और मठ सब’ और ‘हाथ कंगन’ की तरह निश्‍चित ही खुसरो का काव्य देखा जा सकता है, जिसमें उन्होंने तत्कालीन काव्य-भाषा संस्कृत एवं फ़ारसी को छोड़, आम जनता की भाषा ‘हिन्दी या हिन्दवी’ में काव्याभिव्यक्‍ति के ख़तरे उठाकर भाषा के गढ़ और मठ (दरबार और दरग़ाह) सब तोड़े। फलस्वरूप खुसरो की काव्याभिव्यक्ति में नवीन शब्द-संयोग, नवीन अर्थवत्ता और नई भंगिमाएँ और व्यंजनाएँ प्रतिफलित हुई। (मुक्‍तिबोध, ‘कला का तीसरा क्षण’)

अमीर खुसरो का ‘हिन्दवी काव्य’ इतना लोकप्रिय हुआ कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित (ह्रदयांतरित) होता रहा और लोक-संस्कृति-परम्परा का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गया। अनगिनत मुखों से उच्चरित हो, मुख-सुख नियम के चलते भी काफ़ी कुछ बदलाव हुआ होगा, किन्तु हम देखते हैं कि उनकी वे रचनाएँ, जिनमें फ़ारसी और हिन्दवी का मेल रहता है तथा वे रचनाएँ जो विशुद्ध हिन्दवी में हैं और जिनका रूप ‘पहेली’ विधा का है, दोनों में ही कभी सीधे-सीधे ‘अभिधा’ में तो कभी ‘लक्षणा’ एवं ‘व्यंजना’ में तत्कालीन समय की आलोचना की गई है। कई बार यह आलोचना उनके सहज प्रदत्त सामंती परिवेश की ‘स्वाभाविक बुराइयों की अभिव्यक्‍ति’ में आता है, तो कभी कवि की ‘निजी अनुभूति की अभिव्यक्ति’ में। जबकि रचनाकार की निजता उसकी सामाजिकता से भिन्न नहीं होती, फिर भी खुसरो के काव्य के प्रसंग में हम यह पाते हैं कि एक ख़ुश-मिजाज़ी और ज़िन्दादिली के नाते उनकी स्वयं की आलोचना भी हक़ीक़त में परिवेश की ही नुक़्‍ताचीनी होती है। जैसे –

रफ्तम ब तमाशा-ए-कनार-जुए
दीदम बलब-ए-आबजन-ए-हन्दूए
गुफ़्तम सनमा बहा-ए-जुल्फ़त चे बुवद
फ़रियाद बर आवुर्द कि दुर दुर मुए।

लोक-साहित्य की परम्परा के अनुसार फ़ारसी-हिन्दवी मिश्रित इस रचना में श्‍लेष के उपयोग से हास्य और व्यंग्य की सृष्टि की गई है। किन्तु नारी के प्रति पुरुषों का कैसा भोगवादी रुझान रहा करता था, इसकी ओर भी इशारा किया गया है और श्‍लेष के ही माध्यम से उसकी सही भर्त्सना भी की गई है। चार पंक्‍तियों की इस रचना में खुसरो कहते हैं कि मैं सैर के लिए एक नदी के किनारे पर गया था, वहाँ मैंने एक ख़ुबसूरत हिन्दू औरत को देखा। मैंने पूछा कि तेरे सुंदर बालों का क्या दाम है? तो उसने कहा कि मेरे एक-एक बाल की क़ीमत मोतियों के बराबर है। स्त्री के कहने में ‘फ़रियाद’ या ‘दुहाई’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है और ‘दुर-दुर’ का अर्थ ‘एक-एक बाल’ होता है और ‘मुए’ का अर्थ ‘मोती’ होता है, लेकिन साथ ही श्‍लेष में ‘दुर-दुर-मुए’ स्त्रियों के बोलचाल में एक गाली है, जिसके अनुसार ‘अरे मुदरि दूर हो जा’, यह अर्थ भी ध्वनित होता है।

इस तरह स्पष्ट है कि उस युग के सामंती पुरुष के रूप में ही निज को अभिव्यक्‍त किया है और तत्कालीन सामंती पुरुष की उपभोगवादी (भोगवादी?) दृष्टि को प्रकट किया है कि किसी सुंदर स्त्री को नहाते देखते ही रचना का नायक, जो रचनाकार खुद ही है, स्त्री से पूछ बैठता है कि तेरे एक-एक बाल का दाम क्या है? साफ़ शब्दों में वह सौदा पटा रहा है। यह कितनी घृणित हरक़त थी, इसकी ओर इशारा करते हुए अमीर खुसरो स्त्रियोचित गाली के ज़रिए उत्तर दे रहे हैं। श्‍लेष अलंकार की यही ख़ासियत है कि इसमें शब्द के दोनों के अर्थ समान रूप से उचित या सही मालूम पड़ते हैं किन्तु पाठक खुद के लिये सही अर्थ निश्‍चित कर लेता है।

