मैकाले महाराज की जय

अब कहने वाले चाहे कुछ भी कहें, लेकिन मैं तो मैकाले महाराज की जय-जयकार करूंगा। मैकाले महाराज ने अंग्रेजी शिक्षा नीति लागू कर जो राह दिखाई, उसके लिए हम सदा उनके ऋणी रहेंगे। यह अभागा देश अंधकार में डूबा हुआ था। ज्ञान-विज्ञान का तो हमें पता ही नहीं था। ऐसे में मैकाले महाराज ने अंग्रेजी रूप ज्ञान की ज्योति से हमारा अंधकार दूर कर दिया। वास्तव में हम कूप मंडूक थे।

दीन-दुनिया की हमें कुछ खबर नहीं थी। कूप की दीवारों से टकराकर टर्र-टर्र करते रहते थे। मैकाले जी ने हमें कूप से निकालकर सीधा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ला खड़ा किया। भारत में समय-समय पर बहुत से महापुरुष हुए हैं। उन्होंने अपने विचारों और कार्यों ये देश व समाज की सेवा की है। लेकिन किसी भी महापुरुष की महानता को पूरे देश ने समान रूप से नहीं स्वीकारा। यहां तक कि भगवान की अवतार माने जाने वाले महापुरुषों को भी समान रूप से मान्यता नहीं मिली। विभिन्न विचारों और संप्रदायों में जैसे- हिंदू-मुस्लिम, दक्षिणपंथी-वामपंथी आदि में तो भवें तनी रहती ही हैं, लेकिन एक संप्रदाय और विचारधारा में जैसे- शैव-वैष्णव, माक्र्सवादी-लेनिनवादी, शिया-सुन्नी आदि में भी कम टकराव नहीं है। इनके कारण भाई-भाई तो क्या बाप-बेटे भी आमने-सामने आ जाते हैं। ऐसे में मैकाले महाराज और उनकी नीति ही पूरे देश में समान रूप से मान्य है। इस रूप में वह देश की एकता के स्रोत हैं।हर कोई अपने बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा देना चाहता है। इस मामले में धर्म, संप्रदाय और वर्ग आदि का भी कोई भेदभाव नहीं है। कुछ सिरफिरे और नासमझ हिंदी-हिंदी चिल्लाकर मैकाले महाराज का अपमान कर रहे हैं। प्रभु, ऐसे नासमझों को क्षमा करना। पहले मैं भी भटक गया था। अंग्रेजी का विरोध करता था। लेकिन अब मेरी समझ में आ गया है कि अंतरराष्ट्रीय होने के लिए अंग्रेजी आना जरूरी है। भले ही हमें पड़ोस में भी कोई न जानता हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय होना जरूरी है। अब मैं टूटी-फूटी ही सही, लेकिन अंग्रेजी बोलता हूं। लोग मुझे माडर्न समझते हैं। सही बात तो यह है कि मुझमें आत्मविश्वास पैदा हुआ है। हिंदी बोलता था तो हीन भावना से ग्रस्त रहता था। अब लगता है कि मुझे मैं भी दमखम है।मैकाले महाराज के चलते कितने ही लोगों का भला हो रहा है। उनकी बदौलत हजारों की रोजी-रोटी चल रही है। यदि अंग्रेजी शिक्षा नीति लागू नहीं होती तो राजभाषा विभाग की क्या जरूरत पड़ती? फिर उसके अधिकारियों और कर्मचारियों का क्या होता है? हर वर्ष हिंदी पखवाड़ा/सप्ताह मनाया जाता है। गोष्ठियां होती हैं। सेमिनार आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों से बहुत से लोगों का भला हो जाता है। कई लोग हिंदी की दुकान चलाकर अपना खर्चा-पानी चला रहे हैं। उनका क्या होता? भारत को विश्व की शक्ति बनना है तो मैकाले महाराज की नीति को शत-प्रतिशत अपनाना होगा। कुछ भटके हुए लोगों की बात में आकर मैकाले महाराज की उपेक्षाकर हिंदी अपना ली तो देश गर्त में चला जाएगा। हम सभ्यता और आधुनिकता की दौड़ में पिछड़ जाएंगे। जो लोग यह साजिश कर रहे हैं, उनका मिल-जुलकर विरोध करना होगा। यह कभी नहीं भुलना चाहिए कि हमें अंतरराष्ट्रीय होना है और इसके लिए भेजे में चाहे कुछ न हो, लेकिन जबान पर अंग्रेजी होनी चाहिए।



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