बचपन की अलग-अलग छवि की मोहक कहानियां : शकुन्तला कालरा

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साहित्यकार संजीव ठाकुर का लेखन प्रौढ़ एवं बाल पाठकों में समान रूप से समादृत है। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में वे निरंतर प्रकाशित दिखाई देते हैं। बड़ों के साथ-साथ बच्चों के लिए भी उन्होंने विपुल साहित्य की रचना की है। उनकी प्रतिभा का प्रस्फुटन लेखन के साथ-साथ शास्त्रीय संगीत में भी है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी संजीव ठाकुर अध्यापन-क्षेत्र से भी जुड़े रहे हैं। बच्चों के लिए लिखे साहित्य में उनके इसी बहुआयामी व्यक्तित्व का प्रतिबिंब देखा जा सकता है।

‘कबूतरी आंटी’ संजीव ठाकुर का अलग-अलग ज़मीन पर लिखी बाल कहानियों का संग्रह है। कथानक या विषयवस्तु कहानी की आत्मा है। बालकहानी में शिल्प उतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता और न शास्त्रीय दृष्टि से कहानी के तत्‍व महत्त्वपूर्ण हैं। संग्रह में विविध विषयों से सजी 15 कहानियां हैं, जो बच्चों को अलग-अलग दुनिया में प्रवेश कराके उनका मनोरंजन भी करती हैं और चुपके-चुपके कुछ संदेश भी संप्रेषित कर जाती हैं। यह संदेश कहानी की आत्मा में इस तरह अनुस्यूत है कि दिखाई नहीं देता किंतु प्रभावित करता है।

संग्रह में विभिन्न शीर्षकों की कहानियां हैं- ‘दो दोस्तों की कहानी’, ‘हमें नहीं जाना’, ‘मिट्ठू’, ‘रूठनदास’, ‘घिर गया बंटा’, ‘डरपोक’, ‘रामदेव काका’, ‘राखी नहीं बाँधूंगी’, ‘जालिम सिंह’, ‘चुन्नू-मुन्नू का स्कूल’, ‘सुबू भी खेलेगी होली’, ‘संगीत की धुन’, ‘जादूगर’, ‘नेहा को इम्तहान से डर नहीं लगता’, ‘कबूतरी आंटी’ आदि। संग्रह की पहली कहानी ‘दो दोस्तों की कहानी’ है- बिल्ली और कुत्ते की दोस्ती की कहानी। बिल्ली और कुत्ते की दुश्मनी की कहानी तो बड़ी पुरानी है, पर प्रस्तुत कहानी में इनकी दोस्ती की नवीन गाथा है। कुत्ते के नाली में गिरने पर बिल्ली उसे निकालने में उसकी मदद करती है। तब से कृतज्ञ कुत्ता उसका दोस्त बन जाता है। दोनों मिलकर मुसीबतें झेलकर घरों/बाज़ार से कुछ खाने का सामान उड़ा लाते हैं किंतु लोगों की मार के डर से वे दुःखी होकर भविष्य का कार्यक्रम बनाते हुए खेतों में जाकर रहने का फैसला करते हैं, जहां उन्हें चूहे मिलेंगे और नदी किनारे ताज़ी मछलियां भी।

‘हमें नहीं जाना’ ग्रामीण पृष्ठभूमि पर लिखी गई दूसरी कहानी है। बिन्नी और टीनू छुट्टियों में अपने पापा के साथ दादाजी के गांव आते हैं। शहर की भीड़-भाड़ से दूर अपने दादाजी का गांव और उनका खुला और बड़ा सा मकान रास आ जाता है। आम, कटहल, अमरूद के वृक्षों को देखकर तो दोनों बहन-भाई उछल पड़ते हैं। आम की झुकी हुई डाली पर बैठकर झूला झूलते। जब नदी में नहाते तो स्कूल के स्वीमिंग पूल को भूल जाते। पहाड़ी पर चढ़कर प्रकृति का नज़ारा देखते। इस तरह आनंदपूर्वक छुट्टियां कब बीत जाती हैं, उन्हें पता ही नहीं चलता। शहर लौटने का उनका मन ही नहीं होता और वे कहते हैं- ‘हमें नहीं जाना’। तब दादाजी पढ़ाई की जीवन में अनिवार्यता बतलाते हुए अगली छुट्टियों में फिर आ जाने का आश्वासन देते हैं किंतु जाने वाले दिन वे मचान पर चढ़कर छिप जाते हैं। यह कहानी बच्चों की सहज प्रकृति को दर्शाती हैं। पढ़ाई का बंधन, अध्यापकों और घर में माता के अनुशासन में ‘यह करो यह न करो’ के उपदेश भरे वाक्यों से बच्चे ऊब जाते हैं।

