गोरखपुर में बच्चों की मौत ने पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को बेपर्दा कर दिया है : मनोज कुमार सिंह

‘दिमागी बुखार: बच्चों की मौत और विफल स्वास्थ्य तंत्र’ पर व्‍याख्‍यान देते मनोज कुमार सिंह।

नई दि‍ल्‍ली : ‘‘गोरखपुर में आक्सीजन संकट के दौरान चार दिन में 53 बच्चों की मौत ने पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को बेपर्दा कर दिया। मौतों का सिलसिला उसके बाद भी जारी है। पूरे देश जनस्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाओं की क्या स्थिति है, उसे इसके आईने में देखा जा सका है। कुल मिलाकर बहुत भयावह परिदृश्य है। सिर्फ बीआरडी मेडिकल कालेज में वर्ष 1978 से इस वर्ष तक 9907 बच्चों की मौत हो चुकी है। इस आंकड़े में जिला अस्पतालों, सीएचसी-पीएचसी और प्राइवेट अस्पतालों में हुई मौतें शामिल नहीं हैं। इंसेफेलाइटिस से मौतों के आंकड़े आईसवर्ग की तरह हैं। अब तो इस बीमारी का प्रसार देश के 21 राज्यों के 171 जिलों में हो चुका है। खासकर देश के 60 जिले और उत्तर प्रदेश के 20 जिले इससे बुरी तरह प्रभावित हैं।’’ 7 अक्टूबर 2017 को राजेंद्र भवन, दिल्ली में छठा कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान देते हुए चर्चित पत्रकार और जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज कुमार सिंह ने यह कहा। कवि-चित्रकार और टीवी के मशहूर प्रोड्यूसर कुबेर दत्त की स्मृति में हर साल एक व्याख्यान आयोजित होता है। इस बार व्याख्यान का विषय ‘दिमागी बुखार: बच्चों की मौत और विफल स्वास्थ्य तंत्र’ था।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि 40 वर्ष पुरानी बीमारी को अब भी अफसर, नेता और मीडिया रहस्यमय या ‘नवकी’ बीमारी बताने की कोशिश कर रहे हैं। यह दरअसल एक बड़़ा झूठ है। जिन  डॉक्टरों ने इसके निदान की कोशिश की, उन्हें अफसरों द्वारा अपमानित होना पड़ा। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. केपी कुशवाहा ने बहुत पहले ही जब इस बीमारी को अज्ञात बताए जाने पर आपत्ति जाहिर की थी, तो उनकी नहीं सुनी गई। उनका स्पष्ट तौर पर मानना था कि यह बीमारी जापानी इंसेफेलाइटिस है।

मनोज ने बताया कि इंसेफेलाइटिस को समझने के लिए हमें जापानी इंसेफेलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम को समझना पड़ेगा। चीन, इंडोनेशिया में भी टीकाकरण, सुअर बाड़ों के बेहतर प्रबन्धन से जापानी इंसेफेलाइटिस पर काबू कर लिया गया, लेकिन भारत में हर वर्ष सैकड़ों बच्चों की मौत के बाद भी सरकार ने न तो टीकाकरण का निर्णय लिया और न ही इसके रोकथाम के लिए जरूरी उपाय किए। जब उत्तर प्रदेश में वर्ष 2005 में जेई और एईएस से 1500 से अधिक मौतें हुई तो पहली बार इस बीमारी को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर हाय तौबा मची। उन्होंने कहा कि दिमागी बुखार किसी भी आयु के व्यक्ति को हो सकता है लेकिन 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में यह ज्यादा है। इस रोग में मृत्यु दर तथा शारीरिक व मानसिक अपंगता बहुत अधिक है।

इंसेफेलाइटिस के रोकथाम के दावे और हकीकत का जिक्र करते हुए मनोज कुमार सिंह ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग के जिम्मे इंसेफेलाइटिस के इलाज की व्यवस्था ठीक करने, टीकाकरण और इस बीमारी पर शोध का काम था तो पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय को गांवों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए इंडिया मार्का हैण्डपम्पों, नलकूपों की स्थापना तथा व्यक्तिगत शौचालयों का बड़ी संख्या में निर्माण कराना था। इसी तरह सामाजिक न्याय मंत्रालय को इस बीमारी से भीषण तौर पर विकलांग हुए बच्चों के पुनर्वास, शिक्षा व इलाज की व्यवस्था का काम था। इस योजना के पांच वर्ष गुजर गए लेकिन अभी तक इंसेफेलाइटिस से होने वाली मौतों व अपंगता को कम करने में सफलता मिलती नहीं दिख रही है। टीकाकरण में लापरवाही है, शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है, पानी का पूरा एक कारोबार विकसित हो गया है, शौचालय निर्माण के दावे निरर्थक हैं।

