भाषा नहीं रहेगी तो हमारी पहचान भी लुप्त हो जाएगी : बिष्ट

कवयित्री देवकी मेहरा को शेर सिंह बिष्ट 'अनपढ़' कुमाउनी कविता पुरस्कार से सम्मानित करते हुए।

कवयित्री देवकी मेहरा को शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ कुमाउनी कविता पुरस्कार से सम्मानित करते हुए।

अल्मोड़ा : ‘कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति’ और ‘पहरू’ पत्रिका ने संयुक्त रूप से 12, 13, व 14 नवम्बर को आठवाँ ‘राष्ट्रीय कुमाउनी भाषा सम्मलेन’ जिला पंचायत सभागार, अल्मोड़ा में आयोजि‍त कि‍या। इसमें दिल्ली, लखनऊ, संभल, सहारनपुर, चंदौसी, फरीदाबाद, देहरादून और कुमाऊँ मंडल के सभी जिलों से आए हुए लगभग 160 कुमाउनी के साहित्यकारों और कुमाउनी भाषा प्रेमियों ने भागीदारी की।

सम्मेलन में कहानी, कविता, गीत, लेख, हास्य, रिपोर्ताज, शब्दचित्र आदि विधाओं की कुल 10 पुस्तकों का लोकार्पण किया गया।

इस बार देवकी महरा को शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ कुमाउनी कविता पुरस्कार, खुशाल सिंह खनी को बहादुर बोरा ‘श्रीबंधु’ कुमाउनी कहानी पुरस्कार, त्रिभुवन गिरि को शेर सिंह मेहता स्मृति कुमाउनी उपन्यास लेखन पुरस्कार तथा त्रिभुवन गिरि, श्याम सिंह कुटौला व पवनेश ठकुराठी को प्रेमा पंत स्मृति कुमाउनी खण्ड काव्य लेखन पुरस्कार प्रदान किया गया। कुमाउनी भाषा में हर विधा में साहित्य तैयार करने के लिए कुमाउनी भाषा प्रेमियों द्वारा दी गई आर्थिक मदद से चलाई जा रही लेखन पुरस्कार योजनाओं के अन्तर्गत इस वर्ष 21 रचनाकारों की कृतियों को पुरस्कृत किया गया।

सम्मेलन में हर वर्ष कुछ बुजुर्ग रचनाकारों को ‘कुमाउनी साहित्य सेवी सम्मान’, कुछ भाषा प्रेमियों को ‘कुमाउनी भाषा सेवी सम्मान’ तथा कुछ संस्कृतिकर्मियों को ‘कुमाउनी संस्कृति सेवी सम्मान’ से भी सम्मानित किया जाता है। इस वर्ष भी नौ लोगों को कुमाउनी साहित्य सेवी सम्मान, पांच लोगों को ‘कुमाउनी भाषा सेवी सम्मान’ तथा चार संस्कृतिकर्मियों को ‘कुमाउनी संस्कृति सेवी सम्मान’ से सम्मानित किया गया।

ज्ञातव्‍य है कि‍ 13, 14, व 15 नवम्बर 2009 को अल्मोड़ा के कुन्दनलाल साह स्मारक प्रेक्षागार में पहला तीन दिवसीय ‘कुमाउनी भाषा सम्मेलन’ आयोजित किया गया था। तब से अब तक हुए सम्मेलनों में नि‍म्‍न प्रस्ताव पारित किए गए हैं- 1. कुमाउनी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए

  1. उत्तराखण्ड में स्कूली पाठ्यक्रम में कुमाउनी भाषा को एक विषय के रूप में शामिल किया जाए
  2. कुमाउनी भाषा के विकास के लिए उत्तराखण्ड में ‘कुमाउनी भाषा अकादमी’ गठित की जाए
  3. अल्मोड़ा नगर के सांस्कृतिक, साहित्यिक राजधानी स्वरूप को देखते हुए ‘कुमाउनी भाषा अकादमी’ का मुख्यालय अल्मोड़ा में बनाया जाए
  4. उत्तराखण्ड सरकार द्वारा कुमाउनी भाषा के आदि कवि गुमानी पंत जी की याद में कुमाउनी भाषा रचनाकारों के लिए समग्र योगदान पर एक लाख रुपये के सालाना पुरस्कार की घोषणा की जाए
  5. उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद वर्ष 2009 से आज तक के सालाना पुरस्कारों की एकमुश्त घोषणा की जाए
  6. कुमाउनी भाषा के विकास के लिए उत्तराखण्ड सरकार द्वारा पांच करोड़ धनराशि का एक कोष बनाया जाए। इसमें से रचनाकारों को पुरस्कृत-सम्मानित करने की योजना बनाई जाए
  7. कुमाउनी भाषा के रचनाकारों को किताब छपवाने के लिए अनुदान दिया जाए
  8. कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति कसारदेवी, अल्मोड़ा द्वारा कसारदेवी में प्रस्तावित ‘कुमाउनी भाषा संस्थान’ के सभागार, पुस्तकालय आदि निर्माण हेतु शासन स्तर से अनुदान दिया जाए
  9. कुमाउनी भाषा के तीन बुजुर्ग और नामी कवियों शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’, चारुचन्द्र पाण्डे व वंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’ को उत्तराखण्ड भाषा संस्थान देहरादून द्वारा सम्मान योजना में इसी बार ‘गुमानी पंत सम्मान’ या उससे भी बड़े सम्मान से सम्मानित किया जाए
  10. उत्तराखण्ड भाषा संस्थान देहरादून द्वारा कुमाउनी रचनाकारों को दिए जाने वाले सम्मानों में कुमाउनी भाषा के महत्वपूर्ण रचनाकारों गौरीदत्त पाण्डे ‘गौर्दा’, शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’, गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ व बालम सिंह जनौटी के नाम पर सम्मान का नाम रखा जाए
  11. अगले वर्ष सन् 2012 से समिति द्वारा कुमाउनी भाषा के महत्वपूर्ण कहानीकार स्व. बहादुर बोरा ‘श्रीबंधु’ कुमाउनी कहानी पुरस्कार दिया जाएगा
  12. उत्तराखण्ड सरकार के उपक्रम ‘ उत्तराखण्ड हिन्दी अकादमी’ व ‘उत्तराखण्ड भाषा संस्थान’ में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, निदेशक मंडल (कार्यकारिणी) में साहित्यकारों को शामिल किया जाए
  13. उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा हर साल कुमाउनी साहित्यकारों को पुरस्कार/सम्मान और किताब छापने के लिए आर्थिक मदद दिए जाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। पुरस्कार/सम्मान तथा पुस्तक प्रकाशन सहायता के लिए अलग-अलग चयन समितियों का गठन किया जाए और इन चयन समितियों में कुमाउनी भाषा के साहित्यकारों को शामिल किया जाए
  14. उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा पुस्तक प्रकाशन सहायता के रूप में वर्तमान में मात्र दस-पंद्रह हजार रुपये स्वीकृत किए जा रहे हैं, जो कि बहुत कम हैं। इतनी कम धनराशि में पुस्तक प्रकाशन संभव नहीं हैं। अतः पुस्तक प्रकाशन सहायता के रूप में कम से कम पच्चीस हजार रुपये की धनराशि का प्रावधान किया जाए।

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में आधार व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए जाने-माने इतिहासकार ताराचन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि कुमाउनी भाषा तभी बच सकती है, जब यहाँ के बच्चे, युवा और आम जन इसका प्रयोग निरन्तर दैनिक बोलचाल में करेंगे। यदि इसे हमारी नई पीढ़ी उपयोग में नहीं लाती है तो फिर इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज करने की माँग की भी कोई सार्थकता नहीं रह जाएगी। अतः अपनी भाषा व संस्कृति को बचाने के लिए हमें सरकारों की ओर देखते रहने के बजाए स्वयं अधिक से अधिक प्रयत्न करने चाहिए। हमें सालभर विद्यार्थियों के बीच जाकर जगह-जगह अनेक ऐसे कार्यक्रम करने चाहिए, जिससे उनमें कुमाउनी भाषा के प्रति रुचि जाग्रत हो। फिर बच्चों को साल में एक बार होने वाले इस तरह के बड़े सम्मेलन में अवश्य बुलाया जाना चाहिए। भविष्य में हमारे सम्मेलनों में नई पीढ़ी की अधिकाधिक उपस्थिति बेहद जरूरी है।

डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट का कहना था कि भाषा का सवाल बहुत महत्वपूर्ण सवाल है, क्योंकि हमारी भाषा ही नहीं रहेगी तो हमारी पहचान भी लुप्त हो जाएगी। आज जब उत्तराखण्ड राज्य बने सोलह साल बीत चुके हैं, तो यह अत्यंत शोचनीय स्थिति है कि हम आज भी अपने ही राज्य में अपनी पहचान के संकट से जूझ रहे हैं। पिछले इन सोलह सालों में हमारी कोई पहचान ही नहीं बन पाई है। उत्तराखण्ड राज्य की लड़ाई इसलिए लड़ी गई थी कि हमारा अस्तित्व बचा रहे और हमारी पहचान बनी रहे। कुछ विधायक, सांसद व मंत्री बना दिए जाने मात्र से हमारी पहचान नहीं बन सकती। हमारी पहचान तभी बनेगी, जब यहाँ के निवासियों की जिन्दगी और यहाँ की प्रकृति बची रहेगी तथा सामान्य जन को आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के साधान उपलब्ध होंगे। आज जब हमारे जीवन की सारी चीजों को राजनीति ही तय कर रही है तो ऐसे में प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट करने और आम जनता की घोर उपेक्षा करने वाली राजनीति पर सवाल उठाने के साथ-साथ जनहित की राजनीति को स्थापित करना भी बहुत जरूरी है।

