ज्ञान प्राप्त करने की कुंजी है कोश : अरविंद कुमार

 
 
 

कोशकार अरविंद कुमार और उनकी पत्नी कुसुम कुमार

आधुनिक युग में हिंदी कोशकारिता के जनक अरविंद कुमार पिछले तीन दशक से शब्द संकलन कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़ी और महर्षि जैसे जीवन चुना। बीस साल की अटूट मेहनत के बाद उन्होंने हिंदी को अनमोल खजाना दिया- समांतर कोश। इसका प्रकाशन 1996 में नेशनल बुक ट्रस्ट ने किया। पेंगुइन से प्रकाशित द्विभाषी समांतर कोश से हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाएं समृद्ध हुई हैं। शब्द, शब्द की महत्ता, कोशकारिता के जन्म और उसके विकास पर उनसे बातचीत :

हमारे जीवन में शब्द का क्या महत्व है?
शब्द भाषा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण और अपरिहार्य कड़ी है। हमारे संदर्भ में शब्द का केवल एक अर्थ है- एकल, स्वतंत्र, सार्थक ध्वनि। वह ध्वनि जो एक से दूसरे तक मनोभाव पहुंचाती है। संसार की सभी संस्कृतियों में इस सार्थक ध्वनि को बड़ा महत्व दिया गया है। संस्कृत ने शब्द को ब्रह्म का दर्जा दिया है। शब्द जो ईश्वर के बराबर है, जो फैलता है, विश्व को व्याप लेता है। ग्रीक और लैटिन सभ्यताओं में शब्द की, लोगोस की, महिमा का गुणगान विस्तार से है। ईसाइयत में शब्द या लोगोस को कारयित्री प्रतिभा(क्रीएटिव जीनियस) माना गया है। कहा गया है कि यह ईसा मसीह में परिलक्षित ईश्वर की रचनात्मकता ही है।
भाषा सीखने की क्षमता या कुछ कहने की शक्ति आज के मानव, होमा सैपिएंस, के मन मस्तिष्क का, यहां तक कि अस्तित्व का, अंतरंग अंग है। इस शक्ति के उदय ने मानव को संगठन की सहज सुलभ क्षमता प्रदान की और आदमी को प्रकृति पर राज्य कर पाने में सक्षम बनाया। इसी के दम पर सारा ज्ञान और विज्ञान पनपा। शब्दों और वाक्यों से बनी भाषा के बिना समाज का व्यापार नहीं चल सकता। आदमी अनपढ़ हो, विद्वान हो, वक्ता हो, लेखक हो, बच्चा हो या बूढ़ा हो सभी को कुछ कहना है तो शब्द चाहिए, भाषा चाहिए। वह बड़बड़ाता भी है तो भी शब्दों में, भाषा में।
मेरा मानना है कि धरती से बाहर अगर कभी कोई बुद्धियुक्त जीव-जाति पाई गई तो उसमें संप्रेषण का रूप कोई भी हो, उसके मूल में किसी प्रकार की व्याकृत भाषा जरूर होगी, शब्द जरूर होगा।
शब्द के बिना भाषा की कल्पना करना निरर्थक है। शब्द हमारे मन के अमूत्र्त भाव, इच्छा, आदेश, कल्पना का वाचिक प्रतीक, ध्वन्यात्मक प्रतीक है। शब्द जब मौखिक था, तो मात्र हवा था। उसका अस्तित्व क्षणिक था। वह क्षणभंगुर था। लिखित होकर वह छवि बन गया, चित्र बन गया, मूत्र्ति बन गया। दूसरों से कुछ कहने का माध्यम, भाव के संपे्रषण का वाचिक साधन। शब्द का मूल अर्थ है ध्वनि। शब्द जब मौखिक था तो मात्र हवा था। उसका अस्तित्व क्षणिक था। वह क्षणभंगुर था। शब्द को लंबा जीवन देने के लिए कंठस्थ करके, याद करके, वेदों को अमर रखने की कोशिश की गई थी। वेदों को कंठस्थ करने वाले वेदी, द्विवेदी, त्रिवेदी और चतुर्वेदी ब्राह्मïणों की पूरी जातियां बन गईं जो अपना-अपना वेद पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखती थीं। इसी प्रकार कुरान को याद रखने वाले हाफिज कहलाते थे।