मनोज कुमार सिंह ने स्थापना के 45 वर्ष और गुजर जाने के बाद भी बीआरडी मेडिकल कालेज में एमबीबीएस की सीट 100 से ज्यादा न बढ़ पाने पर सवाल उठाया, जबकि इंसेफेलाइटिस के सर्वाधिक मरीज आते हैं। यहां हर वर्ष जेई एईएस के 2500 से 3000 मरीज आते हैं, लेकिन इस मेडिकल कालेज को दवाइयों, डाक्टरों, पैरा मेडिकल स्टाफ, वेंटीलेटर, आक्सीजन के लिए भी जूझना पड़ता है। इंसेफेलाइटिस की दवाओं, चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ, उपकरणों की खरीद व मरम्मत आदि के लिए अभी तक अलग से बजट का प्रबंध नहीं किया गया है। इंसेफेलाइटिस मरीजों के इलाज में लगे चिकित्सकों, नर्स, वार्ड ब्वाय व अन्य कर्मचारियों का वेतन, मरीजों की दवाइयां तथा उनके इलाज में उपयोगी उपकरणों की मरम्मत के लिए लगभग एक वर्ष में सिर्फ 40 करोड़ की बजट की जरूरत है, पर केंद्र और राज्य की सरकार इसे देने में कंजूसी कर रही है। ये हालात बताते हैं कि मंत्रियों-अफसरों के दावों और उन्हें अमली जामा पहनाने में कितना फर्क हैं। उन्होंने तंज करते हुए कहा कि जापान ने 1958 में ही इस बीमारी पर काबू पा लिया था। जापान से बुलेट ट्रेन लाने से ज्यादा जरूरी यह था कि उसकी तरह हम इस बीमारी को रोक लगा पाते।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि जेई/एइएस से मरने वाले बच्चे और लोग चूंकि गरीब परिवार के हैं इसलिए इस मामले में चारों तरफ चुप्पी दिखाई देती है। डेंगू या स्वाइन फलू से दिल्ली और पूना में कुछ लोगों की मौत पर जिस तरह हंगामा मचता है, उस तरह की हलचल इंसेफेलाइटिस से हजारों बच्चों की मौत पर कभी नहीं हुई। गरीबी के कारण ये इंसेफेलाइटिस के आसान शिकार होने के साथ-साथ हमारी राजनीति के लिए भी उपेक्षा के शिकार है।

उन्होंने यह भी बताया कि चीन निर्मित वस्तुओं के बहिष्कार करने वाली राजनीति के बजाय सच यह है कि एक दशक से चीन में बना टीका ही देश के लाखों बच्चों को जापानी इंसेफेलाइटिस जैसी घातक बीमारी से बचा रहा है। सस्ता टीका मिलने के बावजूद हमारे देश की सरकार ने टीके लगाने का निर्णय लेने में काफी देर नहीं की होती तो सैकड़ों बच्चों की जान बचायी जा सकती थी। वर्ष 2013 में भारत में जेई का देशी वैक्सीन बना और इसे अक्टूबर 2013 में लांच करने की घोषणा की गई, लेकिन अभी देश की जरूरतों के मुताबिक यह वैक्सीन उत्पादित नहीं हो पा रही है।

मनोज कुमार सिंह ने कहा कि देश की सरकार सकल घेरलू उत्पाद का सिर्फ 1.01 फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च कर रही है। बहुत से छोटे देश भी स्वास्थ्य पर भारत से ज्यादा खर्च कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवा की हालत तो और खराब है। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2016 के अनुसार यूपी के सीएचसी में 3092 विशेषज्ञ डॉक्टरों सर्जन, गायनकोलाजिस्ट, फिजिशियन बालरोग विशेषज्ञ की जरूरत है, लेकिन सिर्फ 484 तैनात हैं यानी 2608 की जरूरत है। देश में भी यही हाल है। कुल विशेषज्ञ चिकित्सकों के 17 हजार से अधिक पोस्ट खाली हैं। यूपी के 773 सीएचसी में सिर्फ 112 सर्जन, 154 बाल रोग विशेषज्ञ, 115 स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, 143 रेडियोग्राफर हैं। इस स्वास्थ्य ढांचे पर इंसेफेलाइटिस जैसी जटिल बीमारी तो क्या साधारण बीमारियों का भी मुकाबला नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि उत्‍तर प्रदेश में बच्चों की मौत सबसे अधिक है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य को सिर्फ चिकित्सा से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसका सीधा सम्बन्ध गरीबी और सामाजिक-आर्थिक कारण भी हैं। यदि गरीबी कम नहीं होगी और सभी लोगों को बेहतर रोजगार, स्वच्छ पेयजल, शौचालय उपलब्ध नहीं होगा तो देश को स्वस्थ रखना संभव नहीं हो पाएगा।

