जाने कहां गया : मीना पाण्‍डे

युवा लेखि‍का और सृजन से की संपादक मीना पाण्डे की गजल-
दूर तक ये शुष्क मरूस्थल दहक रहा,
कलरव वो कोकिलों का जाने कहां चला गया!
मजहब से तौलते हैं इंसानियत सभी,
हम एक हैं विश्वास जाने कहां गया!
मुर्दा है खौफ़ से मासूम निगाहें,
हंसता हुआ जहां वो जाने कहां गया!
खुलेआम कत्ल हो रही इंसानियत यहां,
सारे जहां से अच्छा दंगों में खो गया!
हम हिन्दु-मुसलमान में बंटते चले गये,
अनेकता में एकता नारा ही रह गया!
संभले ना ’गर’ हम अभी तो कल ये कहेंगे,
भारत मेरा महान वो जाने कहां गया!


3 comments on “जाने कहां गया : मीना पाण्‍डे

  1. Raju Yadav says:

    बहुत सुन्दर

  2. sanjay kumar says:

    yeh gajal vastav me hame batati hai ki ham apne desh ki dharohar jo hamare purvjo ne apne prano ki aahuti dekar prapt ki thi samapt karte ja rahe hai

    sanjay

  3. kewal tiwari says:

    bahut sunder panktiyan

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