दून लिटरेचर फेस्टिवल 24-25 दिसम्बर को

नई दि‍ल्ली : टी.एस. इलियट ने कहा था, ‘जो लोग अपनी साहित्यिक विरासत की चिन्ता करना छोड़ देते हैं, वे जंगली तथा बर्बर हो जाते हैं और जो लोग साहित्य-सृजन करना छोड़ देते हैं, वो विचार और संवेदनशीलता को खो देते हैं।’ हिन्दी के क्षेत्र में यह संकट साफ़-साफ़ नजर आने लगा है। यहाँ के लोगों के जीवन की प्राथमिकता में बच्चों का कामयाब भविष्य, मकान तथा नये दौर के सुख-साधन तो हैं, लेकिन साहित्य, कला तथा संस्कृति से वे दूर होते जा रहे हैं। आबादी का एक बड़ा हिस्सा न तो अपनी साहित्यिक विरासत से परिचित होना चाहता है और न ही समकालीन सृजन से ही जुड़ना चाहता है। इस कारण न उसके पास कोई विचार है, न कोई आदर्श! न उसकी कोई प्रतिबद्धता रह गई है, न संघर्ष का माद्दा! सोशल मीडिया तथा स्मार्ट फ़ोन ने सारी दुनिया को लोगों की मुट्ठी में समेट दिया है। ऐसे में व्यक्ति भयानक तरीक़े से व्यस्त हो चुका है। वह त्वरित सूचनाओं के प्रभाव में है।
सोशल मीडिया के रूप में आया यह सामाजिक बदलाव विज्ञान और तकनीक से जुड़े वैश्विक परिवर्तन का एक चरण है जो समाज को परिवर्तित कर रहा है। आभासी दुनिया को अपने जीवन के अभिन्न अंग बना चुकी युवा पीढ़ी समाज की मुख्यधारा से किस प्रकार कट रही है, इसे हम अपने परिवेश को देखकर समझ सकते हैं। यद्यपि यह भी सत्य है कि साहित्य, सरोकार और संघर्ष की चर्चा के मंच के रूप में भी सोशल मीडिया का प्रयोग हो रहा है। मध्य-पूर्व में हुए जनसंघर्षों में सोशल मीडिया की भूमिका को पूरी दुनिया ने देखा है। शेष दुनिया की भाँति भारत भी तेज़ रफ़्तार से बदलाव के साथ क़दमताल कर रहा है। इसी क़दमताल के बीच परम्परावादी भारत और आधुनिक भारत के विरोधाभास भी हैं। भारत एक बहुसांस्कृतिक और बहुभाषी देश है। हमारी जीवनशैली, लोकपरम्पराओं, धार्मिक प्रथाओं और बहुभाषावाद में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। सामाजिक मान्यता, प्रथा, इतिहास और संस्कृति जैसे तत्व मिलकर लोक परम्पराओं को समृद्ध करते हैं। लेकिन थ्री डायमेंसनल (3डी) के इस युग में घर के भीतर और बाहर लोक-परम्पराओं के सकारात्मक चिह्न निरन्तर धूमिल हो रहे हैं।
देवी-देवताओं के पूजन की प्राचीन लोक-प्रथाओं से लेकर सार्वजनिक समारोहों तथा मेलों का स्वरूप भी बदल गया है। विवाह समारोहों में गाये जाने वाले प्राचीन गीत अब लुप्तप्राय हो गये हैं। इसी प्रकार दादी-नानी के क़िस्से और कहानियाँ भी अब केवल चर्चाओं के अंग बनकर रह गये हैं। कुल मिलाकर दुनिया के इस बदलाव ने लोक-परम्पराओं को न सिर्फ कड़ी चुनौती दी है, बल्कि शहरीकरण और एकल परिवारों के मौजूदा ढाँचे ने सामाजिक व्यवस्था के इन परम्परागत तत्वों को समाप्त कर दिया है। सामाजिक व्यवस्था में आ चुका यह बदलाव हमें कला और साहित्य में भी स्पष्ट हो गया है। कहानी और कविता का कथ्य भी भूमंडलीकरण के साथ ही बदल रहा है। इस बदलाव को हम चाय और पान के नुक्कड़ों के गायब हो जाने के रूप में भी महसूस कर सकते हैं, जहाँ अपनी बात कहने और सुनने को लोग आया करते थे। कहानी अब पढ़ने से ज़्यादा देखने और सुनने के लिए लिखी जा रही है, ऐसा प्रतीत होता है। यह वही दौर है जहाँ फिल्मों और धारावाहिकों की तरह ही कहानियों से भी गाँव के गँवई पात्र गायब हो गए हैं।
इन सब स्थितियों-परिस्थितियों के बीच पहाड़ हैं और पहाड़ के रचनाकार हैं। पहाड़ से जुड़ी उनकी चिंतायें भी हैं। रोज़ी-रोज़गार के लिए टूट चुके पहाड़ के परिवार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और संचार के सवाल भी हैं। इनके सबके केन्द्र में कहीं वह लोक भी है जिसने दुनिया को मौजूदा स्वरूप प्रदान किया है। लोक के गीत, लोक की कथाओं और लोक की गाथाओं के बिना साहित्य के मौजूदा ढाँचे की चर्चा कैसे संभव है। इसी प्रकार दलित, स्त्री आदि मौजूदा दशकों के विमर्श लगातार जरूरी बने हुए हैं। इन सबके बीच भारत की बहुसांस्कृतिक, बहुभाषी, बहुलवादी व समृद्ध लोकपरम्परा को कला और साहित्य के माध्यम से समझने व समझाने के साथ ही साझा करने के प्रयास के रूप में ‘समय साक्ष्य’ (प्रकाशन) की ओर से क्रि‍श्चयन रि‍ट्रीट एंड स्टडी सेंटर, राजपुर रोड, देहरादून में दून लिटरेचर फेस्टिवल (डीएलएफ-2016) का आयोजन में किया जा रहा है। इस आयोजन की परिकल्पना निम्न उद्देश्यों के साथ की गई है-

