रंजन जै़दी की दो गज़लें

रंजन ज़ैदी

सीतापुर, उत्तर प्रदेश में जन्में  रंजन जैदी के पाँच कहानी संग्रह, तीन उपन्यास और एक काव्य  संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इनके अलावा असंख्य लेख, साक्षात्कार, टिप्पणियाँ रेडियो आद‍ि विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। रंजन जैदी की दो गज़लें-

फिर कोई ख्वाब

खेल गुड़ियों का हकीकत में बदल जायेगा,
फिर कोई ख्वाब ग़मे-ज़ीस्त में ढल जायेगा।
बन्दन मुट्ठी से निकल आये जो सूरज बाहर,
मोम का शह्र है, हर सिम्त पिघल जायेगा।
देखते-देखते सब उड़ गईं चिड़िया यां  से,
अब मेरा घर भी कड़ी धूप में जल जायेगा।
एक मिट्टी के प्याले की तरह उम्र कटी,
धूप  की  तरह  रहा  वक़्त निकल जायेगा।
घर  की  दीवारें भी बोसीदः कफ़न ओढ़े हैं,
अबकी तूफाँ मेरे ख़्वाबों को निगल जायेगा।
हमने मायूस कमंदों से न जोड़े रिश्ते,
हिज्र की रात का ये चाँद है, ढल जायेगा।

बुलंदी

तुमको गर चाहिए बुलंदी तो,
सायबां को तलाश मत करना/
जिस सितारे को ढूँढते हैं लोग,
उस सितारे की तरह तुम बनना/
इन खलाओं में और सूरज हैं,
और सूरज में भी समंदर हैं/
तुम परिंदे हो आसमां में उड़ो,
बादलों पर यकीन मत करना/
धूप जिस्म को जलाती है,
रूह को जिलाती है/
धूप इक सियासत है,
इससे बेहतर है फासले रखना।
हमारी बेरुखी, उसकी मुहब्बत का ये आलम था,
नशेमन फूँक कर उसने मुझे कंगन दिखाए थे।
मेरे बिस्तर की हर सिलवट में लहरें थीं समंदर की,
कई तूफाँ थे पोशीदाः मगर तकिये छुपाये थे।
ये सच है इक ज़माने से मैं उसके साथ रहता था,
मगर ये भी हकीकत है के हम दोनों पराये थे।
दिए हैं ज़ख्म कुछ इतने के भरपाई नहीं मुमकिन,
मेरे ज़ख्मों ने मेरी सोच के मंज़र बदल डाले।



4 comments on “रंजन जै़दी की दो गज़लें

  1. दिए हैं ज़ख्म कुछ इतने के भरपाई नहीं मुमकिन,
    मेरे ज़ख्मों ने मेरी सोच के मंज़र बदल डाले।…ठीक लगा…

  2. Vivek Bhatnagar says:

    जैदी साहब की गजलें पढ़वाने का शुक्रिया… बेहतरीन गजल

  3. sumit says:

    ये सच है इक ज़माने से मैं उसके साथ रहता था,
    मगर ये भी हकीकत है के हम दोनों पराये थे।
    दिए हैं ज़ख्म कुछ इतने के भरपाई नहीं मुमकिन,
    मेरे ज़ख्मों ने मेरी सोच के मंज़र बदल डाले।
    bahut hi acchi line hai inke alawa ek do line aur bahut acch lagi jaise
    बन्दन मुट्ठी से निकल आये जो सूरज बाहर,
    मोम का शह्र है, हर सिम्त पिघल जायेगा।
    aur
    जिस सितारे को ढूँढते हैं लोग,
    उस सितारे की तरह तुम बनना

  4. sumit says:

    तुमको गर चाहिए बुलंदी तो,
    सायबां को तलाश मत करना/
    जिस सितारे को ढूँढते हैं लोग,
    उस सितारे की तरह तुम बनना/
    such ko darsati panktiya

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