फैज़ और उनके समकालीनः आशा-भरे अवसाद के विश्‍व-कवि : प्रणय कृष्ण

उर्दू शायरी को नई ऊँचाई देने वाले मशहूर शायर फैज अहमद फैज (13 फरवरी, 1911-20 नवम्बर, 1984) की शायरी की खासि‍यत को रेखांकि‍त कर रहे हैं युवा आलोचक और जन संस्कृति‍ मंच के महासचि‍व प्रणय कृष्ण-

नेरुदा की कविताओं के अबतक के सबसे बेहतर अनुवाद हिंदी में लानेवाले कवि नीलाभ ने नेरुदा की लम्बी कविता ‘वह लकड़हारा जागे’ के बारे में लिखा है, “इस कविता का अंत उस आशा-भरे अवसाद में होता है, जो नेरुदा की अपनी खासियत है।” दरअसल, यह नेरुदा की ही नहीं, बल्कि 20वीं सदी में रचनारत ऐसे विश्वकवियों की एक खास विशेषता है जो तीसरी दुनिया के मुल्कों से आते थे और बेह्तर दुनिया के संघर्ष और स्वप्न को जीवित रखने के लिए अपनी मातृभाषाओं में कविताएं लिखते रहे। चूंकि वे जनसंघर्षों से जुडे़ कवि थे, लिहाजा उन संघर्षों के उतार-चढ़ाव, आशा-निराशा, सफलता-असफलता का उनकी कविता पर प्रभाव लाज़िमी था। ये कवि ऐसे थे जिन्हें बहुधा अपने वतन से बेदखल होना पडा, जेल की सज़ा काटनी पडी़, यातनाएं सहनी पडी और अपनों का बिछोह सहना पडा। वतनबदरी ने उन्हें दुनिया भर में साम्राज्यवाद, औपनिवेशि‍क उत्पीड़न, फासीवाद और तानाशाही के खिलाफ चलने वाली लडाइयों के साझेपन, बहिनापे और दर्द के आपसी रिश्ते़ की चेतना दी। वे खुद जिन देशों से आते थे, उनकी भौतिक, ऐतिहासिक, भू-राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों में समानता के भी तत्व थे, भिन्नता के भी। वे जिन जातीय काव्य-परंपराओं के वारिस थे, वे भी अलग- अलग थीं, लेकिन उनकी कविता में ‘आशा-भरे अवसाद’ के स्वर की समानता का सीधा सम्बन्ध उनकी जनांदोलनों से गहरी संलग्नता और बेहतर, सुंदर, आज़ाद दुनिया तथा मानव नियति के सरोकारों से है। जिन भौतिक और आध्यात्मिक सवालों से उनकी कविता रू-ब-रू है, उनका समाधान 20वीं सदी न दे सकी। वे सवाल भी ऐसे नहीं हैं जिनका हल आसान या समय के निश्‍चि‍त दायरे में अपरिवर्तनीय ढंग से संभव हो। इसी वजह से उनकी इतिहास-चेतना भी एक-रेखीय, परिणामवादी और निर्धारणवादी नहीं है।

इन कवियों में अवसाद मिलेगा, लेकिन निराशा नहीं। आज 21वीं सदी में हम इनकी ‘आशा भरे अवसाद’ की स्वर-भंगिमा से और भी ज़्यादा निकटता महसूस करते हैं क्योंकि आज के संघर्ष और ज़्यादा पेचीदा हैं, साम्राज्यवाद के पक्ष में झुके विश्‍व शक्ति-संतुलन का कोई प्रति-संतुलन मौजूद नहीं है, इसलिए कोई आसान हल भी हमारे सामने मौजूद नहीं हैं। ये कवि इतिहास की गति के बीच अपनी कविता को रखते हैं, इसलिए वे वर्तमान के संघर्षों के गर्भ में पल रही उम्मीदों के रचनाकार हैं, ज़िंदगी की रोज़-ब-रोज़ की जद्दोजहद से कटे किसी यूटोपिया के सर्जक नहीं हैं। वे आसान समाधानों और नुस्खों के कवि नहीं हैं। उन्हें अहसास है कि जिन संघर्षों में उनकी जनता और कविता मुब्तिला है, वे लम्बे चलनेवाले हैं, वे पस्तहिम्मती भी ला सकते हैं, लिहाजा उनकी कविता इस से आगाह करती है और नयी उम्मीद भरने के कर्तव्य का निर्वाह भी करती चलती है। नाज़िम हिकमत की एक मशहूर कविता का यह टुकडा़ देखें-
”मान लीजिए हम मोर्चे पर हैं
लड़ने लायक किसी चीज़ के लिए।
वहां पहले ही हमले में, उसी दिन
हम औंधे गिर सकते हैं, मुंह के बल,  मुर्दा।
हम जानते होंगे इसे एक अजीब गुस्से के साथ
फिर भी हम सोचते सोचते हलकान कर लेंगे खुद को
उस युद्ध के नतीजे की बाबत जो बरसों चल सकता है।
मान लीजिए हम जेल में हैं
और पचास की उम्र की लपेट में,
और लगाइये कि अभी अट्ठारह बरस बाकी हैं
लौह फाटकों के खुलने में।
हम फिर भी जिएंगे बाहर की दुनिया के साथ
इसके लोगों, पशुओं, संघर्षों और हवा के-
मेरा मतलब कि दीवारों के पार की दुनिया के साथ
मेरा मतलब,  कैसे भी कहीं भी हों हम
हमें यों जीना चाहिए जैसे हम कभी मरेंगे ही नहीं।”
( अनु. वीरेन डंगवाल, पहल पुस्तिका,  जनवरी-फरवरी, 1994, सं. ज्ञानरंजन)

फैज़ साहब का आखिरी कलाम जो हिंदीभाषि‍यों को एक गज़ल के रूप में उपलब्ध है, उसमें भी वह कहना नहीं भूलते कि उन्हें मालूम है कि ज़िंदगी की लडा़इयों में, खुशी और गम, उत्थान-पतन, जय-पराजय क्या है। लिहाजा सब सोच समझ कर ही उन्होंने एक शायर के रूप में उन्हें क्या करना है,  इसका चुनाव किया है। वह लिखते हैं –
”हम एक उम्र से वाकिफ हैं अब न समझाओ
के लुत्फ क्या है मेरे मेह्रबां सितम क्या है
करे न जग में अलाव तो शे’र किस मकसद
करे न शह्र में जल-थल तो चश्मे -नम क्या है।”
इतिहास की गहरी समझ,  ज़िंदगी के संघर्षों में पराजय और धक्कों के अहसास के बीच भी संघर्ष की अपरिहार्यता, उम्मीद का सृजन और अपने काम की, जनता के कवि के काम की अहमियत में यकीन इन कवियों को एक खास तरह के रिश्ते में बांधती है। फैज़ के समकालीन ऐसे विश्‍व-कवियों में नेरुदा (1904- 1973), हिकमत (1902-1963) और महमूद दरवेश (1941-2008) का नाम सबसे ऊपर लिक्खा हुआ है। फैज़ साहब का इन सबसे व्यक्तिगत ज़िंदगी में भी आत्मीयता का रिश्ता रहा। इन कवियों की एक विशेषता यह भी रही कि इन्होंने अपनी कविताओं का जो देश और काल रचा, वह साभ्यतिक था, एक पूरे महाद्वीप या उप-महाद्वीप की स्मृतियां और यथार्थ इनकी शायरी में मुखरित हुए। ये कवि किसी राष्ट्र-राज्य की चौहद्दी में बंधे कवि न थे क्योंकि राष्ट्र-राज्यों का उदय पूंजीवाद के साथ हुआ, जबकि ये कवि हक,  इंसाफ,  बराबरी और शांति के पक्ष में लिखते हुए पूंजी के युग में पैदा किए गए राज्य, समाज और संस्कृति के संस्थानों से पहले के ऐतिहासिक जन-जीवन, मिथकीय भाव- जगत,  साभ्यतिक अनुभूति की संरचनाओं को वर्तमान के मुक्ति-संग्राम के दृष्टिकोण और मानव-मुक्ति की भविष्य-दृष्टिं‍ के साथ काव्य में रूपांतरित और सम्प्रेषि‍त करते हैं। काव्य-दृष्टि-‍ की इस विराटता के चलते ही वे विशि‍ष्ट सभ्यताओं और काव्य-परंपराओं से आने के बाद भी विश्‍व-मानव की आकांक्षाओं और संवेदनाओं के वाहक हुए।

