जहाँ मिलता है सुनहरे सपनों को अथाह ज्ञान :डॉ. दीनानाथ मौर्य

शैक्षिक सरोकारों को समर्पित शिक्षकों तथा नागरिकों के साझा मंच द्वारा प्रकाशित ‘शैक्षिक दखल’ पत्रिका का दसवां अंक (जुलाई 2017) स्कूलों की अवधारणा को सीखने की प्रक्रिया से जोड़ते हुए ‘परम्परागत स्कूलों’ से हटकर कुछ कुछ ऐसे स्कूलों की प्रक्रियाओं को सामने लाता है, जो न सिर्फ नवाचारी स्कूल हैं, बल्कि जहाँ पर यह विश्वास भी व्यवहार में लाया जाता है कि ‘‘स्वतंत्रता, विश्वास और संवाद, सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के मूल तत्व हैं। इन तीनों तत्वों के सही तालमेल के बिना सीखना-सिखाना संभव नहीं लगता है। यह बात शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों पर बराबर रूप से लागू होती है। शिक्षक सिखाने की प्रक्रिया में स्वतंत्र, संवाद और विश्वास चाहता है, तो बच्चे सीखने की प्रक्रिया में…।”

सामाजिक विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया को देखें तो यह साफ़ होता है कि सीखने की सामाजिकता और सामाजिकता को सीखने की प्रक्रिया दरअसल सामाजिक विकास की द्वंदात्मक स्थितियों के आपसी सम्वाद से ही आगे बढ़ी है। इसके लिए ही स्कूल जैसी अवधारणा भी विकसित हुई। किसी भी समाज में स्कूलों की जरूरत क्यों होती है ? स्कूल आखिरकार करते क्या हैं? समाज के बीच स्कूल जैसी अवधारणा क्यों आती है ? इन्हीं सवालों का दूसरा किनारा वह है, जहाँ से यह बात की जाती है कि स्कूल समाज के निर्माण में क्या योगदान देते हैं? जिसे हम शिक्षण कहते हैं, वह सभ्यता के विकास क्रम की वह अवस्था होती है, जहाँ से हम अपने ज्ञान के विस्तार को नया आयाम दे रहे होते हैं- न सिर्फ व्यापकता में, बल्कि उसकी गहरायी के तौर पर भी।

रानीबाग़, नैनीताल उत्तराखंड से निकलने वाली इस पत्रिका के संपादक महेश पुनेठा और दिनेश कर्नाटक है। पत्रिका का यह अंक अपने 20 विचारपरक लेखों को समेटे हुए है। इनमें शिक्षा जगत के नामी-गिरामी हस्तियों, शिक्षाविदों और शिक्षक साथियों के अपने अनुभव भी जगह पा सके हैं। ‘स्कूल कुछ हटकर’ यह पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर लिखा गया एक वाक्य है, जिसमें इस अंक की मूल भावना भी समाहित है। यह अंक कुछ नवाचारी स्कूलों की शैक्षिक प्रक्रियों को केंद्र में रखकर सिखाने और सीखने की पूरी प्रणाली को हमारे सामने लाता है। ये नवाचारी स्‍कूल परम्परागत स्कूलों से सही मायने में कुछ हटकर हैं। ‘बच्चे’ शीर्षक से डॉ. माया गोला वर्मा की कविता है, जो पत्रिका के अन्दर के कवर पर बड़े इत्मीनान से पाठक के शैक्षिक परिप्रेक्ष्य को झकझोरती है… ‘बच्चे को करनी है शरारतें/बच्चे को देखनी हैं चिड़ियाएँ/उड़ानी हैं पतंगें/फूलने हैं गुब्बारे/गाना है गीत/चीखना है/चिल्लाना है/हँसना है जी भरकर… परन्तु/बस्ते के भीतर भरे अथाह ज्ञान में/बच्चा डूब गया है/खुश हैं सब/डूबते बच्चे को देखकर/खुश हैं सब/उसके सुनहरे सपने को मरते देखकर….।’ पत्रिका की मूल भावना क्या है ? ‘अनुरोध’ में संपादक लिखते हैं- ‘बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य प्रदान करना एक लोकतान्त्रिक राज्य का पहला दायित्व है। सार्वजानिक शिक्षा का विशाल ढांचा सुविचारित प्रक्रिया के तहत ढहने के कगार पर खड़ा है। इस गफलत के दौर में यह आवश्‍यक हो जाता है कि हम सब शिक्षा से जुड़े हुए तथा शिक्षा को समाज निर्माण का महत्त्वपूर्ण तत्व मानने वाले लोग शिक्षा के लोकतान्त्रिक, उदार, बहुलतावादी, वैज्ञानिक तथा धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बचाने के लिए आगे आएं। यह पत्रिका इसी दिशा में एक प्रयास है…।’

