बाजारोन्‍मुख हुई स्‍वातंत्र्योतर हिंदी कहानी : नरेंद्र अनि‍केत

नरेंद्र अनि‍केत

हिंदी कहानी पर जब भी विचार किया जाता है तो स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद के हुआ तीव्र विकास विवेचना के केंद्र में रहता है। बीसवीं सदी के आठवें दशक तक हिंदी कहानी पांच आंदोलनों से गुजर चुकी थी। सबसे ध्‍यान देने योग्‍य बात यही है कि सभी कहानी आंदोलन स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद हुए। 19वीं सदी के आखिर से हिंदी कहानी शुरू होती है। स्‍वतंत्रता प्राप्ति के समय तक हिंदी कहानी आदर्श के दायरे में बंधी रही। सदी के मध्‍य में देश आजाद हुआ और तीस साल बीतते-बीतते कथा लेखन में जिस तेजी से बदलाव आए, उस पर गौर करने की जरूरत है। छठे दशक के मध्‍य तक आते-आते कहानी में बदलाव आ जाता है। इसी बदलाव को ‘नई कहानी’ नाम दिया गया। नई कहानी को सबसे पहला कहानी आंदोलन कहा जाता है। आजादी मिले दस साल भी नहीं बीते थे और हिंदी कहानी के केंद्र में आदर्श के साथ जीने, संघर्ष करने वाला नायक गायब हो गया। उसकी जगह परिस्थिति की मार झेल समझौता करने वाला हताश नायक आ जाता है। यह हताश नायक तत्‍कालीन भारतीय समाज का यथार्थवादी चेहरा है।

कहानी में आए इस तरह के बदलाव का कारक आजादी के बाद देश में उत्‍पन्‍न परिस्थितियों को माना जाता है। देश में तैयार की जा रही बाजारोन्‍मुख व्‍यवस्‍था ने ही वैसी परिस्थितियां तैयार की थीं। स्‍वतंत्रता से पहले जो समाज अंग्रेजी राज की बाजार हितैषी व्‍यवस्‍था से उत्‍पीडि़त था, उसे सामंती व्‍यवस्‍था की मार झेलने वाला समाज माना गया। अंग्रेजों ने जो सामंती व्‍यवस्‍था तैयार की थी, वह केवल उनकी बाजार नीति को सहारा दे रही थी। सभी कर्णधारों ने इस बात की अनदेखी कर दी कि अंग्रेज भारत क्‍यों आए थे। उन्‍हें अपने औद्योगिक उत्‍पादों के लिए बाजार चाहिए था। दुनिया के जिन हिस्‍सों में मनुष्‍य श्रम और कृषि पर आश्रित था, उससे बेहतर क्रेता और कोई नहीं हो सकता था। ऐसे क्षेत्रों के लोगों को खरीदार बनाने के लिए अंग्रेजों ने वहां के पारंपरिक मूल्‍यों, मान्‍यताओं और जीवन शैली को पोंगापंथ कहा और उसे दरकिनार कराया। भारतीय इतिहास में अंग्रेजी राज की स्‍थापना से ही आधुनिककाल की शुरुआत माना गया है। मतलब औद्योगिक उत्‍पादों के विक्रय की परिस्थिति बनने के बाद के समय को ही आधुनिक काल कहा जाता है।

