मेरा ओलियगाँव : शेखर जोशी

शेखर जोशी

शेखर जोशी

वरिष्ठ कथाकार शेखर जोशीजी की ‘लेखक मंच प्रकाशन’ से शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक ‘मेरा ओलियागांव’ के अंश ‘हर शुक्रवार’ के दीपावली विशेषांक में प्रकाशित हुए हैं। आप भी इन अंशों का आनंद लीजिए-

पक्की फसलों का सुनहरा सरोवर

हिमालय के प्रांगण में अल्मोड़ा जनपद की पट्टी पल्ला बौरारौ के गणनाथ रेंज की उत्तर-पूर्व दिशा में प्राय: 5500 फुट की ऊँचाई पर बसा मेरा ओलियगाँव दो भागों में विभाजित है। इस छोटे से गाँव में मात्र ग्यारह घर हैं। गाँव की बसासत ऊँचाई वाले भाग में  बांज, फयांट, बुरुँश, पयाँ और काफल के वृक्षों से घिरी है। ऊपर की पहाडिय़ों में चीड़ का घना जंगल है।

‘कुमाऊँ का इतिहास’ के लेखक पंडित बद्रीदत्त पाण्डे के अनुसार उन्नाव जनपद अन्तर्गत डोडिया खेड़ा नामक स्थान के प्रकाण्ड ज्योतिषी पंडित सुधानिधि चौबे ने कुँवर सोमचन्द से एक भविष्यवाणी की थी। वह यह थी कि यदि वह उत्तराखण्ड की यात्रा करें, तो उन्हें राज्य की प्राप्ति हो सकती है। तो, कुँवर 22 लोगों के साथ उत्तराखण्ड की यात्रा पर चले और ज्योतिषी जी की वाणी सच साबित हुई। कुँवर सोमचन्द ने कुमाऊँ में चन्द वंश राज्य की स्थापना की। सुधानिधि चौबे ने राज्य का दीवान बनकर चन्द राज्य को विस्तार और स्थायित्व प्रदान किया। सुधानिधि के वंशज इस राज्य के पुश्तैनी दीवान रहे। ज्योतिषी जी के गर्ग गोत्रीय वंशज झिजाड़ गाँव के जोशी कहलाए।

अनुमान किया जा सकता है कि झिजाड़ से कुछ परिवार नौ पीढ़ी पूर्व किसी सुरम्य स्थान की खोज में ओलियागाँव में आकर बस गए।

काठगोदाम-गरुड़ मोटरमार्ग पर मनाण और सोमेश्वर के बीच एक स्थान रनमन है। सड़क के दाँईं ओर खेतों से आगे कोसी नदी प्रवाहित होती है। दड़मिया का पुल पार कर जंगलात की सड़क पर आगे बढ़ें, तो मात्र आधा किलोमीटर चलने पर देवदारु का घना जंगल शुरू हो जाता है, जो प्राय: एक किलोमीटर तक फैला है और उसके बाद चीड़ वन प्रारम्भ होता है। इसी चीड़ वन से घिरा है ओलियागाँव शस्य श्यामल भूमि पर एक कटोरे के आकार में। गाँव के दोनों भागों के बीच कल-कल करती हुई एक छोटी नदी बहती है और उस पार चार मकानों के बाद गिरिखेत का मैदान, देवी थान और फिर सीधी चढ़ाई। इसी पहाड़ पर बहुत ऊपर बहता है, एक झरना। बरसात के मौसम में उस छोटी अनाम नदी की तेज धारा और इस झरने के शुशाट के कारण गाँव के आर-पार के घरों तक अपनी आवाज पहुँचाना मुश्किल हो जाता है।

गाँव की पूरब दिशा में बहुत दूरी पर भटकोट के शिखर दिखाई देते हैं, जिन पर सूर्य की किरण पड़ती हैं तो दिनारम्भ की प्रतीति होती है। इन्हीं शिखरों पर शीतकाल में पहली बर्फबारी होती है, तो ये रजत शिखर चमकने लगते हैं।