तत्कालीन युग नैतिक दृष्टि से कितना पतनोन्मुख था, इसका (समालैंगिकता) नमूना भी खुसरो की कई हिन्दवी मिश्रित रचनाओं में मिल जाता है। जैसे –

तेली पिसरे कि भी फरोशद तेले
अज़ दस्त-ओ-ज़बान-ए-चर्ब-ए-ऊ वावैले
ख़ाल-ए-वरूख़श दीदम-ओ-गुफ्तम कि तिलस्म
गुफ़्ता कि बिरौ दरई तिल तेले

यह रचना भी श्‍लेष के माध्यम से सामंती वर्ग की रुग्ण और पतनोन्मुखी यौन-वृत्ति पर व्यंग्य करती है। भावार्थ यह है कि तेली का बेटा बहुत ही आकर्षक फुर्तीला है। उसके गाल पर एक तिल है, जिसे देखकर रचना का नायक उस लड़के से पूछता है– क्या यह तिल है? तेली का लड़का उत्तर देता है कि ‘दूर हटो, यह वह तिल नहीं है, जिसमें से तेल निकल सके।’ अर्थ स्पष्ट है कि तेली के लड़के ने साफ़-साफ़ कहा कि जो तुम कहना चाह रहे हो, वह मैं समझ रहा हूँ लेकिन तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं होने वाली। इन ‘तिलों में तेल नहीं’ आज भी खड़ी बोली का एक आम मुहावरा है और अमीर खुसरो ने बड़ी ही कुशलता से अपने युग और रचना के नायक की आलोचना को एक करके प्रस्तुत किया है। शायद खुसरो ही तिल के प्रयोग के पहले खड़ीबोली के प्रयोक्‍ता रहे हैं। फिर ‘तिल’ से ‘दिल’ की तमाम बातें आज भी श्‍लेष में ही देखी और समझी जाती है।

अमीर खुसरों की ऐसा अनेक रचनाएँ हैं, जिनको इस प्रसंग में उद्धृत किया जा सकता है। उनके कई ऐसे दोहे हैं जिनकी अभिव्यंजना रचनाकार के परिवेश की बख़ूबी आलोचना करती हैं। यहाँ तक कि जनश्रुति के आधार पर प्रसिद्ध दोहे को यदि ग़ौर से देखा जाए, तो आलोचनामुखी व्यंग्य दिखाई देता है। जब अमीर खुसरो ने अपने गुरु निज़ामुद्दीन औलिया के निधन का समाचार सुना तब उन्होंने कहा–

गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस
चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस।

‘डारे’ और ‘भई’ ये दोनों शब्द ब्रजभाषा के होते हुए भी सारा दोहा ऐसी साफ़ खड़ी बोली में है, जिसमें प्रसाद गुण की कोई कमी नहीं है। कवि साफ़ शब्दों में कह रहा है कि केवल गोरी के मुख के कारण ही चारों तरफ दिन का उजाला था अर्थात् निज़ामुद्दीन औलिया की उपस्थिति से चारों ओर उजाला था, किन्तु अब वह मुख छिप गया है अर्थात् अब जबकि निज़ामुद्दीन औलिया साहब नहीं रहे, तो चारों ओर अंधेरा छा गया। इस प्रकार यह दोहा उस युग पर भी सटीक टिप्पणी करता है।

तत्कालीन युग में आक्रामक तुर्क, हिन्दू लड़कों को दास बनाकर रखते थे। ऐसे माहौल में खुसरो ने व्यंजना का सहारा लेकर विलासिता और यौन विकृतियों की ओर इशारा किया है। हिन्दवी मिश्रित यह रचना भी निज आलोचना के बहाने उस युग पर एक टिप्पणी है –

हिन्दु बचा बीं कि अजब हुस्तनधरे छे,
बर वक़्‍त-ए-सुखन गुफ़्‍तन मुख फूर झरे छे
गुफ़्तम ज़ि लब-ए-लाल-ए-तो सक बीसा बगीरम
गुफ़्ता कि अरे राम तुरक़ काई करे हो।

मुक्‍तक का नायक अपने दोस्त से कह रहा है कि उस हिन्दू लड़के को देखो, जिसकी ख़ूबसूरती बेमिसाल है। जब वह बोलता है तो जैसे उसके मुँह से फूल झरते हैं। मैंने उससे कहा कि अपने लाल फूल जैसे ‘लब’ (होंठ) का चुंबन दे दे, तो वह कहने लगा कि हाय! राम यह तुर्क कर क्या रहा है?

