चित्रकार जे.पी. सिंघलः कुछ यादें : ओमा शर्मा

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प्रसि‍द्ध चित्रकार और छायाकर जे.पी. सिंघल पर ओमा शर्मा का संस्मरण-

कुछ यादें आपके जेहन में हमेशा के लिए तारी हो जाती हैं और बारहा अनजाने ही। जे.पी. सिंघल साहब के साथ पहली मुलाकात की मुझे खूब याद है, जो वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा के घर एक दोपहर को हुई थी। जब मैं वहां पहुंचा तो लेखक-कलाकार मित्र प्रभु जोशी अपने सुपरिचित अंदाज में वहां उपस्थित मेहमानों को कला और साहित्य की अपनी समझ के किसी पहलू पर संबोधित कर रहे थे। वहां घुसने के बाद मैं चुपचाप एक सोफे पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे वहां उपस्थित मेहमानों से मिलवाया। पहली मुलाकात के समय जैसा होता है सभी ने एक नागरीय मुस्कुराहट के साथ परिचय की अदला-बदली की, सिवाय सिंघल साहब को छोड़कर जो पहली मुलाकात पर ही ऐसे गले मिले जैसे कि मैं उनका कोई भूला-बिछड़ा दोस्त रहा हूँ। मैं तब तक उनको नहीं जानता था। उसी दौरान उन्होंने हाजी अली स्थित घर पर आने का निमंत्रण भी दे डाला जो उन दिनों मेरे घर से चंद मिनटों की ही दूरी पर था।

अगले रोज जब मैं उनके घर पहुंचा तो मुझे बड़े विरल कलात्मक अनुभव का एहसास हुआ। लिफ्ट के पास ही उनकी कई पेंटिंग लगी थीं। प्रवेश द्वार के पास उनके खास कलात्मक हस्ताक्षर की लिपि पीतल में जड़ी थी हालांकि मैं तब तक उससे वाकिफ नहीं था। उसके ठीक ऊपर कोई पुराना भित्तीचित्र था। थोड़ी देर इंतजार के बाद किसी ने दरवाजा खोला और मुझे अंदर बुला लिया। उस चौकोर कमरे में मेरा बाद में भी कई मर्तबा जाना हुआ लेकिन उसमें ऐसी अद्भुत चित्रकारियां, शिल्पकृतियाँ, म्यूरल और तरह-तरह की इतनी सारी आकृतियां सजी रखी थीं कि मैं वहां बैठकर सिर्फ हैरान और सुकून महसूस कर सकता था क्योंकि वैसा कमरा न मैंने पहले कभी देखा था न बाद में। शायद इसका कारण यह भी रहा हो कि उस कमरे में सिर्फ अंतिम आकार लेती हुई चित्रकारियां ही नहीं, बल्कि कुछ ऐसी अधबनी भी थीं जो किसी मधुबनी से कम नहीं थीं। थोड़ी देर बाद वे अपने उसी खास अंदाज यानी गोल गर्दनवाले कुर्ते और पायजामे में मुस्कुराते हुए आये और फिर से लिपटकर गले मिले। मैंने उनका एक मेजबान का अपनापन महसूस किया। मुझे थोड़ा ताज्जुब हुआ क्योंकि वो इतने बड़े-बुजुर्ग कलाकार थे और ऐसे खुलकर स्नेह बरसा रहे थे जिसकी कोई वाजिब वजह मुझे समझ नहीं आ रही थी। हां, मुझे एक सच्चे कलाकार की इंसानियत का एहसास जरूर हो रहा था। उसके बाद भी कई मर्तबा मिलना हुआ इसलिए उस पहली मुलाकात की बहुत सारी चीजें मैं भूल गया हूँ। बस मुझे याद है तो ये कि वो डेढ़ घण्टे का वक्फा मानो पलक झपकते ही निकल गया था। उस समय वे 76 साल के जवान थे। जिंदगी और आवेग से भरे हुए और दुनियादारी से तो एकदम ही बेपरवाह। और तो और उनमें कोई कलाकार होने तक का भरम नहीं था। उस समय वे सिर्फ शरीफ इंसान थे जो अपनी जिंदगी पूरी आजादी से जी रहा हो। अलबत्ता ये आजादी पाने के लिए उन्होंने आधी सदी से ऊपर मशक्कत की थी। उनके दिमाग में उस समय अगर कुछ था तो बस यही कि अपने मेहमान को कैसे तवज्जो दी जाए। वे बातें करते और जैसे बेलगाम अतीत रास्तों में घुमक्कड़ी करने लगते। थोड़ी देर बाद ही मुझे लगा कि मैंने तयशुदा वक्त से कहीं ज्यादा उनका वक्त ले लिया है। जब मैं चलने लगा तो वो मेरे साथ लिफ्ट तक आ गये। लेकिन जब लिफ्ट आई, उसके बाद भी मेरे साथ उतर आये। मेरे लाख माना करने पर भी जब तक मैं अपने कार में नहीं बैठ गया उन्होंने मुझे नहीं छोड़ा (और यह क्रम हर बार दोहराया गया)। जब मैं घर लौटा तो उनसे हुई मुलाकात मुझे रह रहकर याद आने लगी। मुम्बई में कौन किसी से इस तरह मिलता है? इतने खुले मन से कौन गले लगता है? कौन इतने गरमजोशी के साथ बातें करता है? कौन ऐसे ही मिलने-मिलाने के लिए आमंत्रित करता है।

