गुम चोट : रेखा चमोली

रेखा चमोली

 नीलिमा हतप्रभ है। उसे समझ नहीं आ रहा, यह सब क्या हो रहा है। सीमा के पिताजी, मनोज की दादी, पडो़स के दिनेश चाचा और बाकि सारे लोग क्यों उसकी माँ पर इतना गुस्सा हो रहे हैं।

उसकी माँ तो चुपचाप अपना काम कर रही थी। वह भी बडी मैडम से पूछकर। सारे बच्चे मैडम के साथ कक्षा में काम कर रहे थे। अचानक बाहर शोर होने पर जब मैडम बाहर देखने आयीं तो वे सब भी पीछे-पीछे बाहर आ गये। बाहर आकर देखा, उनके गाँव के खूब सारे लोग बडी़ जोर-जोर की आवाज में बातें कर रहे हैं। उनकी बातों में अपनी माँ का नाम सुनकर वह पहले चौंकी, फिर घबरा गयी। शोर सुनकर उसकी माँ भी रसोईघर से बाहर आ गयी। सबने माँ को घेर लिया। वे सब माँ से बहुत नाराज थे। नीलिमा ने माँ की ओर देखा। माँ के चेहरे पर डर देखकर उसकी आँखों में आँसू आ गये। पिछले कई दिनों से जो अन्जाना डर उसे महसूस हो रहा था, उसके चलते उसे आज कुछ बुरा होने की आशंका होने लगी। वह दरवाजे का कोना थामकर चुपचाप एकटक माँ को देखने लगी। बडी़ मैडम ने लोगों से आराम से बैठकर बात करने को कहा, पर वे फिर भी शोर मचाते रहे।

‘‘मैडम जी, मेरे नातियों ने दो दिन से स्कूल में खाना नहीं खाया।’’ मनोज की दादी ने बडी़ मैडम से कहा।

‘‘क्यों ? क्यों नहीं खाया उन्होंने खाना?’’ बडी़ मैडम ने पूछा।

‘‘आपने जो नयी भोजनमाता लगायी है, उस कारण।’’

‘‘नयी भोजनमाता ने क्या खाना अच्छा नहीं बनाया या साफ-सफाई से नहीं बनाया।’’

‘‘ऐसी बात नहीं है बेटी, तुम तो सब समझती हो। यहाँ ये बच्चे इसके हाथ का बना खाना खाएँगे और घर आकर हमारे साथ खाना खाएँगे तो हमारा धर्मभ्रष्ट होगा कि नहीं। हम तो इन बच्चों का जूठा भी खाते हैं।’’ गोलू के दादाजी आगे आकर बोले, ‘‘हम जानते हैं, तुमने तो अपनी ड्यूटी निभानी ही थी, पर इन लोगों को तो विवेक होना चाहिये कि नहीं?’’

‘‘ये आप किस जमाने की बात कर रहे हैं?’’ नीरा मैडम बोलीं।

‘‘हम इसी जमाने की बात कर रहे हैं, मैडम जी। आप अभी के अभी नीलिमा की माँ को स्कूल से बाहर करो वरना ठीक नहीं होगा।’’ सीमा के पिताजी ने गुस्से से कहा।

‘‘हमने तो इसके घरवाले को पहले ही समझाने की कोशिश की थी, पर वो माना ही नहीं।’’पीछे से एक आवाज आयी।

बडी़ मैडम बार-बार आराम से बैठकर बात करने को कह रही थीं, पर लोग उनकी बात सुनने को राजी ही नहीं हो रहे थे। इतने में कुछ लोगों ने रसोई में जाकर खाना गिरा दिया और बाकि सामान भी इधर -उधर फेंक दिया। मनोज की दादी ने नीलिमा की माँ को रसोई के पास से खींचकर बाहर निकाला और जोर से धक्का दिया, जिससे वह नीचे गिर पडी़। नीलिमा दौड़कर माँ के पास गयी, तो मनोज की दादी ने ‘पीछे हट छोकडी़’ कहकर उसे दूर धकेल दिया।

नीलिमा रोने लगी। उसका छोटा भाई भी उसके पास आकर रोने लगा। मैडम और बाकि सारे लोगों की बातें सुनकर नीलिमा को ध्यान आया कि पिछले दो दिनों से उसकी माँ दूसरी भोजनमाता के साथ मिलकर स्कूल का खाना बना रही थी और पिछले दो दिनों से ही कुछ बच्चे स्कूल में खाना नहीं खा रहे थे। उन्हें मैडम ने डाँटा, जबरदस्ती खाना खाने बिठाया, लेकिन उन्होंने भूख नहीं है या मन नहीं कर रहा, कहकर खाना खाने से मना कर दिया। इस पर मैडम ने कहा कि कुछ दिनों में सब फिर से खाना खाने लगेंगे।