अंग्रेजी राज की स्‍थापना के बाद भारत में सुधार आंदोलन हुए। उसे अंग्रेजी संपर्क का प्रभाव माना गया। यह सच है कि कई कुरीतियों के खिलाफ आंदोलन हुए और सफलता भी मिली। लेकिन हमें अंग्रेजी राज की स्‍थापना के मूल में क्‍या था, उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ईस्‍ट इंडिया कंपनी व्‍यापार करने आई थी और उसे यहां शासन स्‍थापित करने का अनुकूल माहौल मिल गया था। अपने हितों के लिए आज के छोटे-बड़े कारोबारी भी गार्ड रखते हैं। ये गार्ड हथियार बंद भी होते हैं और खाली हाथ भी। 18वीं सदी में कंपनी को तत्‍कालीन सत्‍ता को कर देने के अलावा और किन्‍हीं बंदिशों का सामना नहीं करना पड़ा था। कंपनी के पहरेदार चौकीदार हथियार बंद हो गए थे और इन्‍हीं गार्डों ने लॉर्ड क्‍लाइब को बिहार, बंगाल जीतकर दिया था। शासन स्‍थापित होने के बाद अंग्रेजों ने यहां के पारंपरिक उद्योगों को बंद कराया था। ढाका के मलमल से प्रतिस्‍पर्द्धा खत्‍म करने के लिए उन्‍होंने एक लाख बुनकरों का अंगूठा कटवा दिया था। घरेलू स्‍तर पर खांड, शक्‍कर और रवा बनाया जाता था। इन्‍हें खत्‍म करने के लिए अंग्रेजी राज में चीनी मिलों के हित में गन्‍ना रिजर्व एरिया एक्‍ट बनाया गया था। इस कानून को आजाद भारत की विधायिका भी अपनी स्‍वीकृति दे चुकी है और इसके प्रावधानों को और कड़ा कर चुकी है। इन दोनों बातों पर नजर डालने के बाद सबकुछ साफ हो जाता है। यह कहना कहीं से भी अनुचित नहीं होगा कि शासन व्‍यवस्‍था केवल और केवल अपने उद्योगों के लिए बाजार बनने का साधन थी। अपना मकसद साधने के लिए अंग्रेजी राज ने वहां की समाज व्‍यवस्‍था के प्रति हेय दृष्टि अपनाई और उन्‍हें अपनी परिभाषा के अनुसार ढालने के लिए अपने मतलब के उपकरण तैयार किए। उन्‍होंने इस‍के लिए पारंपरिक चीजों और मान्‍यताओं के विरुद्ध एक विचार स्‍थापित किया जिसे उन्‍होंने आधुनिकता कहा। आजादी के बाद अंग्रेजी राज के समय की आधुनिकता का बोलबाला बनता चला गया। असल में भारतीय समाज बाजार के अनुसार ढलता चला गया।

जब देश आजाद हुआ तो अंग्रेजी राज की व्‍यवस्‍था लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़ने लगी। जिस व्‍यवस्‍था की उम्‍मीद थी, वह स्‍थापित नहीं हो पाई। इसका असर व्‍यक्ति और समाज पर पड़ा। इन्‍हीं परिस्थितियों ने आम आदमी को निराश किया और उसमें असुरक्षा की भावना भी पैदा की। निराशा ने पहले उसे एकाकी बनाया तो बाद में असुरक्षा ने आक्रामक बनाया। सातवें दशक तक का हिंदुस्‍तानी समाज इसी निराशा, एकाकीपन और आक्रोश के बीच झूलता दिखता है। सातवें दशक के अंतिम समय तक यही समाज आक्रामक होने लगता है और आठवें दशक के आखिर में वह तनाशाही से लोहा लेता है। देश में इस तरह की सामाजिक परिस्थिति निर्मित करने के लिए स्‍वतंत्र भारत के नेतृत्‍व को जवाबदेह माना जा सकता है। स्‍वतंत्रता प्राप्ति से पहले नेताओं ने आजाद भारत के जिस स्‍वरूप की कल्‍पना की थी, सत्‍ता मिलने के बाद वास्‍तविकता भिन्‍न थी। संघर्ष के दिनों में की गई कल्‍पना साकार नहीं होने पर व्‍यापक जनसमुदाय निराश हो गया था। स्‍वातंत्र्योत्‍तर भारतीय समाज सपने और वास्‍तविकता के बीच के द्वंद्व में फंस गया था। हिंदी कहानी इसी द्वंद्व में उलझे आदमी के सामूहिक मनोभावों को हमारे सामने रखती है।

