धूल फांको, मगर : रोज मिलिगन

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
मगर क्या इससे बेहतर नहीं कि
एक ख़ूबसूरत तस्वीर उकेरो या फिर कोई चिट्ठी लिखो,
लज़ीज़ खाना बनाओ या एक पौधा रोपो;
लालसाओं और ज़रूरतों के बीच फासले पर सोचो.

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
मगर ज्यादा वक़्त नहीं है तुम्हारे पास
कितनी नदियां तैरनी हैंऔर कितने पहाड़ चढ़ने हैं;
संगीत में डूबना है और किताबों में खो जाना है;
दोस्तियां निभानी हैं और जीना भी है भरपूर.

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
लेकिन बाहर धरती इंतज़ार कर रही है
सूरज तुम्हारी आँखों में उतरना चाहता है
और हवा तुम्हारे बालों से खेलना चाहती है
बर्फ के फाहों की झुरझुरी और बारिश की फुहारें
तुम्हारे कानों में फुसफुसाना चाहते हैं,
यह दिन फिर लौटकर नहीं आएगा.

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
मगर एक दिन बेमुरव्वत बुढ़ापा घेर लेगा
और जब तुम विदा होगे (वो तो ज़रूर होगे)
तुम खुद धूल के बड़े ढेर में बदल जाओगे. 

(अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)



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