‘फूल झरे’ ब्रजभाषा की शैली है ‘औ करे छे’ गुजराती और राजस्थानी की याद दिलाती है। इतना निश्‍चित है कि यह रचना उस समय की सामंती विलासिता और यौन-विकृतियों को पूरी तरह से प्रस्तुत करती है।

खुसरो की काव्य-प्रतिभा के बारे में सबसे प्रामाणिक उदाहरण उनकी पहेलियाँ हो सकती हैं, किन्तु पाठक यदि ‘पहेली’ विधा को कवि की निजता और उसके युग से असंपृक्‍त समझेगा तो भारी भूल करेगा। वास्तव में कवि तो एक माध्यम होता है और जो कवि जितना बढ़िया माध्यम होता है, वह उस युग को उतनी कुशलता के साथ अभिव्यक्‍त करता है। चाहे निजता का मुखौटा पहन कर करे अथवा कोई और तरीक़ा अपनाए। ‘पहेली’ विधा भी इसका अपवाद नहीं है। कालांतर में भारतेन्दु हरिश्‍चन्द्र ने भी ऐसी पहेलियाँ लिखीं, जो एक साथ पहेली थी और नवजागरण की अभिव्यक्ति भी। अंग्रेज़ों पर व्यंग्य उन पहेलियों की तीसरी विशेषता थी। भारतेन्दु के प्रेरणा स्रोत खुसरो ही थे। उन्होंने भी ‘पहेली’ विधा में युग की विसंगतियों को उजागर किया है।

‘चिराग़’ शीर्षक पहेली में खुसरो कहते हैं –

बाला था जब सबको भाया, बड़ा हुआ कुछ काम न आया।
खुसरो कह दिया उसका नाव, बूझे नहीं तो छोड़ो गाँव।।

चिराग़ जब तक जल रहा था, तब तक सबको अच्छा लग रहा था, लेकिन ज्यों ही बुझा त्योंहि किसी काम का न रहा। ऐसा लिखकर खुसरो अपने युग के उस सामान्य मनुष्य-प्रवृत्ति पर टिप्पणी कर रहे हैं, जिसके अनुसार काम प्यारा होता है, चाम नहीं अथवा निकम्मे या बेरोज़गार व्यक्ति को कोई नहीं पसंद करता। वह बुझे हुए चिराग़ की तरह होता है। पहेली में बड़ा हुआ एक लोक मुहावरा है जो चिराग़ को बुझा देने के लिए व्यवहार में लाया जाता है।

खुसरो की एक प्रसिद्ध पहेली ‘हज़स्त आदम पर’ है –

बिधना ने एक पुरुख बनाया
तिरिया दी और नेय लगाया
चूक पड़ी कुछ वा से ऐसी
देस छोड़ हुआ परदेसी।

यह सही है कि हज़रत आदम की मिथक कथा पर यह पहेली आधारित है किन्तु इसकी व्यंजना कुछ ऐसी है कि उस युग में जो पुरुष रोज़गार के अपना देश छोड़ते थे, उन पर भी लागू हो जाती है।

एक अन्य पहेली ‘पतरी’ अर्थात् पत्तल पर है –

कई पती की नार कहाय, भोजन कारन बेधी जाय
दूजी बार काम न आय, ब्राह्मन या ज़जमान बनाय।

पत्तल कई पत्तों से बनता है और भोजन के उपयोग में लाने के उद्देश्य से उसे बेधा जाता है अर्थात् पत्तों को आपस में जोड़कर पत्तल बनायी जाती है। जोड़ने या मिलाने के लिए यह ज़रूरी होता है कि उन्हें भेदा जाय। भोजन करने के बाद वह किसी काम की नहीं रहती। यदि इस पहेली का व्यंग्य ‘कई पियों की पत्नी कहलाने वाली नगर-वधू’ की ओर हो तो भी कोई आश्‍चर्य नहीं क्योंकि वेश्या के प्रति वह समाज भी कोई उदार नहीं था।

अंत में यहाँ एक ऐसी पहेली को ख़ासतौर पर उद्धृत किया जा रहा है जिसमें खुसरो की काव्य-चातुर्य और प्रशासनिक समझ देखते ही बनती है। शासन चलाने के लिए नौकरशाही तब भी थी और आज भी नौकरशाही का आलम कुछ कम जानलेवा नहीं है। यह पहेली दफ़्तर के बारे में है। श्‍लेष शब्द प्रयोग की चातुरी और विदग्धता देखते ही बनती है–

एक पुरुख जिन आलम कीला, आधा वाजा आधा गीला।

अर्थात् सारी दुनिया में जहाँ भी नौकरशाही है, वहाँ वह सभी के मुँह को बंद रखती है। ‘कीला’ का अर्थ होता है- अधिकार से मुँह को बंद कर देना। ‘दफ्’ जो ‘डफ’ का बोलचाल का रूप है, वह बाजे की तरह बजता है, अर्थात् हरेक नौकरशाह अपनी बड़ाई आप ही करता है। लेकिन वस्तुतः वह कायर है क्योंकि कोई ज़ोरदार या शक्‍तिशाली बाजा बजाने वाला आ जाए तो तर होते या कपड़े गीले करते देर नहीं लगती।

दो राय नहीं कि अमीर खुसरो का काव्य तत्कालीन राष्ट्र में चारों तरफ फैली रैन रूपी असंगतियों की अनुभूति और उसकी अभिव्यक्‍ति है। उदय प्रकाश की ‘कूट’ कविता की अंतिम दो पंक्‍तियाँ अमीर खुसरो के काव्य पर समग्र और सटीक रूप से लागू की जा सकती हैं–

ऐसा है काल जहाँ सब कुछ है भग्न
या तो फिर सारा का सारा नग्न।

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