भाषा एवं साहित्य-शि‍क्षण की सही पद्धति क्या है : कपि‍लेश भोज

कपि‍लेश भोज

कपि‍लेश भोज

वर्तमान में हमारे यहाँ प्राथमिक से लेकर स्नातक एवं स्नातकोत्तर तक की कक्षाओं में भाषा एवं साहित्य-शिक्षण की जो पद्धति प्रचलित है, उसका परिणाम इस रूप में दिखाई देता है कि वर्षों तक एकाधिक भाषाओं और उनमें रचित साहित्य का अध्ययन करने के बावजूद विद्यार्थी अपनी विद्यालयी या महाविद्यालयी शिक्षा पूरी करके जब बाहर निकलते हैं, तो आमतौर पर उनमें से अधिकांश अपनी सीखी हुई भाषाओं में रचे गए या रचे जा रहे साहित्य का न तो गंभीरतापूर्वक पठन-पाठन जारी रखते हैं और न उनमें उसके प्रति कोई जिज्ञासा या उत्सुकता रहती है।

सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों होता है और इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है ?

इस मुद्दे पर चर्चा करने से भी पहले यह जानना जरूरी है कि किसी भी भाषा और उसमें रची गई या रची जा रही उत्कृष्ट कृतियों का अध्ययन जारी रखने की आवश्यकता क्या है ? … अतः पहले इसे ही समझ लें।

यह तो सभी जानते हैं कि भाषा का आविष्कार मनुष्य का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण आविष्कार है। जब से मनुष्य ने पैरों के बल खड़ा होना सीखा और उसके हाथ श्रम करने के लिए पूर्णतः मुक्त हुए तो इसी प्रक्रिया में सामूहिक श्रम के जरिए भौतिक वस्तुओं के उत्पादन, चिन्तन, बुद्धि के विकास और भाषा के सृजन की दीर्घकालिक अनवरत यात्रा भी प्रारंभ हुई। श्रम, सृजन और विकास की इस दीर्घकालिक यात्रा के ही परिणामस्वरूप सुविकसित भाषा और मौखिक व लिखित साहित्य अस्तित्व में आए। अतः भाषा और साहित्य मनुष्य के संघर्ष, सृजन, विकास और संचित अनुभवों का एक ऐसा कोष है, जिससे ठीक ढंग से परिचित हुए बगैर हम मानव-जाति और मानव-समाज के विकास को नहीं समझ सकते। अतः भाषा केवल भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने तथा परस्पर संवाद का माध्यम ही नहीं है, बल्कि वह अपने में मनुष्य के इतिहास और उसकी आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सृजनात्मक आदि समस्त गतिविधियों को समाहित किए रहती है।

असल में भाषा और साहित्य-शिक्षण की प्रचलित वर्तमान पद्धति का मूल संकट ही यह है कि अधिकांश शिक्षक भाषा को केवल अभिव्यक्ति और संवाद के माध्यम के रूप में देखते और समझते हैं और यहीं से अनेक गड़बड़ियाँ शुरू होती हैं। भाषा और साहित्य की बुनियादी अवधारणा से अनभिज्ञता का सीधा प्रभाव उनकी शिक्षण-पद्धति पर पड़ता है।

भाषा और साहित्य की बुनियादी अवधारणा की साफ समझ न होने का परिणाम शिक्षकों की शिक्षण-पद्धति में प्रमुखतः दो रूपों में दृष्टिगोचर होता है। पहला यह कि सबसे पहले वे भाषाओं को महत्वपूर्ण और अमहत्वपूर्ण इन दो खानों में बाँट कर देखने की अवैज्ञानिक और पक्षपातपूर्ण सोच के खुद तो शिकार होते ही है, विद्यार्थियों में भी इस सोच को फैला देते है। हमारे देश में अँगरेजी भाषा के प्रति लगातार बढ़ते अंध मोह और यहाँ के जनगण की विभिन्न भाषाओं के प्रति हीन भावना को इसके उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है।… दूसरा यह कि भाषा और साहित्य का शिक्षण जीवन से काट कर इस नीरस ढंग से किया जाता है कि विद्यार्थी न तो भाषा के सौन्दर्य और साहित्य में पुनर्सृजित जीवन-जगत की छवि को ठीक ढंग से समझ पाता है और न ही उसके सहारे जीवन-जगत के विविध आयामों को और गहराई से जानने की दिशा में आगे बढ़ पाता है।