उन्होंने उपस्थित साहित्यकारों का ध्यान इस ओर भी दिलाया कि केवल ढेरों रचनाएँ लिखने और प्रकाशित करते चले जाने से कोई विशेष बात नहीं बनती है। असली सवाल रचनाओं की दृष्टिसम्पन्नता और उत्कृष्टता का है। यदि हमारे द्वारा लिखी जा रही रचनाओं में बहुसंख्यक जनता के जीवन से जुड़े यथार्थ की सच्ची अभिव्यक्ति न हो पाए तो लोग ऐसे साहित्य को पढ़ेंगे भी नहीं। अतः आज ऐसा साहित्य लिखे जाने की आवश्यकता है जो वर्तमान जीवन की प्रमुख समस्याओं और उनके समाधान की सही समझ विकसित करने के साथ ही पाठक में एक अच्छे समाज के निर्माण के लिए सक्रिय होने की प्रेरणा भी जगा सके।

पी.सी. तिवारी ने कहा कि समाज को दिशा तो अन्ततः राजनीति ही देती है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद कितनी जमीन हमसे छिन गई, हमें इसके बारे में भी बात करनी पड़ेगी। अपनी कृषि भूमि, अपनी जमीन बचाने की बात मुख्य है। उन्होंने सवाल उठाया कि सरकारों द्वारा उद्योगपतियों व पूँजीपतियों को जिस तरह यहाँ की जमीन को कौड़ी के भाव दे दिए जाने का सिलसिला जारी है, क्या इससे हमारा सरोकार नहीं होना चाहिए। अपनी बोली-भाषा बचाने के लिए अपना परिवेश बचाना चाहिए, अपनी जमीन बचानी चाहिए, क्योंकि हमारा परिवेश बचेगा तो हमारी भाषा भी बचेगी। अतः भाषा के संकट पर सोचते हुए इसके राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक अन्तर्सम्बन्ध पर भी अवश्य विचार किया जाना चाहिए। जब तक हम गाँवों को अधिकार नहीं देंगे, विकेन्द्रित व्यवस्था नहीं बनाएंगे, तक तक मुकम्मल तौर पर भाषा के संकट को भी हल नहीं किया जा सकता।

सम्‍मेलन में यह भी एक महत्वपूर्ण बात रही कि सरकारों द्वारा कुमाउनी भाषा के विकास और इसके रचनाकारों की माँगों के संदर्भ में अपेक्षित सहयोग न किए जाने से नाराज होकर, ताराचन्द्र त्रिपाठी जी के सुझाव पर, सम्मेलन में उपस्थित लोगों ने समिति द्वारा कसारदेवी में निर्मित किए जा रहे ‘कुमाउनी भाषा संस्थान’ हेतु लगभग दो लाख रुप जमा किए जाने की घोषणा की।

ज्ञातव्य है कि‍  ‘जब भाषा बचेगी, आगे बढ़ेगी तभी हमारी संस्कृति भी बचेगी, वह भी आगे बढ़ेगी’ इसी सोच के तहत संस्कृति को बचाने के लिए भाषा को बचाना जरूरी समझते हुए सन् 2004 में ‘कुमाऊंनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति’ कसारदेवी, अल्मोड़ा के नाम से संस्था का गठन कराया गया था। फिर भाषा के विकास के लिए उसे बोलना, उसमें लिखना-पढ़ना जरूरी समझते हुए लिखने-पढ़ने का माहौल बनाने के लिए तथा कुमाउनी भाषा में साहित्य की हर विधा में लेखन को बढ़ावा देने के लिए नवम्बर, 2008 से कुमाउनी मासिक पत्रिका ‘पहरू’ का प्रकाशन शुरू किया गया। तब से यह पत्रिका लगातार नियमित रूप से निकल रही है और अक्टूबर 2016 तक इसके 96 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें 600 कुमाउनी रचनाकारों की रचनाएँ प्रकाशि‍त हो चुकी हैं और वर्तमान में लगभग 800 रचनाकार कुमाउनी में लिख रहे हैं।

संस्था द्वारा कहानी, कविता, बाल कविता, जनगीत, लोकगीत, जीवनी, यात्रावृत्तांत, उपन्यास, नाटक, देवगाथा आदि विधाओं की 29 कुमाउनी पुस्तकें भी प्रकाशित की जा चुकी हैं।

One comment on “भाषा नहीं रहेगी तो हमारी पहचान भी लुप्त हो जाएगी : बिष्ट

  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति ब्लॉग बुलेटिन – पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी की 51वीं पुण्यतिथि में शामिल किया गया है। सादर … अभिनन्दन।।

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