ऋतु परिवर्तन के साथ यह कटोरा भिन्न प्रकार के धान्य से भर उठता है। पहले धानी रंग के पादप, फिर खड़ी फसल की हरियाली और जब फसल पक जाती, तो धान्य का यह कटोरा सुनहरे सरोवर का रूप ले लेता है। घास के हाते ऊँची-ऊँची घास का कम्बल ओढ़ लेते हैं।

मैं भाग्यशाली था कि इसी गाँव में श्री दामोदर जोशी और श्रीमती हरिप्रिया जोशी के घर में सन 1932 के पितर पक्ष में तृतीया के दिन मेरा जन्म हुआ। नामकर्ण के दिन पुरोहितजी ने मुझे चन्द्र दत्त नाम दिया था, परन्तु वर्ष 1944 में मामा ने स्कूल में मेरा नाम चन्द्र शेखर लिखवाया। चन्द्र का दिया हुआ नहीं, शीर्ष पर चन्द्र धारण करने वाले शिवजी का पर्याय बना दिया।

हम तीन भाई-बहन थे। मैं उनमें सबसे छोटा था। कहा जाता है कि जब मैं पैदा हुआ, तब मेरी नाक बहुत चपटी और सिर हांडी जैसा था। लेकिन माता-पिता को अपनी सन्तान कैसी भी हो, बहुत प्यारी होती है। मैं सबका लाड़ला था।

गाँव में हर घर के साथ फल-फूलों के बगीचे थे, पेड़ थे। हम लोगों का बचपन पेड़ों के साथ, पशुओं के साथ और फूल-पत्तियों के साथ बीता। हमने यह भी सीखा कि किस तरह से अनाज बोया जाता है, अनाज उगता है और अनाज काटा जाता है।

खेती में लड़कपन में हमारा कोई विशेष योगदान नहीं होता था, लेकिन हमें इसमें बहुत आनन्द आता था, खास तौर से जब धान की रोपाई होती थी। एक छोटे खेत में बेहन बोया जाता था। उसमें खूब घने पौधे होते थे। जब वे बड़े हो जाते थे, करीब 6-7 इंच ऊँचे, तो उनको वहाँ से उखाड़कर दूसरे खेतों में रोपते थे। उससे पहले जिन-जिन खेतों में रोपाई होनी होती, उनको पानी से खूब सींचा जाता। पानी से भरे खेत में दाँता चलाया जाता, जो कि मिट्टी के ढेलों को तोड़ देता। उससे खेत की मिट्टी समतल हो जाती थी। धान रोपाई का काम पूरे दिन का होता था। बहुत से खेतों में रोपाई होती थी, तो खूब सारे मजदूर लगते थे। वे लोग भी उसको एक उत्सव की तरह से मनाते थे, क्योंकि उस दिन उनको खूब अच्छा खाना मिलता था—रोपाई वाला। उस दिन हलवाहे की विशिष्ट भूमिका होती थी। अगर हलवाहा हुड़किया भी होता, तब तो उसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती थी। हुड़किये का मतलब यह है कि वह डमरूनुमा वाद्य ‘हुड़कीÓ को हाथ में लेकर बजाता और पगड़ी बांध कर खेत में सिर्फ गाता फिरता। कतार में औरतें पूलों में से पौधे लेकर रोपती जातीं। अलग-अलग जगहों पर पूले रख दिए जाते। औरतें पूले खोलकर उनमें से पौधें निकालतीं और रोपती जातीं। हुड़किया चंद्राकार या सीधे पीछे हटता जाता और हुड़की बजाता हुआ गाता जाता। वह कोई कथानक लगा देता—राजा भर्तृहरि या राजा हरिश्चन्द्र का, बम-बम्म-बम… हुड़की की आवाज के साथ। औरतें आखिर में टेक लेतीं और वे भी साथ में गातीं। खेत में जाने से पहले हरेक को रोली और अक्षत का टीका लगाया जाता। उस दिन उनके लिए विशेष किस्म का कलेवा बनाया जाता—मोटी रोटियाँ होती हैं, बेड़ुवा मतलब मंडुवा और गेहूँ की मिली हुईं रोटियाँ, कुछ पूडिय़ां और सब्जी। कलेवा हुड़किया के लिए अलग, हलवाहे के लिए अलग, हलवाहे की पत्नी के लिए अलग और आम महिलाओं के लिए अलग बनता। दिन में सभी के लिए खेत में ही दाल-भात पहुँचाया जाता। सभी भर पेट खाना खाते और उनके बच्चे भी आ जाते। शाम को जब औरतें काम खत्म कर देती थीं, तो हाथ-पैरों में लगाने के लिए उनको थोड़ा-थोड़ा तेल दिया जाता था।