शब्द को याददाश्त की सीमाओं से बाहर निकाल कर सर्वव्यापक करने के लिए, लंबा जीवन देने के लिए, लिपियां बनीं। लिपियों में अंकित होकर शब्द साकार मूत्र्ति बन गया। वह ताड़पत्रों पर, पत्थरों पर, अंकित किया जाने लगा। कागज आया तो शब्द लिखना और भी आसान, सस्ता होकर टिकाऊ हो गया। लिपि ने शब्द को स्थायित्व दिया। शब्द काल और देश की सीमाओं से बाहर निकल कर व्यापक हो गया। अब वह एक से दूसरे देश और एक से दूसरी पीढ़ी तक आसानी से जा सकता था। मुद्रण कला के आविष्कार से मानव के ज्ञान में विस्तार के महाद्वार खुल गए और अब इंटरनेट सूचना का महापथ और ज्ञान विज्ञान का अप्रतिम भंडार बन गया है। बिजली की गति से हम अपनी बात सात समंदर पार तत्काल पहुंचाते हैं।
हमारा संबंध केवल वाचिक और लिखित शब्द मात्र से है, लिपि कोई भी हो, भाषा कोई भी हो, हिंदी हो, अंग्रेजी हो, या चीनी… एक लिपि में कई भाषाएं लिखी जा सकती हैं। जैसे देवनागरी में हिंदी और मराठी, और नेपाली… हिंदी के लिए मुंडी जैसी पुरानी कई लिपियां थीं… हिंदी के कई काव्य ग्रंथ उर्दू लिपि में लिखे गए। आज उर्दू कविताएं देवनागरी में छपती और खूब बिकती हैं। रोमन लिपि में यूरोप की अधिकांश भाषाएं लिखी जाती हैं। रोमन में हिंदी भी लिखी जाती है। ब्रिटिश काल में सैनिकों को रोमन हिंदी सिखाई जाती थी। आज इंटरनेट पर कई लोग हिंदी पत्र-व्यवहार रोमन लिपि में ही करते हैं। रोमन में आजकल संसार की कई अन्य भाषाएं लिखने के कई विकल्प मिलते हैं।
चीनी, जापानी या प्राचीन मिस्री भाषाएं चित्रों में लिखी जाती हैं। चित्रों में लिखी लिपि का आधुनिकतम रूप शार्टहैंड कहा जा सकता है। चित्र लिपियों में अक्षरों का होना आवश्यक नहीं है। लेकिन जो बात सब भाषाओं और लिपियों में कॉमन है, एक-सी है, समान है, वह है शब्द। हर भाषा शब्दों में बात करती है। शब्द लिखती-सुनती और पढ़ती है।
भाषा का जन्म और विकास कैसे होता है?
हर भाषा का अपना एक कोड होता है। इसीलिए संस्कृत में भाषा को ‘व्याकृता वाणीÓ कहा गया है, नियमों से बनी और नियमों से बंधी सुव्यवस्थित क्रमबद्ध बोली। शुरू में यह कोड लिखा नहीं गया था। सब मन ही मन यह कोड जानते थे। पढ़ें या नहीं फिर भी हम सब यह कोड जानते हैं। यह कोड किसी भी समाज के सदस्यों के बीच एक तरह का अलिखित अनुबंध है। लिखना-पढऩा सीखने से पहले बच्चा यह कोड समझ चुका होता है।
पहले आम आदमी भाषा बनाता है, बाद में विद्वान मगज खपाकर उसके कोड बनाते हैं। फिर आम आदमी उन कोडों को तोड़ता हुआ नए शब्द बनाता रहता है, शब्दों का रूप और अर्थ बदलता रहता है। कोडों की सीमाएं लांघती, बाढ़ में आई नदी की तरह किनारे तोड़ती भाषाएं नई धाराएं बना लेती हैं। पहले विद्वान माथा पीटते हैं, इस प्रवृति को उच्छृंखलता कहते हैं, भाषा का पतन कहते हैं, फिर बाद में नए कोड बनाने में जुट जाते हैं।
भाषाओं को विकारों से बचाने के लिए विद्वान व्याकरण बनाते हैं, शब्दकोश बनाते हैं। जानसन और वैब्स्टर जैसे कोशकारों ने लिखा है कि उनका उद्देश्य था इंग्लिश और अमरीकन इंग्लिश को स्थाई रूप देना, उसे बिगडऩे से बचाना। उनके कोश आधुनिक संसार के मानक कोश बने। लेकिन हुआ क्या? उनके देखते-देखते भाषा बदल गई, नए शब्द आ गए। फिर कोशों के नए संस्करण बनने लगे। आजकल अंग्रेजी के कोशों में हर साल हजारों नए शब्द डाले जाते हैं। यही जीवित भाषाओं का गुण है। हिंदी भी नए शब्द बनाने और जरूरी शब्द बाहर से लेने में किसी से पीछे नहीं रही है। अंतर केवल इतना है कि हमारे यहां अभी तक कोशों में नए शब्द हर साल डालने की प्रथा नहीं चली है।
कोशकारिता का जन्म कब और कहां हुआ?
