थारू समाज- एक समृद्ध विरासत का शोकगीत : अवैद्यनाथ दुबे

थारू समाज की महि‍लाओं से बात करते अवैद्यनाथ दुबे।

कहने को तो अन्य आदिवासी समाज की तरह उत्तर प्रदेश के तराई में बसा थारू आदिवासी समाज भी सांस्कृतिक-लोकपरम्पराओं के मामले में समृद्ध रहा है। आज भी यहाँ स्थानीय पर्व-त्योहारों के मौकों पर लोकधुनों पर थिरकते थारू स्त्री-पुरुषों का समूह दिख जाएगा। विडम्बना है कि दुधवा टाइगर रिज़र्व पहुँचने वाले देसी-विदेशी सैलानी, सत्ता में बैठे हुक्मरान और पैसेवाले थारू आदिवासियों के शोकगीतों में भी मनोरंजन खोजते हैं। यही वजह है कि‍ आज भी यह आदिवासी समुदाय खासतौर से महिलाएं हाशिये पर हैं। वरि‍ष्‍ठ पत्रकार अवैद्यनाथ दुबे की रि‍पोर्ट-

एक तरफ उत्तर प्रदेश का राष्ट्रीय उद्यान दुधवा अपने प्राकृतिक सौंदर्य और वैविध्यपूर्ण वन्य जीवन के लिए दुनिया भर में जाना जाता है, तो वहीं नेपाल से सटे तराई के इन जंगलों के बीच इंसानों की वह दुनिया भी है, जिसे यह ‘सभ्य’ समाज थारू आदिवासियों के नाम से जानता है। ‘सबका साथ, सबका विकास’ जैसे नारों के बीच थारू आदिवासियों का यह समाज आज भी हाशिये पर है और इसी समाज की आधी आबादी यानी महिलाएं तो हाशिये से भी गायब हैं।

कहने को तो अन्य आदिवासी समाज की तरह थारू आदिवासी समाज भी महिला प्रधान है, लेकिन हकीकत में यहाँ भी सत्ता पुरुषों के हाथों में रहती है। वैसे तो लोकतंत्र की पहली और सबसे अहम इकाई ग्राम पंचायतों में इनकी पैठ तो दूर, पहुंच भी नहीं है। खुदा न खास्ता कोई महिला ग्राम प्रधान बन भी जाती है तो हमारे तथाकथित सभ्य समाज की तरह यहाँ भी उसकी हैसियत रबर स्टाम्प तक ही सीमित रह जाती है। चलती ‘प्रधानपति’ की ही है।

खेती का काम हो या जंगल से जलावन की लकड़ी ढोकर लाना हो, ज्यादातर महिलाओं को ही हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। यहां तक कि मछली के शिकार के लिए जाल बुनने का काम भी महिलाओं को करना पड़ता है। फिर मर्द क्या करते है? नेपाल सीमा से लगे लखीमपुर जिले के रामनगर गाँव की अचम्भी देवी कहती हैं, ‘उन्हें शराब (कच्ची) बनाने और पीने से फुर्सत मिले तो न।’ कोई 50 साल की अचम्भी को सबसे ज्यादा शिकायत वन विभाग महकमे से है। वह कहती हैं, ‘जंगल से हम जिंदा हैं, लेकिन जलावन के लिए सूखी लकड़ियां लाने पर भी विभाग वाले परेशान करते हैं। कभी हमारी कुल्हाड़ियाँ छीन लेते हैं, कभी हमसे बदसलूकी करते हैं।’

40 साल की भज्जो दो-तीन साल पुराना वाकया बताती हैं, ‘बनकटी के जंगल में जलावन लकड़ी लेने गई महिलाओं पर पुलिस और वन विभाग के लोगों ने हमला कर दिया था, जिसमें सूडा गांव की एक औरत बुरी तरह से घायल हो गई। दोषियों पर कार्रवाई के बजाय पुलिस ने उलटा जख्मी महिला और उसके पति को लूट व जंगल काटने की धाराएं लगाकर जेल भेज दिया।’ यह बात और है कि थारू महिलाओं के बड़े पैमाने पर हुए आंदोलन के बाद आरोपी दुधवा वार्डन और एक कोतवाल पर एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा कायम हुआ।