असल में यह द्वंद्व महात्‍मा गांधी की कल्‍पना के भारत और नेहरू के सपनों के भारत के बीच का है। कहानी को यदि स्‍वतंत्रता प्राप्ति से पहले और स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद के समय में विभाजित करें हमें सबकुछ साफ नजर आएगा।

भारतीय समाज अवतारवाद की कल्‍पना में जीता चला आया समाज है। मजेदार है कि भगवान बुद्ध जिन्‍होंने अपने तात्‍कालिक समाज को पदार्थवादी बनाया था। जिनका मुक्ति संबंधी विचार पारंपरिक विचार से भिन्‍न था। उनके पदार्थवादी चिंतन और मुक्ति या निर्वाण संबंधी विचार के कारण पारंपरिक वैदिक विचारकों ने उन्‍हें वाममार्गी घोषित किया था। इसके बाद भी भारतीय समाज ने उन्‍हें भगवान का दर्जा दिया और बाद में वैष्‍णव विचारकों ने उन्‍हें विष्‍णु के नौवें अवतार के रूप में मान्‍यता दी थी। भगवान बुद्ध ने तात्‍कालिक जीवन और शासन व्‍यवस्‍था को प्रभावित किया था। उपदेश देने से पहले उन्‍होंने स्‍वयं पालन किया और खुद पर ही प्रयोग भी किया था। उसे ग्राह्य और सुगम साबित किया था। यही कारण है कि समाज ने उसे सामूहिक रूप से स्‍वीकार किया था।

ठीक इसी तरह भगवान राम वनवास के लिए भेजे जाते हैं। राजमहल के ऐश्‍वर्य में जीने वाले राम वनवासियों की जीवनशैली अपनाते हैं। कंदमूल फल खाते हैं। राम की यही सादगी, यही त्‍याग भारतीय समाज को भाता है। एक तर्क दिया जाता है कि राम गरीबों के बीच गरीबों की तरह जीने के लिए मजबूर किए गए इसीलिए मजबूर भारतीय समाज ने उन्‍हें दयावश स्‍वीकार किया। भारतीय समाज पारंपरिक रूप से सहज और प्रकृति के साथ साम्‍य रखने वाला समाज है। सहजता ही वह मूल बिंदु है जो भारतीय समाज को राम और बुद्ध की तरफ ले जाता है। गौर करें तो भगवान बुद्ध और राम दोनों जीवन की कसौटी पर एक जगह ही खड़े नजर आते हैं। दोनों अवतारों के व्‍यापक आधार से स्‍वतंत्रता आंदोलन के समय गांधी को मिले जनसमर्थन का कारण भी साफ हो जाता है। गांधी भी अपनी निजी जीवनशैली और हर बुराई के खात्‍मे के प्रति अडिग रहने की अपनी प्रवृत्ति के कारण व्‍यापक रूप से स्‍वीकृत हुए थे। उन्‍हें उसी भारतीय समाज का आधार मिला था जिसे अवतारवाद का समर्थक माना जाता है। उस समाज ने गांधी के रामराज के नारे पर भरोसा किया था। उसे उम्‍मीद थी कि देश जब आजाद होगा तो उसके सभी दुखों का अंत हो जाएगा। भारतीय समाज के लिए गांधी एक अवतार की तरह थे इसलिए उनके हर आह्वान पर लोग गोलबंद हो रहे थे। आजादी के बाद गांधी की कल्‍पना का भारत खो गया। उसकी जगह एक ऐसी व्‍यवस्‍था आकार ले रही थी जिसमें आदमी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा था। यही वह परिस्थिति थी, जिसमें नई कहानी उठ खड़ी हुई थी।

