दिनकर कुमार की कवितायें

दिनकर कुमार

दिनकर कुमार

5 अक्टूबर, 1967, बिहार के दरभंगा जिले के एक छोटे से गांव ब्रहमपुरा में जन्मे दिनकर कुमार के तीन कविता संग्रह, दो उपन्यास, दो जीवनियाँ एवं असमिया से पैंतालीस पुस्तकों का अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। वह दैनिक सेंटिनल (गुवाहाटी) के सम्पा दक है। उनकी कुछ कवितायें-  

सारा देश रियल इस्टेट

सारा देश रियल इस्टेट
मानचित्र पर क्यों रहें
धान के लहलहाते हुए खेत
कल-कल बहती हुई नदियाँ
ताल-तलैया, झील-पोखर
हरियाली का जीवन

सारा देश रियल इस्टेट
उन्हें उजाडऩे की आदत है
वे उजाडक़र दम लेंगे
फसल की जगह फ्लैट उगाएंगे
एक्सप्रेस वे बनाएंगे
रिसॉर्ट और फन सिटी बसाएंगे

सारा देश रियल इस्टेट
कैसी माटी किसकी माटी
कैसी धरती कैसी माता
कैसा देश किसका तंत्र
भूमाफिया का देश
बिल्डर का तंत्र
बाकी प्रजा रहे दीन-हीन
उनके अधीन उनके अधीन।

इस विज्ञापन जगत में तुम कहां हो मनुष्य

इस विज्ञापन जगत में तुम कहाँ हो मनुष्य
कहाँ है अभाव में थरथराती हुई तुम्हारी गृहस्थी
जीवन से जूझते हुए कलेजे से निकलने वाली आहें
कहाँ हैं रक्तपान करने वाली व्यवस्था का चेहरा

अगर है तो केवल है सिक्कों की खनखनाहट
अघाई हुई श्रेणी की ऐय्याशियों की सजावट
झूठी घोषणाओं को ढकने के लिए अमूर्त चित्राँकन
कोढिय़ों और भिखारियों की पृष्ठभूमि में पर्यावरण का रेखाँकन
एलसीडी स्क्रीन पर झिलमिलाती हुई वस्तुएं
किस्त में कारें किस्त में फ्लैटें किस्त में
उपलब्ध हैं समस्त महंगे सपने सौदागर बन गए हैं बहेलिए
कदम-कदम पर बिछाए गए हैं जाल
चाहे तो इसे हादसा कहो या कहो खुदकुशी
तुम्हारी अहमियत कुछ भी नहीं मरोगे तो मुक्ति मिले या न मिले
आँकड़े में शामिल जरूर हो जाओगे

इस विज्ञापन जगत में तुम कहां हो मनुष्य
हिंसक पशुओं को देख रहा हूँ गुर्राते हुए रेंगते हुए
गिड़गिड़ाते हुए यह कैसी क्षुधा है जिसकी भट्ठी में
समाती जा रही है जीवन और प्रकृति की समस्त सहज भावनाएं
नष्ट होती जा रही है सहजता-सम्वे दना
पसरता जा रहा है अपरिचय का ठंडापन
इस विज्ञापन जगत में तुम कहाँ हो मनुष्य ।

मुझे मत उछालो

मुझे मत उछालो सराहना के झूले पर
कहीं हो न जाए मुझे झूठा गुमान
कहीं बिगड़ न जाए मेरा संतुलन
कहीं मैं मुग्ध न हो जाऊँ अपने आप पर

अगर दे सकते हो तो दो थोड़ा सा अपनापन
मेरे थके हुए वजूद को थोड़ी सी छाया
मेरे नम सपनों को थोड़ी सी धूप
उदासी की घडिय़ों में दो मीठे बोल

मुझे मत उछालो सराहना के झूले पर
कहीं मैं भूल न जाऊँ अपनी राह
कहीं मैं भ्रमित होकर पड़ाव को ही न मान लूँ मंजिल
कहीं ओझल न हो जाएं मेरे आदर्श