एक तरफ थारू समाज के लोग वक़्त के साथ चलने की कोशिश कर रहे हैं, तो वहीं कई ऐसे मसले हैं, जहां ये चाहकर भी अपने पुराने तौर-तरीके आजमाने पर मजबूर हैं। इनके लिए प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना भी उन योजनाओं में शुमार है, जो इन तक पहुंचनी तो दूर, जिनका नाम तक इन्होंने नहीं सुना। थारू समाज के लोग आज भी मिट्टी के चूल्हे पर खाना पकाते हैं। ईंधन के रूप में ये लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं, जो थारू महिलाएं जंगल से लकड़ियां इकट्ठा करती हैं। फिर उनके गट्ठर बनाकर अपने सिर पर लादकर घर लाती हैं। एक गट्ठर का वज़न 50 से 60 किलो होता है।

थारू जीवन को करीब से जानने और इस आदिवासी समुदाय खासतौर से महिलाओं की दुश्वारियों को समझने के लिए इन पंक्तियों के लेखक ने दर्जन से ज्यादा गाँवों का दौरा किया, जिनमें नेपाल से सटे चंदन चौकी, रामगढ़, मसानखंभ, पुरैना, चमरौली, सौनहा, सोनारीपुर, बनकटी आदि शामिल हैं। कुछ मायनों में यहाँ बदलाव की बयार का असर होता दिखा। मसलन, लगभग सभी गांवों में प्राथमिक विद्यालय देखने को मिले। कुछ उच्च प्राथमिक विद्यालय भी दिखे। इनमें से कई गांव बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत सड़क से भी जुड़ चुके हैं। लेकिन स्थानीय आदिवासी देश की मुख्यधारा से जुड़ सकें, उन्हें उनका अधिकार मिल सके, इस दिशा में कारगर पहल होती नहीं दिखती। कायदे से वन्य सम्पदा पर वन्यजीवों के बाद इनका हक बनता है, जिसके लिए यह थारू समुदाय जब-तब आंदोलन करता आया है, लेकिन ताल-तलैयों में शिकार तो दूर, जंगल की सूखी लकड़ियां बीनने पर भी धर लिया जाता है।

रामगढ़ गांव के बिस्सू को आरक्षण के बारे में ज्यादा नहीं पता। हां, उन्हें बखूबी याद है कि करीब दो साल पहले उनके पड़ोसी गांव चमरौली में एक युवक के फ़ौज में बतौर सिपाही भर्ती होने पर आस-पास के गाँवों के लोगों को दावत मिली थी। यह पूछने पर कि उनकी जानकारी में यहाँ कितने लोग सरकारी नौकरी में होंगे, बिस्सू ने आसानी से दो नाम गिना दिए- एक फ़ौज में सिपाही और दूसरा जिला प्रशासन में चपरासी। लड़कियां तो बस जंगल से लकड़ियां बीनने के लिए है, शादी के बाद भी।

थारू आदिवासियों के लिए बाढ़ भी बड़ी समस्या है। इस इलाके में कुल तीन प्रमुख नदियाँ हैं- शारदा, सुहेली और मुहाना। बरसात में जब नेपाल से भारी मात्रा में पानी छोड़ा जाता है, तो पूरा इलाका जलमग्न हो जाता है। फसलें चौपट हो जाती हैं। इनकी मुश्किलें और तब बाद जाती हैं, जब शासन-प्रशासन से कोई मदद या रियायत नहीं मिलती। पुरैना के राजाराम कहते हैं, ‘बाढ़ आती है, धान और सब्जियों की फसलें चौपट हो जाती हैं। ये लगभग हर बरसात की बात है।’ सरकारें शायद इसे नियति मान चुकी हैं, तभी तो इस दिशा में कुछ ठोस नहीं किया जाता।

परंपरा की खातिर

एक तरफ थारू जनजाति के लोगों में समाज की मुख्यधारा में शामिल होने की ललक बढ़ी है, वहीँ दूसरी तरफ इस समाज में सैकड़ों साल से चली आ रही तमाम चीजें आज भी परंपरा के तौर पर जीवित हैं। थारू जनजाति की महिलाएं एक खास किस्म की घास से डलिया और चटाई जैसी कई चीजें तैयार करती हैं। डलिया का इस्तेमाल ये रोटियां या खाने-पीने की बाकी चीजें रखने में करते हैं। इनकी बनाई गई चीजें काफी खूबसूरत होती हैं, लेकिन यह इनके धंधे में शामिल नहीं हो पाया है। हाथ से बुनी गई ऐसी तमाम चीजों का इस्तेमाल ये अपनी दिनचर्या में करते हैं। इनके पास एक और अनोखी चीज होती है लौका। लौका का इस्तेमाल ये मछली पकड़ने में करते हैं। पकी हुई लौकी को अंदर से खोखला करके उसे सुखाया जाता है। थारू जनजाति की औरतें मछली पकड़ते वक्त लौका को अपनी कमर से बंधती हैं और मछली पकड़ कर उसमें रखती जाती हैं।