जिन सामाजिक परिस्थितियों को नई कहानी आंदोलन की कहानियां हमारे सामने रखती हैं, उसके लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू की नीतियों को जवाबदेह ठहराया जा सकता है। लेकिन मजेदार है कि नई कहानी के कथाकार त्रयी में से एक राजेंद्र यादव ने करीब ढाई दशक पहले एक विचार गोष्‍ठी में कहा था कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद देश में कोई विजनरी नेता नहीं हुआ। राजेंद्र यादव के मुताबिक, नेहरू के विजन ने देश की समाजव्‍यवस्‍था, अर्थव्‍यवस्‍था को प्रभावित किया था। राजेंद्र यादव ने नेहरू के सपने के भारत को सत्‍य मानते हुए उनके विजन के संबंध में यह विचार व्‍यक्‍त किया था। जीवन में बदलाव आया, उद्योगों की आधारशिला रखी गई, विकास के काम शुरू हुए और शहरों का विकास होने लगा। इन सभी बदलावों के मूल में नेहरू के विजन को मुख्‍य कारक माना जाता है। यह निर्विवाद सत्‍य है कि आजादी के बाद हुए विकास का लोगों के जीवन पर कई रूपों में असर पड़ा। लेकिन भारतीय समाज पर विकास का नकारात्‍मक असर भी पड़ा। लोगों में निराशा बढ़ी और जीवन की शर्तें आसान होने की जगह और दुरूह होती चली गईं। बेहतर जीवन की उम्‍मीद में लोग शहर की ओर बढ़ने लगे थे, लेकिन वहां उनके लायक रोजगार नहीं थे। अकेले आ रहे लोग अकेले हो रहे थे और जीवन का, पीछे छूटे परिवार की उम्‍मीदों का बोझ उठाए चल रहे थे। ऐसे में भारतीय जनमानस में निराशा का पनपना स्‍वाभाविक था। निराशा के उसी वातावरण से जूझ रहे शहरी समाज का चेहरा छठे दशक के मध्‍य में आई कहानियों में दिखाई देता है। कहा जा सकता है कि आजादी के बाद जो सामाजिक परिस्थिति विकसित हुई थी, वह नेहरू के विजन की ही देन थी।

नेहरू के सपनों के भारत में पश्चिम का ऐश्‍वर्य था। वह भारत को ब्रिटेन और दिल्‍ली को लंदन बनाना चाहते थे। यही गांधी और नेहरू के बीच का अंतर था। जब आजादी आसन्‍न हो गई थी, तब भावी भारत के स्‍वरूप को लेकर गांधी और नेहरू दो भिन्‍न सिरों पर खड़े हो चुके थे। नेहरू के सपनों का भारत जिस भ्रष्‍टाचार में डूबने वाला था, उसकी झलक मिलने लगी थी और कांग्रेस में जो लोग खादी पहन अपने लिए जगह बना रहे थे, वे आने वाले दिनों का संकेत दे रहे थे। इस स्थिति को फणीश्‍वरनाथ रेणु ने अपने उपन्‍यास ‘मैला आंचल’ में रखा है।

‘मैला आंचल’ का बामन दास गांधीवादी विचारधारा पर अडिग रहने वाला वह मनुष्‍य है, जिसे आजाद भारत या यह कहिए कि नेहरूबियन मॉडल का भारत बेकार या आउट डेटेड मान रहा है। ‘मैला आंचल’ में आजादी के आसपास के समय में गलत लोगों को कांग्रेस का नेता बनते दिखाया गया है। इस उपन्‍यास के अंतिम पड़ाव में भारत और पूर्वी पाकिस्‍तान के बीच चल रही तस्‍करी और उससे जुड़े लोगों को दर्शाया है। बैलगाडि़यों पर तस्‍करी का सामान ले जाया जा रहा है। नागर नदी को दोनों देशों की सीमा मान ली गई है। इसी नदी के चोर घाट से बैलगाडि़यां पार कराई जाती हैं। इस तस्‍करी में सप्‍लाई इंस्‍पेक्‍टर, हवलदार, सिपाही सभी मिले हुए हैं। इसका लीडर दुलारचंद कापरा है, जो अफसरों को मोरंगिया शराब (बिहार के सीमावर्ती इलाके में नेपाल को मोरंग कहा जाता है) परोसता है। कटहा का दुलारचंद जुआ घर चलाता है और मोरंगिया ल‍ड़कियों, गांजा शराब का कारोबार करता रहा है। वह कपड़ा, चीनी, सीमेंट पूर्वी पाकिस्‍तान भेजता है। यही दुलारचंद कापरा कटहा थाना कांग्रेस कमेटी का अध्‍यक्ष भी बन गया है। यहां दुलारचंद आजाद भारत में निचले स्‍तर पर शासकों के चरित्र की झलक देता है। इसके माध्‍यम से रेणु ने यह बताया है कि देश तो बस अंग्रेजी चंगुल से आजाद हुआ, लेकिन उसकी व्‍यवस्‍था से उसे मुक्ति नहीं मिल सकी।