पश्चिमी देश हमेशा दावा करते हैं कि कोशकारिता का आरंभ वहां हुआ था। वहां कोशों के किसी इतिहास में भारत का जिक्र नहीं होता। रोजट भी इस भ्रम में थे कि उनका थिसारस संसार का पहला थिसारस है। पुस्तक छपते-छपते उन्होंने सुना कि संस्कृत में किसी अमर सिंह ने यह काम छठी-सातवीं सदी में ही कर लिया था। कहीं से ‘अमर कोश’ का कोई अंग्रेजी अनुवाद उन्होंने मंगाया, इधर-उधर पन्ने पलटकर देखा और भूमिका में फुटनोट में टिप्पणी कर दी कि ‘मैंने अभी-अभी ‘अमर कोश’ देखा, बड़ी आरंभिक किस्म की बेतरतीब बेसिरपैर की लचर सी कृति है।’
काश, वह यह बात समझ पाए होते कि हर कोश की तरह ‘अमर कोश’ भी अपने समसामयिक समाज के लिए बनाया गया था। असल में सभ्यता और संस्कृति के उदय से ही आदमी जान गया था कि भाव के सही संपे्रषण के लिए सही अभिव्यक्ति आवश्यक है। सही अभिव्यक्ति के लिए सही शब्द का चयन आवश्यक है। सही शब्द के चयन के लिए शब्दों के संकलन आवश्यक हैं। शब्दों और भाषा के मानकीकरण की आवश्यकता समझकर आरंभिक लिपियों के उदय से बहुत पहले ही आदमी ने शब्दों का लेखा-जोखा रखना शुरू कर दिया था। इसके लिए उसने कोश बनाना शुरू किया। कोश बनाने की हमारी यह शानदार परंपरा वेदी जितनी, कम-से-कम पांच हजार साल पुरानी है। प्रजापति कश्यप का ‘निघंटु’ संसार का प्राचीनतम शब्द संकलन है। इसमें 1800 वैदिक शब्दों को इकट्ठा किया गया है। ‘निघंटु’ पर महर्षि यास्क की व्याख्या ‘निरुक्त’ संसार का पहला शब्दार्थ कोश और विश्वकोश यानी एनसाइक्लोपीडिया है। इस महान शृंखला की सशक्त कड़ी है छठी या सातवीं सदी में लिखा अमर सिंह कृत ‘नामलिंगानुशासन’ या ‘त्रिकांड’ जिसे सारा संसार ‘अमर कोश’ के नाम से जानता है।
भारत के बाहर संसार में शब्द संकलन का एक प्राचीन प्रयास अक्कादियाई संस्कृति की शब्द सूची है। यह शायद ईसा पूर्व सातवीं सदी की रचना है। ईसा से तीसरी सदी पहले की चीनी भाषा का कोश है ‘ईर्या’।
आधुनिक कोशों की नींव डाली इंग्लैंड में 1755 में सैमुएल जानसन ने। उनकी डिक्शनरी ऑफ इंग्लिश लैंग्वेज (Samuel Johnson’s Dictionary of the English Language) ने कोशकारिता को नए आयाम दिए। इसमें परिभाषाएं भी दी गई थीं।
असली आधुनिक कोश आया इक्यावन साल बाद 1806 में। अमरीका में नोहा वैब्स्टर की ‘ए कंपैंडियस डिक्शनरी ऑफ इंग्लिश लैंग्वेज’ (Noah Webster’s A Compendious Dictionary of the English Language)प्रकाशित हुई। इसने जो स्तर स्थापित किया वह पहले कभी नहीं हुआ था। साहित्यिक शब्दावली के साथ-साथ कला और विज्ञान क्षेत्रों को स्थान दिया गया था। कोश सफल हुआ। वैब्स्टर के बाद अंग्रेजी कोशों के रिवीजन और नए कोशों के प्रकाशन का व्यवसाय तेजी से बढऩे लगा। आज छोटे-बड़े हर शहर में, विदेशों में तो हर गांव में, किताबों की दुकानें हैं। हर दुकान पर कई कोश मिलते हैं। हर साल कोशों में नए शब्द शामिल किए जाते हैं।
अपने कोशों के लिए वैब्स्टर ने 20 भाषाएं सीखीं ताकि वह अंग्रेजी शब्दों के उद्गम तक जा सके। उन भाषों में संस्कृत भी थी। तभी उस कोश में अनेक अंगे्रजी शब्दों का संस्कृत उद्गम तक वर्णित है। मैं पिछले तीस सालों से वैब्स्टर कोश का ‘न्यू कालिजिएट’ संस्करण काम में ला रहा हूं। मुझे इसमें मेरे काम की हर जरूरी सामग्री मिल जाती है। यहां तक कि यूरोपीय मूल वाले अंग्रेजी शब्दों के संस्कृत स्रोत भी। ‘समांतर कोश’ के द्विभाषी संस्करण ‘द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/ हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी’ पर काम करते-करते कई बार तो अनपेक्षित जगहों पर भी शब्दों के संस्कृत मूल मिल गए। पता चला कि ईक्विवैलेंट, बाईवैलेंट जैसे शब्दों के मूल में है संस्कृत का वलयन। एअर यानी हवा का मूल संस्कृत ईर में है, ‘सोनिक’ के मूल में हैं संस्कृत के ‘स्वन’ और ‘स्वानिक’। कई बार मैं सोचता था- काश, डाक्टर रघुवीर की टीम ने और बाद में  तकनीकी शब्दावली बनाने वाले सरकारी संस्थानों ने ये संस्कृत मूल जानने की कोशिश की होती। उनके बनाए शब्दों को एक भारतीय आधार मिल जाता और लोकप्रियता सहज हो जाती। खैर, उन लोगों ने जो किया वह भी भागीरथ प्रयास था।
कोश कितने तरह के होते हैं?