अतः किसी भी भाषा के अध्ययन का मतलब केवल कामचलाऊ मौखिक और लिखित अभिव्यक्ति-कौशल अर्जित करना ही नहीं, बल्कि उसे अर्जित करते हुए उसके व्यापक उपयोग में दक्षता हासिल करना होता है। आशय यह कि किसी भाषा को बोलने-लिखने और समझने में कुशलता अर्जित करने के पश्चात उस भाषा में रचित उत्कृष्ट साहित्य के अनमोल खजाने से परिचित होना और अपने जीवनानुभवों व विचारों को मौखिक व लिखित दोनों रूपों में अधिकाधिक स्पष्ट और रोचक ढंग से व्यक्त करने का कौशल विकसित करना ही किसी भाषा को सीखने की असली उपयोगिता या सार्थकता है। इस प्रक्रिया में ही मनुष्य आत्मिक समृद्धि प्राप्त करता है। इसीलिए किसी भाषा और उसमें लिखी गई उत्कृष्ट रचनाओं के शिक्षण के दौरान भाषा और साहित्य-शिक्षण के इस मूलभूत उद्देश्य को ध्यान में रखना जरूरी होता है।

भाषा और साहित्य के अध्ययन के मूलभूत उद्देश्य से सम्बन्धित इस अवधारणात्मक पृष्ठभूमि की चर्चा के बाद अब हम उस पद्धति की छानबीन कर सकते हैं, जो हमारे प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा में भाषा-साहित्य-शिक्षण में अपनाई जा रही है।

हमारे सरकारी स्कूल-कॉलेज हों या गैर-सरकारी, सब जगह पाठ्य-पुस्तकों के पाठों के प्रश्नोत्तरों को रटते हुए भाषा को सीखने की एक जैसी ही एकरस प्रक्रिया अपनाई जाती है। पहली कक्षा से लेकर स्नातकोत्तर स्तर तक के विद्यार्थी पाठ्य-पुस्तकों के घेरे में ही घूमते रहते हैं और शिक्षक भी उन्हें उन्हीं तक सीमित रखते हैं। उदाहरण के लिए हिन्दी, संस्कृत और अँगरेजी की पाठ्य-पुस्तकों में संकलित गद्य व पद्य की विभिन्न विधाओं की जो रचनाएँ जिस ढंग से पढ़ाई जाती हैं, उसका एकमात्र उद्देश्य परीक्षा में पाठों से सम्बन्धित प्रश्नों को शुद्ध भाषा में सही-सही लिख पाने में सफल होना होता है।… सारी मशक्कत इसी बात के लिए की जाती है और यह सिलसिला पहली कक्षा से शुरू होकर उच्च कक्षाओं तक चलता रहता है। जाहिर है,  इस तरह की परीक्षा-पद्धति में पाठों पर आधारित प्रश्नों के उत्तर देते समय विद्यार्थी पाठों की अन्तर्वस्तु को कितना समझ पाया है, इसकी ठीक-ठीक परख संभव नहीं हो पाती। अतः इस तरह की शिक्षण व परीक्षा-पद्धति के चलते विद्यार्थी पाठ्य-पुस्तकों के पाठों से बाहर निकलकर विविधता भरे पुस्तक-संसार में प्रवेश करके मानव-जाति द्वारा संचित ज्ञान को आत्मसात करने और उसके आलोक में जीवन-जगत को समझने की दिशा में प्रेरित व गतिमान नहीं हो पाता।

इसी जड़ शिक्षण व परीक्षा-पद्धति का ही परिणाम यह हुआ है कि हमारे स्कूल-कॉलेजों में पाठ्य-पुस्तकों के अलावा अन्य पुस्तकों के पठन-पाठन और उन पर चर्चा की गतिविधि एकदम बन्द है। और पाठ्य-पुस्तकों में संकलित रचनाओं को पढ़ाने का जो तरीका अपनाया जाता है, वह भी पूर्णतः जड़ता से ग्रस्त है। अध्यापन की इस जड़ता भरी पद्धति के प्रति सजग होना और सही पद्धति को समझना व अपनाना बेहद जरूरी है।

