बाबा साहब अम्बेडकर: साझी विरासत : प्रेमपाल शर्मा

डा. भीमराव अम्बेडकर

डा. भीमराव अम्बेडकर

मुझे अफसोस है कि मैंने बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर को बहुत देर से जाना। देर से तो मैंने महात्मा गांधी को भी पढ़ा, लेकिन बाबा साहेब को उसके भी बाद। क्यों ? कारण उस स्कूली व्यवस्था, शिक्षा में ज्यादा है। मेरी कॉलेज की नियमित पढ़ाई वर्ष 1975 में खुर्जा, उत्तर प्रदेश के एक कॉलेज में बी.एस.सी तक हुई। स्कूली पाठ्यक्रम में एक किताब थी- ‘हमारे पूर्वज’ । इसमें दधीचि‍ से लेकर विनोबा, सुभाष सभी थे। मुझे याद नहीं कि इसमें बाबा अम्बेडकर भी थे। न उन दिनों इनका जन्म दिवस होता था न निर्वाण या कोई और चर्चा। मात्र इतना बताया गया था कि हमारे संविधान बनाने में बाबा साहेब को बड़ा योगदान था। किस की सत्ता थी? कौन थे परिदृश्य पर? नेहरू जी, उनकी कांग्रेस और उनका मिला जुला वंश। किताबों में क्यों नहीं थे अम्बेडकर? मौलान आज़ाद लंबे समय तक शिक्षा मंत्री रहे। फिर उनके एक और शार्गिद नुरूल हसन। शुरू की नूराकुश्‍ती के बाद कम्यूनिस्ट विचारक राजनेता, बुद्धिजीवी भी सन साठ तक कांग्रेसी सांठ-गांठ में शामिल होना शुरू हो गए थे। नेहरू जी की मृत्यु के बाद वे इन्दिरा गांधी की किचन कैबिनेट का हिस्सा थे। पाठ्यक्रम नये बने, बदले गये लेकिन कांशीराम के उदय तक अम्बेडकर लगभग आजादी के सैकड़ों महापुरुषों की भीड़ में एक से ज्यादा नहीं थे। गांधी की तो छोड़ो नेहरू जी के साथ भी आकलन के योग्य नहीं माना जाता था। सार-संक्षेप यह कि जितना नुकसान अम्बेडकर को नेहरू और उनके दरबारियों ने पहुंचाया, उतना किसी दूसरी राजनीतिक सत्ता या व्यक्ति ने नहीं। मुसलमानों के मसीहा हैं तो नेहरू, दलित-गरीबों के तो नेहरू और पंडितों के तो वे हैं ही– पंडित वंश में जन्म लेने के कारण। राजनीति इसी का नाम है। इस विनिर्माण के लिए हर दावपेंच अपनाये गये और इसीलिए कांग्रेस सत्‍ता पहली बार वर्ष 2014 में कुछ हिली है।

उन दिनों के बुद्धिजीवियों की भूमिका भी यहां संदेह के घेरे में है कि क्यों उन्हें अम्बेडकर का संघर्ष, योग्यता, योगदान नहीं दिखाई दिया। क्यों वे नेहरू को खुश करने और बदले में कुछ विश्वविद्यालयों के पद, प्रतिष्ठा लेने के लिए अम्बेडकर को जाति विशेष का नेता ही मानते रहे। बिकी हुई जमात अपने नेता की मंशा सबसे पहले पहचान लेती है और उसी के अनुसार नाचती है। यही कारण है कि उन दिनों हमारी सभी पीढियों को बाबा साहेब अम्बेडकर जैसे महान व्यक्तित्व से सभी अध्ययन, पाठ्यक्रम, विमर्श में दूर रखा गया। सरदार पटेल जैसे और भी इतिहास निर्माताओं के साथ नेहरू वंश ने यही सलूक किया। लेकिन इतिहास की निर्ममता देखिए कि भारतीय समाज को आमूल-चूल बदलने वाले अम्बेडकर आज नेहरू से ज्यादा प्रासंगिक हैं- हर क्षेत्र में। सामाजिक, राजनीतिक आर्थिक सभी में।