खेतों में बने बिलों में पानी भर जाने से बड़े-बड़े चूहे निकलते थे। शाम को अगर खेत बकाया रह जाता, तो मालिक नाराज न हो जाए, इसलिए हुड़किया हुँकारी लगाता था—’धार में दिन है गो, ब्वारियो…। छेक करो, छेक करो।’ मतलब कि चोटी पर सूरज पहुँच गया है। जल्दी करो, बहुओ, जल्दी करो।

कार्तिक में जब धान की फसल पक जाती थी, तो उसकी पूलियाँ खेत में ही जमा करके रख दी जाती थीं। धान की पेराई के लिए इस्तेमाल होने वाली बाँस की चटाइयाँ को ‘मोस्टÓ कहते थे। ये पतले बाँस की नरसल की चटाइयाँ होती थीं, जो कि 10 फुट बाई 10 फुट या 8 फुट बाइ 8 फुट की होती थीं। ये चटाइयाँ बड़े खेत में बिछा दी जाती थीं और उनमें धान के पूले रख दिए जाते थे। लकड़ी का बड़ा-सा कुंदा रखकर उसमें धान को पछीटा जाता था। पूलियों में जो धान रह जाता, उसे पतली संटियों से झाड़ा जाता था। धान के खाली पराल को अलग करते। चाँदनी रात को पूरी रात यह कार्यक्रम चलता। एकाध बार मैं भी जिद करके इस तरह के कार्यक्रम में गया। कई मजदूर लगे थे। हमारी ईजा भी गई थीं। धान की वह खुशबू और चाँदनी रात, बहुत आनन्द आता था।

धान की पकी फसलों को नुकसान पहुँचाने में जंगली सुअरों का बड़ा हाथ रहता। वे अपनी थूथन से खेत की मिट्टी को खोद कर न जाने क्या ढूँढ़ते रहते। लीलाधर ताऊजी के पास एक भरवाँ बन्दूक थी, जिसमें बारूद, साबुत उड़द के दाने, कपड़े का लत्ता, ठूँस-ठूँस कर ट्रिगर के ऊपरी सिरे पर टोपी चढ़ाने के बाद फायरिंग की जाती, तो सुअर भाग जाते। यह काम देर रात में किया जाता था।

इस बन्दूक से जुड़ा एक रोचक प्रसंग है, जिसने हमें बचपन में बहुत गुदगुदाया था। हमारी माधवी बुआ की ससुराल मल्ला स्यूनरा में थी, जो हमारे गाँव से अधिक दूरी पर नहीं था।

उस बार उनका पोता राम अकेला ही अपनी दादी के मायके में आया था। वह 14-15 वर्ष का किशोर बहुत ही दुस्साहसी था। ताऊजी की भरवाँ बन्दूक उनके शयनकक्ष में कोने पर टंगी रहती थी। एक दिन महाशय राम की नजर उस पर पड़ी। उसने साबुत उड़द के दाने, पुराने चिथड़े, कुछ कठोर पत्थर के टुकड़े जमा किए। उसे न जाने कैसे बारूद का पाउडर भी आलमारी में मिल गया था। उसने खूब ठूँस कर बारूद से सना यह सामान बन्दूक की नाल में भरा। अब समस्या ट्रिगर (घोड़ी) में पहनाने वाली टोपी की थी। वह नहीं मिली, तो राम ने ट्रिगर उठा कर छेद के मुँह के सामने जलता चैला (छिलुक) रख दिया। बन्दूक ऊँचाई पर टिकाई हुई थी। उसके अन्दर भरे मसाले में आग लगी, तो बारूद विस्फोट करता हुआ, दीवार के ऊपर रखे ताऊजी के जूते से टकराया। दूसरी तरफ छिद्र से निकली चिंगारी के छींटे राम के कपाल पर जा लगे। खैरियत यह थी कि उसकी आँखें सुरक्षित रहीं। गाँव के लड़कों की तरह वह टोपी पहने रहता था। उस दिन राम ने अपनी टोपी आँख की भँवों तक खींच रखी थी। हादसे के बाद वह बन्दूक को यथास्थान रख आया ।