इन्होंने तो सारा खाना गिरा दिया। अब कहाँ से खाएँगे बच्चे खाना, नीलिमा सोचने लगी। अभी दो दिन पहले तक तो सब ठीक चल रहा था। उसकी माँ उसे और उसके छोटे भाई को सुबह जगाती, उनका हाथ मुँह धुलाती, स्कूल के लिए तैयार करती और दोनों भाई-बहन चल पड़ते स्कूल की तरफ। जिस दिन माँ को जंगल या खेतों में काम करने जल्दी जाना होता, उस दिन उसके पिता या दादी उन्हें तैयार करते। कभी-कभी जब सब लोग जल्दी काम पर चले जाते तो पडो़स की दादी या बुआ उन्हें आवाज देकर जगाते। उस दिन नीलिमा खुद को ज्यादा जिम्मेदार महसूस करती। वह छोटे भाई को जगाती, उसका नित्यक्रम करवाकर, हाथ-मुँह धुलवाकर तैयार करती। माँ की रखी रोटी और गुड टोकरी में से निकालकर खुद भी खाती, भाई को भी खिलाती। अगर स्कूल के लिए देर हो रही होती तो गुड को रोटी के अन्दर रखकर भाई के हाथ में दे देती, जिसे वह रास्ते में खाते-खाते जाता। कभी-कभी उसका भाई उठने में बहुत नखरे दिखाता, तब उसका मन करता कि उसे दो थप्पड लगा दे, पर थप्पड लगाने से वह रोने लगता और बहुत देर में चुप होता। इसलिए वह उसे कोई-न-कोई बहाना बनाकर उठाती। रास्ते में उन्हें और भी बच्चे मिलते। सारे बच्चे गपियाते, बतियाते, धकियाते, मस्ती करते स्कूल की तरफ चल पड़ते। स्कूल पहुँचकर स्कूल की सफाई करते, प्रार्थना करते, कविता-कहानी कहते-सुनते, कक्षा में काम करते। मध्यान्तर होने पर सारे बच्चे आँगन में लाइन बनाकर बैठते। भोजनमाता राहुल की माँ सबको बारी-बारी से दाल-भात परोसती। सारे बच्चे खाना खाते, अपनी-अपनी थाली धोते और खेलते। शुरू-शुरू में कुछ बच्चे अपनी थाली उठाकर बाकि बच्चों से दूर जाकर बैठते थे। कुछ बच्चे रसोई में ही खाना खाते थे। नीरा मैडम ने सारे बच्चों को एक साथ बिठाकर भोजनमाता को खाना परोसने को कहा, तबसे सारे बच्चे एक साथ बैठकर ही खाना खाते हैं। उसने कई बार नीरा मैडम को यह कहते हुए सुना कि ‘यह सब स्कूल में नही चलेगा। दुनिया कहाँ की कहाँ पहुँच गई और हम इन्हीं सब बातों में उलझे पडे़ हैं।’

कुछ दिनों पहले स्कूल में सारे अभिभावकों की एक बैठक हुई थी, जिसमें नीलिमा के पिताजी भी आए थे। उन्होंने घर आकर बताया कि स्कूल में एक और भोजनमाता की नियुक्‍त‍ि होने वाली है और नियमानुसार वह भोजनमाता अनुसूचित जाति की व बीपीएल कार्ड वाली ही होनी चाहिए। उन्होंने कल ही नीलिमा की माँ की अर्जी देने की बात घर में कही।

‘‘तेरा दिमाग तो खराब नहीं हो गया। कैसे बनाएगी तेरी बुवारी(बहू) स्कूल में खाना। उसका बनाया खाना बामनों और ठाकुरों के बच्चे कैसे खाएँगे?’’ दादा जी ने कहा।

‘‘खाएँगे कैसे नहीं। मेरी बुवारी को क्या खाना बनाना नहीं आता? वैसे भी उसे कौन सा अकेले खाना बनाना है। जोशी भाभी जी तो हैं ही वहाँ।’’

‘‘फालतू बात मत कर बेटा, शादी-ब्याह में तो तेरी बुवारी जाती नहीं खाना खाने कि वहाँ उसे सबसे बाद में खाना खाना पड़ता है। वो भी कोई दूसरा किनारे पर लाकर दे, तब। दाल-भात, हलवा-पूरी सब एक साथ मिलकर ‘कल्च्वाडी’ बन जाता है। अभी भी तेरी माँ ही जाती है, शादी-ब्याह में खाना लेने। तेरी बुवारी तो कहती है कि वैसे खाने से तो भूखा रहना ही ठीक है।’’