नेहरू यूरोप के जिस वैभव से बंधे थे, गांधी पश्चिम के उसी ऐश्‍वर्य के विरुद्ध खड़े थे। गांधी भारतीय समाज के अनुरूप साबित हो रहे थे इसलिए उन्‍हें हर वर्ग का समर्थन प्राप्‍त हुआ था। प्रेमचंद ने अपने उपन्‍यास ‘रंगभूमि’ में सूरदास के माध्‍यम से गांधी के इसी रूप को सामने रखा है। आलोचकों की दृष्टि में यह उपन्‍यास दो संस्‍कृतियों के बीच के टकराव को सामने रखता है। लेकिन यह उपन्‍यास दो संस्‍कृतियों के वैचारिक टकराव तक ही सीमित नहीं है। यह बाजार में गांधीवाद के गुम हो जाने की दास्‍तां को भी सामने रखता है।

भारत में अंग्रेजी सामान या भारत को अपना बाजार बनाने के क्रम में अंग्रेजों ने आधुनिकता के बारे में जो दृष्टि फैलाई थी, इस उपन्‍यास में सूरदास उसी दृष्टि के खिलाफ भारतीय विचारधारा के प्रतीक के रूप में खड़े हैं। गौर किया जाए तो सूरदास उसी आधुनिक भोगवादी लालसा से लिप्‍त आधुनिक समाज के विरुद्ध दिखाई देते हैं। इस उपन्‍यास का नायक सूरदास उस भारतीय समाज का प्रतिनिधित्‍व कर रहे हैं, जो दूसरों के लिए त्‍याग करना धर्म समझता है। वह अपनी जमीन की कीमत नहीं देखते, अपने दुखों से मुक्ति पाने के लिए वह जमीन की ऊंची कीमत की लालसा नहीं पालते। जमीन पर मि. जान सेवक की नजर पड़ जाती है और वह उन्‍हें पांच रुपये देने लगता है। बग्‍गी के साथ मीलों दौड़ता चले आए सूरदास यह कहते हुए रुपये लेने से इन्‍कार कर देते हैं, ‘धर्म में आपका स्‍वार्थ मिल गया, अब यह धर्म नहीं रहा।’

इन दोनों उपन्‍यासों और उसके गांधीवादी नायकों का जिक्र इसलिए किया है कि दोनों के गांधीवादी नायक उसी शहरी प्रपंच के शिकार हो जाते हैं, जिसमें आजाद भारत का आम आदमी फंस गया है। दूसरे शब्‍दों में कहा जाए तो गांधी और गांधीवाद जिस बाजार के खिलाफ खड़े थे, आजाद भारत में उसी गांधीवाद को औद्योगिक साम्राज्‍य का बाजार निगल जाता है और बदलती सत्‍ता उन्‍हें समय-समय पर अप्रासंगिक करार देती रहती है। दोनों उपन्‍यासों में दोनों कहानीकारों ने प्रतीकात्‍मक ढंग से गांधीवाद की इसी स्थिति को दर्शाया है।

‘मैला आंचल’ के बामन दास नेहरूबियन मॉडल के भारत के विरोध में खड़े हो जाते हैं और नेहरूबियन मॉडल का भारत उन्‍हें कुचलकर मार डालता है। उनकी लाश नागर नदी के पार पूर्वी पाकिस्‍तान में फेंक दी जाती है। दूसरी तरफ के सिपाही बामन दास की लाश को नदी में प्रवाहित कर देते हैं और उनका झोला भारतीय सीमा में एक पीपल के पेड़ पर टांग देते हैं। समय के थपेड़े में झोला चीथड़ा हो जाता है और लोग पीपल को चे‍थरिया पीर समझने लगते हैं। फिर वहां पेड़ में कई चीथड़े लटक जाते हैं। ‘रंगभूमि’ में उद्योग से गांव का समाज बदल जाता है। लोगों का आपसी व्‍यवहार बदल जाता है और नायक सूरदास का अंत होता है, लेकिन उनके हठ और जनोन्‍मुखी स्‍वभाव के कारण उनकी मूर्ति लगाई जाती है। एक दिन उनकी प्रतिमा को उद्योग समर्थक राजा क्षतिग्रस्‍त कर देता है।

रेणु ने तो आजादी के बाद ‘मैला आंचल’ लिखा था, लेकिन प्रेमचंद ने ‘रंगभूमि’ आजादी से बहुत पहले लिखा था। तत्‍कालीन परिस्थितियों को देख प्रेमचंद भावी भारत के स्‍वरूप के बारे में सटीक अनुमान लगा बैठे थे। जिस समय ‘रंगभूमि’ की रचना हुई थी, उस समय आजादी के लिए संघर्ष ही चल रहा था। आजादी आसन्‍न भी नहीं थी, लेकिन प्रेमचंद ने यही कल्‍पना की थी कि यह देश गांधी को प्रतिमाओं में समेट देगा और उसी बाजार के व्‍यामोह में जा फंसेगा, जिसके खिलाफ गांधी खड़े हैं।

आजाद भारत में आधुनिक कौन इसकी परिभाषा बदल जाती है। शिक्षा और ज्ञान आधुनिक होने की पहचान के सबसे निचले पायदान पर आते हैं, लेकिन पहनावा आदमी को समाज में प्रतिष्‍ठा दिलाता है। नई पीढ़ी की नजर में खादी पहनना पिछड़ेपन की निशानी बन चुका है। एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को अपने से अलग मानती है। मूल्‍यों और मान्‍यताओं में आए इस बदलाव को दीप्ति खंडेलवाल ने अपनी कहानी ‘मूल्‍य’ में बेहतर तरीके से चित्रित किया है – ‘ओ माई गॉड ! पिताजी, क्‍या हुलिया बनाए रहते हैं आप भी ? ढंग के कपड़े तो पहना कीजिए। कितनी बार आपको बताया कि टेरीकॉट का एक सूट बनवा लीजिए, तो झंझट मिटे। लेकिन आप तो खादी की लादी लादे रहेंगे और उन पर मां प्रेस करेगी, लोटे में कोयला डालकर। क्‍या आप लोगों के लिए ढंग से रहने की कोई वैल्‍यू नहीं ?’

वैल्‍यू ?
मूल्‍य ?

पंडित जी भरपूर नजर से बेटे को देखते हैं। टेरीकॉट की तंग पैंट और ब्‍लाउजनुमा चुस्‍त बुशर्ट में कलमें बढ़ाए यह उनका अपना खून कितने निर्द्वंद्व भाव से उन्‍हें मूल्‍यों का अर्थ समझा रहा है।1

इस तरह के बदलाव का शहरी जीवन और परंपरागत पेशा पर बुरा असर पड़ा था। बदीउज्‍जमा ने ‘चौथा ब्राह्मण’ कहानी संग्रह में ‘मिटते साए’ कहानी में इसी स्थिति को दर्शाया है। ये दोनों कहानियां आठवें दशक की हैं। इस दशक तक आते-आते हर दो-तीन साल बाद मानदंडों में तेजी से बदलाव आता है। इन बदलावों का कारण वैज्ञानिक उन्‍नति, औद्योगिक प्रगति, महानगरीय सभ्‍यता का तेजी से विकास, शिक्षा और कला आदि में परिवर्तन था। इन सबके मूल में पश्चिम का भौतिकवादी चिंतन था। जिस तरह की सोच और जिस तरह के चिंतन से महानगरीय संस्‍कृति लैस थी, उसमें पुराने मूल्‍यों और संस्‍कारों के लिए कोई जगह नहीं थी। महानगरों में रहने वाले और रहने आए लोगों ने अपने अनेक संस्‍कारों के विपरीत नई जीवन पद्धति अपनाई। इस बदलाव ने समाज को दिखावे के अध्‍यात्‍म से बांधा। यह अध्‍यात्‍म भी भौतिकता के रंग में डूबा और उसने भी बाजार बनाया। उस बाजार में आज के कई साधु-संत दिखते हैं।

शहरीकरण ने संयुक्‍त परिवार को तोड़ा, परिवार में भी तनाव, फूट और संबंधों में बिखराव पैदा हुआ। इसी स्थिति ने अकेलापन, सूनापन, बेगानापन और जटिलताओं को न केलव जन्‍म दिया, बल्कि उसे पाला भी। गोविंद मिश्र की ‘कचकौंध’ कहानी में पंडित जी जैसे पात्र इस व्‍यथा से पीडि़त हैं कि शहर आकर उनके बेटे-पोते उन सब प्रतिमानों को ध्‍वस्‍त कर रहे हैं, जिसका उन्‍होंने जीवनभर निष्‍ठापूर्वक पालन किया है। उन्‍हें लगता है कि शहर में आ गई उनकी अगली पीढ़ी ‘हर चीज को मटियामेट कर रही है।’2

इस नए पनप रहे समाज ने आठवें दशक में ही वैवाहिक संबंधों को लेकर भी भिन्‍न विचार को जगह दे दी थी। रमेश बक्षी ने ‘पिता दर पिता’ कहानी में इसे बखूबी दर्शाया है। कहानी की नायिका एनी विवाह को स्‍त्री के स्‍वतंत्र अस्तित्‍व के लिए हानिकारक मानती हुई कहती है, ‘विवाह का अर्थ खुद को समाप्‍त करना है।’3

बाजार के प्रभाव में सबसे पहले नगर ही आए। नगर से ही नई सोच का प्रसार शुरू हुआ। नौवें दशक के पहले तक टेलीविजन सिर्फ महानगर तक ही सीमित था। प्रचार का सबसे बड़ा माध्‍यम रेडियो था और दृश्‍य श्रव्‍य के रूप में सिनेमा। ऐसे में दबे पांव नई धारणाएं और विचार कस्‍बों तक पहुंचे। नगरों में नए-नए बोधों का जन्‍म हुआ। भैरू लाल गर्ग ने इस संबंध में लिखा है- ‘आधुनिकता, परंपरा से मुक्ति के लिए प्रयत्‍न, कृत्रिम जीवन प्रणाली, कालाबाजारी, अनैतिकता, काम की उग्रभूख, जीवन मूल्‍यों और जीवन दृष्टि में तीव्र परिवर्तन, संबंधों में परिवर्तन, प्राचीनता और नवीनता के मध्‍य संघर्ष, अपरिचय ऊब, अकेलापन, अविश्‍वास, फिट न होने की स्थिति, क्षण बोध, स्‍त्री-पुरुष का जूझना और अंत में टूटना, दिग्‍भ्रम आदि स्थितियों का प्रादुर्भाव हुआ है।’4