‘स्वतंत्रता, संवाद और विश्वास’ शीर्षक सम्पादकीय में महेश पुनेठा का जोर इस बात पर है कि ‘शिक्षण एक कला है। कोई भी कला तब तक पूर्णरूप में विकसित नहीं हो सकती है, जब तक उसके लिए दबावमुक्त वातावरण न हो।’ संपादक इस बात से बाखबर भी है कि स्‍कूली शिक्षा में इस शब्द के मायनों को बहुत ही सरलीकृत करके उसकी मूल भावना से अलग करने का प्रयास भी क्या जा सकता है। इसीलिए वह यह भी लिखते है कि ‘स्वतंत्रता का मतलब यह कतई नहीं है कि बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए। वे जैसा चाहें, वैसा करते रहें। बच्चों के लिए स्वतंत्रता के साथ-साथ खुला संवाद भी बहुत जरूरी है…संवादहीन स्वतंत्रता को अराजकता में बदलने में देर नहीं लगती है। बच्चों को स्वतंत्रता देने के साथ ही उनसे और अधिक संवाद करना जरूरी हो जाता है। ऐसे में शिक्षक-अभिभावक की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।’ स्वत्रंत्रता, संवाद और विश्वास को जैसे मूल्यों को विद्यालय की मूल भावना से जोड़ते हुए पत्रिका का यह अंक कुछ ऐसे स्कूलों की बानगी हमारे सामने पेश करता है, जहाँ नवाचार पूरे विद्यालयी परिवेश में फलता-फूलता है- किसी सैधांतिक अवधारणा के रूप में ही नहीं, व्यावहारिक प्रतिफलन में भी।

फेसबुक आज के समय में वर्चुअल दुनिया का एक ऐसा समाज बन गया है, जहाँ हम अपने विचारों के साथ दूसरे से मिलते-जुलते हैं, बतियाते हैं और समय के सवालों से दो–चार होते हैं। पत्रिका का एक पूरा लेख ही ‘फेसबुक परिचर्चा’ का है। इसमें शिक्षा से जुड़े हुए तमाम बिन्दुओं पर संपादक के साथ विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से की गई बातचीत को संकलित किया गया है। सोशल मीडिया का यह सकारात्मक उपयोग तात्कालिक तौर पर सराहनीय और दीर्घकालिक तौर पर अनुकरणीय है। इसे संवाद की संस्कृति को प्रसारित करने में अहम् भूमिका निभाने वाले कारक के रूप में भी देख सकते हैं। संपादक ने इस तरह के प्रयोग से यह सिद्ध कर दिया है कि ‘विचारों का कभी अंत नहीं होता’ जरूरत उसकी अनन्तता की पहचान की है। कक्षा में अनुशासन को केंद्र में रखकर की गई बातचीत को इस लेख के माध्यम से कई आयामों में समझा जा सकता है। इस विषय पर हेमा तिवारी, अनिल अविश्रांत, मुकेश वशिष्ठ, रणजीत कुमार, जगमोहन कठैत, कमलेश जोशी तथा भाष्कर चौधरी के विचार महत्त्वपूर्ण हैं।

कवियित्री और शिक्षिका रेखा चमोली का आलेख ‘जहाँ बच्चे मनपसंद विषय से अपना दिन शुरू करते हैं’ विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘तोतोचान’ को आधार बनाकर जापान के तोमोए गाकुएन स्कूल की शिक्षण पद्धति को बयाँ करता है। अपने अनुभव को स्कूल की प्रक्रिया से जोडती हुई लेखिका का यह निष्कर्ष है कि- “तोमोए की एक प्रमुख विशेषता थी स्वाभाविकता़। स्कूल चाहता था कि बच्चों के व्यक्तित्व यथासंभव स्वाभाविकता के साथ निखरें।” स्कूल का माहौल और समाज के साथ आपसी रिश्ते की ख़ूबसूरत सहजता ऊपर से शिक्षकों का विद्यार्थियों के साथ साहचर्य का सम्बन्ध ये सब कुछ मिलकर बच्चों को सीखने के जीवंत अनुभव देते थे। यहाँ विशिष्टता का सम्मान भी था और वि‍भिन्नता की कद्र भी थी। तोतोचान स्कूल की शिक्षण प्रक्रिया को समझने के लिए यह आलेख भी अनिवार्यतः पढ़ना चाहिए।