हिन्दी, संस्कृत और अँगरेजी की पाठ्य-पुस्तकों में संकलित गद्य एवं पद्य की रचनाओं को पढ़ाते समय शिक्षकों का सारा जोर शब्दार्थ, व्याख्या और रचनाओं पर आधारित निश्चित प्रश्नों के निश्चित उत्तरों को जानने और उन्हें याद करवाने पर रहता है। किसी कविता या गद्य की किसी भी विधा की रचना को पढ़ाते समय शब्दार्थ, व्याख्या और प्रश्नोत्तर से अवगत होना पाठ की बोधगम्यता के लिए जरूरी तो होता है, लेकिन यह शुरुआती चरण होता है और बात यहाँ पर समाप्त नहीं, बल्कि यहाँ से शुरू होती है।… पद्य और गद्य की रचनाओं की अन्तर्वस्तु जीवन-जगत की जिन छवियों को प्रस्तुत करती है, शिक्षण के दौरान अगर विद्यार्थी को उनकी ठीक से प्रतीति कराई जा सके तो वह पढ़ी जा रही रचनाओं के सार को ग्रहण करते हुए व्यापक जीवन-जगत को जानने-समझने की दिशा में सक्रिय हो जाता है।

भाषा और साहित्य-शिक्षण की सही पद्धति क्या है, आइए इसे एक-दो उदाहरणों के जरिए समझने की कोशिश करते हैं।

उत्तराखण्ड के विद्यालयों में पढ़ाई जा रही कक्षा-11 की हिन्दी पाठ्य- पुस्तक ‘आरोह’ में प्रख्यात फिल्मकार सत्यजित राय का एक संस्मरण संकलित किया गया है- ‘अपू के साथ ढाई साल’।… अब इसे पढ़ाने की परम्परागत जड़ पद्धति यह है कि इस पाठ का वाचन कर दिया जाए और इसमें प्रयुक्त कठिन शब्दों के शब्दार्थ समझाते हुए प्रश्नोत्तर तैयार करवा दिए जाएँ। और बस इसके साथ ही पाठ समाप्त। अधिकांश शिक्षक आमतौर पर यही पद्धति अपनाते हैं।… यदि इसी पाठ को पढ़ाने की सही पद्धति अपनाई जाए तो उसका तरीका इससे भिन्न होगा। वह तरीका यह होगा कि इस संस्मरण के वाचन, कठिन शब्दों व प्रसंगों के अर्थ और उनकी व्याख्या तथा अभ्यासार्थ प्रश्नोत्तरों से गुजरने  के पश्चात प्रसिद्ध बांग्ला कथाकार विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के उपन्यास ‘ पथेर पांचाली’ पर आधारित इसी नाम की सत्यजित राय की उस फिल्म को देखने-दिखाने की व्यवस्था करनी होगी, जिसकी निर्माण-प्रक्रिया का जिक्र इस संस्मरण में किया गया है। साथ ही, विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के विस्तृत जीवन-वृत्तांत और उनके उपन्यास ‘पथेर पांचाली’ को भी पढ़ना होगा। इतना ही नहीं, उपन्यास में बंगाल के ग्रामीण जीवन  का जैसा चित्रण किया गया है, वह ग्रामीण जीवन आज किस स्थिति में है इसे जानने के लिए भी खोजबीन करनी होगी।… तो इस प्रकार तय किया जाता है, रचना से जीवन तक का सफर… और ऐसा कर पाना ही सही और सार्थक शिक्षण- पद्धति का मूल उद्देश्य होता है।

अब जमीनी हकीकत को देखें।….. हो यह रहा है कि विद्यालयों में अन्य पाठों के साथ-साथ यह संस्मरण लगातार ‘पढ़ाया’ जा रहा है और विद्यार्थी हर वर्ष परीक्षा में इससे सम्बन्धित निश्चित प्रश्नोत्तरों के सुनिश्चित उत्तर लिखकर अच्छे अंक प्राप्त करते चले जा रहे हैं, लेकिन विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के उपन्यास ‘पथेर पांचाली’ को पढ़ने या इस पर आधारित सत्यजित राय की फिल्म देखने और उस पर चर्चा करने के सम्बन्ध में सोचने की फुर्सत किसे है ? …. शायद अपवादस्वरूप कुछ ही ऐसे विद्यालय होंगे, जहाँ के पुस्तकालयों में ‘पथेर पांचाली’ उपन्यास का हिन्दी अनुवाद उपलब्ध होगा ताकि विद्यार्थी अवकाश के दिनों में उसे पढ़ सकें या उसे उलट-पुलट कर देखने के बाद भविष्य में कभी पढ़ने का मन बना सकें।

इसी प्रकार कक्षा-11 की ही पाठ्य-पुस्तक में संकलित दुष्यन्त कुमार की गज़ल ‘साये में धूप’ को पढ़ाते हुए यदि विद्यार्थियों में ‘कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए/ कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए’ इस शेर में व्यक्त वस्तुस्थिति के कारणों और उसके समाधान की उत्सुकता उत्पन्न न की जा सके तो वह पढ़ाना निरर्थक है।