हिंमाशु जोशी की कहानी ‘कोई एक मसीहा’ में आजाद भारतीय राजनीतिक का चेहरा सामने रखा गया है। जनता के प्रतिनिधि सुरेश भाई आश्रम का निरीक्षण करने पहुंचे हैं। उनका ध्‍यान वहां की सुंदर कन्‍याओं पर है। आश्रम की संचालिका उनकी सेवा में सावित्री नाम की लड़की को भेज देती है। सुरेश भाई सावित्री को भी शराब पिलाते हैं और रात भर उसकी सेवा लेते हैं। सुबह जब जाने लगते हैं तो उसे खादी की धोती पुरस्‍कार में देने के लिए कह जाते हैं।5

गिरिराज किशोर की कहानी ‘मंत्रीपद’ में नेताओं के स्‍वार्थ को उजागर किया गया है। कहानी के पंडित भूतपूर्ण मंत्री और मौजूदा सांसद हैं। यह नेता बातें तो आदर्श की करते हैं, लेकिन व्‍यवहार में अत्‍यंत कुटिल हैं। पंडित जी कहते हैं, ‘बड़ा दुख होता है। मंत्री लोग शाहों में नौकरशाह हैं। जनतंत्र में नौकरशाह ही सबसे बड़ा शाह होता है। बाकी तो सब गुलाम हैं। वे लोग जनता चुने गए प्रतिनिधियों जैसा व्‍यवहार नहीं करते। उनका जनता से कोई संपर्क नहीं है। इनका तामझाम राजकुमारों वाला है। गांधी जी की आत्‍मा क्‍या कहती होगी। क्‍या मैंने इसलिए आजादी की लड़ाई लड़ी थी। पटेल की आत्‍मा रोती होगी। जब राजकुमारों को रहना ही था तो बेकार ही मैंने उन कदमी राजवाड़ों का खात्‍मा किया। धत्‍त तेरी की।’

गिरधर गोपाल की कहानी ‘मुझे बचाओ’ में स्‍वतंत्रता के बाद के भ्रष्‍टाचार का चित्रण किया गया है। सोमेश एक ईमानदार नागरिक है और आजादी की लड़ाई लड़ता है। देश में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार को देखकर सोमेश कहता है, ‘यहां आदमी इतना गिर चुका है कि थोड़े से लाभ के लिए देश का बड़े से बड़ा अहित करने में उसे शर्म नहीं आती। ईमान बेच सकता है और ईमान खरीद सकता है।’ स्थिति को देख सोमेश कहता है, ‘खादी और गांधी टोपी भ्रष्‍टाचार की ध्‍वजा बन गई है।’

इन कहानियों में जिस समाज और जिस राजनीतिक, प्रशासनिक व्‍यवस्‍था की तस्‍वीर को कहानीकारों ने समाज के सामने पेश किया है, वह उसका यथार्थवादी चेहरा है। यह पूरी व्‍यवस्‍था बाजार में खड़े सक्षम खरीदार और अक्षम खरीदार के बीच के भेद को स्‍पष्‍ट करता है। सच तो यही है कि आजादी के बाद बाजार में हेराए गांधीवाद को हिंदी कहानी ने परखा और पेश किया है।

संदर्भ संकेत

1 संपादक योगेंद्र कुमार (लल्‍ला) : श्रीकृष्‍ण, हिंदी लेखिकाओं की श्रेष्‍ठ कहानियां (कहानी संग्रह), राष्‍ट्रभाषा प्रकाशन 1991, पृष्‍ठ 38
2 गोविंद मिश्र, कचकौंध, सारिका 1972
3 रमेश बक्षी, पिता दर पिता, रूपांबरा प्रकाशन, इलाहाबाद, 1971, पृष्‍ठ 24
4 भैरू लाल गर्ग, स्‍वातंत्र्योत्‍तर हिंदी कहानी में सामाजिक परिवर्तन, चित्रलेखा प्रकाशन, 1979
5 हिंमाशु जोशी, चर्चित कहानिया, कोई एक मसीहा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्‍ली

साभार : अभि‍मत



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