मुझे मत उछालो सराहना के झूल पर।

आवारा पूँजी के उत्सव में

आवारा पूँजी के उत्सव में दबकर रह जाती है
कमजोर नागिरकों की सिसकी
असहाय कंठ की फरियादें
वंचित आबादी की अर्जी

आवारा पूँजी के पोषक मंद मंद मुस्काते हैं
कुछ अंग्रेजी में बुदबुदाते हैं
शेयर बाजार का चित्र दिखाकर आबादी को धमकाते हैं
कहते हैं छोड़ो जल-जमीन
नदियाँ छोड़ो जनपद छोड़ो
झोपड़पट्टी से निकलो बाहर
बसने दो शॉपिंग माल यहाँ
रियल इस्टेट का स्वर्ग यहाँ
यह कैसी भावुक बातें हैं
अपनी जमीन है माँ जैसी

आवारा पूँजी के साये में
कितना बौना है लोकतंत्र
कितना निरीह है जनमानस

आवारा पूँजी के साये में
पलते-बढ़ते अपराधीगण
अलग-अलग चेहरे उनके
अलग-अलग हैं किरदारें
बंधक उनकी है मातृभूमि
उनके कब्जे में संसाधन

कैसे कहें आजाद हैं हम?

वह जो फेसबुक का साथी है

वह जो फेसबुक का साथी है
किसी मशीन की तरह
या किसी बहुरुपिए की तरह
वह अपनी कुंठाएं उड़ेलता है
जब वह बिलकुल अकेला होता है
कुछ भद्दी गालियाँ देते हुए कल्पना करता है
कि इस तरह बदल जाएगा समूचा तंत्र

वह जो फेसबुक का साथी है
बनावटी है उसकी भावनाएं
वह जब करुणा की बातें करता है
उसके सीने में सुलगती रहती है घृणा
वह जब प्रेम दर्शाना चाहता है
जाहिर हो जाती है उसकी आत्मदया

वह जो फेसबुक का साथी है
देखते ही देखते वह नजर आने लगता है
बेजान बिजूका की तरह
उसकी आकृतियाँ गड्डमड्ड होने लगती हैं
वह बुद्धि विलास को ही समझता है क्रांति
वह मदिरापान करने के बाद
दार्शनिक बन जाता है
जीवन में पिट जाने पर कायर बन जाता है
वह उतना ही खोखला है
जितना कोई बेजान डिब्बा हो सकता है
वह उतना ही संवेदनशून्य है
जितना कोई यंत्र हो सकता है।

एक दिन बचेगा

एक दिन बचेगा समाज का मलाईदार वर्ग ही शहर के इस मुख्य इलाके में
बाकी सारे कमजोर लोगों को
दूर-दराज की बस्तियों में जाकर
बिल्लियों के डर से बिलों में दुबके चूहों की तरह
जीने की आदत डालनी होगी

वे कहते हैं विकास के लिए इतना त्याग
तो करना ही पड़ता है
ऐसे नहीं हासिल हो जाता महानगर का दर्जा
ऐसे ही नहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपनी तिजौरी
खोलकर राजकोष की रक्षा करती हैं
ऐसे ही नहीं भूमाफिया से लेकर राजनेता तक
जी-जान से तैयार करते हैं अपना गिरोह

एक दिन बचेगा डार्विन के सिद्धांत वाला ताकतवर वर्ग ही
समस्त सुविधाओं पर काबिज होकर
उसकी सेवा करने के लिए भले ही
गुलामों की प्रजाति रहेगी मलीन बस्तियों में
दया की मोहताज बनकर
मतदाता सूची में दर्ज नाम बनकर।

