बच्चों के लिए कविताएँ : संज्ञा उपाध्याय

संज्ञा उपाध्याय

संज्ञा उपाध्याय

उफ़ कबूतर! ये कबूतर !

उफ़ कबूतर! ये कबूतर!
गूँ गूँ गूँ गूँ गुटर गुटर कर
कितना शोर मचाते हैं!

सुबह-सुबह मेरी खिड़की पर
फड़ फड़ फड़ फड़ पंख फटककर
जबरन मुझे जगाते हैं!

बिना इजाज़त घर में घुसकर
शान से हर कमरे में फिरकर
हम पर रौब जमाते हैं!

आँख सदा रखते झाड़ू पर
चाहे कितनी रखो छिपाकर
सींकें ले उड़ जाते हैं!

फेंको तिनके झाड़-बुहारकर
पर जो भायी, उसी जगह पर
फिर-फिर उन्हें सजाते हैं!

डांटूं जब मैं हाथ झटककर
डरने का थोड़ा नाटक कर
गोल आँख मटकाते हैं!

आसमान में चक्कर भरकर
उड़े जहाँ से, वहीं बैठकर
गर्दन ख़ूब फुलाते हैं!

मकड़ी जाला बुनती है

मकड़ी जाला बुनती है
नहीं किसी की सुनती है
पूरे घर को देखभाल कर
कोने-अँतरे चुनती है
दम साधे जाले में बैठी
गुर शिकार के गुनती है
जाले पर झाड़ू फिरने पर
रोती है सिर धुनती है
किसे सुनाये दुखड़ा जाकर
दुनिया ऊँचा सुनती है.

बादल का वह नटखट बच्चा

बादल का वह नटखट बच्चा
हाथ छुड़ाकर अपनी माँ से
आगे-आगे दौड़ गया है
बादल का वह नटखट बच्चा!
घूम रहा है जाने कब से
तरह-तरह के रूप बदलके
भालू, हाथी, कछुआ बनके
मेरी खिड़की तक आया तो
मछली बनकर तैर गया है
बादल का वह नटखट बच्चा!

कैसे बतलाऊँ…

अक्सर पूछा करते हैं सब
चलते में इस तरह अचानक
यूँ तुम ठिठक क्यूँ रह जाती हो
खड़ी हुई तो खड़ी रह गई
कभी देखती कहीं एकटक रह जाती हो
कैसे यह समझाऊँ सबको
रस्ते में जब पेड़ कोई
या कोई बादल, कोई कौवा
बतियाने लगता है मुझसे
ठिठकी हुई नहीं होती हूँ, बह जाती हूँ…

सूरज का माथा गरमाया

सूरज का माथा गरमाया
चढ़ा है उसका पारा
होकर आगबबूला उसने
सब पर ताप उतारा
आसमान कोरे कागज़-सा
बिन पंछी बिन बदरा
पड़ा तार पर सूख रहा ज्यों
साफ़ धुला इक चदरा
हवा दुबक के जा बैठी है
छाया में कहीं छुपकर
कहीं बुखार ना हो जाये
इस तेज़ घाम में तपकर
पंछी मुँह लटकाये बैठे
कहाँ से पायें पानी
बच्चे उनके दाना माँगें
सुनते नहीं कहानी
तब धरती इक बड़े ताल में
पानी लायी भरकर
नंगे पाँव धूप में जल गये
भागी घर के अंदर
खिड़की से झाँका जो आयी
छप छप की आवाज़
ताल में सूरज नहा रहा था
छोड़ के सारे काज!


8 comments on “बच्चों के लिए कविताएँ : संज्ञा उपाध्याय

  1. अनुप्रिया says:

    सभी कविताएँ बहुत अच्छी लगी।मकड़ी जाला बुनती है ,बहुत अच्छी लगी।

  2. रमेश तैलंग says:

    सभी बाल कवितायेँ अच्छी हैं और उनमें व्यक्त छवियाँ तथा उनकी लयकारी आकर्षक है. संज्ञा को और भी बाल्,कवितायेँ सामने लानी चाहिए. उनकी बाल कविताओं में शिल्प की काफी संभावनाएं हैं, हाँ यदि वे बच्चों के कार्यकलापों को भी अपना विषय बनाएं तो और भी विविधता आ जाएगी…

  3. shashi says:

    बढ़िया कविताएँ..

  4. Shyam Gopal Gupta says:

    सच में मन प्रसन्न हो गया बहुत अच्छी कविताएं

  5. Meethesh Nirmohi says:

    कविताएं अच्छी हैं.बधाई .
    मीठेश निर्मोही

  6. मृत्युंजय प्रभाकर says:

    बालकों ही नहीं, बल्कि बड़ों के दिल को भी छूती कविताएँ

  7. श‍िवनारायण गौर says:

    सुन्दर कविताएँ हैं। बधाई। मकड़ी जाला बु‍नती है ने ज़्यादा बॉंधा। इसके और इस्तेमाल के बारे में भी सोच सकते हैं।

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