एक कहावत है जितना बड़ा संघर्ष होगा, उतना ही बड़ा व्यक्तित्‍व। मनुष्य मनुष्य के बीच जैसा भेदभाव भारतीय समाज में है, वैसा अन्यत्र नहीं। दोहराने की जरूरत नहीं कि बचपन के क्रूर नृशंस आघातों ने ही अम्बेडकर को इतना मजबूत बनाया कि‍ वे भारतीय समाज को गठने वाले सबसे बड़े भारतीय महापुरुष हैं। नेहरू की जकड़न, कांग्रेसी आत्म प्रशंसा-प्रचार से जैसे-जैसे सन 1990 के आसपास देश को मुक्ति मिलती गयी, बाबा साहेब उभर कर आते रहे।

डॉ. भीमराव जैसी शख्सि‍यतें शताब्दियों बाद पैदा होती हैं। क्या उनके विचारों के बिना इक्कीसवी सदी या कहे आधुनिक भारत की कल्पना की जा सकती है? नि:संदेह हर महापुरुष अपने युग की उपज होता है, लेकिन बिरले ही ऐसे होते हैं जो आमूलचूल परिवर्तन के मसीहा बनते हैं। भारत जि‍तनी सामाजिक गैरबराबरी, भेदभाव, ऊंच-नीच शायद ही दुनिया में कहीं है। आश्चर्य की बात यह कि ऐसा हजारों साल तक चलता रहा। या कहें कि यह असमानता लगातार क्रूर और बढ़ती गयी। यहां उस मुस्लिम शासन को भी माफ नहीं किया जा सकता जो धर्म की तलवार तो भांजता रहा, समानता के लिए कोई कदम नहीं उठाया। लेकिन समय चक्र आगे बढ़ता रहा। यूरोप में पंद्रहवी सदी से शुरू हुए पुनर्जागरण ने दुनिया भर को गतिशील बनाया। तर्क, समानता, विज्ञान, स्त्री-पुरुष की बराबरी और धर्म की जकड़न से मुक्ति इस गतिशीलता के प्रस्थान बिंदू बने। औद्यौगिक क्रांति, उपनिवेशवाद के रथ पर सवार ये विचार फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति से गुजरते हुए दुनियाभर में फैले। अम्बेडकर, गांधी, गोखले भी कैसे इनसे अछूते रह सकते थे, बल्कि कहें कि‍ इससे पहले राजा राममोहन राय, महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले भी आधुनि‍क समय की इसी समानता तर्क के दर्शन से अनुप्राणित हुए। बाबा साहेब अम्बेडकर नि:संदेह इनमें सबसे चमकते सितारे हैं।

सब से पहले अम्बेडकर सामाजिक बराबरी के लिए लड़े, फिर आर्थिक फिर मजदूरों के हितों के लिए। कौन सा क्षेत्र अछूता है? व्यक्तिगत स्वतंत्रता हो, स्त्री की बराबरी (हिन्दू कोड बिल), संवैधानिक सुधार से लेकर शिक्षा, पंचायती राज। सही मायनों में ऐसे स्टेसमैन जिनके विचार देश और देश के बाहर लगातार प्रासंगिक हैं। उनकी प्रतिभा का लोहा हर मंच ने माना और आज भी मान रहे हैं।