बाद में ताऊजी जब अपना जूता पहनने लगे, तो उसमें बड़ा-सा छेद देख कर वह चौंके। राम ने उन्हें बताया कि एक काला कुत्ता जूतों के पास बैठा था। शायद उसी की यह कारस्तानी हो। लेकिन जब किसी ने राम की टोपी को ऊपर खिसका कर ठीक से पहनाने की कोशिश की, तो ललाट में चानमारी के निशानों ने उसकी पोल खोल दी। राम अपने गाँव भाग गया।

पकी फसलों, विशेषकर धान के खेतों के बीच से गुजरने का अपना आनन्द होता था। पके धान की मादक गंध तन-मन को एक नई स्फूर्ति से भर देती थी।

धान की पेराई के अलावा मुझे गेहूँ की मड़ाई में भी बहुत आनन्द आता था। गेहूँ की पूलियाँ घर के आँगन के ऊपर वाले खेत में लाकर जमा कर दी जाती थीं। आँगन की खूब अच्छे से सफाई करके लिपाई कर दी जाती थी। जब आँगन सूख जाता, तो पूलियाँ आँगन में फैला दी जातीं। फिर बैलों को गेहूँ की बालियों के ढेर के ऊपर चलाया जाता था। हम बच्चे उनके पीछे-पीछे हाथ में संटी लेकर चलते थे—’हौ ले बल्दा, हौ ले- हौ ले… कानि कै लालै बल्दा… पुठि कै लालै, हौ ले-हौ ले…’ मतलब बैल राजा चल/धीरे-धीरे चल/कंधे में लाद कर लाएगा, पीठ पर लाद कर लाएगा/बल्दा चल। बैल गेहूँ की पूलियों को अपने पैरों से कुचलकर दानों को अलग कर देते थे। बैल गेहूँ न खा लें, इसलिए उनके मुँह में जाली बांधी जाती थी। बाद में सूपों से या चादरों से हवा करके भूसे को उड़ाया जाता। एक सयाना इधर से, तो दूसरा उधर से चादर पकड़ता और चादर को तेज-तेज ऊपर-नीचे कर हवा करते। इससे भूसा उड़ता जाता और गेहूँ नीचे गिरता जाता। उसके बाद हम बच्चे जहाँ गाय-भैंस चरने जातीं, वहाँ से सूखा हुआ गोबर लेकर आते। पहाड़ में गोबर का ईंधन के रूप में इस्तेमाल नहीं होता था, क्योंकि गोबर खेती के लिए बहुत जरूरी होता है, इसलिए उसे बरबाद नहीं किया जाता। गोशाला की रोज सफाई होती। गोबर को गोशाला के बाहर डाल दिया जाता। वहाँ खाद का ढेर लगा रहता। जो घास पशुओं के नीचे बिछाई जाती, वह उनके पेशाब और गोबर में सन कर सुनहरी खाद हो जाती। वही जैविक खाद खेतों में डाली जाती थी। वह खाद फर्टिलाइजर से कहीं ज्यादा अच्छा होती थी।

हम बच्चे सूखा हुआ गोबर लेकर आते थे। उस गोबर का ढेर लगा करके उसमें आग लगा दी जाती थी। उसके जलने से राख बनती। बाँस की चटाइयाँ बिछा कर और उन पर गेहूँ डाल कर उसमें राख डाली जाती। फिर पैरों से उसको मिलाया जाता। राख कीटनाशक दवा का काम करती थी। यह गाँव की विधि थी कि किस तरह से अनाज को सुरक्षित किया जाता था। जिन चटाइयों पर खेती का काम होता था, उनको ऐसे ही लपेट कर नहीं रखा जाता था। उन चटाइयों के लिए बकायदा गोशालाओं में गाय का या अन्य पशुओं का मूत्र कनस्तर में इकट्् ठा किया जाता था। पशुओं के मूत्र को इन चटाइयों पर छिड़का जाता था। उससे एक तो चटाइयों में लचीलापन आ जाता था। दूसरा, कीड़े नहीं लगते थे। इससे ये चटाइयाँ वर्षों चलती थीं। मूत्र सूखने पर चटाइयों को लपेटकर टाँड़ के ऊपर डाल दिया जाता। जब जरूरत हुई, तब निकाल लिया जाता।