कोश कई तरह के होते हैं। किसी भाषा के एकल कोश, जैसे अंग्रेजी कोश या हिंदी से हिंदी के कोश। एक भाषा के शब्दों के अर्थ उसी भाषा में समझाए जाते हैं। कोश द्विभाषी भी होते हैं। जैसे- संस्कृत से अंग्रेजी के कोश। सन् 1872 में छपी सर मोनिअर-विलियम्स की (बारीक टाइप में 8.5”x11.75”आकार के तीन कालम वाले एक हजार तीन सौ तैंतीस पृष्ठों की अद्वितीय) ‘संस्कृत-इंग्लिश डिक्शनरी’ इसका अनुपम उदाहरण है। या आजकल बाजार में मिलने वाले ढेर सारे अंग्रेजी-हिंदी कोश और हिंदी-अंग्रेजी कोश। एक भाषा जानने वाले को दूसरी भाषा के शब्दों का ज्ञान देना इनका उद्देश्य होता है। जिसको जिस भाषा में पारंगत होना होता है या उसके शब्दों को समझने की जरूरत होती है, वह उसी भाषा के कोशों का उपयोग करता है।)
कोश का क्या महत्व है?
किसी भी तरह का ज्ञान प्राप्त करने की कुंजी कोश है। मोनिअर-विलियम्स के जमाने में अंगे्रज भारत पर राज करने के लिए हमारी संस्कृति और भाषाओं को पूरी तरह समझना चाहते थे, इसलिए उन्होंने ऐसे कई कोश बनवाए। आज हम अंगे्रजी सीख कर सारे संसार का ज्ञान पाना चाहते हैं तो हम अंग्रेजी से हिंदी के कोश बना रहे हैं। हमारे समांतर कोश और उसके बाद के हमारे ही अन्य कोश भी हमारे देश की इसी इच्छा आकांक्षा के प्रतीक हैं, प्रयास हैं।
आपको शब्दकोश बनाने का विचार कब ओर कैसे आया?
मैं मेरठ शहर के म्युनिसिपल स्कूल में पढ़ा। सन् 45 में दिल्ली से मैट्रिक किया। मैट्रिक का इम्तहान देते ही मुझे कनाट सरकस में दिल्ली पै्रस में छापेखाने का काम सीखने बालश्रमिक के रूप में जाना पड़ा। उस समय मेरी उम्र पंद्रह साल थी। बोर्ड के दसवीं के परिणाम आने पर चार विषयों में हिंदी, संस्कृत, गणित और अंग्रेजी में डिस्टिंक्शन आई थी। मैं आगे पढऩा चाहता था, लेकिन आर्थिक कारणों से संभव नहीं हो सका। मुझे नौकरी करने के लिए विवश होना पड़ा।
मेरे भावी समांतर कोश और हाल ही में प्रकाशित द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी की दिमागी नींव वहीं पड़ी। मैंने वहां देखा और सीखा (उस जमाने की तकनीक में) एक-एक अक्षर या उसका टाइप कैसे खानों में रखा होता है, जुड़-जुड़कर छपता है, छप जाने के बाद फिर उन्हीं खानों में वापस रख दिया जाता है। मैंने सीखा कैसे हम अपनी आवश्यकता के अनुसार ये टाइप रखने के खाने और खानोंदार केस कम ज्यादा कर सकते हैं। टाइपों का वर्गीकरण कर सकते हैं, रैकों में रख सकते हैं, मुद्रण में काम आने वाली अन्य सामग्री रखने के लिए डिब्बे बना सकते हैं। फिर जब कंपोजिंग करने लगा, तो मैंने सीखा कैसे एक-एक अक्षर जोड़ा जाता है, कैसे एक के बाद एक शब्द रखकर पंक्तियां बनती हैं। कैसे ये पंक्तियां पैरा बनती हैं, गेली बनती हैं, पेज बनते हैं और बनते हैं पूरा लेख, किताब, पत्रिका, अखबार।
छापेखाने में कई काम किए। कई काम सीखे। कंपोजिंग, मशीन मैनी, बुक बाइंडिंग, खजांचीगीरी, अंग्रेजी हिंदी टाइपिंग आदि। इसके साथ-साथ शाम के समय मैट्रिक से आगे की पढ़ाई। ऐफए, बीए, और अंग्रेजी साहित्य में एम.ए.।
इस बीच मैं छापेखाने में प्रूफ रीडर बना। मेरे लिए नए दरवाजे खुलने लगे। धीरे-धीरे ‘सरिता’, ‘कैरेवान’ पत्रिकाओं के संस्थापक संपादक विश्वनाथजी मुझे बढ़ावा देने लगे। पहले ‘सरिता’ में उप-संपादक बनाया। अब लेखकों की रचनाएं पढऩे लगा, उन पर कमैंट देने लगा। रचना अच्छी हो या बुरी, पढऩी पड़ती। अच्छे-बुरे का विवेक जागने लगा। स्वीकृत रचनाओं का संपादन करने लगा। अंगे्रजी से हिंदी में अनुवाद।