इस सबके बाद भी हमें भारतीय समाज को परिवर्तन की इस परिधि तक लाने वाली विरासत को एक निष्‍पक्ष दृष्टि, तर्क से समझने की जरूरत है, न कि भावना या राजनीतिक राग-द्वेष में कुतर्क वाली दृष्टि की। मौजूदा सभ्‍यताओं का बड़ा श्रेय इस तर्क पद्धति को है जो यूरोप के पुनर्जागरण से शुरू होती है। पूरा विज्ञान, सोचने का ढंग, धर्म को धकियाता हुआ आगे आता है और यूरोप के कायाकल्‍प के बाद पूरी दुनिया को बदलता है। फ्रांसीसी क्रांति हो या रूसी या अमेरिकी क्रांति और दास प्रथा का अंत- समानता की बुनियाद इन्‍हीं सड़कों से गुजरती है। इसलिए ब्रिटिश काल भारत के लिए एक वरदान भी है, जब हमारे इन सब दिग्‍गजों ने मनुष्‍य-मनुष्‍य की समानता, न्‍याय, भाईचारा, तर्क के अर्थ पहली बार जाने। क्‍या फुले महाराज की शुरू की शिक्षा उस ईसाई मिशनरी स्‍कूल में नहीं हुई होती तो समानता का दर्शन जान पाते ? अम्‍बेडकर का कायाकल्‍प भी एक तरफ भारतीय समाज में भेदभाव जातिगत घृणा के अनुभव और दूसरी और इंग्‍लैंड, जर्मनी, अमेरिकी समाज, विश्‍वविद्यालयों में बराबरी के अहसास से होता है। प्रतिभाशाली तो वे थे ही, कानून अर्थशास्‍त्र, लोकतंत्र, शिक्षा हर क्षेत्र में मौलिकता के स्‍तम्‍भ। सर सैयद अहमद खां भी इंग्लैंड से शि‍क्षा लेकर एक प्रगतिशील समाज की स्‍थापना के लिए मुसलमानों को ललकारते हैं और अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना के लिए आगे बढ़ते हैं। स्वयं महात्मा गांधी यदि सत्‍य अहिंसा के हथियारों से आगे बढ़े तो इसलिए कि उन्‍हें ब्रिटिश न्याय व्यवस्था, समाज पर यकीन था।

इसलिए इस पूरी विरासत को न भक्तिभाव से देखने की जरूरत है न नकारवादी भावना से। देश की आजादी भी जरूरी थी और समाज की जकड़न क्रूर जाति व्‍यवस्‍था से भी। गांधी पर वर्ण व्‍यवस्‍था के प्रति नरमी का आरोप सही है तो अम्‍बेडकर पर अंग्रेजों के प्रति नरमी का। दोनों के अपने कारण हैं और सबसे अच्‍छी बात है कि दोनों में एक निडरता, स्‍पष्‍टता और अपने लक्ष्‍य के प्रति पूरी निष्‍ठा है। क्‍या पूना पैक्‍ट सफल नहीं होता तो आजादी की लड़ाई की एकजुटता बनी रह सकती थी? हरगिज नहीं। और यदि अम्‍बेडकर ने सामाजिक बराबरी के लिए ऐसा हट, दृढ़ता न दिखाई होती तो क्‍या संविधान में बराबरी गरीबों के लिए विशेष सुविधाओं की बातें शामिल होंती? दोनों ही लोकतंत्र के खरे प्रहरी हैं। एक पूरे समाज की चिंता में देश भर को जगा रहा है तो दूसरा आजादी की खातिर। यह बात दीगर है कि आजादी के सामाजिक परिवर्तन जितना तेजी से होना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ। लेकिन इसके लिए सामाजिक-राजनीतिक कारणों के साथ नेहरू वंश ज्‍यादा जिम्‍मेदार है। नेहरू की अटूट निरंकुश सत्‍ता 1946 से लेकर 1964 तक रही। क्‍या बीस वर्ष कम होते हैं, किसी बुनियादी परिवर्तन के लिए? और उसके बाद भी कुछ अंतराल को छोड़कर कांग्रेस का वंश ही सत्‍ता में रहा है। शायद गांधी न होते और उनका नेहरू को इशारा न होता तो न नेहरू की कांग्रेस अम्‍बेडकर को संविधान पीठ का अध्‍यक्ष बनाती और न वे कैबि‍नेट में आते। आये भी तो नेहरू की नीतियों से निराश होकर तुरंत इस्‍तीफा देकर बाहर हो गये। यहां तक कि हिन्‍दू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया।