बाजार सबको नचाता है

बाजार सबको नचाता है अपने इशारे पर
कहता है निरर्थक है भावना-संवेदना
असली चीज है खनखनाता हुआ सिक्का
इसे हासिल करने के लिए बेच दो
जो कुछ भी है तुम्हारे पास बेचने लायक
अगर बेचेने लायक कुछ भी नहीं है
तो बाजार कहता है तुम्हें भूमंडलीकरण के सवेरे में
जीवित रहने का कोई हक नहीं है

बाजार सबको नचाता है अपने इशारे पर
इसीलिए तो खोखले हो रहे हैं मानवीय रिश्ते
बढ़ती जा रही है गणिकाओं की तादाद
बढ़ते जा रहे हैं संवेदनशून्य चेहरे
यंत्र की तरह दौड़ती-भागती भीड़
बाजार के इशारे पर जीना
बाजार के इशारे पर मरना।

वे जो हमें नायक की तरह नजर आते हैं

वे जो हमें नायक की तरह नजर आते हैं
असल में वे प्रेशर कुकर की सीटी की
भूमिका निभा रहे होते हैं
हमें लगता है कि वे हमारे हितों की चिंता में
आमरण अनशन कर रहे हैं
डिजाइनर पोशाक में सज-धजकर
असंख्य टीवी कैमरों के सामने आग उगल रहे हैं
बदरंग तस्वीर को पूरी तरह
बदल देने का दावा कर रहे हैं

वे जो हमें नायक की तरह नजर आते हैं
असल में वे हमारे असंतोष की आग पर
बर्फ रखने की भूमिका निभा रहे होते हैं
वे हमारा ध्यान अनर्गल प्रलापों की तरफ
केंद्रित करना चाहते हैं
ताकि हम पूछ न सकें कोई असुविधाजनक सवाल
ताकि हमें अंधेरे में रखकर
वे लोग हमारे जीवन के साथ खिड़वाड़ करने की
साजिशों को अंजाम देते रहें

वो जो हमें नायक की तरह नजर आते हैं
असल में वे खलनायकों की मदद करने में जुटे रहते हैं।

दुनिया की सबसे हसीन औरत

दुनिया की सबसे हसीन औरत
गरीबी की रेखा पर चढक़र
मुस्कराती है
ठंडे चूल्हे की तरह सर्द है
उसके होंठ
असमय ही वृद्धा बन जाने वाली
बच्ची से मिलती है
उसकी आँखें

दुनिया की सबसे हसीन औरत
हमें बताएगी
भूख लगने पर रोटी नहीं मिले
तो केक खा लेना
प्यास लगने पर
शुद्ध पेयजल नहीं मिले
तो कोल्ड ड्रिंक्स पी लेना

दुनिया की सबसे हसीन औरत
हमारी नींद की गुफा में
समा जाती है
हमारे सबसे हसीन सपनों को
बटोरती है
और गायब हो जाती है।

परिचय

हवा ने बीज से नहीं पूछा था
उसकी जाति के बारे में
उसके प्रांत के बारे में
उसकी मातृभाषा के बारे में
और हवा
बीज को उड़ाकर ले आई थी

बीज मिट्टी के साथ
घुल-मिल गया था और
एक फूल के पौधे के रूप में
अंकुरित हुआ था

हवा की तरह चिडिय़ा भी
बीज से नहीं पूछती
निर्धारित प्रपत्र के प्रश्न
हवा की तरह चिडिय़ा भी
बीज से नहीं माँगती
सच्चे-झूठे प्रमाण-पत्र

और मनुष्य जड़ की तलाश में
उन्मादित हो जाता है
अतीत के मुर्दाघर में भटकता है
हवा की तरह
चिडिय़ा की तरह
और मिट्टी की तरह
सहज नहीं रह जाता

खून के लाल रंग को भूलकर
पीले और नीले
काले और भूरे रंग के भ्रम में
पंचतंत्र का शेर बन जाता है
मेमने पर पानी गंदा करने का
आरोप लगाता है
मेमने की सफाई सुनकर
उसके पूर्वज को दोषी बताता है
और मेमने को दंडित करता है।