आज बहुप्रचारित और साम्राज्यवादियों द्वारा अमल में लाए जा रहे ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ का सिद्धांत इनकी कविताओं के सामने बालू की भीत सा लगता है, क्योंकि इनमें से हर कवि अपनी वि‍शि‍ष्ट  सभ्यता की अनुभूतियों की जटिल बुनावट के भीतर से सामान्य मानव-मुक्ति के स्वप्न और यथार्थ को उभार देता है। उपनिवेशवाद-विरोधी संस्कृति-कर्म की एक खास भंगिमा यह भी थी कि न केवल वर्तमान को, बल्कि इतिहास और स्मृति को भी साम्राज्य के कब्ज़े से छुडा़ लाया जाए। यह काम इन सभी उपनिवेशवाद-विरोधी शायरों ने बखूबी अंजाम दिया। फैज़ न केवल पूरे उप-महाद्वीप के शायर हैं, बल्कि इंडो-परशि‍यन काव्य-परंपरा के वारिस होने के चलते एक बडा़ सभ्यतागत घेरा अपने काव्य में बनाते हैं।

हिकमत को आटोमन साम्राज्य के भीतर समाहित शताब्दियों में विकसित अनेक कौमों की साझा संस्कृतिक विरासत मिली थी जो उनके काव्य में अपनी खास छटा लेकर आती है। हिकमत के पुरखों में तुर्की, पोलिश, जर्मन और काकेशस की आडिग जनजाति से आनेवाले लोग थे, लिहाजा पारिवारिक विरासत के लिहाज से भी वे कास्मोपालिटन थे।

महमूद दरवेश महज फिलिस्तीनी राष्ट्र  के नहीं, बल्कि उदात्त अरब अस्मिता के कवि थे और कविता भी उन्होंने अरबी भाषा में ही लिखी। नेरुदा इसीलिए महज अपने देश चिली के कवि नहीं, बल्कि सारा लैटिन अमरीका उनके काव्य की रंग-स्थली है। 1943 में नेरुदा ने पेरू की यात्रा की और शताब्दियों पहले लुप्त हो चुकी इंका सभ्यता के खंडहरों में घूमे। दो ऊंची पहाडियों के बीच स्थित इंका सभ्यता के प्रमुख नगर-केंद्र ‘माच्चू पिच्चू’ को उन्होंने देखा और अपनी महान कविता ‘माच्चू-पिच्चू के शि‍खर’ लिखी। इस खोए हुए पहाडी़ नगर की चढा़ई का वृतांत कविता में ऐसे ढलता है कि वह लैटिन अमरीकी के खोए हुए अतीत, उसके संघर्षों, उसके प्राकृतिक और मानवीय सौन्दर्य तथा उसकी स्मृतियों के संधान में तब्दील हो जाता है। कविता के अंत में नेरुदा शताब्दियों के मृतकों का अपनी वाणी में फिर से जन्म लेने का आह्वान करते हैं.-

“उठो जन्म लो, मेरे साथ, मेरे सहजात

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देखो मेरी ओर धरती की गहराइयों से
हरवाहे, जुलाहे, खामोश चरवाहेः
विघ्नहर्ता ऊंटों के पालकः
खतरनाक पाडों पर चढे़ हुए राजगीरः
एण्डीज़ के आंसुओं के कहारः
कुचली उंगलियों वाले मणिकारः
अंखुवाते बिरवों में लरज़ते किसानः
अपनी माटी में बिखरे कुम्हारः
इस नयी ज़िंदगी के प्याले तक लाओ
अपने पुराने दबे पडे़ दुख।
……………………………………………….
मैं आया हूं तुम्हारे निस्पंद मुखों की ओर से बोलने।’’
(पाब्लो नेरुदा, अनु. नीलाभ, माच्चू पिच्चू के शि‍खर, सदानीरा प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.68-69)

इन कवियों का काव्य रूमानी, आदर्शवादी मानवतावादी कवियों की तरह अमूर्त नहीं, बल्कि यथार्थ में गहरे धंस कर,  गहरे अर्थ में राजनीतिक और प्रतिबद्ध है। ये सभी कवि अपनी काव्य-यात्रा की शुरुआत से ही कम्यूनिस्ट न थे, बल्कि अपने काव्य की जो भूमिका इन्होंने चुनी, वह इन्हें कम्यूनिस्ट बनाने तक ले गई। इन कवियों ने कविता की ज़रूरत, उसकी ताकत और भूमिका को भी एक नई ज़मीन दी है। वास्तविक दुनिया की विभीषि‍काओं के बरखिलाफ कविता की काल्पनिक दुनिया में ज़िंदगी के अर्थ  को, उम्मीद को फिर से जगाना और पाना इन कवियों की खास भंगिमा है। इनकी जीवनगत परिस्थितियों ने भी कविता की इस खास भूमिका की खोज के लिए उन्हें प्रेरित किया।

महमूद दरवेश ने अपनी मृत्यु से एक साल पहले दिये गए एक साक्षात्कार में डालिया कार्पेल नामक पत्रकार के एक सवाल के जवाब में कहा था, ”जब उम्मीद न भी हो, हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम उसका आविष्कार और उसकी रचना करें। उम्मीद के बिना हम हार जाएंगे। उम्मीद ने सादगीभरी चीज़ों से उभरना चाहिये। प्रकृति की महिमा से, जीवन के सौन्दर्य से, उनकी नाज़ुकी से। केवल अपने मस्तिष्क को स्वस्थ रखने की ख़ातिर आप कभी-कभी ज़रूरी चीज़ों को भूल ही सकते हैं। इस समय उम्मीद के बारे में बात करना मुश्किल है। यह ऐसा लगेगा जैसे हम इतिहास और वर्तमान की अनदेखी कर रहे हैं। जैसे कि हम भविष्य को फ़िलहाल हो रही घटनाओं से काट कर देख रहे हैं। लेकिन जीवित रहने के लिए हमें बलपूर्वक उम्मीद का आविष्कार करना होगा।”( कबाडखाना ब्लाग से साभार)

