मीडिया क्या है ? : नित्यानंद गायेन

जन सरोकारों से कट चुके मीडिया पर चल रहे प्रहसन पर युवा कवि नित्‍यानंद गायेन की कविता-

मीडिया दूर-दर्शन है
सरकारी वाचक है
मीडिया प्रभु है
बरखा है
वीर है
मीडिया–
दिशाहीन योद्धा का
छोड़ा हुआ तीर है

मीडिया–
सत्ता है
राडिया है
बहुत बढिया है
नोट के बदले
खबर है मीडिया
स्टिंग आपरेशन है
शोषण है
बार-बार एक ही समाचार
लगता है लूज मोशन है
मीडिया राखी सावंत है

मुठभेड़ है
मीडिया मतभेद है
हमें इसका बेहद खेद है
मीडिया डांस-डांस-डांस है
सास-बहू और साज़िश है
अपवाद है
अवसाद है
मीडिया अवसरवाद है
कुछ एकदम बर्बाद है

सबसे आगे
सबसे तेज़ है
सनसनी है
मीडिया वारदात है

यह सर-देसाई है
ज्ञानियों का
दबंगों का हक़ है
गुड लक है
मीडिया जानता है
जनता अनपढ़ है
भुलक्कड़ है
यह टी.आर.पी. की होड़ है
भ्रष्टाचार का नया पेड है
अदालत है
मीडिया कुछ लोगों की वकालत है
नेता-उद्योगपतियों का
पूंजी निवेश कुञ्ज है
यह हाथी का सूंड है

मीडिया —
तुलसी-मिहिर का
प्रेम प्रसंग है
खली है
महाबली है
मीडिया ख़बरों की उछाल है
देश में भूचाल है
मीडिया मायाजाल है …

22 comments on “मीडिया क्या है ? : नित्यानंद गायेन

  1. It seams that media is representing the Croudism. no democracy no rule no Discipline like a person takes the sheeps from one place to another same money and power gides the media

  2. bhaskar choudhury says:

    Fine!!
    Threw light on various hidden and unhidden colours of media quite nicely.well done. Also having nice touch of humour…
    Bhaskar.

  3. समय के सच को मुखर करती रचना…..

  4. Raj singh says:

    मीडिया गरीबों की बेमानी आवाज़
    भट्टापरसौल और सिंगूर है
    मीडिया वाद है विवाद है
    पेचीदा सवालों का अनसुलझा जवाब है
    मीडिया एंकर है रिपोर्टर है
    और कुछ सिरफिरे लोगों का दिमागी टेंशन है
    जो भी है जैसा भी है पैसा वसूल है
    लेकिन फिर भी मीडिया फ़िज़ूल है

  5. Rajesh Prabhakar says:

    wahh Nityanand sabah, kya katakch mara hai media pe jo ki bilkul sahi hai.
    Fully appreciated by every one….good creativity.

  6. अवैद्यनाथ दुबे says:

    कविता के जरिये मीडिया का अच्‍छा विश्‍लेषण है।

  7. Pramod dhital says:

    media ka samasamaik chehara ka achxhha chitran kiya hai aapne

  8. मीडिया बिग बॉस भी है
    नुक्‍कड़ भी है मीडिया
    कविता एकदम बढि़या
    चढ़ गई है अनेक सीढि़यां
    तर जाएंगी इससे जरूर
    प्रिंट और चैनलों की पीढि़यां

  9. R.Khanna says:

    Bahut sehaj roop se Gehrayi bayan karti kavita..

  10. amit tanwar says:

    Media mayawati hai…
    Khub nityanand…

  11. मीडिया सब कुछ है, बस मीडिया नहीं है…

  12. sumit says:

    media ke bare me acchi kavita hai….Media ko north-east ke states, Aadhiwasi cheter ya desh ke dur daraz ke logo ki samsya nahi dikayi deti…….Media ke liye Cricket, Filmi Gosip aur ab Netao ke upvas aur unki yatrayein hi sab kuch ho gaye hai – Jai ho

  13. media ke virat sawroop par likhi kavita hetu dhanyawad.shabd moti hai.rasul hamjatow kahate hai,jaha murge se kam chal jaye waha bakra na mara jaaye.

  14. Mushahid AKHTAR says:

    Media sachcha samachar hi, media ghuskhora ka muh todda jawab hi media sachchai ko samni lane ka saman hi media esli to mahan hi.

  15. vivek singh says:

    kya baat kahi hai…aap jaise likhne walo ki jaroorat aaj ke bharat ko hai…

  16. Piyush says:

    sai kaha sir apne media ki sachai yehi ae….

  17. Dilip Kumar Sharma 'Agyat' says:

    Nityanand jee,
    Aap ki yah kavita media ka mahakosh ban gaya hai. Jo bhi media par koi bat hoga Aap ki yah kavita yad ki jayegi.
    – Agyat

  18. Surajit Halder says:

    Very Nice…………….

  19. wah wah!!!!…laajawab!!!!…ye tho sachme bahuth achi hain!!!!

  20. नित्यानंद जी की कविताओं में संचार तंत्र का सत्य वह क्यों न हो संचार तंत्र की दुनिया की मुझे जो सीमित जानकारी और व्यावसायिक अनुभव है, उसके आधार पर यह कहूँगा कि समाचारतंत्र कर्मठ बौद्धिक आधार से बंधा नहीं है , पत्रकार एक नियत वेतनधारी कर्मचारी की भूमिका में प्रबंधन के निर्देशों का पालन करते हैं. संपादक भी अब स्वतन्त्र नहीं,मौलिक समाचार स्रोत भी एकपक्षीय होते हैं. मीडिया विद्यालयों के चलन बढ़ने से यह खतरा भी बढ़ता जा रहा है, क्योंकि तकनीकी दक्षता के बावजूद इस नये पत्रकारवृन्द को निरंतर तनाव झेलने की हिम्मत नहीं है. तीन दशक पूर्व , पत्रकार निज राजनीतिक झुकाव, शैक्षणिक पृष्ठभूमि और व्यापक संपर्क संजाल के भरोसे समाचार और विचार समाचारपत्रों की थाली में परोसते थे, अब ‘ पेड पत्रकारिता’ का दौर है, प्रायोजित समाचारों के ढेर में अकुलाये पाठक आसपास की घटनाओं और राजनीतिकों पर खुद नज़रें टिकाये रहते हैं और निर्णायक घड़ी में अपना निर्णय दे पाँसा उलट-पलट कर देते हैं. उन्हें केवल पत्रकारों द्वारा एकत्रित आकड़ों और सूचनाओं पर भरोसा है जो उन्हें कई खेमों से उपलब्ध होता है. लोकतंत्र में कुछ ही पत्रकारों का प्रतिबद्ध समूह ही विश्वसनीय हैं , जिनपर आज की पत्रकारिता इतराती है…आपको कविता के लिए बधाई ।

  21. क्या बात है
    खडी सबकी खाट है
    चार टांग थी
    दिखाई इनकी पाचवी
    लात है , क्या बात है

  22. राजकुमार राव says:

    अति सुन्दर

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