जब विश्वनाथजी आश्वस्त हो गए कि मैं अच्छी-खासी हिंदी लिख लेता हूं और अंग्रेजी की समझ मुझमें पनपने लगी है, जब उन्होंने देखा कि मैंने शाम को बी.ए. में दाखिला ले लिया है और मेरी रुचि अंग्रेजी के साथ-साथ विश्व साहित्य और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान में हो गई है, तो उन्होंने मुझे हिंदी से अंग्रेजी में धकेल दिया। पहले मैं ‘सरिता’ में था, अब मैं अंग्रेजी की ‘कैरेवान’ पत्रिका में उप-संपादक बन गया।
मेरे बहुत से कामों मे एक था हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद। हिंदी से अंग्रेजी कोश बहुत अच्छे नहीं थे। अब भी कुल एक-दो कोश हैं जो कामचलाऊ कहे जा सकते हैं। उनमें मुझे संतोषप्रद अंग्रेजी के शब्द न मिलते थे। मात्र इतना संतोष था कि मुझे यह पता चलने लगा था कि कौन-सा शब्द मेरे संदर्भ में उपयुक्त नहीं है।
इन्हीं दिनों मुझे एक अनोखी पुस्तक के बारे में पता चला। पुस्तक का पूरा नाम था ‘रोजट्स थिसारस ऑफ इंग्लिश वड्र्स एण्ड फे्रजेज’। संक्षेप में उसे ‘रोजट्स थिसारस’ ही कहते हैं। मैंने यह छोटी-सी किताब तुरंत खरीद ली। फ्रांसीसी मूल के कला-नाटक समीक्षक, इंजीनियर, वैज्ञानिक पीटर मार्क रोजट ने इस किताब के शब्दों का संकलन एक बिल्कुल नए क्रम से किया था। रोजट की हालत भी मेरे जैसे ही हुआ करती थी। उसे शब्द चाहिए होते थे, मिलते नहीं थे। उसने अपने निजी काम के लिए जो सूची बनाई, वही बाद में महान पुस्तक बन गई। 1852 में छपते ही यह पुस्तक लोकप्रिय हो गई थी। इसके छपने के 101 साल बाद दिल्ली में मैंने इसका जो संस्करण खरीदा वह लगभग इसी आउटडेट संस्करण का पुनर्मुद्रण था।
यह था मेरे जीवन का सबसे बढिय़ा खजाना जो मुझे मिला। मानो किसी ने मुझे अली बाबा की शब्दों के रत्न भंडार में घुसने का ‘सिम-सिम खुल जा’ मंत्र बता दिया हो। दिन में ‘कैरेवान’ के संपादन विभाग में काम करता था, रात में बी.ए. में पढ़ रहा था। सारी पढ़ाई अंगे्रजी में होती थी। हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद करना होता था। दूसरों के अंग्रेजी में लिखे को जहां तक हो सके सुधारना होता था। नए-नए शब्दों की जरूरत होती। लेखक के किसी एक शब्द के लिए मैं दूसरा कौन-सा शब्द डालूं, इसमें कोशों से सहायता मिलती ही नहीं थी। अब रोजट में मुझे अधिकाधिक शब्द मिलने लगे।
पहले तो मैं रोजट की किताब केवल शब्द खोजने के लिए खोलता था। कोई भी पन्ना खोलता और ठगा-सा रह जाता। फिर तो जब चाहे किताब खोलना, पढऩा, पढ़ते रहना मेरे लिए लाभप्रद मनोरंजन बन गया।
परिस्थितियों ने कुछ ऐसा मोड़ लिया कि 1963 में टाइम्स ऑफ इंडिया की नई फिल्मी पत्रिका ‘माधुरी’ का संपादक हो गया। यहां काम करते-करते दस साल हो गए थे। मेरे मन में आया कि हिंदी में किसी ने थिसारस नहीं बनाया है तो इसका मतलब मुझे बनाना है। इच्छा मेरी है तो मैं ही पूरी करूंगा। मैं सुबह घूमने के लिए हैंगिंग गार्डन जाता था। 26 सितंबर, 1973 को मैंने अपनी पत्नी कुसुम कुमार से इस योजना का जिक्र किया। वह तुरंत तैयार हो गई।
19 अपै्रल, 1976 की सुहावनी सुबह गोदावरी नदी में स्नान करने के बाद पहला कार्ड बनाया और काम बाकायदा शुरू हो गया। इस काम को पूरा करने में 20 साल लगे। ‘समांतर कोश’ का प्रकाशन नेशनल बुक ट्रस्ट ने किया। तत्कालीन राष्टपति डा. शंकरदयाल शर्मा ने 13 दिसंबर, 1996 को इसका विमोचन किया।
शब्दकोश और थिसारस में क्या अंतर है?