‘मिट्ठू’ उन्मुक्त आकाश में उड़ते हुए एक तोते की कहानी है जो एक दिन श्रुति की बॉलकनी की रैलिंग में आकर बैठ जाता है। श्रुति मां के कहने पर उसे हरी मिर्च खिलाती है। तोता ऐसे ही रोज़ आने लगता है। श्रुति उसे हरी मिर्च और भिगोए हुए चने खिलाती है। कटोरे में पानी भी रखती है। मिट्ठू रोज़ आता। उछलता, कूदता, मिर्च खाता, श्रुति के कंधे पर चढ़ बैठता, कभी उसकी हथेली पर। लेकिन पकड़ने पर कभी हाथ नहीं आता। एक दिन श्रुति उसका इंतज़ार करती रहती है, पर वह नहीं आता और ऐसे ही अगले दिन, फिर अगले से अगले दिन भी नहीं आता। श्रुति परेशान होकर मां से पूछती है तो मां उसे बताती है कि कोई बहेलिया उसे पकड़कर ले गया होगा और पिंजरे में बंद करके बेच दिया होगा। श्रुति बहुत दुःखी होती है और रात को सोते समय सोचती है कि अगर कहीं से सचमुच उसके हाथ बंदूक आ जाती तो वह बहेलिए को गोली मार देती। श्रुति की यह सोच आज की पीढ़ी की सोच है जो टी.वी. संस्कृति से हिंसात्मक प्रवृत्ति की हो गई हैं। लेखक ने इस ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित किया है क्योंकि श्रुति साफ कहती है- ‘‘मैं उसे उसी तरह गोली मार देती जिस तरह सीरियल में या फिल्मों में कोई बदमाश को मारता है।…..’’

‘नेहा को इम्तहान से डर नहीं लगता’ बच्चों को सीधे-सीधे नसीहत देने वाली कहानी है कि जैसे नेहा नियमित रूप से पढ़ती है वैसे ही सभी बच्चे पढ़ें तो उन्हें तनाव नहीं होगा। ‘रूठन दास’ बाल मानसिकता से जुड़ी है। बच्चे बात-बात पर रूठ जाते हैं। कभी मनपसंद नाश्ता न मिला या मनपसंद खिलौना या कोई और प्रिय वस्तु न मिलने पर वे न केवल बात करना बंद करते हैं, वरन् खाना तक नहीं खाते। बाल-प्रकृति को दर्शाती इस कहानी में रूठनदास का चरित्र भी इसी प्रकार का है। घर में तो सब उसके नाज़-नखरे उठाते हैं और उसकी ज़िद पूरी कर देते किंतु मित्र तो मित्र ठहरे। वह उसे ‘रूठनदास’ कहकर चिढ़ाने लगे। यह आदत उसकी बनी रही। कुछ दिन गांव से दूर शहर के बड़े स्कूल में जब पढ़ने जाता है तो वह वहां भी रूठने लगा किंतु वहां उसे कोई नहीं मनाता। वह रूठना भूल गया। घर आया तो उसके इस परिवर्तित स्वभाव से सबको सुखद आश्चर्य हुआ। वह खुद भी अब बहुत प्रसन्न था।

बच्चों के स्वभाव से जुड़ी एक दूसरी शरारती बच्चे की कहानी है ‘घिर गया बंटा’। बंटा कभी किसी बच्चे को नाली में गिरा देता तो कभी किसी की साइकिल। किसी को बकरी पर चढ़ाकर उसे दौड़ाना आदि उसके प्रिय शौक थे। एक बार उसने ‘हीरा’ के माथे पर नमक लगा कर पत्थर से घिसकर गूमड़ बना दिया। बेचारा दर्द से तड़पने लगा। पप्पू के हाथ बांधकर उसकी पैंट खोल दी। अब तो सब बच्चों ने उसको भी मज़ा चखाने की ठानी। सभी बच्चों ने अपनी-अपनी कमर में बेल्ट या बिजली की तार का कोड़ा बनाकर बांधा और बगीचे में बंटा को छोड़ दिया। बंटा भागने लगा। सब बच्चे उसके पीछे-पीछे भागने लगे। वह भागते-भागते एक कच्चे कुएं में गिर जाता है। किंतु यहां बच्चे ‘बंटा’ के स्वभाव और उसकी मित्रों के साथ की गई ज्यादतियों को भूलकर उन्हीं तारों को बांधकर एक लम्बी रस्सी बनाकर कुएं में डाल देते है, जिससे बंटा बाहर आ जाता है। बंटा शर्मिंदा सा खड़ा था। वह समझ चुका था कि मित्र तो मित्र होते हैं- वे चाहते तो उसे कुएं में गिरा रहने देते और अपना बदला ले सकते थे, किंतु बच्चों ने ऐसा नहीं किया। उसने सबसे माफ़ी मांगी और सबका दोस्त बन गया।

‘रामदेव काका’ कहानी बच्चों के कोमल संवेदनशील स्वभाव और उनकी सहृदयता को दर्शाती है। बच्चे देबू का अपने घरेलू नौकर रामदेव के प्रति स्नेह, उसके अर्धनग्न बेटे को देबू का अपनी कमीज़ उतारकर देना बच्चों में निष्छल स्वभाव और उनकी सहृदयता का सुन्दर उदाहरण है। ‘राखी नहीं बाँधूंगी’ भाई-बहन के प्रेम की कहानी है जहां रूठना-मनाना, लड़ना-झगड़ना और फिर सब भूलकर दुगुने प्रेम से एक हो जाना दिखाया गया है। ‘जालिम सिंह’ कहानी चपरासी जालिम सिंह के कठोर स्वभाव के हृदय-परिवर्तन की कहानी है। ‘चुन्नू-मुन्नू का स्कूल’ में उन बच्चों की प्रकृति बतलाई है जिन्हें स्कूल फालतू लगता है और जो रोज़ नया बहाना गढ़-गढ़ कर स्कूल से छुट्टी करते हैं किंतु एक दिन पिता के द्वारा पकड़ लिए जाते हैं। यह कहानी यहीं खत्म हो जाती है किंतु यदि लेखक बच्चों को किसी घटना के माध्यम से स्कूल से भागने का दुष्परिणाम या कोई नुकसान दिखाते तो कहानी एक अच्छा मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ती और बच्चों के लिए भी प्रेरक बन जाती। यहां बच्चों को अभी भी इस बात का अहसास नहीं हुआ कि उन्होंने कोई गलती की है। भोले माता-पिता के विश्वास को छला है या अपनी पढ़ाई का कोई नुकसान किया है।

‘सुबू भी खेलेगी होली’ में बच्चों की डर की भावना को पिता अपनी समझ-बूझ से दूर करते हैं तो ‘संगीत की धुन’ में समीर की संगीत के प्रति धुन उसे एक दिन सचमुच बहुत बड़ा गायक बना देती है। निःसंदेह यह कहानी बच्चों को धुन का पक्का होना सिखाएगी और लक्ष्य की ओर बढ़ाएगी। ‘जादूगर’ संवेदना और सहृदयता की कहानी है जो निश्चय ही बच्चों में भावात्मक संस्कारों को पुष्ट करेगी।

संग्रह की अंतिम शीर्षक कहानी ‘कबूतरी आंटी’ बाल मानसिकता की कहानी है। बच्चों में पशु-पक्षियों के साथ ‘मानवीकरण’ की कहानी है। सुबू कबूतरी आंटी के बच्चे में अपने को देखती है और छत पर उसके लिए वे सारी वस्तुएं फैंकती जाती हैं जो उसके लिए आवश्यक हो सकती हैं- मसलन, कंघी, पानी पीने का बरतन, चावल-दाल के दाने सब। वह उसको रोज़ बढ़ता देख बड़ी खुश होती है। वह कबूतरी आंटी से खूब बतियाती है और यह कहकर अपनी पेंसिल बॉक्स भी गिरा देती है कि वह स्कूल जाएगा और उसे ज़रूरत पड़ेगी। कबूतरी का बच्चा उड़ना सीख जाता है। वह कुछ देर उड़कर जाता है और फिर छज्जे पर आकर बैठता है। सुबू सोचती है- वह स्कूल जाता है और फिर लौट आता है। पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता जगाती यह कहानी बच्चों में प्रकृति के प्रति उत्सुकता का भाव जगाती है।

इन कहानियों से लेखक ने बाल मनोभावों को अभिव्यक्ति दी है। बालकों की रुचि, प्रवृत्ति को केन्द्र में रखते हुए सीधी-सरल एवं बालोपयोगी भाषा में लिखी ये कहानियां बच्चों को पसंद आएंगी। मानवीय संवेदनाएं बच्चों के हृदय तक पहुँचेगी चाहे मानव के प्रति हों चाहे मूक पशु-पक्षी के प्रति हों। हर कहानी बचपन की अलग-अलग छवि को मोहक ढंग से प्रस्तुत करती है। बाल हृदय से जुड़ी सादगी से कही ये कहानियाँ बच्चों को अपनी कहानियाँ लगेंगी।

पुस्तक:  कबूतरी आंटी
कहानीकार: संजीव ठाकुर
प्रकाशक:  प्रखर प्रकाशन, 1/11486ए, सुभाष पार्क एक्सटेंशन,
नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032

संस्करण: प्रथम संस्करण, 2014
मूल्य   :   150 रुपये मात्र

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