बाबा साहेब को सिर्फ दलित या जाति विशेष तक सीमित रखना उनके साथ ऐतिहासिक ज्‍यादती है। सवर्णों को समझने की जरूरत है कि इक्‍सवीं सदी का भारत धर्म ग्रंथों, उपनिषदों, पुराणों की व्‍याख्‍या से नहीं चलाया जा सकता। समानता नये समाज की बुनियाद है और इसे हासिल करना ही होगा। वहीं दलितों को भी इस विषमता से बचने की जरूरत है कि अम्‍बेडकरवाद होने की शर्त ब्राह्मण-विरोधी होना है। अम्‍बेडकर ब्राह्मणवाद की कट्टरता, ढोंग, नकली रीतिरिवाज के खिलाफ थे, व्‍यक्ति विरोधी नहीं। ऐसा न होता तो उनकी शादी एक ब्राह्मणी से नहीं हुई होती। हिन्‍दू धर्म की हजार बुराइयों के खिलाफ अम्‍बेडकर मृत्‍यु पर्यन्‍त लड़ते रहे, लेकिन मुस्लिम धर्म को वे इससे भी क्रूर मानते थे। उनका कहना था कि हिन्‍दू धर्म में अपनी बुराइयों के खिलाफ बोलने, उन्‍हें सुधारने की आजादी तो है, मुस्लिम धर्म की कट्टरता तो ऐसे प्रश्‍न उठाने की भी स्‍वतंत्रता नहीं देती। यही कारण है कि वर्षों सोचने-विचारने और कई बार कुछ मुस्लिम मित्रों के उकसावे के बावजूद न उन्होंने मुस्लिम धर्म अपनाया न ईसाई। वे बौद्ध धर्म की ओर गये। क्या यह अकारण है कि जितना बाबा साहेब अम्बेडकर का जादू है, उतना उनके अपनाये बौद्ध धर्म का नहीं। यह संतोष की भी बात है क्‍योंकि नयी सदी में और आने वाली सदियों में दुनिया भर से धर्म का मिटना ज्‍यादा स्‍थाई शांति का बंदोबस्त करेगा।

महात्मा गांधी पर एक किताब है- बहुरूप गांधी, अनु गांधी की लिखी हुई। मुझे लगता है कि बाबा साहेब अम्बेडकर के ज्ञान, अनुभव संघर्ष को देखते हुए यह शीर्षक उनके ऊपर और ज्‍यादा स्‍टीक बैठता है। शिक्षा, पंचायती राज, मजदूर बिल, अर्थशास्‍त्र, कानून से लेकर हिन्दू कोड बिल तक का ज्ञान। तीन तलाक मुद्दे पर जो बहस चल रही है, बाबा साहेब के विचार यहां सबसे महत्‍वपूर्ण हैं। 2 दिसंबर 1948 को संविधान सभा में बहस के विस्‍तार का जबाव देते हुए उन्‍होंने कहा था कि धर्म का दखल इतना क्यों होना चाहिए कि वह पूरे सामाजिक जीवन को ही समेट ले और विधानमंडल को उस क्षेत्र में घुसने ही न दे। कानून में बदलाव इसलिए चाहते हैं कि इतने अन्याय, असमानता, भेदभाव से भरी हमारी सामाजिक व्यवस्था हमारे मूलभूत मानवीय अधिकारों के रास्ते में न आये। हम ऐसी कल्पना भी कैसे कर सकते हैं कि कोई पर्सनल लॉ ऐसा भी हो सकता है जो राज्‍य के अधिकार क्षेत्र से एकदम बाहर हो। मौजूदा भारत के लिए सबसे ज्यादा प्रांसगिक महापुरुष।

हम सब का दायित्व है कि हम आत्म सजगता से अम्बेडकर जैसे व्‍यक्तित्व को देवता या मूर्तियों में कैद न होने दें। उन्होंने तो इन मूर्तियों को तोड़कर ही पूरे भारतीय समाज को रास्ता दिखाया था। वे हम सब की साझी विरासत हैं।

3 comments on “बाबा साहब अम्बेडकर: साझी विरासत : प्रेमपाल शर्मा

  1. Shiv Pratap Singh says:

    डा. अम्बेदकर का सही मूल्यांकन होने में सदियाँ लगेंगी…एक तो हम भारतीयों की समस्या यह है हम कि विदेशी अनुमोदन से पहले किसी स्वदेशी व्यक्ति/वस्तु का तटस्थ होकर मूल्यांकन नहीं कर पाते…

    जातीय अस्मिता की राजनीति शायद ही कभी अम्बेदकर का सम्यक मूल्यांकन होने दे…अंतर्राष्ट्रीय-राजनीतिविद अंबेदकर या अर्थशास्त्री अंबेदकर की बात कौन करेगा l

  2. Harshvardhan says:

    आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व हास्य दिवस – अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर …. आभार।।

  3. Harshvardhan जी, पाेस्ट काे सम्मान देने के लि‍ए आभार।

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