-हिन्दी साहित्य के मौजूदा परिदृश्य पर विमर्श।
-पुस्तक लोकार्पण, पुस्तक चर्चा तथा पुस्तक प्रदर्शनी।
-लोक-साहित्य व लोक-कला की मौजूदा स्थिति पर चर्चा।
-साहित्यकारों, लोक कलाकारों, शिल्पियों, संस्थाओं, समूहों व पाठकों का एक मंच पर समागम।
-आंचलिक, स्थानीय व लोक-परम्पराओं से जुड़े रचनाकारों का एक मंच पर एकत्रीकरण।
-कार्यक्रम में साहित्य व कला से जुड़ी प्रदर्शनी, फिल्म स्क्रीनिंग आदि का आयोजन।

कार्यक्रम

प्रथम दिवस 24 दिसम्बर 2016
पंजीकरण 9-10 बजे
उद्घाटन सत्र 10 बजे 11.00 बजे
हिन्दी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य और नया मीडिया
संबोधनः पुरुषोत्तम अग्रवाल, बटरोही
संयोजकः डॉ. सुशील उपाध्याय

प्रथम सत्र 11.00 बजे 1.00 बजे तक 
भूमण्डलीकरण और हिन्दी कहानी
(सन्दर्भः जाति, धर्म, स्त्री, साम्प्रदायिकता, गांव, बाजार, नया पाठ और तकनीक)
अध्यक्षः सुभाष पंत
बीज भाषणः जितेन ठाकुर
सहभागः कॉन्ता रॉय, मनीषा कुलश्रेष्ठ, दिव्य प्रकाश दुबे, अनिल कार्की
संयोजकः दिनेश कर्नाटक
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर
मध्याह्न भोजन 1.00-2.00 बजे

द्वितीय सत्र 2.00-4.00 बजे
हिन्दी कविताः चेतना और पक्षधरता
(सन्दर्भः खेत, किसान, गांव, शहर, पहाड़, घर, परिवार और समाज आदि)
अध्यक्षः मंगलेश डबराल
बीज भाषणः लीलाधर जगूड़ी
सहभागः राजेश सकलानी, शैलेय, प्रकृति करगेती, आशीष मिश्र
संयोजकः डॉ. अरुण देव
चाय: कार्यक्रम में ही खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर

तृतीय सत्र 4.00-6.00 बजे
स्त्री और आधुनिकता
अध्यक्षः सुमन केसरी
बीज भाषणः शीबा असलम
मंच पर: सुजाता तेवतिया, सन्ध्या निवेदिता, निधि नित्या
संयोजकः मनीषा पांडे
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर
भोजन 8-9 बजे रात्रि

चतुर्थ सत्र: 9 बजे से 11 बजे
कवि और कविता
अध्यक्षः डॉ. अतुल शर्मा
आमंत्रित कविः स्वाति मेलकानी, डॉ. माया गोला, केशव तिवारी, चेतन क्रान्ति, डॉ. राम विनय सिंह, अंबर खरबंदा, मुनीश चन्द्र सक्सेना, राजेश आनन्द ‘असीर’, नदीम बर्नी, जिया नहटौरी, शादाब अली, रेखा चमोली, नदीम बिस्मिल, प्रतिभा कटियार, सुभाष तराण।
संयोजकः डॉ. प्रमोद भारतीय

द्वितीय दिवस, 25 दिसम्बर 2016

प्रथम सत्र 10.00-12.00 बजे
लोक साहित्य: अतीत, वर्तमान और भविष्य
(सन्दर्भः लोकगीत, लोककथाएं, लोकगाथाएं, वीरगाथाएं, कहावतें व किं‍वदंतियां)
अध्यक्षः डॉ. दाताराम पुरोहित
बीज भाषणः डॉ. प्रभा पंत
मंच पर: डॉ. प्रभात उप्रेती, महाबीर रवांल्टा, डॉ. शेर सिंह पांगती
संयोजक: डॉ. उमेश चमोला
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर
चाय: कार्यक्रम में ही

द्वितीय सत्र 12.00-2.00 
बाल साहित्यः चुनौतियां और संभावनाएं
(सन्दर्भः परिवार, समाज, संस्कृति, स्कूल, घर, किताबें, बस्ता, पुस्तकालय, वाचलनालय, विकास, परिवर्तन आदि)
अध्यक्षः उदय किरौला
बीज भाषणः राजेश उत्साही
मंच परः डॉ. दिनेश चमोला, मुकेश नौटियाल, डॉ. शीशपाल, डॉ. उमेश चन्द्र सिरतवारी
संयोजकः मनोहर चमोली ‘मनु’
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर

समानान्तर
द्वितीय सत्र 12.00-2.00
बाजार, मीडिया और लोकतंत्र
अध्यक्षः कुशल कोठियाल
बीज भाषणः सुन्दर चन्द्र ठाकुर
मंच परः अनुपम त्रिवेदी, पवन लाल चंद, लक्ष्मी पंत
संयोजकः भूपेन सिंह
खुली चर्चा/प्रश्नोत्तर
मध्याहन भोजन 2.00-2.30

तृतीय सत्र 2.30- 4.30 बजे
कथेतर साहित्यः समय और समाज
(यात्रा, संस्मरण, डायरी, पत्र, आत्मकथा, विज्ञान लेखन आदि पर संवाद)
अध्यक्षः देवेन्‍द्र मेवाड़ी
बीज भाषण- डॉ. शेखर पाठक
मंच परः तापस चक्रवर्ती, एस.पी. सेमवाल, आकांक्षा पारे कासिव
संयोजकः डॉ. सुशील उपाध्याय

चतुर्थ सत्र 4.30-6.30 बजे 
आंचलिक साहित्यः चुनौतियाँ एवं संभावनाएं
अध्यक्षः डॉ. अचलानंद जखमोला
बीज भाषणः डॉ. देब सिंह पोखरिया
मंच पर: मदन मोहन डुकलाण, नेत्र सिंह असवाल, डॉ. हयात सिंह रावत, रमाकांत बैंजवाल
संयोजकः गिरीश सुन्दरियाल

पंचम सत्र-6.30- 7.30 
विभिन्न पुस्तकों पर चर्चा
व्यावहारिक वेदान्त: सरला देबी, समीक्षकः शशि भूषण बडोनी
साहिर लुधियानवीः मेरे गीत तुम्हारेः सुनील भट्ट, समीक्षकः- मुकेश नौटियाल
मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां: दिनेश कर्नाटक, समीक्षकः- भाष्कर उप्रेती
खुली चर्चा/चाय
भोजनः  8-9.00 बजे

छठा सत्र 9-11 बजे 
समापन

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