थोड़े दिन बाद उनका मेरे पास फोन आया कि भाई अरसा हो गया मिला जाए। मुझे पिछली मुलाकात अभी तक गुदगुदा रही थी। मैंने अपनी पत्नी को भी उनके घर जाने को राजी कर लिया ताकि वो भी महसूस कर सके कि एक सच्चे कलाकार से मिलना कितना ऊर्जा भरा होता है। सिंघल साहब और उनकी पत्नी श्रीमती माया सिंघल हमेशा बेहतरीन मेजबान थे। हम हमेशा उसी कमरे में बैठते जहां मैं पहली बार बैठा था। मैं किसी भित्तीचित्र के बारे में उनसे पूछता तो वह उसे हासिल करने तक की दास्तान छेड़ देते जिनकी तादात अच्छी खासी थी। पता नहीं उन्होंने ये बात छेड़ी या मैंने जिक्र किया, थोड़ी देर बाद हम उनके पेंटिंग रूम में चले गये जहां उनकी कई पेंटिंग्स अधबनी रखी थीं। एक तो ईजल पर ही रखी थी। एक बार तो मुझे लगा कि वह ईजल पर क्यों रखी है क्योंकि वह तो सम्पूर्ण हो चुकी है लेकिन उन्होंने थोड़ा सहमते करते हुए बताया कि अभी… इसका निचला हिस्सा थोड़ा खुरदुरा है…चेहरे के हाव-भाव में भी… ऊपर का आसमान बाकी चित्र से मेल नहीं खा रहा है। मुझे वाकई लगा कि मेरे देखने का नजरिया अभी कितना संकुचित है हालांकि मैं पॉल वालरी के इस कथन से वाकिफ था कि कोई भी कलाकृति कभी पूरी नहीं होती है; एक अवस्था के बाद वह दुनिया में समर्पित करनी होती है। शायद इसी को प्रभु जोशी ‘नष्ट होने का कगार’ कहते हैं। उसके बाद उन्होंने मुझे एक और पेंटिंग दिखाई जो एक स्त्री की थी। फकत काले रंग का इस्तेमाल। सांझ ढले के वक्त वह स्त्री किसी पहाड़ी पर आँखें मुंदे कुदरत और अपने आप से मगन थी। एक पारदर्शी हिजाब उसके ऊपर जरूर था लेकिन उसके रोम-रोम से मादकता रिस रही थी। अपनी कोहनी मोड़े वह औरत कमर के बल लेटी अपने ही खयालों में ऐसे खोयी थी जैसे- उसे अपनी दुनिया की या किसी और की कुछ पड़ी ही नहीं हो। या एक अबूझ आनन्द में डूबी हो। उस कमसिन की नाभी पूरी चित्रकारी को एक अतीव मादकता में घोले दे रही थी। इस तरह की चित्रकारी को देखना करिश्माई अनुभव था। यह एक बड़े आकार की पेंटिंग थी जिसमें सिर्फ एक ही रंग यानी काला और और उसमें अलग-अलग शेड्स इस्तेमाल किये गये थे। देखने में बहुत सहज लेकिन उतनी ही आकर्षक लग रही थी। मैं सोचने लगा फकत एक रंग और वह भी काले के सहारे कोई किसी के हावभावों को इतनी बारीकी से कैसे चित्रित कर सकता है? लेकिन हाथ कंगन को आरसी क्या? वह पेंटिंग तो मेरे सामने थी। तब तक मुझे पेंटिंग की बारीकियों के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी (अभी भी नहीं है) लेकिन उस पेंटिंग का असर सम्मोहित करने वाला था।