जिस फिलिस्तीन के महमूद दरवेश राष्ट्र-कवि जैसे हैं, वह आजतक एक राष्ट्र बन नहीं पाया है। बेहथियार फिलिस्तीनी जनता, अपने अधिकांश ज़मीन से पूरी तरह बेदखल, अपने ही देश में शरणार्थी, महज जीवित रहने के लिए पूरी तरह से विदेशी सहायता पर निर्भर होने के बावजूद अपने अधिकार, इज़्ज़त और सम्प्रभुता के लिए एक असंभव सा युद्ध लड़ रही है। पिछले चार दशकों में फिलिस्तीनी संघर्ष आगे कम बढा़ है, उसे झटके ही ज़्यादा लगे हैं और शेष दुनिया मूक दर्शक बनी रही है।  फिलिस्तीनी मुक्ति-संघर्ष 1967 से ही जारी है। इस बीच फिलिस्तीनी अपनी लगभग  सारी ही ज़मीनें इस्राइल को हार चुके हैं और अब वे अलग-थलग, कटे-फटे ज़मीन के उन टुकड़ों पर जीवन बसर करते हैं जो चारों ओर से इस्राइली कब्ज़े वाले इलाकों से घिरे हुए हैं। इस पूरे इलाके पर अमरीका के समर्थन और शह पर इस्राइल ने जिस प्रकार के हमले, कब्ज़े और जनसंहार को अंजाम दिया है, उसकी तुलना अतीत की सिर्फ एक ही घटना से हो सकती है- वह है कोलम्बस के अमरीकी तट पर पहुंचने के बाद वहां चलाया गया कब्ज़ा और हत्या अभियान। ऐसे लहुलुहान मुल्क के कवि के पास उम्मीद की भला क्या वजह हो सकती थी? फिलस्तीनी आबादी न केवल विभाजित है,  बल्कि इन स्थितियों के बीच वहां लोकतंत्र और मानवाधिकार भी गिरावट पर है। बाहरी हमला और कब्ज़े तथा घेरेबंदी की स्थितियां भीतरी कलह को भी जन्म देती हैं और महमूद दरवेश ने अपने जीते जी गाज़ा में अल-फतह और हमास के बीच खूनी संघर्ष को देखा था।

बहुत पहले फ्रैंज़ फैनन ने औपनिवेशि‍क घेरेबंदी में जीनेवालों के आपसी कलह के बारे में स्थापना देते हुए लिखा था, “अपनी पूरी ताकत के साथ जब देशी लोग एक दूसरे के प्रति घृणा में कूद पड़ते हैं तो वे स्वयं को समझा रहे होते हैं कि उपनिवेशवाद अस्तित्व में नहीं है,  कि सब कुछ पहले जैसा ही है,  कि इतिहास जारी है। सामुदायिक संगठनों के स्तर पर हम परिवर्जन (या बचने) के सुपरिचित व्यवहार को देखते हैं, मानो आपसी खूनी लड़ाइयों ने उन्हें (वास्तविक बाधाओं) को नजरअंदाज करने और उपनिवेशवाद के खिलाफ अपरिहार्य सशस्त्र संघर्ष के चुनाव को टाल देने का मौका दे दिया हो। इस प्रकार सामूहिक आत्मविनाश उन तरीकों में से एक है जिनसे देशि‍यों की मांसपेशि‍यों का तनाव मुक्त होता है। इस तरह के व्यवहार खतरे की स्थिति में मृत्यु की प्रतिक्रिया है,  एक आत्मघाती व्यवहार …”

ज़रा सोचिए, कहां और कैसे आए ऐसी स्थितियों में उम्मीद ? लेकिन यहीं एक कवि अपनी कविता की ताकत पर भरोसा करता है, अपनी लहुलुहान मातृभूमि को कविता में निर्मित करता है और महज यथार्थ के नहीं, बल्कि कल्पना के तत्वों से उसकी कविता जनता के मुक्ति-संघर्ष में अपनी भूमिका निभाती है, एक पराजित जाति के लोग उस कविता में अपनी उम्मीद और सपनों को महफूज़ पाते हैं। इन पंक्तियों के लेखक ने खुद दिल्ली में वतनबदरी की हालत में रह रहे फिलिस्तीनी नौजवानों के कमरों में दरवेश की कविताओं के पोस्टर और किताबें देखी हैं। अपने पूर्वोक्त साक्षात्कार में दरवेश कहते हैं, ”मैं उपमाओं का कर्मचारी हूं, प्रतीकों का नहीं। मैं कविता की ताक़त पर भरोसा करता हूं, जो मुझे भविष्य को देखने और रोशनी की झलक को पहचानने की वजहें देती है। कविता एक असल हरामज़ादी हो सकती है। वह विकृति पैदा करती है। इस के पास अवास्तविक को वास्तविक में और वास्तविक को काल्पनिक में बदल देने की ताक़त होती है। इसके पास एक ऐसा संसार खड़ा कर सकने की ताक़त होती है जो उस संसार के बरख़िलाफ़ होता है जिसमें हम जीवित रहते हैं। मैं कविता को एक आध्यात्मिक औषधि की तरह देखता हूं। मैं शब्दों से वह रच सकता हूं जो मुझे वास्तविकता में नज़र नहीं आता। यह एक विराट भ्रम होती है लेकिन एक पॉज़िटिव भ्रम। मेरे पास अपनी या अपने मुल्क की ज़िन्दगी के अर्थ खोजने के लिए और कोई उपकरण नहीं। यह मेरी क्षमता के भीतर होता है कि मैं शब्दों के माध्यम से उन्हें सुन्दरता प्रदान कर सकूं और एक सुन्दर संसार का चित्र खींचूं और उनकी परिस्थिति को भी अभिव्यक्त कर सकूं। मैंने एक बार कहा था कि मैंने शब्दों की मदद से अपने देश और अपने लिए एक मातृभूमि का निर्माण किया था।”

जिन्हें ‘आशा-भरे अवसाद’ के इस द्वंद्वात्मक सौन्दर्य- विधान का अभ्यास नहीं है, वे या तो आशा देखते हैं या अवसाद और दोनों को अलगाकर अलग-अलग दिशाओं के निष्कंर्ष निकालते हैं। ऐसी ही स्थिति में फैज़ की जीवनीकार रूस की उर्दू विदुशी लुदमिला वासिलेवा खुद को पाती हैं। उनके द्वारा रूसी भाषा में लिखी फैज़ की बेहतरीन जीवनी 2002 में प्रकाशि‍त हुई। फिर 2007 में उसका परिवर्धित उर्दू संस्करण ‘परवरिश-ए-लौहो-क़लमः फैज़, हयात और तखलीक़ात’ नाम से प्रकाशि‍त हुई। अदीब खालिद ने इसकी समीक्षा ‘ऐनुअल आफ उर्दू स्टडीज़’ (खण्ड 23, 2008) में की है। उनके लिखे के मुताबिक जीवनीकार वासिलेवा यह मानती हैं कि ”वे राजनीतिक और सामाजिक मूल्य जो फैज़ के लिए प्राथमिक महत्व के थे, समय की कसौटी पर खरे नहीं उतरे।” ज़ाहिर है कि वासिलेवा रुस की हैं और सोवियत विघटन से उन्होंने बहुत से लोगों की तरह यह निष्कर्ष निकाला हो कि समाजवाद के पहले प्रयोग की विफलता समाजवाद मात्र की विफलता है,  तो कोई  आश्‍चर्य  की बात नहीं। मुश्किल तब आती है जब वे अपनी समझ को फैज़ की शायरी पर थोपती हैं। फैज़ सोवियत विघटन देखने को जीवित न थे। अदीब खालिद के साक्ष्य पर हमें ज्ञात होता है कि वासिलेवा फैज़ के आखीरी काव्य-संग्रहों- ‘मिरे दिल, मिरे मुसाफिर’ और ‘गुबारे- अय्याम’ में व्यक्त अवसाद की न केवल फैज़ के सोवियत संघ के प्रति संदेह के बतौर व्याख्या करती हैं, बल्कि इससे भी आगे बढ़कर वह इसमें उन उद्देश्यों और आदर्शों से भी फैज़ के मोहभंग को लक्षित करती है, जो उन्हें जीवनभर प्रिय रहे। फैज़ के इन दोनों संग्रहों में अवसाद वैसा ही है जैसा उनके पिछले संग्रहों में भी दिखाई पड़ता है, लेकिन एक उम्मीद बराबर साथ लगी रही है।