चिंतामणि जोशी का लेख ‘बाल ह्रदय की गहराइयों में पैठना शिक्षा का सार’ उक्रेन, अविभाजित सोवियत संघ के ‘खुशियों का स्कूल’ की कहानी कहता है। स्कूल के संस्थापक वसीली सुखोम्लिंस्खी के विजन को उद्धरित करते हुए लेखक का कहना है कि- ‘स्कूल में चरित्र निर्माण के दौरान इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाता था कि ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया में हर बच्चा मानव गरिमा का, गर्व का अनुभव करे। बाल ह्रदय की गहराइयों में पैठना वसीली की शिक्षण विधि का सार था।’ शिक्षा में बाल मनोविज्ञान की व्यावहारिकता के लिए इस आलेख को देखा जाना चाहिए।

तारा चन्द्र त्रिपाठी जिनका शिक्षा के क्षेत्र में लंबा अनुभव रहा है, का साक्षात्कार भी इस अंक की ख़ूबसूरती है। एक शिक्षाकर्मी की हैसियत से वे विभिन्न मुद्दों पर दर्शक की भांति अपनी राय नहीं देते होते हैं, बल्‍कि‍ भागीदार होकर चीजों को जानने और समझने का अनुभव उनके साक्षात्कार में दिखायी पड़ता है। ‘शैक्षिक दखल’ के साथ की गई लंबी बातचीत में वे अपने व्यावहारिक अनुभवों से बाल मनोविज्ञान को सामने रखने का प्रयास भी करते है।
समरहिल स्कूल, लन्दन को आधार बनाकर लिखा गया अंशुल शर्मा का आलेख शिक्षा सिद्धांतों और प्रयोग की जाने वाली विधियों को लेकर हमारे मन में बनी कुछ शंकाओं का समाधान करता है। लेखक ने अपने लेख का शीर्षक ‘मनमर्जी का स्कूल’ देते हुए लिखा है कि- ‘एक स्कूल है जिसमें बालकों को कक्षा में न जाने की आज़ादी है, बालकों को गाली निकालने की आज़ादी है, अपने निर्णय खुद लेने की आजादी है, बालकों को शिक्षकों के नाम लेकर संबोधित करने की आज़ादी है।’

नीलबाग स्कूल की शिक्षण प्रणाली पर राजाराम भादू का साक्षात्कार कई मायनों में अहम् है। डेविड आसबरा के शैक्षिक दर्शन को आधार बनाकर उन्होंने इस विद्यालय की सीखने-सिखाने की पूरी प्रक्रिया को डिटेल में बताया है।

इसी तरह से ऋषि वैली स्कूल चित्तूर, आंध्रप्रदेश पर राजीव जोशी, आनंद निकेतन डेमोक्रेटिक स्‍कूल भोपाल और इमली महुआ, कोंदागावं (बस्तर), छतीसगढ़ पर प्रमोद दीक्षित मलय, साल सबील ग्रीन स्कूल त्रिशूर, केरल पर सुनील, उमंग पाठशाला, गन्नूर(सोनीपत), हरियाणा पर मिनाक्षी गाँधी, रा.आ.प्रा.वि. कपकोट, बागेश्वर, उत्तराखंड पर डॉ. केवलानंद कांडपाल, रा.प्रा.वि. मेतली, पिथौरागढ़ पर दिनेश सिंह रावत, रा.उ.प्रा.वि.पौड़, पिथौरागढ़, उत्तराखंड पर नरेश पुनेठा, प्रा.वि.स्यूणी मल्ली, चमोली पर देवेश जोशी, रा.प्रा.वि. गणेशपुर, उत्तरकाशी, उत्तराखंड पर सुनीता के लेख इन स्कूलों की पूरी प्रक्रिया को हमारे सामने रखते है। शिक्षा जहाँ सीखने का दूसरा नाम ही नहीं है, बल्कि आनंद लेने और देने का जरिया भी है।
सुप्रसिद्ध विज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी की डायरी का वह अंश भी पत्रिका को इस मायने में वैचारिक गहरायी प्रदान करता है, जिसमें वे राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय, देहरा, देहरादून की शिक्षण प्रक्रिया का आँखों देखा और खुद का अनुभव किया हुआ सच बयाँ करते हैं। इस स्कूल में उन्हें सेवा, समर्पण और शिक्षा का अनूठा संगम दिखाई दिया।

सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र का व्याख्यान ‘एक अजीब स्कूल’ गुमनाम स्कूल लापोड़िया जयपुर की कहानी कहता है, जहाँ परिवेश के साथ सीखने की प्रक्रिया सहजता के साथ अपना रूप ग्रहण करती है। वहां कोई बंधन नही है- सीखने में भी और जीने में भी। समाज और स्कूल का कोई बंटवारा नहीं, स्कूल समाज के साथ कुछ इस तरह घुला-मिला है कि‍ कौन किससे सीख रहा है, यह पता लगाना मुश्किल है अर्थात सब एक दूसरे के सानिध्य में आगे बढ़ रहे हैं। पसंद और नापसंद के साथ विषयों की दीवारें बनतीं और बिगड़ती रहती थीं और बच्चे इस गुमनाम स्कूल से शिक्षा की एक नई इबारत लिख रहे थे। सीखने की स्वाभाविकता और जीने की सहजता के आपसी संबध को समझने के लिए यह आलेख महत्त्वपूर्ण है।

‘और अंत में’ तीन स्कूलों 1. ग्राम भारती विद्या मंदिर, रानिचौरी, टेहरी गढ़वाल. 2. दून घाटी शिक्षण संस्थान, बापू ग्राम,ऋषिकेश. 3.जीवन जागृति निकेतन, ऋषिकेश के हवाले से दिनेश कर्नाटक ने गाँधीवादी शिक्षा के मूल्यों की व्यावहारिकता को दिखाया है। इन तीनों स्कूलों की स्थापना गाँधीवादी विचारक योगेश चन्द्र बहुगुणा ने की थी। उनके लिए शिक्षा का पेशा रोजगार का नहीं, सेवा का पेशा था। यह आलेख किसी शिक्षण संस्था के निर्माण के साथ उसमें विकसित होने वाली मूल्य-चिंता की पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए पठनीय है।

‘आदमी बनने के क्रम में’ मिथिलेश कुमार राय की कविता शुरुआती कविता की तरह फिर एक बार हमारे परिपेक्ष्य को दुरुस्त करती जान पड़ती है- पिता मुझे रोज पीटते थे/गरियाते थे/कहते थे कि साले/राधेश्याम का बीटा दीपवा/पढ़-लिखकर बाबू बन गया/और चंद्नमा अफसर/और तू ढोर हांकने चल देता है/हँसियाँ लेकर गेहूं काटने बैठ जाता है/कान खोल कर सुन ले/आदमी बन जा/नहीं तो खाल खीचकर भूसा भर दूंगा/और बांस की फुनगी पर टांग दूंगा…/आदमियों की तरह सारी हरकतें करते पिता/क्या अपने आपको आदमी नहीं समझते थे/आदमी बनने के क्रम में/मैं यह सोचकर उलझ जाता हूँ…।’
कुल मिलाकर ‘शैक्षिक दखल’ का यह अंक काफी महत्त्वपूर्ण है। इसमें लिखे गये लेख रोचक, उपयोगी और संग्रहनीय हैं।

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शैक्षिक दख़ल (छमाही)
एक अंक- 40 रुपये
5+1 अंक- 200 रुपये
आजीवन-1500 रुपये
संस्थागत आजीवन सदस्यता-2000 रुपये
विशिष्ट सदस्यता-5000 रुपये
सम्‍पर्क : महेश चंद्र पुनेठा, शि‍व कॉलोनी,
न्‍यू पि‍याना, पो. ऑ डि‍ग्री कॉलेज श्‍जोशी भवन, नि‍कट लीड बैंक, पि‍थौरागढ़-262502, मोबाइल नम्‍बर- 09411707470
ईमेल- punetha.mahesh@gmail.com

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