लेकिन ये तो उस शाम इस तरह के अनुभव से गुजरने की शुरुआत भर थी। मैंने कला दीर्घायें देखीं हैं लेकिन इस तरह का कला अनुभव, और वह भी किसी के घर के छोटे से कमरे के भीतर, कहीं नहीं हुआ था। उसके बाद उन्होंने वहीं पर आधा दर्जन रखी पेंटिंगों में से एक उठाई और मुझे दिखाने लगे। अपनी पेंटिंग को दिखाने का उनका लहजा और जज्बा क्या खूब था। मैं पेंटिंग को उठाने में उनकी मदद करता तो वे मुझे रोक देते और इसरार करते कि मैं कहां किस कोण पर खड़ा होकर उस पेंटिंग को देखूं ताकि उनके सृजन को महसूस कर सकूं। मुझे एक पेंटिंग की अभी भी याद है। वह एक आदिवासी महिला की थी जो अपने अधनंगे बच्चे को गोदी में उठाये आसमान की तरफ देख मुस्कुराए जा रही थी। चित्रकार की बारीक निगाह से कुछ छूटा हुआ लग ही नहीं रहा था… उनके फटैले कपड़े, अलग-अलग रंगों के मोती, तरह-तरह के रंग-बिरंगे कंगन, आँखों की चमक… बाजू में एक पेड़ भी था जिसके पत्तों के बीच से उतरी हुई धूप अलग-अलग आकारों में पसरी थी। वह महिला अपने बच्चे के साथ जहां खड़ी थी, उसका आस-पास भी चित्रकार ने पूरी बारीकी से दर्ज कर रखा था। प्रकृति की बारीकियों को इस तरह ‘चित्रित’ करना मेरे लिए बड़ा हैरत भरा था और वह आज भी है। कितनी देर तक काम किया गया होगा ताकि कुछ अखरे भी न और छूटे भी न… आखिर यही तो यथार्थवादी चित्रकारी की कसौटी होती है। बाद में मेरे मित्र भाई प्रभु जोशी ने बतलाया कि सिंघल साहब के यहां सूखे ब्रश का जिस अद्भुत और उस्ताद-परक ढंग से इस्तेमाल होता है, उसकी कहीं कोई मिशाल नहीं है। उनमें कहीं भी कोई ‘स्ट्रोक’ जैसी चीज गोचर नहीं हो सकती। इसलिए वे मानते हैं कि उनकी यथार्थवादी चित्रकारी समूचे बंगाल स्कूल की यथार्थवादी चित्रकारी पर भारी पड़ती है। उनको याद करते हुए जब मैं यह सब लिख रहा हूँ तो उस शाम देखी और दिखाई गयी दूसरी चित्रकारियां भी जेहन में आ रही हैं। लेकिन जो खास चीज याद आ रही है वह है सिंघल साहब का अपनी कला में यकीन। वो अपने रचे को ऐसी मार्मिक विनम्रता से दिखाते थे कि पता लगता कि उनके भीतर बैठा कलाकार कितना सच्चा और ईमानदार है। मेरे लिए तो यह जैसे कुबेर का खजाना था।
* *

धीरे-धीरे हम लोगों की खूब छनने लगी। किसी बड़े बुजुर्ग कलाकार जिसने पूरी जिन्दगी ही कला के सृजन में बिताई हो, उससे उसकी या दूसरों की कला या फिर जिंदगी के दूसरे पहलुओं पर बात करना बड़ा आस्वाद भरा था। सिंघल साहब क्योंकि उम्र और अऩुभव के किसी अऩ्तर को नहीं मानते थे इसलिए हम बड़े याराने ढंग से गुफ्तगू करते। उसी दौरान मुझे पता लगा कि वे अपने श्वेत-श्याम वाले छाया-चित्रों को एक जगह इकट्ठा कर कॉफी टेबल बुक तैयार करना चाह रहे थे। पिछले चालीस साल के परिदृश्य में एक भी तो अभिनेत्री ऐसी नहीं…सायरा बानो से लेकर रेखा-हेमा-जीनत और श्रीदेवी से लेकर माधुरी-ऐश्वर्य और कैटरीना तक… जो अपने कमसिन दौर में उनके कैमरे की गिरफ्त में न आयी हो। इनमें ज़्यादातर छाया चित्र उनके मशहूर होने से ठीक पहले के दिनों के रहे होंगे। उन्होंने मुझे बैलगाड़ी के पीछे बैठी एक तस्वीर दिखायी और पहचानने का इसरार किया। तस्वीर में मुझे बहुत कुछ पहचाना सा लग रहा था लेकिन मैं सुनिश्चित नहीं हो रहा था कि वह कौन हो सकती है। बारह-तेरह साल की उम्र में सभी उसी मासूमियत और भोलेपन से भरे होते है। मेरे असमंजस को ताड़ते हुए उन्होंने बताया कि ये नीतू सिंह है जो यकीनन कमसिन होते हुए संभावनाओं से भरी-भरी लग रही थी। कनखियों से देखती हुई उसकी अदा किसी को भी अपनी तरफ लुभा सकती थी। मैंने और दूसरे चित्र भी पलटे, हर चित्र अपने उस श्वेत-श्याम रूप में उस अभिनेत्री के बाहरी ही नहीं भीतरी सौंदर्य तक को छलका दे रहा था। एक चित्र को देखकर मैं रुक गया। उसमें वह युवती पत्तों से भरी जमीन पर दोनों हाथों को सिर की तरफ फैलाए ऐसे लेटी थी जैसे कुदरत ने इसे अभी-अभी किसी सुकून से नवाजा हो… शान्त, तृप्त और अपने में मगन। सिंघल साहब की यह भी एक खूबी थी कि वे सिर्फ प्राकृतिक रौशनी ही इस्तेमाल करते थे, कैमरे का फ्लैश नहीं। उस छायाचित्र को देखकर मैंने वाजिब सवाल किया कि उस चित्र के ऐंगल को देखकर उन्होंने कैमरे को कैसे सेट किया होगा। उन्होंने बताया कि इसके लिए उन्होंने कैमरे को लेकर पेड़ की टहनी के ऊपर बमुश्किल संतुलन बनाते हुए लेटना पड़ा था।
“लेकिन आप पेड़ पर चढ़े कैसे?”
उस दृश्य की कल्पना से मेरे भीतर जिज्ञासा हुई।
“अरे उस हिरोइन ने ही मुझे सहारा देकर ऊपर चढ़ाया था।”
उन्होंने चुश्की ली।

बातों के बीच में ये मजाहिया तेवर उनकी आदत थी। लेकिन जब बात उनकी कला या किसी की भी कला की बात हो तो वो एकदम गैर-समझौतावादी हो जाते। प्रभु जोशी के जल रंगों के वो ऐसे मुरीद थे कि कोई भी उनकी बातों से लहालोट हो जाए। उनके जलरंगों की इतनी तारीफ करते, उनकी बारीकियों को ऐसे मार्मिक ढंग से बताते कि कैसे धूसर रंगों का इस्तेमाल किया जा सकता है। कैनवस के एक-एक गोशे को किस अनुपात में पिरोया गया है कि प्रभु जोशी जैसा जलरंगी चित्रकार कोई दूसरा नहीं हो सकता। और यह सब कहते हुए किसी को ये लग ही नहीं सकता था कि वे खुद एक चित्रकार हैं। लेकिन एक बार जब उन्होंने प्रभु जोशी के गणेश श्रृंखला के चित्रों को देखा (जो बेशक मुम्बई के बाजार के लिए तैयार किये गये थे) तो वे उन्हीं प्रभु जोशी को लगभग लताड़ने में रत्ती भर नहीं हिचके!
“क्यों? तुम ये सब क्यों करते हो, क्या जरूरत है? इससे तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा…. और तो और वो पैसे भी नहीं जिसके लिए तुमने इन्हें बनाया है…”
मेरे सामने ही वे प्रभु जोशी पर दहाड़ने लगे।

इसी तरह एक बार जब वे मेरे घर आये और हुसेन साहब की बनी पेंटिंग को देखकर मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए बोले “… ये हुसेन साहब का बहुत चालू वाला काम है… हुसेन साहब ने इसे ज्यादा से ज्यादा एक घण्टे में बना दिया होगा… ये उनकी आदत थी, दोस्तों को खुश रखने की।”
मुझे उनकी बात और बारीकी पसन्द आयी।

जेपी सिंघल के साथ ओमा शर्मा।

जेपी सिंघल के साथ ओमा शर्मा।

उन्हीं दिनों भारतीय ज्ञानपीठ से मेरा कहानी संग्रह आने वाला था। मेरे मन में ऐसे ही बात उठी कि क्या किताब के कवर पर उनकी किसी पेंटिंग का इस्तेमाल हो सकता है? या वे कोई मेरी फोटो खींच सकते हैं? मैंने उनसे इस बात का जिक्र भर क्या कर दिया कि उनका दिल तो मदद के लिए उमड़ पड़ा। वे मुझे अपने दूसरे कमरे में ले गये जहां उनकी न जाने कितनी अमूर्त चित्रकारियां बनी रखी थी। एक यथार्थवादी चित्रकार की कूची ने जो अमूर्तन का संसार रचा हुआ था वह कम स्तब्धकारी न था। एक तरह से यथार्थवादी और अमूर्तन, पेंटिंग की दुनिया के दो छोर हैं। कला में अमूर्तन की जरूरत और महत्तव एक दिलचस्प विषय रहा है। अमूर्तन उत्तरोत्तर विकास का पैमाना माना जाता रहा है हालांकि बाज़ हल्कों में जो कलाकृति समझ में न आये या कुछ भी समझाती सी न लगे उसे सहजता से अमूर्त कह दिया जाता है। खैर, मैंने उनके भण्डारगृह से एक का चयन किया जो अंततः बहुत खुबसूरत ढंग से मेरे कहानी संग्रह “कारोबार” का कवर बनी। भारतीय ज्ञानपीठ में कार्यरत मेरे एक मित्र ने बताया कि उसको देखकर तत्कालीन संपादक गदगद हो गये थे क्योंकि इस तरह की चित्रकारी उनकी नजर में इसके पहले कभी नहीं आयी थी और न शायद इसके बाद। जहां तक फोटो लेने की बात थी वह भी उन्होंने उसी वक्त कह दिया कि शनिवार को खींचेंगे। अभी तक मेरी किताबों में गये मेरे चित्र किसी नुक्कड़ के फोटो स्टूडियो में पासपोर्ट साइज के बनवाये हुए थे। मैं यह तो नहीं कहूँगा कि मेरे भीतर किसी नामी या अच्छे फोटोग्राफर द्वारा चित्र खिंचवाने की इच्छा न थी क्योंकि मैं किसी ऐसे-वैसे से वाकिफ ही नहीं था। कोई फोटो खींचने में कितनी देर लगती है? लेकिन पहली बार पता चला कि फोटो खींचने का भी एक ‘सत्र’ होता है। और वो उस पूरे ‘सत्र ‘की तैयारी से ही उस शनिवार मेरे घर आये थे…हैट और सस्पेंडर चढ़ाए…तरह-तरह के लेंसों का जत्था उठाए। कभी वे मुझे खिड़की के पास खड़ा कर देते, कभी सोफे पर बिठाते, कभी खुद सोफे पर चढ़ जाते और कभी नीचे बैठकर, यहां तक की लेटकर अपने कैमरे का ऐंगल सेट करते। कई बार ये भी हुआ कि वे उस मुद्रा में यूँ ही पड़े रहे क्योंकि उनके मुताबिक मैं ‘रिलैक्स’ नहीं था।
“मैंने तुम्हारी कहानियां नहीं पढ़ी हैं, मगर पढ़ लूंगा… लेकिन तुम्हारे चेहरे में एक दार्शनिकपना(इदन्नमं) है … मैं उसे पकड़ना चाहता हूँ… इसलिए… कुछ जान-बूझकर सोचने या पोज बनाने की जरूरत नहीं है… जैसे हो वैसे ही रहो… क्योंकि मैं जानता हूँ तुम क्या हो।” वे कैमरा छोड़ बड़े मनुहार और संयम से मुझे समझाने लगते। कौन फोटोग्राफर, जिसके पास हिन्दी सिनेमा की एक से एक अभिनेत्री अपना फोलियो बनवाने को ललायित रहती रही हों, इस तरह कर सकता था? लेकिन सिंघल साहब तो सिंघल साहब थे। उन्हें कुछ करना होता था तो पूरे सलीके और स्नेह से करते थे। सृजन का अभिप्राय ही उनके लिये पूरे जी जान से अपने को समर्पित कर देना था। मैंने यह भी देखा कि उन्होंने जान लिया था की किस तरह तकनीकी के सहारे से( मैकेनटॉश कंप्यूटर) अपने सृजन में चार चांद लगाये जा सकते हैं। मेरी किताब को आये अब कई वर्ष हो चुके हैं। उसका दूसरा संस्करण भी आ गया जिसमें वही पेंटिंग और उनका खींचा गया मेरा चित्र है। इतना ही नहीं उस चित्र को मैंने उसके बाद आई दूसरी किताबों में भी इस्तेमाल किया। मुझे ही नहीं मेरे करीबी कई मित्रों को लगता है कि कोई दूसरा चित्र मुझे इससे बेहतर नहीं दिखा सकता है।
जो भी हो इस बहाने सिंघल साहब के साथ मेरी संगत बनी रहती है।

लेकिन उनके साथ बातें करना, उनके बताये अनुभव का गवाह बनना, उनके खयालात से वाकिफ होना या कभी-कभी उनकी तुनक मिजाजियों से गुजरना बहुत रोमांचक था। वे अपने यकीनों में पूरे जोश-खरोश से जीते थे जैसा बहुत सारे कलाकारों की फितरत होती है। एक बार जब मैं उनसे मिलने गया तो वो कुछ फोटोग्राफ्स का पुलिंदा लिये बैठे थे। बड़े अजीबो-गरीब ढंग के फोटोग्राफ्स थे। बम्बई और उसकी तमाम भीतरी-बाहरी पहचान को दर्ज करते हुए। कई वर्षों का काम रहा होगा। और फोटोग्राफ्स क्या थे? बम्बई की दीवारों पर लिखी गयी इबारतें और पोस्टर्स… कोई चारकोल से लिखा हुआ… कोई आधा मिटा हुआ… कोई एक दूसरे के ऊपर चढ़ा हुआ… कोई भीड़-भड़क्के के बीच दबा हुआ तो कोई सुनसान में पड़ा हुआ। क्या ऐसे वाहियात संदेशों–जिन्हें उस शहर को पढ़ने की फुर्सत नहीं– से कोई कला बरामद की जा सकती है? या कहें, कि क्या इस तरह की मामूलियत कला में ढाली जा सकती है? मैं सोचने लगा। लेकिन सिंघल साहब एक सोचते-विचारते कलाकार थे। जीवन के आंवे से अपना माल-पानी उठाते थे। उनके भीतर हरदम कुछ न कुछ चलता रहता था। पिछली सदी के सातवें और आठवें दशक में बंबई आकर अपनी कैलेंडर आर्ट के सहारे उन्होंने आर्थिक रूप से अपने को ठीक-ठाक सुरक्षित कर लिया था जिसे बाद में उनके फिल्मों से जुड़ने के कारण और पुख्तगी मिल गयी थी। वे मुख्य धारा की लगभग सौ फिल्मों से उनके पब्लिसिटी डिजाइनर के तौर पर जुड़े रहे। फिल्मी दुनिया का जिक्र करते वक्त उनका जायका कुछ कसैला सा हो जाता “… बड़ी कारोबारी दुनिया है भाई…एक से एक कमजर्फ वहां बैठा होता है…फिल्मों की दुनिया कलाकार की दुनिया नहीं हो सकती है… लेकिन मेरे को क्या मेरा तो इसने भला ही किया।” वे जैसे सब कुछ भूलते-भालते एक फलसफे के सहारे बाहर निकल चुस्की लेने लग जाते। लेकिन उनको अपने संघर्ष के दिन याद रहते थे। यानी लड़कपन में मेरठ के दिन और बम्बई में आने के शुरुआती दिन भी। आडवानी एण्ड ऑरलीकॉन में काम करते हुए उन्होंने अच्छा-खासा मकाम बना लिया था, लेकिन वे खुलेआम स्वीकारते कि वे अभी भी कई तरह की असुरक्षाओं के शिकार हैं। हर कलाकार को अपने को चलायमान रखने के लिए अपने तईं कुछ न कुछ करना पड़ता है, चाहे वह कोई मुगालता हो या कोई टोटका। अगर कोई लेखक बीस-तीस साल से लगातार लिख रहा है तो उसे कुछ नहीं तो उस नैरंतर्य के लिए ही सराहा जाना चाहिए। सिंघल साहब तो फोटोग्राफी और चित्रकारी की दुनिया से पचास साल से ऊपर से जुड़े हुए थे और फिर भी वे ‘प्रवाह’ में थे। उन्होंने अभी अपने हथियार नहीं फेंके थे… जैसे कलाकार होना उनका स्वभाव हो। जहांगीर आर्ट गैलरी में हुई उनकी कला प्रदर्शनी का मैं गवाह था। वह सचमुच एक विराट उपलब्धि थी। जहांगीर के नीचे के तीनों हॉल ही नहीं, पहली मंजिल पर बने दोनों कमरों को भी उन्होंने शामिल कर लिया था। मुम्बई का कला-जगत जैसे सकते में आ गया था। एक तरफ उनकी आदिवासियों की श्रृंखला थी तो दूसरी तरफ उनकी अजंता-एलोरा की। एक तरफ उनकी अमूर्त चित्रकारियां थी तो दूसरी तरफ कैलेंडरों के लिए बनायी गई चित्रकारियां। एक कमरे में तो उनके पिछले चालीस सालों की मुम्बई की तमाम खूबसूरत अभिनेत्रियों के ही श्वेत-श्याम छायाचित्र थे। उन दिनों बात करते हुए वे एक अजीब मस्ती के आलम में झूमते दिखते! कभी वे अपनी पेंटिंगों के बारे में ही बताते तो कभी उनके सृजन के रहस्य के बारे में और कभी अपनी खुद की ग्रन्थियों के बारे में। वे उम्र और कला के ऐसे मकाम पर थे जहां सराहना और आलोचना बेमानी हो जाते हैं। उन्हें कहीं दिली तसल्ली थी कि अपनी आदिवासी श्रृंखला में वे एक ठेठ भारतीयता को दर्ज कर पाये हैं और अपनी अजन्ता एलोरा श्रृंखला में उन्होंने उन तमाम बेनाम कलाकारों को श्रद्धांजली दी है जिन्होंने सदियों पहले ऐसा करिश्माई काम कर छोड़ा था। प्रदर्शनी का विमोचन अभिनेत्री श्रीदेवी ने किया जो मुझे बड़ा वाहियात लगा क्योंकि सारा मामला कम से कम कुछ समय के लिए कला की दुनिया से बेमेल हो चला था। लोगों के बीच अपनी बात रखते हुए उन्होंने कतर में बैठे मकबूल फिदा हुसेन से भी मोबाइल के जरिये आशीर्वचन लिये। मुझे वह गैरजरूरी लगा। मगर सिंघल साहब शायद हर सूरत उस प्रदर्शनी की सफलता देखना चाह रहे थे। जो भी हो प्रदर्शनी हर लिहाज से कामयाब थी। उन्हें भीतर कहीं ये भी सुकून था कि मुम्बई की कला की दुनिया में आखिर उन्होंने अपना झण्डा गाड़ दिया।
तो क्या वाकई उनका सपना पूरा हो गया?
क्या वाकई अब कुछ करने को नहीं बचा?
* *

पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे याद आता है कि अपने आखिरी दिनों में वे मुझसे कुछ कहना और बांटना चाहते थे… उनकी देखी-भाली कुछ कहानियां या वे अनुभव जिनसे वे गुजरे… जो उनके भीतर एक तड़प मचाये हुए थीं कि वे बाहर आयें। लेकिन सिंघल साहब के हाथ में कूची थी, कलम नहीं। एक बार मुझे देखकर लढ़ीयाते से बोले “… हम दोनों की जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसी होगी… एक सोचता है, दूसरा उसे अंजाम देता है।” वे बतायेंगे और मैं लिखूंगा। उन्होंने दक्षिण की अभिनेत्री का कई बार जिक्र किया जिसका बचपन में ही उसके पिता ने बलात्कार किया था। आज वह न सिर्फ एक जानी-मानी अभिनेत्री और सांसद रह चुकी हैं बल्कि उसके नाम का एक मंदिर तक है। मुझे यह संक्रमण दिलचस्प लगा। मगर किसी न किसी वजह से हम लोगों की वह देर तक चलने वाली मुलाकातें नहीं हो सकीं। मैं कभी उनसे इसका जिक्र करता तो वे कुछ टालमटोली सी कर जाते। मुझे कुछ नहीं सूझता क्योंकि यदि कुछ होने वाला था तो उसमें पहल उन्हीं की थी। अस्सी वर्ष के एक कलाकार व्यक्ति के साथ बर्ताव करते समय आपको खयाल ज्यादा रखना होता है (हुसेन के साथ मेरा तजुर्बा गवाह था!)। वे अब भी कला की दुनिया में विचरण करते थे लेकिन निजी चैनलों पर आने वाले कुछ अनाप-सनाप धारावाहिकों में रमने लगे थे। उन धारावाहिकों के कुटिल चरित्रों के साथ वे निजी दुश्मनी सी मानने लगते। भाभी जी यानी श्रीमती माया सिंघल ने मुझे हौले से सूचित भी किया कि वे उन धारावाहिकों के रिपीट शोज को भी उसी तन्मयता और आवेग से देखते हैं। उसके चरित्रों के साथ ऊपर-नीचे होते हैं।

“लेकिन सिंघल साहब ये टी.आर.पी.के लिए बनाये गये, खड़े किये चरित्र हैं, असली नहीं हैं…” मैंने हौले से उन्हें समझाने की कोशिश की।
“क्या ऐसे चरित्र हमारे आस-पास नहीं भटक रहे हैं, क्या तुम अखबार नहीं पढ़ते हो। कितना कुछ गलत हो रहा है दुनिया में।”  वे लगभग मुझ पर गरज से पड़े।
मैं सहम गया।
मुझे लगा जैसे उन पर कोई बाधा आ गयी है क्योंकि यह सब इतना अप्रत्याशित था। पता नहीं अपने दिल के भीतर वे किस रहस्यमयी झंझट में उलझे थे।
जिन्हें हम चाहते हैं कई हमें उनके गुस्से और अप्रत्याशित को स्वीकारना ही होता है।
* *

आठ मई, 2014 को मैं नाशिक में था जब फोटोग्राफर मित्र प्रदीप चन्द्रा का मेरे पास संदेश आया कि‍ प्रिय कला के हमारे एक दिग्गज सिंघल साहब नहीं रहे। मैं अवसन्न रह गया। पिछले चार वर्षों की मेल-मुलाकातों के बहुत सारे पल यकायक उमड़ने-घुमड़ने लगे। मेरे आस-पास एक बेचारगी तैर गई। उनके अप्रत्याशित रवैये का भी जैसे खुलासा सा हाथ लगने लगा। लेकिन मेरी चाहना थी कि उनके अन्तिम दर्शन अवश्य करूं। क्या यह मुमकिन होगा? संयोग से कनाडा में रहने वाले उनके छोटे पुत्र के आने से यह सम्भव हो सका।
जब मैंने उनको आखिरी बार देखा तो उनकी देह सिकुड़कर बहुत छोटी रह गयी थी। उन्होंने अपने संघर्षपूर्ण जीवन से कला की दुनिया को जो दिया था, उसकी अनूगूँज बनी हुई थी। लेकिन उनके दाह-संस्कार में शामिल होने वालों की तादाद बहुत कम थी। सिर्फ अंगुलियों पर गिनने लायक। कला की वह दुनिया जिसे उन्होंने जतन से इतना संवारा, उसे भी उनसे कुछ पड़ी नहीं रह गयी। क्या कहेंगे इसे? एक कलाकार का नसीब या मुम्बई की भागमभाग।
अलबत्ता, उनके चेहरे पर एक बच्चे की मासूमियत अभी भी तारी थी और मैं देख पा रहा था कि कैसे अपनी अंतिम सांस तक वे एक कलाकार की गरिमा बनाये रहे।

( ‘अकार’ से साभार)


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जेपी (जयंती प्रसाद) सिंघल  का परि‍चय

चित्रकार जे.पी. सिंघल।

चित्रकार जे.पी. सिंघल।

जन्म 24 अक्तूबर 1934, मेरठ, उत्तर प्रदेश। दस बरस की उम्र से चित्रकारी। आत्म दीक्षित। अठारह बरस की उम्र में मेरठ छोड़ बम्बई प्रस्थान। शेष जीवन मुम्बई में। बीस बरस की उम्र में ‘धर्मयुग’ में चित्र प्रकाशित। भारतीय देवी-देवताओं, लोक-कथाओं, मंदिरों, आदिवासियों और अजन्ता-एलोरा को लेकर कई कंपनियों के लिए कलैंडर बनाए जिनकी बिक्री की तादाद अस्सी करोड़ के ज्यादा। लगभग 2700 से अधिक मूल पेंटिंग्स। जितने अच्छे चित्रकार, उतने ही  अच्छे छायाकर। पिछले चालीस- पचास बरसों में देश की शीर्ष अभिनेत्रियों और मॉडल्स के छायाकर। राज कपूर की ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ के लिए ज़ीनत अमान के किरदार को रूप देने में अहम योगदान। तभी से फिल्मों से जुड़ाव। ‘शान’, मिस्टर इंडिया’, ’हिना’ त्रिदेव’, ‘रॉकी’, ‘बॉर्डर’, ‘गदर’, और ‘बेताब समेत हिन्दी सिनेमा की सौ से अधिक फिल्मों की पब्लिसिटी डिजाइन। मकबूल फिदा हुसेन की फिल्म ‘मीनाक्षी’ में विशेष सहयोग। जे जे स्कूल और जहांगीर कला दीर्घा में प्रदर्शनियाँ। श्री राम(75-76), कृष्ण लीला(1977) के कलेंडरों पर भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार। कलेंडर आर्ट्स के लिए दूसरे राष्ट्रीय पुरस्कार भी। सात मई 2014 को हृदय गति रुकने से मुंबई में निधन।

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