अच्छा कोश हमें शब्द का मर्म समझाता है। एक से अधिक अर्थ देता है, और कभी एक से ज्यादा समानार्थी शब्द भी। लेकिन ये एकाधिक शब्द कोई बहुत ज्यादा नहीं होते। बड़े कोश भाषा समझने के लिए शब्दों की व्युत्पत्ति भी बताते हैं। कुछ कोश प्रिस्क्रिपटिव या निदानात्मक निदेशात्मक कहलाते हैं। वे यह भी बताते हैं कि अमुक शब्द आंचलिक है, सभ्य है या अशिष्ट। वे शब्द के उपयोग की विधि भी बताते हैं। ऐसे अधिकारिक कोश मैंने हिंदी में नहीं देखे हैं।
कोशकारिता पूरी तरह सामाजिक प्रक्रिया है। हर कोश अपने समसामयिक संदर्भ में रचा जाता है। कोशकार को ध्यान रखना पड़ता है कि उसका उपयोग करने वाले लोगों की जरूरतें क्या हैं, वह कोश को किस संदर्भ में देखेगा, उससे लाभ उठाएगा। जो कोश बच्चों के लिए लिखा गया है वह एम.ए. के छात्र के लिए नाकाफी है। वनस्पति शास्त्र या भौतिकी के विद्यार्थी को जो कोश चाहिए उसमें किसी भी फल, पेड़, वस्तु के बारे में वैज्ञानिक जानकारी होनी चाहिए। बच्चों के कोश में किसी शब्द के मोटे-मोटे अर्थ लिखे जा सकते हैं। उच्च स्तर के कोश में परिभाषाएं भी होनी चाहिए। अभी तक हिंदी के किसी कोश में परिभाषाओं का स्तर संतोषजनक नहीं है। न हिंदी के किसी एकल कोश में, न किसी अंग्रेजी-हिंदी कोश में।
मैंने अपने संपादन काल में अनुभव किया कि शब्दकोश से हमें लेखन में, संपादन में बहुत सहायता नहीं मिलती। अनुवाद में भी जो सहायता मिलती है वह आधी-अधूरी होती है। संक्षेप में कह सकते हैं कि शब्दार्थ कोश लेखक के लिए नहीं होता। वह उसके काम आता है जो किसी अज्ञात शब्द का अर्थ जानना चाहता है या वह विद्यार्थियों के काम की चीज है।
कोश और थिसारस के क्षेत्र अलग-अलग हैं। शब्दकोश और थिसारस में बहुत अंतर होता है।
एक सूत्र वाक्य में कहें तो शब्दकोश शब्द को अर्थ देता है, थिसारस अर्थ को, विचार को, शब्द देता है।
मुझे रात के लिए अंग्रेजी शब्द चाहिए तो मैं हिंदी-अंग्रेजी कोश खोलूंगा। यदि नाइट की हिंदी चाहिए तो इंग्लिश-हिंदी डिक्शनरी काम में लाऊंगा। लेकिन मुझे रात का पर्यायवाची चाहिए, या दिन का या राम का या रावण का… या मुझे समय बताने वाले किसी उपकरण का नाम चाहिए, तो इस दिशा में कोई कोश हमारी कैसी भी मदद नहीं करता। यहां काम आता है थिसारस।
थिसारसकार यह मानकर चलता है कि उसे काम में लाने वाले किसी लेखक, अनुवादक, विज्ञापन लेखक, या आपको और मुझे भाषा आती है। लेकिन हमें किसी खास शब्द की तलाश है। वही रात वाला उदाहरण आगे बढ़ाता हूं। मुझे रात नहीं तो रात का कोई और शब्द आता होगा, जैसे रजनी। नहीं तो मुझे शाम याद होगी, सुबह याद होगी। या दिन याद होगा। अब मुझे क्या करना है? बस थिसारस के अनुक्रम खंड में इनमें से कोई एक शब्द खोजकर उसका पता नोट करना है। हमारे थिसारसों में क्योंकि थिसारस खंड और अनुक्रम अलग-अलग जिल्दों में हैं, तो बस वह पेज खोलकर अपने सामने रखना है जहां वह शब्द है और उसका पता लिखा है। उस पते पर थिसारस में ढेर सारे शब्द मिल ही जाएंगे। ‘रजनीÓ से तो हम सीधे रात तक पहुंचेंगे जहां रात के सारे शब्द लिखे हैं। ये सभी उदाहरण मैंने अपने ‘समांतर कोश’ से लिए हैं।
थिसारस में शब्द संकलन का आधार क्या होता है?
थिसारसों में भी सामाजिक संदर्भ होता है। थिसारस बनाने वाले का काम है कि इन संदर्भों की तलाश करे और अपनी किताब में इनका संकलन करे। उसे अपने समाज की मानसिकता के आधार पर काम करना होता है। एक चीज के लिए बहुत सारे लिंक बनाने होते हैं, ताकि किताब का उपयोग करने वाला किसी भी जगह से, कोण से, मनवांछित शब्द तक पहुंच सके। कई बार ये लिंक फालतू से, जाने-पहचाने से, अनावश्यक लग सकते हैं। पर यही थिसारस की जान होते हैं।
‘अमर कोश’ पर अपनी टिप्पणी देते समय रोजट इसी तथ्य को नजरअंदाज कर गए थे। मुझे शक है कि जीवन भर वह थिसारस के इस मर्म को समझ पाए या नहीं। ‘अमर कोश’ का गठन प्राचीन भारत में वर्णों पर आधारित समाज में हुआ था। उससे सामाजिक सरोकार के एक-दो उदाहरण देता हूं। ‘अमर कोश’ में संगीत नैसर्गिक गतिविधि है, वह हमें ‘स्वर्ग वर्ग’ में मिलता है। लेकिन ‘संगीतकार’ की गिनती ‘शूद्र वर्ग’ में की गई है। ‘गाय’ की गिनती जानवरों में नहीं है ‘वैश्व वर्ग’ में है क्योंकि तब वैश्यों का कर्म था। इसी प्रकार ‘हाथी’ राजाओं की सवारी होने के कारण ‘क्षत्रिय वर्ग’ में है। यह उचित ही था। उस जमाने के भारतीय हर चीज को वर्णों के आधार पर याद रखते थे।
19वीं सदी के ब्रिटेन में शब्दों के वर्गीकरण वैज्ञानिक आधार पर करने का फैशन था। लिहाजा रोजट के थिसारस में परस्पर संदर्भ मनोस्वाभाविक न होकर वैज्ञानिक हैं। कई बार उसमें आदमी के मनो संबंध नहीं बनते। एक दो उदाहरण काफी हैं। गेहूं और केले की गणना घासों में की गई है। परिणाम यह है कि गेहूं और केला आपस में संबद्ध हैं, जबकि आम आदमी गेहूं को अनाज और केले को फल से जोड़कर देखता है। लोहे की गिनती धातुओं में है और इस्पात की मिश्र धातुओं में। दोनों एक दूसरे से बहुत दूर रखे गए हैं, और हमें एक-से-दूसरे तक नहीं ले जाते।
हमने समांतर कोश को मानव मन में रहने वाले सहज परस्पर संबंधों के आधार पर बनाया। जैसे रात को ही लें- रात, अंजन, अंधकार, अंधेरा, निशा आदि।
अमावस : अंधेरी रात,
पूर्णिमा : चौदहवीं रात,
कालरात्रि : काली रात, भयानक रात।
इस तरह बहुत से परस्पर संबंध में लिए गए हैं। एक रात शब्द हमें अमावस, पूर्णिमा, कालरात्रि आदि भाव और सूचना देता है।
हाल ही में प्रकाशित ‘ द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/ हिंदी-इंग्लिश थिसारस एण्ड डिक्शनरी’ के बारे में बताइए? इस द्विभाषी कोष की क्या उपयोगिता है?
हिंदी को भारत के बाहर मॉरीशस, फिजी, गुयाना, सूरीनामा, त्रिनिदाद, अरब मुल्कों, इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा आदि अनेक देशों में लोग दैनिक प्रयोग में लाते हैं। दूसरी ओर, अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या अंग्रेजी भाषी देशों की अपेक्षा भारत में अधिक है। इसलिए ऐसे थिसारस की जरूरत महसूस हुई, जो दोनों भाषाओं के लिए उपयोगी हो और दोनों भाषाओं को निकट लाए। बहुत सारे शब्द अंग्रेजी में होते हैं, हिंदी में नहीं। दूसरी ओर बहुत से शब्द हिंदी में हैं, अंग्रेजी में नहीं। जैसे- ब्रह्मचर्य, आश्रम, निष्काम, कर्म, हिंदी में हैं, अंग्रेजी में नहीं। अब यूटोपिया शब्द को लें। यूटोपिया को हिंदी में स्वर्णकाल या स्वर्णयुग कह सकते हैं। वास्तव में यूटोपिया उस कल्पना का नाम है कि कभी ऐसा समय आएगा, जब हजार साल तक सब कुछ बढिय़ा रहेगा। इस तरह मुहावरे, देवी-देवताओं के नाम आदि बहुत-सी चीजें हैं, जो केवल हिंदी में या अंग्रेजी में है अथवा दोनों में अलग-अलग है। इन सभी बातों को ध्यान में रखकर यह बाइलिंग्वल थिसारस बनाया गया है। इसके तीन खंड हैं।
पहला खंड इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस है। इसमें  शब्दों का संकलन विषय या संदर्भ क्रम में किया गया है। पाठक स्वाभाविक ढंग से एक विषय से दूसरे पर जा सकता है, मानो उसके सामने इनसाइक्लोपीडिया खोल दिया गया हो, जो एक के बाद दूसरी संबद्ध जानकारी सामने रखता रहता है। इसमें 988 शीर्षकों के अंतर्गत 25565 उपशीर्षक हैं, यानी किसी एक कोटि के अधीन अनेक उपकोटियां। इन सबमें कुल मिलाकर 548330 स्वतंत्र अभिव्यक्तियां हैं। इनमें से 257853 अंग्रेजी की हैं और 290477 हिंदी की। और संबद्ध तथा विपरित कोटियों के क्रास रैफरेंसों की भरमार है। परिणाम यह होता है कि हम चाहें तो अंगे्रजी के माध्यम से या हिंदी के द्वारा किसी भाव से संबद्ध विशाल पर्याय शब्द को पाते ही हैं। उनकी कोटियां भी, जैसी सृष्टि से संबद्ध ब्रह्मांड, तारे, आकाश आदि। इसके साथ ही विपरीत शब्द भी पाते हैं, जैसे- दिन के साथ रात, सुबह के साथ शाम, सौंदर्य के साथ कुरुपता। एक-एक चीज को समझाने के लिए तरह-तरह से दर्शाया गया है। जैसे- सौंदर्य को ही लें। सौंदर्य का भाव समझाने के लिए पहले तो अंग्रेजी और हिंदी के ढेर सारे शब्द हैं। अगर एक से बात समझ में न आए तो किसी दूसरे से आएगी। फिर तरह-तरह की उपमाएं उदाहरण देने के लिए सुंदर पुरुषों और स्त्रियों की सूचियां। मेनका, अप्सरा, परी से सुंदरता का भाव साफ होगा, बाद में सुंदर के लिए 175 शब्द और उनके क्रास रैफरेंस तो हिंदी के 302 शब्द और उनके क्रास रैफरेंस। दोनों भाषाओं में इतने सारे शब्दों की छटा इससे पहले कहीं और एक साथ नहीं मिलती।
दूसरा खंड इंग्लिश-हिंदी कोश ऐंड इंडैक्स है।  हर इंग्लिश शब्द के साथ हिंदी अर्थ और अन्य संबद्ध शब्द पहले खंड में मिलने का पता।
तीसरा खंड हिंदी-इंग्लिश कोश एंड इंडैक्स है। हर हिंदी शब्द के साथ हिंदी अर्थ, और अन्य संबद्ध शब्द पहले खंड में मिलने का पता इसमें दिया गया है।
अगर दूसरी भाषा का कुल एक शब्द चाहिए तो खोज यहीं पूरी हो जाती है। वांछित विषय से संबद्ध कोटियां भी यहीं मिल जाती हैं। यदि ढेर सारे शब्द और शब्द कोटियां चाहिए तो इन खंडों में प्रदत्त पते पर जाने से मिल जाएंगी।
ए-4 साइज के हर पेज पर चार कॉलमों में छोटे टाइप में तीन खंडों में कुल शब्दों की संख्या तीस लाख से भी अधिक है। इतना समृद्ध कोई भी थिसारस या शब्दकोश नहीं है। शब्दों के जगमग मणि का यह भंडार हिंदी और अंग्रेजी के लिए बहुउपयोगी है।
कोशकारिता में क्या संभावनाएं हैं?
मुझे इस कोश से कई भावी संभावनाएं नजर आ रही हैं। कुछ देर के लिए हम इसे रॉ-मैटेरियल मान लें और सोचें कि अब हमारे पास एक कामचलाऊ ढांचा है। इसके अंगे्रजी  डाटा के सहारे हम हिंदी को एक तरफ सभी विदेशी भाषाओं, जैसे फ्रांसीसी, जरमन, रूसी आदि से जोड़ सकते हैं।
जब यूनिकोड ने कम्प्यूटर पर जापान, चीन से लेकर सुदूर पश्चिम की हवाई लिपियों से जोड़ दिया है तो भाषाएं क्यों नहीं जोड़ी जा सकतीं? लेकिन यह काम दस-बीस साल में होने वाला नहीं है। हमारे सामने डच भाषा के कोश हेतु वूर्डनबीक डेर नीडरलांड्ष ताल (het woorden book der Nederlandsche Taal (WNT ) का उदाहरण है। इस पर काम 1864 में शुरू हुआ था और 134 साल बाद पूरा हुआ 1998 में। अगर हमें बहुभाषी कोश बनाने में सौ साल भी लग जाएं तो इसकी उपयोगिता को देखते हुए यह अधिक समय नहीं है।
इस काम में अपको परिवार का क्या सहयोग रहा?
कोश कर्म में शुरू से ही परिवार का पूरा समर्थन और सहयोग मिला। पहले ही दिन पत्नी कुसुम कुमार सहकर्मी बन गई। बाद में बेटे डा. सुमीत ने कोश के डाटा के कम्प्यूटरीकरण का जिम्मा ले लिया। बेटी मीता ने समांतर कोश के हिंदी मुख शब्दों के अंग्रेजी समकक्ष लिखकर द्विभाषी थिसारस की नींव डाली।



3 comments on “ज्ञान प्राप्त करने की कुंजी है कोश : अरविंद कुमार

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    RATILAL CHANDARIA
    Malabar hill, Mumbai

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    Like both of us, Maharaja Bhagavatsinghji also spent more than 25 years on Bhagvadgomandal.
    I do not know how many years were spent in preparing SARTH by Gujarat Vidyapith & BRUHAD by K. K. Shastri. Both of them along with many other dictionaries have been digitalised by us for free.
    All such works are legend.
    We desire to include your work in our Gujaratilexicon. Please let me know if this is possible and you terms for same.
    With kind regards,
    Jayesh Patel
    Currently at
    12, Sudhakar Apartment,
    26 Narayan Dabholkar Lane,
    Malabar hill, Mumbai-400 006.
    Jayesh: 9987020492

  3. अरविन्द कुमार जी को आधुनिक हिन्दी कोशकारिता का पिता कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति न होगी।
    (पुखराज जाँगिड़)

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