लुदमिला वासिलेवा को आखीरी संग्रहों में जो नाउम्मीदी और शुभहा दिखाई पड़ता है,  उसमें अफ्गानिस्तान पर सोवियत हमले की छाया देखना तो शायद उतनी दूर की कौडी़ नहीं है, लेकिन उदासी का यह गाढा़पन क्या सचमुच उन मूल्यों से फैज़ का मोहभंग है जो फैज़ को जीवनपर्यंत प्रिय रहे ? आइये देखें कि इन संग्रहों में व्याप्त उदासी के बीच कौन से मूल्य व्यक्त होते हैं। ‘मिरे दिल, मिरे मुसाफिर’ में एक नज़्म है ‘मंज़र’। यह दृष्य है आसमान का जिसमें समुद्र जैसा शोर है। बादलों के गड़गडा़ते हुए जहाज़ हैं,  नील में नहाती हुई अबाबील है,  तो कहीं चील गोते लगा रही है। हरकतों से भरा आसमान है और ‘एक बाज़ी में मसरूफ है हर कोई।’ लेकिन इस शोरगुल में कहीं ताकत की ज़ोर-आज़माइश नहीं है-
”कोई ताकत नहीं इसमें ज़ोर-आज़मा
कोई बेडा़ नहीं है किसी मुल्क का
इसकी तह में कोई आबदोज़ें नहीं
कोई राकट नहीं कोई तोपें नहीं
यं तो सारे अनासिर हैं यां ज़ोर में
अम्न कितना है इस बहरे-पुरशोर में।”

हरकतों से भरे, शोरगुल से भरे आसमान का चित्र यहां दुनिया में दो महाशक्तियों के बीच चल रही हथियारों की होड़, युद्ध की विभीषिका के भयानक चित्र के साथ जक्सटापोज़ किया गया है। दोनों जगह शोरगुल है, प्रकृति के दृष्य में पंचतत्वों का शोर है, जबकि महाशक्तियों की हथियारों की स्पर्धा में जहाज़ी बेडों, पनडुब्बियों, राकेटों और तोपों का। प्रकृति के दृष्य में शोर तो है, लेकिन शांति है और सौन्दर्य भी,  कोई किसी के खिलाफ युद्धरत नहीं है जबकि मानवीय दृष्य के शोरगुल में न शांति है न सौन्दर्य, बल्कि विनाश का ऐलान ही है सब ओर। जैसे बादलों से गड़गडा़ते आसमान का दृष्य है, वैसे ही अनेक दृष्य और भी हमें मिलते हैं जहां शोर तो होता है, लेकिन वह ताकतवरों का विनाशकारी शोर नहीं होता, जैसे कि खेल-कूद करते बच्चों का शोर। पहले हमने उद्धृत किया है महमूद दरवेश को जहां वे कहते हैं कि हमें नाउम्मीद समय में भी प्रकृति की महिमा से और जीवन के सौन्दर्य से उम्मीद रचनी चाहिए। फैज़ ने इस कविता में यही किया है। यह कविता विश्व-शांति के पक्ष में, मुल्कों के बीच आपसी युद्धों और हथियारों की होड़ के खिलाफ प्रकृति का एक दृष्य खडा़ करके पैदा की गई है। क्या विश्‍व-शांति वह मूल्य नहीं जो फैज़ को जीवन भर प्यारा रहा और जिसके पक्ष में वे शुरू से लिखते रहे? इसी संग्रह की एक कविता है ‘शाइर लोग’ जहां फैज़ एक बार फिर अपनी शायरी के सबसे बडे़ मूल्य ‘ऐहतिजाज़’ का, हाकिमों के खिलाफ मज़लूमों का पक्ष लेने के एवज़ में कुर्बानियां देने की शायराना रस्म की याद दिलाते हैं-
”जो भी रस्ता चुना उस पे चलते रहे
माल वाले हिकारत से तकते रहे
ता’न करते रहे हाथ मलते रहे
हमने उन पर किया हर्फे-हक़ संगज़न
जिन की हैबत से दुनिया लरजती रही
जिन पे आंसू बहाने को कोई न था
अपनी आंख उनके गम में बरसती रही
सबसे ओझल हुए हुक्मे हाकिम पे हम
कैदखाने सहे ताज़याने सहे
लोग सुनते रहे साज़े-दिल की सदा
अपने नग्में सलाखों से छनते रहे…”
क्या ये उस शायर का कलाम है जिस का अपने उद्देश्योंल और आदर्शों से मोहभंग हो गया है, जैसा लुदमिला चाहती हैं कि हम समझें? ज़रा देखिए कि ‘गुबारे-अय्याम’ में वे मौलाना हसरत मोहानी को कैसे याद करते हैं-
”मर जाएंगे ज़ालिम केः हिमायत न करेंगे
अहरार कभी तर्के-रवायत न करेंगे”
ज़ाहिर है कि आज़ादी, बराबरी और भाइचारे के इस शायर ने आखीर तक उस रवायत को तर्क नहीं किया जो इन मूल्यों के लिए प्राण न्यौछावर कर देनेवालों की रही है। याद आती है फैज़ की ही दस्ते-तहे-संग में संकलित वो महान गज़ल जिसका एक शेर यों है-
”करो कज ज़बीं पे सरे कफन, मिरे कातिलों को गुमां न हो
कि गुरूरे-इ’श्कल का बांकपन पसे-मर्ग हमने भुला दिया”

क्या ये पर्याप्त चेतावनी नहीं है उन तमाम समीक्षकों के लिए जो फैज़ के न रहने के बाद उन्हें उनके आदर्शों और मूल्यों से काट कर पढ़ना चाहते हैं, खासकर  आखीर की शायरी में। ‘शोपेन का नग्मा बजता है’ जैसी बेहद उदास नज़्म में भी आज़ादी के किए प्राण देनेवालों का गर्वमय ज़िक्र आता है-
”कुछ आज़ादी के मतवाले, जां कफ पे लिए मैदां में गए
हर सू दुश्मेन का नर्गा था,  कुछ बच निकले,  कुछ खेत रहे
आलम में उनका शोहरा है
शोपेन का नग्मा बजता है।’’
इन आखिर के संग्रहों में भी महज उदासी या फिर ‘आशा भरे अवसाद’ की ही शायरी नहीं है, बल्कि जोशीले आह्वान की भी नज़्में हैं। ‘आवाज़ें’ शीर्षक नज़्म का आखिरी हिस्सा है- ”निदा-ए-गैब” जो कि क्रमश: ‘ज़ालिम’ और ‘मज़लूम’ शीर्षक दो हिस्सों के बाद आता है। पहले दो हिस्सों में क्रमश: ज़ालिम की गर्वोक्तियां और मज़लूम के दर्द और गुस्से के बयान के बाद इस आखिरी हिस्से में ज़ालिमों को सीधी-सीधी चेतावनी दी गई है और क्रांतिकारी शक्तियों द्वारा इन्साफ का भय दिखाया गया है-
”हर इक उलिल-अम्र को सदा दो
कि अपनी फर्दे- अमल संभाले
उठेगा जब जस्मे-सरफरोशां
पड़ेंगे दारो-रसन के लाले
कोई न होगा कि जो बचा ले
जज़ा सज़ा सब यहीं पे होगी
यहीं अज़ाबो-सवाब होगा
यहीं से उट्ठेगा शोरे-महशर
यहीं पे रोज़े  हिसाब होगा।”
उसी ‘गुबारे-अय्याम’ में ‘एक तराना मुजाहिदीने-फलिस्तीन के लिए’ भी है, लडा़कों को जोश दिलाता हुआ-
”हम जीतेंगे
हक्का हम इक दिन जीतेंगे
बिल आखिर इक दिन जीतेंगे….’’

अगर इससे भी इत्मीनान न हो तो ‘गुबारे-अय्याम’ का वह अमर तराना तो ज़रूर ही उन लोगों को याद दिलाना होगा जो फैज़ के आखिरी संग्रहों में उनके जीवनपर्यंत प्रिय उद्देश्यों और आदर्शों से उनके मोहभंग का सिद्धांत प्रतिपादित कर रहे हैं। ‘तराना-2’ की इस उम्मीद को वे कैसे परिभाषि‍त करेंगे, जहां शायर को यकीन है उस दिन का जब ‘सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख्त गिराए जाएंगे’-

उट्ठेगा ‘अनहलक’ का नारा-
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी खल्के-खुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो’

यूं लुदमिला अकेली सिद्धांतकार नहीं हैं इस तथाकथित ‘मोहभंग’ की। समीक्षक  अदीब खालिद भी जीवनीकार से सहमत दिखाई देते हैं और उन्हें भी लगता है कि  आखीर के इन संग्रहों की नज़्में जो उन्होंने निर्वासन में लिखीं, उनमें समाजवादी मूल्यों से मोहभंग के साथ-साथ उनका अपना वतन उनकी शायरी के केंद्र में आ जाता है। इसी लिए अपना आत्मनिर्वासन खत्म कर वे मौत से पहले 1983 में अपने वतन वापस लौट आए। इशारा यह है कि तीसरी दुनिया की एकता या अंतरराष्ट्रीयवाद, दुनिया के मज़दूरों और मज़लूमों की एकता के आदर्शों की जगह अब वे अपने वतन को ही केंद्रित करना चाहते हैं शायरी में। अगर ऐसा है तो फिर उसी ‘मिरे दिल, मिरे मुसाफिर’ में फिलिस्तीन के लिए नज़्में क्यों हैं ? फिलिस्तीन के जो योद्धा परदेश में शहीद हुए, उनके लिए लिखते हुए फैज़ ‘उत्तम पुरुष’ में लिखते हैं, मानो कवि का वतन वही है जो उन शहीदों का और शायर उनका अपना हमवतन है-
”मैं जहां पर भी गया अर्ज़े-वतन
तेरी तज़लील के दागों की जलन दिल में लिए
तेरी हुर्मत के चरागों की लगन दिल में लिए
तेरी उल्फत, तेरी यादों की कसक साथ गई”
इन पंक्तियों का दर्द जितना फिलिस्तीन के परदेस में मारे गए योद्धाओं का है, उतना ही वतनबदर शायर फैज़ का भी,  दर्द के रिश्ते में वतनियत के आधार पर कोई तक़सीम नहीं है। बहरहाल, जहां जीवनीकार ने एक ही झटके में फैज़ को समाजवाद, बराबरी,  न्याय, स्वतंत्रता, विश्‍व-बंधुत्व जैसे उन मूल्यों से अलगाया जो फैज़ को जान से ज़्यादा प्यारे थे, वहीं जीवनी के समीक्षक ने उन्हें पूरी दुनिया में सरमायादारी और साम्राज्यवाद के खिलाफ मेहनतकशों की एकता के शायर के ओहदे से उतार कर ‘राष्ट्रवाद’ की तंग सरहदों में उनकी शायरी को कैद करने की दिशा ली। वतन कब फैज़ की शायरी में नहीं रहा ? क्या उनका ऐसा भी कोई संग्रह है जिसमें अपने वतन के मेहनतकशों और आम लोगों की खुदमुख्तारी, बराबरी और आज़ादी की चाहत के तराने न हों,  हाकिमों के खिलाफ प्रतिरोध के स्वर में एक प्रतिरोधी राष्ट्रीय भावना न हो, अवाम की बदहाली के शोकगीत न हों ? फैज़ अपने देश के तानाशाहों से लड़ते रहे और कभी भी उनके ‘जंगजू’ राष्ट्रवाद के साथ खडे़ नहीं हुए। वे शुरू से उस वतन के दर्द के गीत गाते रहे जिसे ज़ालिम रौंद रहे थे। उनका राष्ट्रवाद अगर कुछ था, तो ऐजाज़ अहमद के शब्दों में ‘गमज़दा’ राष्ट्रवाद ही था,  शुरू से आखीर तक। देश की सत्ता और सम्पत्ति पर मेहनतकशों का कब्ज़ा हो, भविष्य के इसी राष्ट्र के वे शायर थे, जिससे उन्हें कोई देशनिकाला नहीं दे सकता था। ऐसा ही मेहनतकशों का राष्ट्र दुनिया के मेहनतकशों से एका कायम कर सकता है और विश्‍व-मैत्री भी। इसीलिए फैज़ प्रचलित अर्थों में जिसे राष्ट्रवाद कहा जाता है, वैसे राष्ट्रवादी न थे। वतन तो हरदम उनकी शायरी के केंद्र में था- वह वतन जो पहले एक था और उनके जीवनकाल में ही तीन हिस्सों में बंटा। जब उन्होंने ‘सुबहे-आज़ादी’ लिखी थी, तब भी न उसमें अवसाद कम था और न ही उम्मीद का दामन छूटा था। उस नज़्म के आखीर में वो कौन सी मंज़िल है जिसतक पहुंचने की उम्मीद में वे कह रहे हैं कि, ‘चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई?’ बांग्लादेश के अलग हो जाने के बाद ‘ढाका से वापसी’ शीर्षक नज़्म में भी इस बात का ही दर्द उभरा है कि कैसे जो कौमें एकसाथ रहीं सदियों तक,  वे अचानक ऐसी अजनबी हो गईं एक-दूसरे के लिए कि सारी मेहमाननवाज़ी के बाद भी, अजनबियत है कि मिटती ही नहीं।

दरअसल सरमायादार और ज़मींदारी की ताकतें जब राष्ट्र की कमान सम्भाल लेती हैं, तो वे बंटवारे को ही लगातार बढा़ती जाती हैं। एक कौम को दूसरे के खिलाफ खडा़ करके, भाषा, धर्म, जाति के झगड़ों को उकसाकर वे मेहनतकशों की एकता को कमज़ोर करती हैं और खुद को सत्ता में महफूज़ रखती हैं। अक्सर ऐसे निज़ाम ये सब कुछ वतन, देश या राष्ट्र के नाम पर करते हैं। वे खुद को देश घोषि‍त करते हैं और अपने ज़ुल्मों के खिलाफ लड़नेवालों को देश-विरोधी। हर थोडे़-थोडे़ वक्त बाद उन्हें ‘देश पर खतरे’ के बादल मंडराते दिखते हैं और फिर वे देश की रक्षा में किसी न किसी क्षेत्रीय, धार्मिक, भाषाई या उप-राष्ट्रीय समुदाय पर लाव-लश्ककर लेकर टूट पड़ते हैं। धीरे-धीरे दिलों के घाव वतन की तक्सीम में बदल जाते हैं। फैज़ ने ये सब अपने देश और पूरे उपमहाद्वीप में देखा था और इसके दर्द को अपने स्नायुओं पर झेला था। किसी अदीब ने ही मज़ाक में कहा था कि पाकिस्तान की फौजें हर कुछ साल बाद अपने ही देश को फतह कर लेती हैं। ‘देश पर खतरे’ से निपटने के लिए फौजी तानाशाहियां स्थापित होती हैं जिन्हें बरकरार रखने के लिए अक्सर ‘धर्म पर खतरे’ का आविष्कार किया जाता है। फैज़ ने सरमायादारों, फौजी तानाशाहों और जागीरदारों की कथित वतनियत के शि‍कार उस लहुलुहान वतन को पुकारा है अपनी शायरी में जिसके आंसू पोंछनेवाला कोई न था। वतन ऐसे ही आता है फैज़ के यहां- दुख की गाथा के रूप में,  इंसाफ की चीख के बतौर, प्यार के पैगाम के बतौर। ‘हम लोग’( नक्शे-फरियादी), ‘निसार मैं तेरी गलियों पे’ (दस्ते-सबा), ‘खुशा ज़मानते-गम’(दस्ते तहे-संग), ‘इंतिसाब’, ‘ऐ वतन, ऐ वतन’, ‘दुआ’(सरे-वादिए-सीना), ‘हम तो मजबूरे वफा हैं’( मिरे दिल, मिरे मुसाफिर) जैसी नज़्मौं में ऐसा ही वतन आबाद है।

मेहनतकश अवाम से अलग वतन का कोई तसव्वुर उनके पास न था। ‘तराना’(दस्ते-सबा), ‘तराना-1’ (सरे-वादिए-सीना) और ‘तराना-2’( गुबारे-अय्याम) मेहनतकशों और आम अवाम की इंकलाबी कार्रवाइयों के गीत हैं। अपने वतन के मेहनतकशों का दर्द, आम लोगों की तक्लीफों और आकांक्षाओं ने ही उन्हें दुनिया भर की संघर्षरत अवाम के साथ जोड़ दिया था। दरअसल उनके आखीरी दो संग्रहों को केंद्र करके लुदमिला वासिलेवा और अदीब खालिद द्वारा निकाले गए निष्कर्षों  को ऐहतेजाज़ की विश्‍व-शायरी के महान-स्तंभ के रूप में फैज़ को दरकिनार कर किसी देश और भाषा की चौहद्दी में सीमित एक सौन्दर्यवादी शायर के रूप में दोबारा कैननाइज़ करने के आरम्भिक प्रयासों के बतौर ही समझा जाना चाहिए।

हमारे यहां गोपीचंद नारंग ने अल्थ्यूसर, मार्ले पोंटी और रोला बार्थ के कुछ पाठीय उपकरणों/सिद्धांतों को जोड़-जाड़ कर फ़ैज़ के पाठ की एक ऐसी वैकल्पिक पद्धति का प्रस्ताव किया है जिसमें पंक्तियों/शब्दों के बीच की जगह/अंतराल और ख़ामोशियों के माध्यम से उनकी शायरी के गहरे, अचेतन,  सौन्दर्यात्मक अर्थों की अनेक पर्तों को खंगालने की सलाह दी गई है, जो कि उनके अनुसार सामने की वैचारिक सतह के नीचे दब गई है। नारंग का अभिप्राय यह है कि इस पाठ पद्धति के जरिए अर्थ के दबे हुए संस्तर शायर के क्रांतिकारी उद्देश्यों की बाहरी सतह को तोड़कर उभर आते हैं। ऐसा नहीं कि फैज़ की शायरी का ही सौन्दर्यवादी पाठ प्रस्तावित किया जा रहा है। तमाम इंकलाबी अदीबों के साथ यह नियमित तौर पर घटनेवाली चीज़ है। अदीब ही क्यों, क्रांतिकारी योद्धाओं और यहां तक कि आंदोलनों के साथ भी ऐसा होता है। सबसे बडा़ प्रमाण तो चे-ग्वेवारा हैं, जिनकी हत्या के बाद उन्हें उत्तरी अमरीका में बाज़ार की ताकतों ने बेपरवाह अमरीकी किशोरों और युवाओं के फैशन आइकन में बदल दिया। यह प्रतीकों की राजनीति है जो संकेत-तंत्रों के भीतर वर्गीय शक्ति-संतुलन का विस्तार है। हम देखते हैं कि कैसे जन- आंदोलनों को कुचलने के बाद जनता के बीच उनकी पवित्र स्मृति की ताकत को दुहने के लिए शासक जमातें उनके प्रतीकों,  नारों वगैरह को उनकी अंतर्वस्तु से विरहित कर आत्मसात कर लिया करती हैं। जब व्यक्ति या आंदोलन सत्ताधारियों के लिए खतरे का सबब नहीं रह जाते,  तो प्रतीकों में ढालकर सत्ता-प्रतिष्ठांन में उनकी वापसी होती है। इस तरह सता इस बात की भी गारंटी करने की कोशि‍श करती है कि उनकी स्मृति का ऐसा विरुपण हो जाए कि वह भविष्य के संघर्षों  की प्रेरणा न बन सके,  ये अलग बात है कि ऐसे हर प्रयास कामयाब ही नहीं होते।

हमारे देश के साम्राज्यपरस्त हुक्मरान किसानों की आत्महत्याओं के बीच चैन की बंसी बजाते हुए उस 1857 की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ भी मना डालते हैं जिसमें लाखों किसान अंग्रेज़ों से लड़कर शहीद हुए थे। सन् 2009 में तुर्की सरकार ने नाज़िम हिकमत की मौत के 46 साल बाद उनकी नागरिकता लौटा दी। अपने जीवन काल में हिकमत जिस देश में कम्यूनिस्ट होने के चलते जेल में रखे गए, अपराधी बताए गए, यातनाएं झेलते रहे, आज वहीं जनता में उनकी अपार लोकप्रियता और इज़्ज़त के जज़्बे को अपने पक्ष में मोड़ने की खातिर हुक्मरान उनकी नागरिकता वापस  कर रहे हैं।

यह सच है कि ‘मिरे दिल, मिरे मुसाफिर’ में उदासी का रंग गाढा़ है, लेकिन उसका सबब भी उसी में बयान होता है। पाकिस्तान में फौजी हुकूमत के चलते वतनबदर होना, फिलिस्तीन के मुक्ति-संघर्ष की तमाम शहादतों के बावजूद जीत न मिलना, मध्य-पूर्व का जलते रहना,  दुनिया में युद्धों का सिलसिला खत्म न होना,  अणुबमों से लैस महाशक्तियों  की अंतहीन स्पर्धा और जिस उप-महाद्वीप के वे शायर थे वहां परिवर्तन की रफ्तार का बेहद कम होना और बार-बार ज़ुल्म और तानाशाही के निज़ाम की ओर प्रत्यावर्तन, ऐसे तमाम कारण थे। ‘मिरे दिल, मिरे मुसाफिर’ की पहली ही नज़्म ‘दिले-मन मुसाफिरे-मन’ बार-बार वतनबदर होने के गहरे अवसाद में लिखी गई है-
”मिरे दिल, मिरे मुसाफिर
हुआ फिर से हुक्म सादिर
कि वतन बदर हों हम तुम
दें गली गली सदाएं
करें रुख नगर नगर का
कि सुराग कोई पाएं
किसी यार-ए-नामा-बर का
हर एक अजनबी से पूछें
जो पता था अपने घर का……”
ये पूरी नज़्म गालिब के रंग में ही नहीं, बल्कि उनके अदाज़े-बयां, उनकी दर-बदर भटकती आत्मा के गहरे अवसाद की शायरी से एक उपमहाद्वीपीय, शायराना रवायत का सम्बंध बनाकर लिखी गई है-
”तुम्हें क्या कहूं कि क्या है
शब-ए-गम बुरी बला है
हमें ये भी था गनीमत
जो कोई शुमार होता
”हमें क्या बुरा था मरना
अगर एक बार होता”

दरअसल वतन से अलग होना फैज़ के लिए अपनी हस्ती से, अपने वजूद से अलग होना है, वर्ना गालिब क्यों याद आते? वे तो वतन से बदर न हुए थे। गालिब अलग हुए थे उस दुनिया से जो उनके वजूद को अर्थ देती थी, जिसमें उनकी मुहब्बत थी, जिसमें वो सब कुछ था जो वे खुद थे। नामाबर की तलाश गालिब को रहा करती थी ताकि वे उससे सम्पर्क कर सकें जो अपना था,  पर छूट चुका है। वतन का छूटना, कू-ए-जाना का छूटना, अपनी हस्ती को अर्थ देनेवाली तमाम चीज़ों, परिस्थितियों और इंसानों का छूटना एक ही तरह की दर्द की तीव्रता पैदा करती है जिसके चलते फैज़ अपने पुर्खे गालिब की आवाज़ में अपनी आवाज़ मिला देते हैं।

एलियट मानते थे कि किसी शायर के कलाम में उसके पुर्खों की आवाज़ भी मिली होती है, ये अलग बात है कि ऐसा जदीद शायरी में कम, तरक्कीपसंदों में ज़्यादा देखने में आता है। ‘आज शब कोई नहीं’ या ‘मेरे मिलने वाले’ जैसी नज़्मों की उदासी को लक्ष्य करके जो लोग फैज़ के मोहभंग का मिथक रचते हैं, उन्हें नहीं मालूम कि वे क्या कह रहे हैं। वे फैज़ को समझ नहीं पाते क्योंकि वे उस ज्ञान-मीमांसा से ही इत्तेफाक नहीं रखते जो बगैर शामिल हुए जानने का दावा नहीं करती। फैज़ ‘इनसाडर’ थे, वे आंदोलन के शायर थे, बाहर से बैठ कर उसपर निर्णय सुनाने वालों में नहीं थे। ‘गुबारे-अय्याम’ की पहली नज़्म ‘तुम ही कहो क्या करना है’ पढ़कर बाहर बैठे लोगों को भरम हो सकता है कि शायर को अपने उद्देश्यों और आदर्शों को लेकर शुभहा हो गया है। लेकिन दरअसल यह शायर का वहम नहीं, बल्कि उन लोगों का है जिन्होंने अगर ज़ालिम का साथ न भी दिया हो तो भी हरदम किनारे पर बैठकर आन्दोलनों की उठती गिरती मौजों पर फैसले सुनाते आए हैं। ‘तुम ही कहो क्या करना है’  शीर्षक नज़्म में कवि मंज़िल पर पहुंच पाने की विफलता की बात करता है,  उसके कारण भी बताता है, लेकिन कहीं भी ये अफसोस ज़ाहिर नहीं करता कि मंज़िल चुनी ही गलत थी या कोई और रास्ते भी मौजूद थे जिनपर न चलने की गलती की गयी। शायर का कहना है कि जिस मर्ज़ का इलाज किया जाना था, वो इतना पुराना था कि वैद्यों के सारे आज़माए हुए नुस्खे बेकार गए। इस नज़्म का अर्थ उन लोगों के लिए बिलकुल अलग है जो किसी आंदोलन का हिस्सा हैं, ‘इनसाइर’ है। नज़्म की शुरुआती पंक्तियां देखें-
‘जब दुख की नदिया में हमने
जीवन की नांव डाली है
था कितना कस-बल बाहों में
लोहू में कितनी लाली थी
यूं लगता था दो हाथ लगे
और नाव पूरम्पार लगी
ऐसा न हुआ, हर धारे में
कुछ अनदेखी मझधारें थीं
कुछ मांझी थे अनजान बहुत
कुछ बेपरखी पतवारें थीं
अब जो भी चाहो छान करो
अब जितने चाहो दोष धरो
नदिया तो वही है, नाव वही
अब तुम ही कहो क्या करना है
अब केसे पार उतरना है।”
पहली छह पंक्तियों में विफलता का, संघर्ष शुरू होने के समय के उत्साह के आगे चलकर छीजने का बयान है। लेकिन इसके आगे विफलता के कारणों का बयान है जो बाहरी भी हैं और भीतरी भी। जो लोग जन-आंदोलनों के हिस्सेदार हैं, वे ही समझ सकते हैं कि कैसे ‘हर धारे में कुछ अनदेखी मझधाएं हुआ करती हैं’, बिलकुल नयी परिस्थितियां जिनका पहले से कोई अनुमान संभव ही नहीं होता। अगर सब पहले से मालुम हो तो इतिहास और गणित में फर्क ही क्यों हो। ये तो हुईं वे भौतिक परिस्थितियां जो किसी भी आंदोलन या संघर्ष के दौरान बडी़ रुकावट बन कर खड़ी हो जाती हैं, जिनका पहले से अनुमान लगाना मुश्किल हुआ करता है। (क्या रूसी क्रांति के बाद या आज भी 21वीं सदी में लैटिन अमरीकी देशों और पडो़सी नेपाल के क्रांतिकारियों का अनुभव ‘हर धारे में, अनदेखी मझधारों’ की तस्दीक नहीं करता?)। दूसरी ओर आत्मगत परिस्थितियां हैं- संघर्ष चला रहे लोगों की कमज़ोरियां, अदूरदर्शिता (कुछ मांझी थे अनजान बहुत) और काम-काज के तरीकों, लडा़ई के अस्त्रों की गड़बडियां ( कुछ बेपरखी पतवारें थीं)। इन्हें रेखांकित करने के बाद, शायर ज़ोर देकर कहता है कि चाहे जितनी भी छानबीन कर लो, चाहे जिसको दोष दे डालो, और कोई नई बात इसमें से नहीं निकलेगी। ज़ोर देने के लिए जो शब्द शायर इस्तेमाल करता है, वह है ‘भी’ ( अब जो भी चाहे छान करो)। आगे जब वो कहता है कि ‘नदिया तो वही है, नाव वही’ तो अपनी तरफ से बातों को बिलकुल साफ कर देता है। नदिया (लोगों के दुख, नाइंसाफी, गैर-बराबरी, अशांति, भूख, गरीबी आदि) भी वही है और नाव (यानी खुद का जीवन, उसके अहसास, तजर्बे, ज्ञान और जिसकी बदौलत संघर्ष के वैचारिक तंत्र, संगठन आदि का चुनाव किया था) वही हैं। इनमें कोई शुभहा नहीं। ‘वही’ शब्द भी ज़ोर देने के अर्थ में ही लाया गया है। आगे जब वो कहते हैं कि अपनी छाती में देखे गए देश के घावों के इलाज के लिए जिन वैद्यों और नुस्खों पर यकीन था, वे रोग की तह पाने में कामयाब नहीं हुए। वहां भी शायर न वैद्यों को दोष दे रहा है,  न नुस्खों को, बल्कि रोग ही इतने पुराने थे कि लाइलाज हो गए-
”ऐसा न हुआ के रोग अपने
तो सदियों ढेर पुराने थे
वैद इनकी तह को पा न सके
और टोटके सब नाकाम गए।”

इस नज़्म का पाठ करते हुए एक सवाल उठता है कि ये सम्बोधित किसको है,  खुद को या उन लोगों को भी जिन्होंने दुख की नदिया में जीवन की नांव डाली ही नहीं और अब निर्लिप्त भाव से असफलता की छान-बीन में लगे हैं और दोष धरने के लिए ‘स्केपगोट’ खोज रहे हैं। यों तो शायरी के एकदम निर्दिष्ट  भौतिक संदर्भ खोजना मुश्कि‍ल और कभी-कभी अतिशयता के खतरे से भरा होता है, लेकिन यह सोचना बहुत गलत न होगा कि पाकिस्तान में बार-बार लोकतंत्र की ताकतों की विफलता और सैनिक-धार्मिक तानाशाहियों की ओर उसका प्रत्यावर्तन भी इस नज़्म के असफलता बोध के पीछे सक्रिय है, खासतौर पर तब जबकि शायर इसी कारण फिर से वतनबदर होकर रहने के लिए अभिशप्त है। ‘सुबहे-आज़ादी’ जैसी नज़्म 1947 में लिखनेवाले शायर का यह बोध काफी पहले का है कि इस उप-महाद्वीप के रोग ऐतिहासिक हैं, जहां कोई नयी चीज़ जन्म लेने से पहले ही दम तोड़ दिया करती है, इतिहास अपनी प्रसव पीडा़ के बाद किसी नए को जन्म देता भी है, तो उसकी उम्र कम होती है, चीज़ें फिर अपने ढर्रे पर वापस आ जाया करती हैं। इसका सबसे तल्ख अहसास शायर को तब हुआ था जब इतनी कुर्बानियों के बाद आई आज़ादी ‘दाग दाग उजाले’ और ‘रात से डसी हुई सुबह’ की तरह निकली। ‘दस्ते-तहे-संग’ में संकलित एक नज़्म है ‘शाम’ जो एक ठिठकी हुई शाम का मंज़र खींचती है। लेकिन इसके बिम्ब एक पुरातन सभ्यता के वक्त में कैद होने का, एक सनातन अवरुद्धता का रूपक होने का अहसास कराते हैं-
”इस तरह है कि हर इक पेड़ कोई मंदिर है
कोई उजडा हुआ, बेनूर पुराना मंदिर
ढूंढता है जो खराबी के बहाने कब से
चाक हर बाम, हर इक दर का दमे-आखिर है
आसमां कोई पुरोहित है जो हर बाम तले
जिस्म पर राख मले, माथे पे सिंदूर मले
सरनिगूं बैठा है चुपचाप न जाने कब से
इस तरह है कि पसे-पर्दः कोई साहिर है….
……………………………………………………………….
आसमां आस लिए है कि यह जादू टूटे
चुप की ज़ंजीर कटे, वक्त का दामन छूटे।”

फैज़ की शायरी की उपमहाद्वीपीय इतिहास, साभ्यतिक स्मृति और जन-जीवन की नब्ज़ पर पकड़ गहरी है। उसके अनुभव और समझ उन्हें दुनिया भर में चलनेवाले हक, खुदमुख्तारी, जम्हूरियत और बराबरी के संघर्षों को भीतर से महसूस करने और उनके साथ होने में मदद करती है। इन संघर्षों की राह में आनेवाली बाधाओं, घिसाव-थकाव की लम्बी चलनेवाली लडाइयों में आनेवाली उदासी, उम्मीद- नाउम्मीदी के आरोह-अवरोह में झूलती जन-चेतना, छोटी-छोटी जीतों पर अछोर खुशि‍यों में डूब जाने की फितरत से उनकी शायरी खूब वाकिफ है। इसीलिए उनकी शायरी ने जश्‍न भी मनाए, मातम भी। अवसाद से ग्रस्त भी हुई, लेकिन उम्मीद का दामन नहीं छोडा़। कभी उसने ढांढस बंधाया, कभी जोश और हिम्मत को ललकारा, कभी आंसू बहाए, तो कभी पुचकारा, कभी दुआ में हाथ उठाए तो कभी इंतज़ार की लम्बी घडियां काटीं, कभी तख्तो-ताज गिराए तो कभी रुककर आत्मावलोकन किया, कभी बेअंत सी लगनेवाली तन्हाई झेली तो कभी मुहब्बत और कुदरत की गहराइयों में डूबकर हस्ती के सरो-सामां जुटाए। उनकी शायरी ऐहतिजाज़ की एक शम्मः  है, जो हर रंग में जलती रहेगी, सहर होने तक।

2 comments on “फैज़ और उनके समकालीनः आशा-भरे अवसाद के विश्‍व-कवि : प्रणय कृष्ण

  1. pran sharma says:

    FAIZ AHMED FAIZ PAR SAHEJNE YOGYA LEKH HAI .

  2. misir says:

    फैज़ की रचनाधर्मिता और उनके राजनैतिक-सामाजिक उद्देश्यों पर
    इतना उत्कृष्ट लेख मैंने नहीं पहले कभी नहीं पढ़ा ! प्रतिक्रियावादी
    ताक़तों की व्यक्तिहंता प्रवत्तियों का इतना सटीक शोध और प्रस्तुतिकरण
    टिप्पणीकार की सूक्ष्म दृष्टि और मेधा और सजगता का प्रमाण है ,जो उन्हें
    इस मूल्यवान समीक्षा के लिए प्रसंशा का पात्र बनाती है !

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