यह एक कटु सच्चाई है कि हमारी मौजूदा शिक्षा-व्यवस्था के अन्तर्गत प्राथमिक से लेकर स्नातकोत्तर स्तर तक हिन्दी, संस्कृत और अँगरेजी भाषाओं और उनके साहित्य की जिस ढंग से पढ़ाई करवाई जा रही है और उसके बाद शिक्षक बनने के लिए जिस प्रकार का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, उसे पूरा करके जो विद्यालयों में भाषा-शिक्षक बनकर पढ़ा रहे हैं उनमें से अपवादस्वरूप कुछ को छोड़कर अधिकांश को भाषा और साहित्य के महत्व व मर्म की बुनियादी समझ ही नहीं होती। यही कारण है कि वे न तो स्वयं साहित्य की श्रेष्ठ प्राचीन एवं अर्वाचीन कृतियाँ पढ़ते हैं और न अपने विद्यार्थियों को उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित कर पाते हैं। ऐसे शिक्षकों से पढ़े हुए विद्यार्थी अपने बाद के जीवन में साहित्य ही नहीं पुस्तक मात्र से दूर रहें तो यह आश्चर्य ही बात नहीं।

यहाँ भाषा-शिक्षण से ही सम्बन्धित ‘उत्तराखण्ड विद्यालयी शिक्षा परिषद’ के एक अवैज्ञानिक और निहायत मूर्खतापूर्ण निर्णय का जिक्र करना भी जरूरी लगता है। …

‘राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद’ (एनसीईआरटी) द्वारा हाईस्कूल एवं इण्टरमीडिएट में हिन्दी के अन्तर्गत हिन्दी की दो-दो पाठ्य-पुस्तकें निर्धारित की गई हैं। लेकिन ‘उत्तराखण्ड विद्यालयी शिक्षा परिषद’ के निर्देशानुसार इन कक्षाओं में हिन्दी के अन्तर्गत एक-एक संस्कृत पाठ्य-पुस्तक अतिरिक्त रूप से पढ़ाई जा रही है। अब पाठ्य- पुस्तक निर्धारक विद्वानों को कैसे समझाया जाए कि हिन्दी के अन्तर्गत संस्कृत पढ़ाने का कोई औचित्य या लाभ नहीं है, क्योंकि ये दोनों सर्वथा अलग-अलग भाषाएँ हैं। अतः दोनों भाषाओं को पृथक-पृथक पढ़ाया जाना चाहिए, लेकिन अजीबोगरीब स्थिति यह है कि उत्तराखण्ड के विद्यार्थी हाईस्कूल और इण्टरमीडिएट की कक्षाओं में हिन्दी विषय के अन्तर्गत संस्कृत की पुस्तक भी पढ़ने के लिए मजबूर हैं।

निष्कर्षतः भाषा और साहित्य-शिक्षण की सही पद्धति लागू करने के लिए सर्वप्रथम तो उसकी अवधारणात्मक समझ होना बेहद जरूरी है और फिर भाषा और साहित्य-शिक्षण की समुचित विधि को सीखना आवश्यक है। इनके अलावा जिस एक और साधन की अपरिहार्य आवश्यकता होती है वह है एक समृद्ध पुस्तकालय।… चिन्ताजनक बात यह है कि हमारे स्कूल-कॉलेज इन तीनों ही चीजों से वंचित हैं। नतीजा हमारे सामने है- भाषा और साहित्य की बुनियादी समझ और उनकी महान उपलब्धियों को आत्मसात कर सकने की क्षमता से रहित शिक्षक और विद्यार्थी।

इस भयावह जड़तापूर्ण वातावरण के बीच स्कूल-कॉलेजों में जो थोड़े जागरूक शिक्षक मौजूद हैं, उनके सामने यह चुनौती है कि वे इस स्थिति को बदलने के लिए प्रयत्नशील हों।

2 comments on “भाषा एवं साहित्य-शि‍क्षण की सही पद्धति क्या है : कपि‍लेश भोज

  1. दिनेश कर्नाटक says:

    बहुत महत्वपूर्ण आलेख……हिंदी राज्यों ने हिंदी के ऊपर संस्कृत लादकर हिंदी पठन-पाठन को कबाड़ बना कर रख दिया है.

  2. Dr Kewal Anand Kandpal says:

    भाषा शिक्षण हेतु महत्व पूर्ण आलेख। डॉ० भोज साहब को बधाई ऐसा विचारोतेज्जक आलेख हमारे सामने लाने के लिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *