पद्मनाभ गौतम की कविताएं

पद्मनाभ गौतम

पद्मनाभ गौतम

27 जून 1975 को  बैकुण्ठपुर, जिला-कोरिया, छत्तीसगढ़ में जन्‍में पद्मनाभ गौतम का ग़ज़ल संग्रह ‘कुछ विषम सा’ 2004 में प्रकाशित। विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में कविता, गज़ल, आलेख इत्यादि प्रकाशित। उनकी कुछ कविताएं-

 आँच

जब लकलकाती धूप में
देह से भी भीतर आत्मा तक
झुलसाती है लू,
अघाया सूरज ले रहा होता है
दोपहर की नींद

मकड़ी नहीं फँसती है
अपने बुने जाल में,
बैठकर लेती है इत्मीनान से
जाल में जूझते पतंगे की
छटपटाहट का रस

पर शब्द, वे जो अक्सर
करते देते हैं तुम्हें आहत,
आनंद नहीं वह मेरे लिए

शब्दों की आँच
बाहर से ज्यादा
झुलसाती है अन्तस/
उतर कर देखो तो
भीतर एक बार

देखा नहीं है,
उफान उतरने के बाद
हहराता हुआ दरिया
हो जाता है
कितना कमज़ोर/
कितना बेआब

आज पहली बार

आज पहली बार
माँगी हैं पत्नी ने
पढ़ने के लिए कविताएँ
अपने-आप,
और अब झल्ला रही है
लैपटाप की बैटरी
चुकने की वजह से
टूटे तारतम्य पर।

डर रहा हूँ कि
आज फिर से गरियाएगी
सारी शाम बेबात

लेकिन,
आज पहली बार
देखा उसने मुझे
अलहदा निगाहों से

आज पहली बार
नहीं खोजा उसने कविताओं में
औसतन नहीं रहने वाला
अपना नाम

आज पहली बार पढी़ उसने
किसी और लड़की पर
लिखी गई कविता
बड़ी सादगी से

आज पहली देखा मैंने
कलैण्‍डर ध्यान से/
ले आई है उम्र
आँखों पर पट्टी बाँधकर
किस मुकाम पर/
शायद अब सचमुच
बड़े हो गए हैं हम

सत्य

गैलिलियों की धरती लगाए
सूरज के फेरे,
या अरस्तू का सूरज घूमे
धरती के गिर्द,
रात और दिन में
पहर होंगे कुल आठ ही

आठ पहर भी
कब रह जाएंगे आठ,
यदि साबित कर दे कोई
घटी, पल-छिन का आंकड़ा
एक नए हिसाब से

एक स्थापना होती है कालातीत
और उसकी जगह लेती है
उससे सुदृढ़ स्थापना

पर क्या सत्य से बढ़कर होता है
कोई उत्कृष्ट सत्य

बाँट सकते हैं हम
उजाले और अंधेरे के
बीच का वक्त अपने हिसाब से/
जैसे घर के बीच
दीवार उठाकर एक और घर,
एक परछी को बाँटकर
एक और परछी/
पर तय नहीं कर सकते
सूरज का उगना और
साँझ का घिरना/
आँख के खुलने पर
होती नहीं भोर,
पलकें बोझिल देख
उतरती नहीं रात

मायान कलैण्डर चुकने के बाद
आने को है
एक और दिसम्बर,
नहीं चुका सूरज/
उग रहा है वह अब भी
पुराने वक्त पर
तुम करो गणनाएं कि इसी गति से
और कब तक जल सकेगा सूरज

तब तक निहितार्थ यह है

कि सूर्य का जलना ही सत्य है/
जो सदैव है, वही सत्य है/

जो सत्य है, वही सदैव है

सत्य, जो आश्रित नहीं मुझ पर,
तुम पर या किसी और पर/
हम खड़े हो सकते हैं बस
जिसके पक्ष में/
यदि सत्य के पक्ष में नही हैं हम
तब हम हैं सत्य के विरुद्ध

और असत्य कुछ भी नहीं
वह तो है केवल उस जगह पर
सत्य की अनुपस्थिति

जिंदगी की विंडो

सुनो, डाल कर रखना

अपनी खुशियों पर
एक कठिन सा ‘पासवर्ड’,
इन दिनों सबसे ज्यादा आसान है
‘हैकिंग’ खुशियों की

मत देना जवाब
खुशियों के खजाने का स्वप्न दिखाते
किसी ईमेल, फोन या चिट्ठी का/
कहीं छिन न जाए
बड़ी खुशियों के लालच में
तुम्हारी छोटी-छोटी खुशियाँ भी/
कहीं दर्ज मत करना,
बस कैद कर रखना तुम
अपनी खुशियों का ‘पासवर्ड’
अपने कलेजे में

ईश्‍वर नहीं भेजता है
कभी ऐसे संदेश/
कोई कितना भी करे वादा,
नहीं कर सकता दूर
कोई दूसरा तुम्हारे दुख/
दुख कम्प्यूटर का वह
‘हैंग स्क्रीन’ है,
जिसे बस किया जा सकता है
‘स्विच-ऑफ’/
दुख को घेर कर रख दो
तुम एक कैद में-
दुख का ‘मालवेयर’ बस
हो सकता है ‘क्वैरेंटाईन’

खुशियों और दुख का
योग है जिंदगी

जिंदगी की ‘विंडो’
कभी नहीं होती ‘री-इंस्टाल’/
‘फारमैट’ करने से पीछा नही छोड़ता
पिछली जिंदगी का ‘डाटा’/
तुम्हें खुद तलाशनी होगी
एक-एक पुरानी ‘फाइल’,
सुधारनी होंगी सारी प्रविष्टियाँ,
तभी ‘बूट’ होगा
जिंदगी का ‘प्रोसेसर’
‘गीगा हर्ट्ज स्पीड’ के साथ

 नए पिता

नए बने पिता
निकलते हैं सड़क पर
काँधे पर छपकाए
कटहल के कोए सा बच्चा/
अद्भुत गर्व के साथ
चलते हैं सड़क पर
नए बने पापा

नए बने पिता
काँधे पर छपका कर
अपने लाड़ले को
करते हैं महसूस,
कि हैं वे दुनिया के
सबसे दौलतमंद आदमी/
भूलकर सारे अभाव,
बेकारी और बेचारगी

नए बने पिता
देखते हैं दुनिया की ओर
जैसे कह रहे हों
अपनी संतान से
-लो मेरे बच्चे
अब सौंप दी मैंने यह दुनिया
विरासत में तुमको

नए कवि भी तो हैं
नए बने पिताओं से
जो लगाए फिरते हैं छाती से
सतमासे जनी कविताएं
और फिर छोड़ देते हैं उन्हें
दुनिया के विस्तार मे
भटकने को

8 comments on “पद्मनाभ गौतम की कविताएं

  1. Pooja says:

    Saarinhi bahut badhiya hai…

  2. बहुत ही प्रभावी रचनायें।

  3. आह !! कितना सुन्दर …
    हर कविता एक अलग रूप में….

  4. हार्दिक धन्यवाद…….प्रकाशन हेतु भाई अनुराग जी का और चयन हेतु भाई नित्यानन्द जी का ….

  5. उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु आपका धन्यवाद प्रवीण भाईजी….

  6. ढेरों धन्यवाद वसुंधराजी …

  7. Parveen Sharma says:

    Fabulous……

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