व्याख्यान के बाद गीतेश, सौरभ, आशीष मिश्र, नूतन, अखिल रंजन, इरफान और विवेक भारद्वाज के सवालों का जवाब देते हुए मनोज कुमार सिंह ने कहा कि रिसर्च के मामले में सरकारी या प्राइवेट स्तर पर सन्नाटे की स्थिति है, इसलिए कि इस बीमारी पर रिसर्च को लेकर किसी की ओर से कोई फंडिंग नहीं है। फंडिंग थी तो एचआइवी, एडस की बड़ी चर्चा होती थी, पर फंडिंग बंद होते ही लगता है कि वे बीमारी ही गायब हो गर्ईं।

मनोज कुमार सिंह ने दो टूक कहा कि इस बीमारी के निदान में सरकार की कोई रुचि नहीं है, इसलिए कि तब उसे स्वच्छ पानी, ठीक शौचालय और संविधान प्रदत्त अन्य अधिकारों को सुनिश्चित करना पड़ेगा। विडंबना यह है कि राजनीतिक पार्टियों के लोग जब विपक्ष में होते हैं, तो इसे मुद्दा बनाते हैं, पर सरकार में जाते ही इस पर पर्दा डालने लगते हैं। उन्होंने कहा कि बोलना और करना दो भिन्न बातें हैं। जब भाजपा विपक्ष में थी, तो योगी ने इस बीमारी को लेकर मौन जुलूस निकाला था, लेकिन नेशनल हाईवे पर नौ गायें कट जाने के बाद जिस तरह तीन दिन तक उन्होंने बंदी करवाई थी, वैसा बंद उन्होंने इंसेफेलाइटिस के लिए कभी नहीं करवाया। मनोज ने बताया कि अपनी जिम्मेवारी से बचने के लिए ही सरकार ने विगत 11 अगस्त को मरीजों की मदद करने वाले डॉ कफील को खलनायक बनाया। उन्होंने कहा कि बीमारी का दायरा बढ़ रहा है। शुद्ध पेयजल की समस्या बहुत गंभीर है, कम गहराई वाले हैंडपंपों के जरिए इंसेफेलाइटिस के बीमारी के संक्रमण होता है, वहीं ज्यादा गहराई वाले हैंडपंपों में आर्सेनिक और उससे होने वाले कैंसर का खतरा है। बच्चे वोटबैंक नहीं हैं, इसलिए राजनीतिक पार्टियों के लिए यह गंभीर मुद्दा नहीं है। उनके ज्यादातर अभिभावक गरीब और मजदूर हैं, भले ही रोजी-रोटी के लिए वे महानगरों में चले जाएं, पर इस इलाके से उनके पूरे परिवार का विस्थापित होकर कहीं दूसरी जगह चले जाना संभव नहीं है।

मनोज का मानना था कि सरकार पर आंदोलनात्मक दबाव बनाना जरूरी है। तत्काल तो बचाव पर ध्यान देना जरूरी है, प्रति मरीज लगभग 3000 रुपये की जरूरत है, प्राइवेट प्रैक्टिस वाले सुविधा देने को तैयार नहीं है। यह काम तो सरकार को ही करना होगा, पर मुख्यमंत्री की रुचि तो केरल में जाकर वहां के स्वास्थ्य सेवा पर टीका-टिप्पणी करने में ज्यादा है, जहां बच्चों की इस तरह की मौतें बहुत ही कम होती हैं।

मनोज ने बताया कि साहित्य में भी मदन मोहन के उपन्यास ‘जहां एक जंगल था’ और एक-दो कविताओं के अतिरिक्त इंसेफेलाइटिस की बीमारी का कोई प्रगटीकरण नहीं है।

संचालन करते हुए सुधीर सुमन ने इंसेफेलाइटिस से हुई बच्चों की मौतों में सरकार और स्वास्थ्य तंत्र की विफलताओं को ढंकने की कोशिश के विरुद्ध एक जनपक्षीय पत्रकार के बतौर मनोज कुमार सिंह के संघर्ष का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि मनोज लगातार इस बीमारी को लेकर लिखते रहे हैं, पर इस बार जिस लापरवाही और संवेदहीनता की वजह से बड़े पैमाने पर बच्चों की मौतें हुईं, जो कि एक किस्म की हत्या ही थी, उसके पीछे की वजहों और उसके लिए जिम्मेवार लोगों और उनके तंत्र का गोरखपुर न्यूज ऑनलाइन वेब पोर्टल के जरिए मनोज ने बखूबी पर्दाफाश किया। सच पर पर्दा डालने की सत्ता की कोशिशों के बरअक्स निर्भीकता के साथ उन्होंने जो संघर्ष किया, वह वैकल्पिक मीडिया में लगे लोगों के लिए अनुकरणीय है।

सवाल-जवाब के सत्र से पूर्व, चर्चित चित्रकार अशोक भौमिक ने व्याख्यानकर्ता मनोज कुमार सिंह को स्मृति-चिह्न के बतौर कुबेर दत्त द्वारा बनाई गई पेंटिंग दी। गोरखपुर में स्वास्थ्य तंत्र और सरकार की नाकामियों और संवेदनहीनता की वजह से मारे गए बच्चों की याद में जन संस्कृति मंच के कला समूह द्वारा पेंटिंग प्रदर्शनी लगाए जाने तथा उससे होने वाली आय के जरिए इंसेफेलाइटिस के निदान के लिए चलने वाले प्रयासों में मदद देने की घोषणा भी की गई।

व्याख्यान से पूर्व जसम, दिल्ली के संयोजक रामनरेश राम ने लोगों का स्वागत किया। उसके बाद प्रसिद्ध चित्रकार हरिपाल त्यागी ने कुबेर दत्त की कविताओं के नए संग्रह ‘बचा हुआ नमक लेकर’ का लोकार्पण किया। कवि-वैज्ञानिक लाल्टू द्वारा लिखी गई इस संग्रह की भूमिका का पाठ श्याम सुशील ने किया। सुधीर सुमन ने कहा कि इस संग्रह कविताओं में कुबेर दत्त की कविता के सारे रंग और अंदाज मौजूद हैं। उन्होंने कवि के इस संग्रह और अन्य संग्रहों में मौजूद बच्चों से संबंधित कविताओं का पाठ किया। कुबेर दत्त की कविताओं के हवाले से यह बात सामने आई कि नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के असर में विकसित राजनीतिक-धार्मिक सत्ता की उन्मत्त तानाशाही बच्चों के लिए यानी मनुष्य के भविष्य के लिए भी खतरनाक है। नब्बे के दशक के शुरुआत में लिखी गई अपनी एक कविता में उन्होंने जिन सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों की शिनाख्त की थी, वे आज हूबहू उसी रूप में हमारे सामने हैं। गोरखपुर में भी वहीं उन्मादी, नृशंस और जनता के प्रति संवेदनहीन प्रवृत्ति वाला चेहरा नजर आया।

अध्यक्षता करते हुए बनारस से आए साहित्यकार वाचस्पति ने कहा कि सरकार की जो आपराधिक लापरवाही और नेतृत्व का जो पाखंड है, उसे मनोज कुमार ने अपने व्याख्यान के जरिए स्पष्ट रूप से दिखा दिया। इस बीमारी से बचाव के लिए निरंतर संघर्ष की आवश्यकता है। उन्होंने कुबेर दत्त से जुड़े संस्मरण भी सुनाए।

आयोजन के आरंभ में मशहूर फिल्म निर्देशक कुंदन शाह और उचित इलाज के अभाव में मारे गए बच्चों को एक मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गई।

इस मौके पर वरिष्ठ कवि राम कुमार कृषक, रमेश आजाद, वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा, जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेन्द्र कुमार, रामजी राय, दूरदर्शन आर्काइव्स की पूर्व निदेशक कमलिनी दत्त, कहानीकार महेश दर्पण, दिनेश श्रीनेत, कौशल किशोर, पत्रकार पंकज श्रीवास्तव, अभिषेक श्रीवास्तव, कवि मदन कश्यप, दिगंबर, रंगकर्मी जहूर आलम, कवि शोभा सिंह, कहानीकार योगेंद्र आहूजा, आलोचक प्रणय कृष्ण, आशुतोष कुमार, राधिका मेनन, पत्रकार भाषा सिंह, अशोक चौधरी, डॉ. एसपी सिन्हा, प्रभात कुमार, राजेंद्र प्रथोली, गिरिजा पाठक, अमरनाथ तिवारी, अनुपम सिंह, मनीषा, रविप्रकाश, बृजेश यादव, इरेंद्र, मृत्युंजय, तूलिका, अवधेश, मुकुल सरल, रविदत्त शर्मा, सोमदत्त शर्मा, संजय भारद्वाज, गीतेश, सुनीता, रूचि दीक्षित, अंशुमान, कपिल शर्मा, रामनिवास सिंह, सुनील चौधरी, सुजीत कुमार, कनुप्रिया, असद शेख, नौशाद राणा, शालिनी श्रीनेत, रोहित कौशिक, माला जी, दिवस, अतुल कुमार, उद्देश्य आदि मौजूद थे।

प्रस्‍तुति‍ : सुधीर सुमन



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *