रवीन्द्रनाथ संवाद के कवि‍ : चक्रधर

नई दि‍ल्‍ली : रवीन्द्र संवाद के कवि थे। यह बात हि‍न्‍दी अकादमी, दि‍ल्‍ली के उपाध्‍यक्ष अशोक चक्रधर ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर की द्विपारवी, जन्मकथा और प्राज नामक कविताओं के उदाहरण देते हुए कही। उन्‍होंने कहा कि‍ रवीन्द्रनाथ ठाकुर कवियों के कवि हैं। नवजागरण की जो चेतना रवीन्द्र में है वही भारतेन्दु के साहित्य में भी दिखाई देती है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने हमें पहली बार भूमंडलीकृत होने का गौरव दिलाया। उन्‍होंने यह वि‍चार हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा 12 फरवरी को रवीन्द्रनाथ ठाकुर की 150 वीं जयंती के अवसर पर त्रिवेणी सभागार, तानसेन मार्ग, मंडी हाउस, नयी दिल्ली में आयोजि‍त संगोष्‍ठी में व्‍यक्‍त कि‍ए। संगोष्ठी की अध्यक्षता जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. बी.बी. भट्टाचार्य ने की।

डा. बलदेव वंशी ने कहा कि रवीन्द्र के समूचे साहित्य में अध्यात्म दृष्टि रूप में मिलता है। कबीर की वाणी का फक्कड़पन रवीन्द्र अपनी रचनाओं में लाए हैं। उन्होंने कबीर के सौ दोहों का अनुवाद भी किया। रवीन्द्र विश्‍व मानवता के ध्वज हैं। उन्होंने कहा कि हम रवीन्द्र जैसे कवि, चिंतक, औलिया और पैगम्बर के उत्‍तराधिकारी हैं। वह हमें ज्योति का महासमुद्र दिखते हैं। उन्होंने  रवीन्द्र की गीतांजलि पर चर्चा करते हुए कहा कि विश्व के किसी कवि ने इस प्रकार की कविता नहीं लिखी हैं। डॉ. वंशी ने गीतांजलि में संकलित भारतीय तीर्थ, धूलि मंदिर, जाने के दिन और मीत मेरे दो विदा पर विस्तार से चर्चा की।

डॉ. विभाष चन्द्र वर्मा ने कहा कि रवीन्द्र हिन्दी में भक्तिकाल और छायावाद दो प्रकार के बीच का सेतु हैं। निराला हिन्दी के पहले ऐसे कवि हैं जिन्होंने रवीन्द्र को हिन्दी भाषियों से परिचय कराया। रवीन्द्र के कवि और संगीत रूप को अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा रवीन्द्र की रचनाओं में साधारण मनुष्य की संवेदना दिखाई देती है। साहित्य की समस्त विविधता उनके साहित्य में मिलती है।
हिन्दी अकादमी के सचिव, प्रो. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ ने संगोष्ठी का प्रारंभ करते हुए कहा कि विश्‍व गुरू रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने न केवल बंगाल, बांग्ला और देश का गौरव बढ़ाया, बल्कि उन्होंने कविता नाटक आदि को नई दृष्टि दी जो अपने आप में विलक्षण है। उन्होंने कबीर को नये सिरे से गीतांजली में खोजा है। रवीन्द्र भारत के नवजागरण के अग्रदूत हैं। उन्‍होंने रवीन्द्र की ब्रज बोली रचनाओं की गहन समीक्षा और आलोचना किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. बी.बी. भट्टाचार्य ने कहा कि रवीन्द्र के संगीत में मनुष्य के जीवन के सभी पक्ष मिलते हैं। हर चिंता का समाधान उनके संगीत में है। रवीन्द्र विश्‍वगुरु और दार्शनिक थे। उन्होंने रवीन्द्रनाथ ठाकुर को पढ़ने की जरूरत पर बल दिया। दुख में रहकर भी मन को ऊपर कैसे करें, इसका समाधान भी रवीन्द्र के साहित्य में मिलता है।

इस अवसर पर ‘नृत्य के सौन्दर्यशास्त्र’ पुस्तक की लेखिका सुश्री शिखा खरे ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर में भानु पदावली पर अधारित कथक नृत्य की प्रस्तुति की।

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