हम बच्चे बचपन से ही खेती-बाड़ी के बारे में जान जाते थे और अपनी क्षमता के अनुसार कुछ करते भी रहते थे। जैसे—गर्मियों में बैंगन और मिर्च की पौध लगाते। हम अपनी-अपनी क्यारियाँ बनाते थे। फिर उनमें मिर्ची और बैंगन के पौध रोपते थे। भिंडी की पौध नहीं होती थी। भिंडी के बीज बोए जाते। शाम को हम पौधों  में गिलास से पानी डालते थे। फिर पौधों का क्रमिक विकास देखते थे—पौधे बड़े होते जाते। फिर उनमें फूल लगते। इसके बाद उनमें फल लगते। जब पौधों में पहला फल दिखाई देता, तो हमें बहुत खुशी होती। अगर कोई सीधी उंगली से फल की तरफ इशारा कर देता, तो हम टोकते कि ऐसा करने से सड़ जाएगा। उंगली टेढ़ी करके दिखाना होता था कि वह देखो, फल आ गया है।

इस तरह का मनोविज्ञान और लगाव बचपन से वनस्पतियों के साथ था।

पहाड़ों में मैदानी इलाकों की तरह पतली ककड़ी नहीं होती। वहाँ बड़ा खीरा होता है जिसे कहते ककड़ी ही हैं। खीरे की बेल को कोई सहारा देना पड़ता है। बेलों के सहारे के लिए कोई छोटा पेड़ काटकर या पुराने पेड़ की टहनी को काटकर उसे लगाया जाता था। बेल उस पर लिपट कर चढ़ जाती। पेड़ के सहारे खीरे लटके रहते थे। जब फसल समाप्त हो जाती, तो बेल को निकाल दिया जाता। उसमें छोटे-छोटे खीरे लगे रहते थे। इनकी अब बढऩे की सम्भावना नहीं रहती थी। हम बच्चे उनको निकालकर उन पर सीकों की टाँगें लगाकर बकरे की तरह से उनकी बलि देते थे। ऐसा हमने मन्दिरों में देखा होता था, जहाँ बलि दी जाती थी। मेरी एक कविता है–

काली की बलि पूजा का स्वांग,
रचा लगा तिनकों की टाँग
हरी ककड़ी के अन्तर को छेद
छिन्न कर उसका मस्तक बाँटा प्रसाद
न रखा छूत-अछूत का भेद।

खट्टे अनार को दाडि़म कहते हैं। पन्सारी के यहाँ चटनी के लिए जो अनार दाना बिकता है, वह दाडि़म का ही बीज होता है। दाडि़म का फूल सिन्दूरी रंग का होता है। आरी के दाँतों की तरह तिकोनी उसकी चार-पाँच पंखुडिय़ाँ होती हैं। उसको उल्टा करके रख देने से फूल खड़ा हो जाता। वे फूल पेड़ों के नीचे खूब गिरे रहते थे। हम उनको इकट्ठा करके लाते और कतार में रखकर बारात निकालते थे। उनमें सींकें लगाकर डोली वगैरह बना लेते. इस तरह के खेल होते थे हमारे जो वनस्पति संसार से हमको जोड़ते थे।

बिगौत की दावत

हमारे घर में गायें थीं। हमारी सबसे प्रिय गाय का नाम बसंती था। वह ईजा के मायके से आई हुई गाय की तीसरी पीढ़ी की थी, इसलिए ईजा उसको बहुत प्यार करती थीं। हम भाई-बहन उसको मौसी कहते थे। मैं जब थोड़ा बड़ा हुआ, तो कभी-कभी गायों को ग्वाले के पास छोडऩे के लिए ले जाता था। एक बार मैं बसंती के साथ छेड़-छाड़ कर रहा था—कभी उसके थन में हाथ लगा देता, तो कभी उसकी पूँछ को पकड़ कर सिर पर लगा देता।

बसंती ने सींग हिलाकर मना किया, लेकिन मेरी शैतानी बढ़ती गई। पहाड़ी रास्ते घुमावदार होते हैं। आखिर में तंग आकर बसंती ने सिर नीचा करके मेरी टाँगों के नीचे से सींग डाले और मुझे उठाकर ऊपर घुमावदार रास्ते पर रख दिया। जैसे—मुझे सजा दे दी हो। तब में समझ गया कि ज्यादा छेड़-छाड़ नहीं करनी चाहिए।

यह बात बसंती के प्रसंग में समझ में आई कि पशु मनुष्य की भाषा कैसे समझते थे। जब खेतों में फसल कट जाती थी, तो पशुओं को कुछ दिनों तक उन्हीं खेतों में चरने के लिए छोड़ दिया जाता था। एक बार कोई मेहमान आए, तो उस समय घर में चाय के लिए दूध नहीं था। ईजा ने खेत की तरफ जाकर बसंती को हाँक दी। बसंती ने सिर उठाकर ऊपर देखा। ईजा ने कहा, ”आ बसंती।’’ वह नजदीक आ गई। ईजा के हाथ में गिलास था। ईजा ने उस गिलास में थोड़ा दूध दुहा। फिर ईजा ने बसंती से कहा, ”अभी ठहर’’ और बसंती खड़ी रही। जैसे—सब कुछ समझ रही हो। ईजा घर आईं। गिलास अलमारी में रखा। कटोरदान से एक रोटी निकाल कर बसंती के लिए ले गईं। ईजा ने बसंती को रोटी खिलाकर उसकी पीठ थपथपाकर कहा, ”जाओ’’ तो वह चली गई। इस तरह का सम्वाद पशुओं और मनुष्यों के बीच होता था।

और थोड़ा बड़े होने पर एक और घटना मेरे जीवन में घटी। हमारे गाँव के एक परिवार की गाय सुरमा थी। सफेद रंग की बड़ी खूबसूरत गाय थी। हमारे पंचायती ग्वाले मोहनदा को उस गाय से बहुत लगाव था। सुनते हैं कि वह अपने दिन के कलेवे से एक रोटी बचाकर सुरमा को खिलाते थे। सुरमा भी उनको बहुत प्यार करती होगी। एक बार मोहनदा काफल तोड़ते हुए पेड़ से नीचे गिर गए। वह शाम को जब जंगल से लौटते थे, तो बच्चों के लिए मौसम के हिसाब से जंगली फल लेकर आते थे। वह हम बच्चों के लिए काफल लाने के लिए पेड़ पर चढ़े होंगे, गिर गए। शाम हो गई। सारी गायें अपने-अपने बच्चों की याद कर घर चली आईं, लेकिन सुरमा मोहनदा के पास ही रह गई। मोहनदा उठने में लाचार थे। गाँव वालों ने देखा कि सभी गायें चली आई हैं, लेकिन मोहनदा साथ में नहीं हैं। सुरमा के घरवालों ने देखा कि सुरमा भी नहीं आई है। सब लोग दौड़े-दौड़े जंगल की तरफ गए। वहाँ देखा कि मोहनदा गिरे हुए हैं और सुरमा उनको चाट रही है। मोहनदा को उठा कर लाया गया और पीछे-पीछे सुरमा भी आ गई।

वह ऐसे आई, जैसे—मोहनदा की माँ हो।

हमारे ईजा-बाबू में एक गाय को लेकर खूब मतभेद हुआ था। इसकी याद मुझे आज भी है। हुआ यह कि एक दिन बाबू कहीं जा रहे थे। उन्होंने देखा कि पड़ोसी  गाँव का एक आदमी अपने ढोरों को चरा रहा है। सभी पशु बहुत दुर्बल हो रहे थे। पैलागी-आशीष के बाद बाबू ने उन पशुओं की हालत पर चिंता जताई, तो वह व्यक्ति अपने पास घास-चारा न होने का रोना रोने लगा। उसने आग्रह किया कि एक गाय बाबू रख लें।

बाबू ने विनोद के लहजे में कहा, ”अब इस हाड़ के पिंजर का गोदान लेने के लिए मैं ही रह गया हूँ?’’

उस व्यक्ति ने फिर जिद की, ”आप वैसे न रखो, तो कुछ दाम दे देना, लेकिन आपके घर में यह पल जाएगी। मेरे घर में तो यह भूखी मर जाएगी और मुझे गोहत्या लगेगी। अच्छी नस्ल की गाय है, पर मुझ अभागे के घर आ मरी।’’

बाबू तब भी सहमत नहीं हुए तो वह गिड़गिड़ाया, ”आप पन्द्रह रुपये ही दे देना। उससे मैं दूसरे पशुओं के लिए घास खरीद लूँगा। मेरे दोनों ‘लुट’ इन्होंने चट कर दिए हैं।’’

उसकी इस दलील पर बाबू पसीज गए। उन्होंने उसे पन्द्रह रुपये देकर गाय हमारे घर पहुँचाने का आदेश दिया।

वह सफेद रंग की कद्दावर गाय थी। उसके सींग बैलों की तरह खूब बड़े थे। थनों के अलावा उसमें कोई भी लक्षण स्त्रैण होने का नहीं दिख रहा था। ईजा की पहली प्रतिक्रिया हुई, ”यह गाय है या बैल?’’

वह व्यक्ति गाय को गोशाला में खूँटे पर बाँधकर चला गया।

कहाँ ईजा की सुन्दर सलोनी बसंती गाय और कहाँ यह हड्डियों का ढाँचा!

नई गाय उपेक्षित ही रही। उस गाय को लेकर ईजा के अलावा दूसरा विरोध पंचायती ग्वाले मोहनदा का था। यह एक अलिखित नियम था कि गाँव में किसी गृहस्थ में किसी पशु की खरीद-फरोख्त हो, तो उसमें मोहनदा की सहमति जरूरी मानी जाती थी। इस बार ऐसा नहीं हुआ था। मोहनदा गुस्साए हुए थे। दूसरे दिन एक आँख के धनी मोहनदा ने पशुओं को जंगल ले जाते हुए इस गरीब जीव को हाँक कर भगा दिया। वह इधर-उधर डोलती रही।

बाबू ने मोहनदा को पूरी बात बताई, तो वह नरम पड़े, लेकिन ईजा के विचारों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। वह घर की जूठन पूर्ववत अपनी लाड़ली बसंती को देती रहीं और इसकी भरपूर उपेक्षा करती रहीं। लेकिन बाबू हार मानने वाले व्यक्ति नहीं थे। वह भिगोए हुए भट और दूसरी पौष्टिक चीजें गो-ग्रास के पिण्ड में रखकर उसे खिलाते और उसके लिए अच्छा चारा छाँटकर अलग रखते।

कुछ दिनों बाद उस गाय की काया में सुधार आने लगा। उसके दूध की मात्रा भी बढ़ गई। बाबू कहते, ”इसका दूध अलग से गर्म कर उसे दूसरी ठेकी में जमाया करो। यह अच्छी नस्ल की गाय है। इसके दूध में चिकनाई ज्यादा है। इसके मक्खन में ज्यादा घी निकलेगा।’’ ईजा मुँह बिचकाती, लेकिन बाद में यह बात सच निकली।

उस गाय को हमारे गोठ में मान्यता प्राप्त करने में काफी समय लगा। इसका एक कारण शायद उसका कद और बड़े सींग भी थे और बसंती की तुलना तो थी ही!

गोधूलि में गले में बंधी घंटियों के साथ गायों का जंगल से लौटना बड़ा मोहक होता था। एक मुख्य गाय होती थी। उसके गले में एक गोल खोखल ताम्बे या पीतल का पाइप जैसा होता था। उसके अन्दर टकराने वाला लकड़ी का एक टुकड़ा होता था। जब गाय चलती थी, तो घन-घन-घन-घन-घन की आवाज आती थी। अन्य गायें मुख्य गाय के पीछे-पीछे आती थीं। यह एक संकेत होता था कि गायें लौट आई हैं। घन-घन-घन की आवाज को बछड़े भी सुनते होंगे, तो वे भी अपनी भाषा में खुशी जताने लगते थे। गाय के गले में बंधे पाइपनुमा वाद्य की घन-घन चिडिय़ों की चहचहाट के साथ एक मधुर सांगीतिक रचना प्रस्तुत कर देती थी।

गायें जब जंगल से लौटतीं, तो कभी-कभी, कोई गाय बेचैन-सी दिखाई देती। घर वाले उसकी बेचैनी का कारण समझ जाते और एक छोटे टब में पानी लाकर उसमें मुट्ठीभर नमक घोलकर उसके सामने रख देते। वह ज्यों ही पानी पीती, उसकी नाक के दोनों छेदों से लपलपाती हुई जोंकें बाहर निकलतीं, जिन्हें हाथ से खींचकर बाहर फेंक दिया जाता। जो जोंकें नमकीन पानी में गिर जातीं, वे तत्काल विलीन हो जातीं। जोंकों से मुक्ति पाकर गायें फिर सहज हो जाती थीं। पहाड़ों में गीली जगहों पर जोंकें रहती हैं और पैदल चलने वालों के पैरों से चिपक कर खून चूसने के बाद मोटी होकर अपने आप गिर जाती हैं। आदमी को जब पैर में खुजली होने लगती है, तब उसे इस शोषण का पता चलता। मेरे साथ जब भी ऐसा हुआ, खुजलाने पर उस जगह सूजन आ जाती थी।

जब गायें बियाती थीं, तो सयाने लोग 22 दिनों तक उनका दूध नहीं पीते थे। गाय बियाने के 22वें दिन लापसी बनाई जाती थी और चमू देवता के थान पर चढ़ाई जाती थी। चमू पशुओं के देवता होते हैं। उसके बाद सयाने लोग भी दूध पीने लगते थे। लेकिन इस बीच दूध को गर्म करने पर वह छेने जैसा हो जाता था। पहाड़ में उसे बिगौत कहते हैं और मैदानी इलाके में खिजरी। प्राय: गाय दूध कम देती थी। ऐसा होता नहीं था कि पूरे गाँव के बच्चों को खिजरी खाने के लिए एक साथ बुला लिया जाए। ऐसे में एक-एक घर के बच्चों को बुलाया जाता था। उनको खिजरी दी जाती थी। फिर दूसरे दिन अगले घर के बच्चों को बुला लिया जाता। ऐसे मौके कई आते थे। लोगों की गाय बियाती थी, तो दूध फेंका नहीं जाता था, बच्चों को दिया जाता था। आज भी खिजरी खाने की इच्छा होती है।

गायों के नवजात बछड़ों को कुलाँचे भरते देखने का सुख और उनके साथ हाथ-पैरों के सहारे उछल-कूद करने का सुख जिन बच्चों ने उठाया है, वे ही इसकी ताईद कर सकते हैं।

अन्न और गोरस के प्रति बहुत आदर भाव प्रदर्शित किया जाता था, क्योंकि ये दोनों ही जीवनदायी तत्व माने जाते थे। दूध या दही यदि भूमि पर गिर जाता, तो उसे तत्काल पोंछ दिया जाता था ताकि किसी का पैर उस पर न पड़े। इसी प्रकार अन्न को भी पवित्र माना जाता था।

6 comments on “मेरा ओलियगाँव : शेखर जोशी

  1. सुन्दर तब और आज सब कुछ बदल चुका है ।

  2. ankur kandpal says:

    sundar..kai yaade taaza ho gaye apne gaoun se jude….wakai mai jo antarmann ki shanti gauon mailye thi wo…kai saalo se nhi mil paye hai…aaj palayan ne pahado k gaoun ki raunak hi khatam karde hai

  3. vineet says:

    बहुत सुन्दर चित्रण, अपना गाँव याद आ गया.

  4. बहुत सुंदर……पूरी किताब एक साथ पढ़ने का इंतजार है। हाँ, एक बात की ओर जरूर ध्यान दिलाना चाहता हूँ…ओलिया गाँव समेत समूची बौरा रौ घाटी में धान की फसल असोज(आश्विन) में पकती है,कार्तिक में नहीं।

  5. कपि‍लेश जी, आपने धान की फसल के पकने के महीेनेे की ओर जो ध्यान दि‍लाया है, उसके लि‍ए आभारी हूं।
    अनुराग

  6. MEENA PANDEY says:

    सुन्दर चित्रन…अभिनन्दन्

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