स्कूल में गोलीबारी

वीडियो गेम की काल्पनिक दुनिया में
वे रचते थे असली नजर आने वाले किरदारों को
माउस की क्लिक के सहारे वे नष्ट करते थे
अपने ही किरदारों को
उन्हें खून बहते हुए देखकर
तनिक भी डर नहीं लगता था

डर उन्हें लगता था अंधेरे से
अकेलेपन से रिश्तों के खोखलेपन से
माता-पिता के असंभव सपनों पर सवार होकर
वे जिस सफर पर निकले थे
वह सफर किसी मंजिल पर नहीं पहुँचता था

पैसे के क्रूर परिवेश ने पैदा होने के बाद ही
धुन की तरह नष्ट करना शुरू कर दिया था
उनके भीतर की सम्वेशदनशीलता को
उन्होंने प्रतिशोध का पाठ सीखा था
परिवार से समाज से देश और दुनिया से
इसीलिए उन्होंने वीडियो गेम की काल्पनिक दुनिया की तरह
असली जीवन में भी जब अपने ही सहपाठी को
गोली मारी तो वे तनिक भी डरे नहीं।

जिंदा रहते हैं सपने

विद्रोह को कुचल दिया जाता है
लेकिन जिंदा रहते हैं सपने
सपनों का कोई मुख्यालय नहीं
न ही छिपने के लिए बंकर
न ही भागने के लिए कोई गुप्त मार्ग

जब अन्याय फहराता है जीत का पताका
वंचित के सीने में बीज की तरह
अंकुरित होता है सुलगता हुआ सपना
जब अन्याय विद्रोह की छाती पर पैर रखकर
घोषणा करता है कि अब
खत्म हो गई हैं सारी चुनौतियाँ
खामोश हो गए हैं प्रतिवादी स्वर
उसी समय किसी बच्चे की मुट्ठी तन जाती है
आंखों में विद्रोह समा जाता है

विद्रोह को कुचल दिया जाता है
लाशें बिछा दी जाती हैं खेतों में खलिहानों में
नदी और सागर को लाल कर दिया जाता है
विद्रोहियों के रक्त से
नए सिरे से जन्म लेता है विद्रोही
प्राचीन सपने को कलेजे से लगाकर
आदेश या अध्यादेश मानने से
वह इंकार कर देता है।

(‘बोधि प्रकाशन’ एफ-77, करतारपुरा औद्योगिक क्षेत्र, बाईस गोदाम, जयपुर, मोबाइल : +91 98290 18087 से प्रकाशित कविता संग्रह ‘लोग मेरे लोग’ से साभार, मूल्‍य : 60 रुपये)



5 comments on “दिनकर कुमार की कवितायें

  1. ” लोग मेरे लोग” संग्रह की सार्थक कविताओँ हेतु लेखक को धन्यवाद।
    वर्तमान विसंगतियोँ का यथार्थ अंकन किया है, कविताएँ मन को छू गई।
    .. . . .. .. .. … ..
    कविता संग्रह मिलने का पता और मूल्य कि जानकारी देँ।
    gurpreetbutters@gmail.com

    MY BLOG….http://yuvaam.blogspot.com/p/katha.html?m=0

  2. sumit says:

    vibhin visyao pe likhi bahut hi acchi kavitayein hai

  3. बहुत सामायिक और मारक रचनाएँ हैं . दिनकर कुमार चुपचाप काम करने वाले लेखकों में हैं …उन्हें बहुत -बहुत बधाई .

  4. anwar suhail says:

    dinkar kumar ki kavitaayen…ek naye bhaw-lok ki sair karati hain aur insan ki zindagi me pravesh le chuke bazar ke bare me unki chintaayen jhakjhorti hain…
    shubhkamnaayen

  5. Praveen Saini says:

    Achhi kavitaye hai Dinkar ji ki.

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