पुस्तकालय, जो बंद रहता है…

लखीमपुर खीरी की एक तत्कालीन जिलाधिकारी ने कोई दो-ढाई साल पहले थारू आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए थारू महोत्सव, आदिवासी गांवों को गोद लेने जैसी कुछ पहल की थी। उन्होंने पलिया कलां से अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर चंदन चौकी को जोड़ने वाले मुख्य मार्ग पर स्थित पुरैना गांव में पुस्तकालय की नीव रखी थी। इसके लिए छोटी ही सही, बिल्डिंग खड़ी हो गई, लेकिन बनने के डेढ़ साल बाद भी कुछ उत्साही स्थानीय आदिवासी युवा इसके खुलने का इंतजार कर रहे हैं। 12वीं पास पुष्पा कहती हैं, ‘आसपास ‘बड़ा’ स्कूल नहीं होने से हम आगे की पढाई तो नहीं कर सकते, लेकिन जब यहाँ लाइब्रेरी बनी तो लगा हमें यहाँ कुछ पढने को मिलेगा. लेकिन बनने के बाद से यह कभी खुली ही नहीं।’

 

थारू समाज का गौरवशाली अतीत

थारू जनजाति उत्तराखंड के खटीमा और सितारगंज, लखीमपुर समेत उत्तर प्रदेश के कुछ इलाके और नेपाल के दक्षिणी हिस्से के तराई क्षेत्र में रहती है। थारू जनजाति के इतिहास पर इतिहासकारों के बीच काफी मतभेद हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि थारू मुस्लिम आक्रमणकारियों से जान बचाकर भागीं राजपूत महिलाओं और उनके सेवकों के वंशज हैं, जो उस दौरान पहाड़ के दुर्गम इलाकों में बस गए थे। ऐसा उल्लेख मिलता है कि इनके समाज में महिलाएं खुद को श्रेष्ठ मानती हैं और कुछ इतिहासकार यहां तक कहते हैं कि महिलाएं अपने पति के साथ भोजन तक नहीं करती थीं। हालांकि अब काफी बदलाव आ चुका है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि ये राजस्थान के थार इलाके से आए हैं और महाराणा प्रताप के वंशज हैं। थारू अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में आते हैं। समाज में पिछड़े वर्ग में आने की वजह से 1961 में इन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया था।

थारू आदिवासियों के ज्यादातर परिवार खेती पर निर्भर हैं। 60-70 के दशक तक इनके पास काफी जमीनें थीं, लेकिन अब ज्यादातर दूसरे के खेतों में काम करते हैं। इस समाज के ज्यादातर परिवारों ने कभी अपनी जरूरत तो कभी भूमाफियाओं के जाल में फंसकर अपनी जमीनें बेच दीं। कुछ लोग अभी भी अपनी जमीनों पर खेती करते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग अब दूसरों के खेतों में मजदूरी करते हैं। यही इनकी आजीविका का मुख्य जरिया है। पारंपरिक रूप से ये धान और चावल की खेती किया करते थे, लेकिन खेती में लागत के हिसाब से फायदा नहीं हो पाता। लिहाजा, इन्होंने सब्जियों की खेती भी शुरू कर दी है। इसके अलावा ये पशुपालन, शिकार और मछली पकड़ने जैसे काम भी करते हैं।
थारू जनजाति के लोगों में अब अपनी ज़मीन को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, ऐसे में वे अब सरकार से मदद की आस लगाए बैठे हैं। जनजातियों की जमीन पर कब्जे को रोकने संबंधी कानून के मुताबिक उनकी जमीन गैर जनजाति के लोग नहीं खरीद सकते, लेकिन पिछले कुछ दशकों में बड़े पैमाने पर इनकी जमीनों पर गैर-आदिवासियों का कब्ज़ा है। अपनी ज़मीनों को गैर जनजातियों को बेच चुके थारू जनजाति के लोग अब चाहते हैं कि सरकार इस कानून का सख्ती से पालन कराए।



One comment on “थारू समाज- एक समृद्ध विरासत का शोकगीत : अवैद्यनाथ दुबे

  1. Avaidya Nath Dubey says:

    शुक्रिया अनुराग जी

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