‘‘पिताजी, घर गाँव की बात और है, स्कूल में ऐसा कुछ नहीं होगा। सरकार चाहती है कि स्कूल में छोटा-बडा़, जात-पात का भेदभाव न रहे। बच्चों के मन में किसी तरह की हीनभावना न रहे, जिससे कि आने वाले समय में हमारे समाज से ये कुप्रथाएँ हमेशा के लिए खत्म हो जाएँ। इसलिए सरकार ने यह नियम निकाला है कि भोजनमाता अनुसूचित जाति की भी होनी चाहिए।’’

‘‘सरकार के चाहने से कुछ नहीं होता, बेटा। सरकार के चाहने से मदनू का बाप प्रधान बन गया तो बता, गाँव के कितने लोगों ने खाना खा लिया, उसके घर पर। अरे चार लोग उसके साथ बाहर कहीं चाय भी पीते हैं, तो अपना गिलास पहले ही अलग कर लेते हैं। बेटा क्यों पड़ रहा है इस चक्कर में, क्‍यों बैर ले रहा है सबसे, नी खाने देगा दो रोटी चैन से इस गाँव में।’’

‘‘पिताजी, क्या तुम यह चाहते हो कि जो दुर्व्‍यवहार  तुम्हारे-मेरे साथ हुआ, वो हमारे बच्चों के साथ भी हो। तुम भूल सकते हो, पर मैं वो दुत्कारना, हमारे साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार करना, हमें अपना जडखरीद गुलाम समझना, वो सब नहीं भूल सकता। हम सब सहन करते रहे तो क्या हमारे बच्चे भी करेंगे, नहीं बिल्कुल नहीं। मैं मर जाऊॅगा, पर अर्जी वापस नहीं लूँगा।’’

‘‘लेकिन बेटा।’’

‘‘पिताजी! तुम चुप रहो, मैंने जो सोच लिया वो सोच लिया। किसी-न-किसी को तो शुरुआत करनी ही होगी। देख लेंगे, जो होगा।’’

उसके पिता, दादाजी, दादी, चाचा, माँ सब देर तक जाने क्या-क्या बातें करते रहे। नीलिमा दादी की गोद में लेटे-लेटे सुनती रही। उसे भी ध्यान आया, पिछली बार जब वह दीपिका की बुआ की शादी में गयी थी, तो गुलाबजामुन देने वाले रविन्दर ने कैसे उसे डाँटा था और बाद में आने को कहा था। लेकिन जब सूरज और निशा ने गुलाबजामुन माँगें थे तो उन्हें कुछ भी नहीं कहा और गुलाबजामुन दे दिए थे। स्कूल में भी जब भोजनमाता बच्चों से पानी मॅगवाती तो उसे मना कर देती और डाँट देती। और उस दिन, जब पकड़न पकडा़ई खेलते-खेलते वह गरिमा के पीछे दौड़ते हुए उसकी रसोई तक पहुँच गयी थी, तो उसकी दादी ने उसको गाली देते हुए कैसे बाहर भेजा था। वह समझ नहीं पाती कि ऐसा उसी के साथ क्यों होता है, स्कूल में तो वह सारे बच्चों के साथ खेलती, पर घर आकर वे ही बच्चे अपने भाई-बहनों के साथ खेलने लगते और उसकी तरफ ध्यान ही नहीं देते। जब उनकी तरफ वाले नल पर पानी बन्द हो जाता तो वह बडे़ धारे पर पानी भरने जाती। वहाँ या तो उसकी बारी सबसे बाद में आती या फिर कोई महिला किनारे पर ही अपने बर्तन से उसका बर्तन भरकर उसे जाने को कहती। जबकि उसका मन पानी की मोटी धारा के नीचे भीगने, पानी पीने का हो रहा होता। कभी-कभी जब धारे पर कोई न होता, वह देर तक पानी से खेलती, हाथ-मुँह धोती, धारे के नरसिंह वाले मुँह पर प्यार से हाथ फेरती, इधर-उधर देखकर पता लगाना चाहती कि धारे के अंदर इतना पानी आता कहाँ से है। ऐसे में अगर ऊपर मोहल्ले से कोई पानी भरने आ जाता तो वह जल्दी से पानी भरकर लौट आती। पीछे से उसे सुनाई पड़ता, ‘‘सारा धारा गन्दा कर दिया।’’ वह जानती थी कि‍ वह आदमी पहले धारा खूब धोएगा फिर पानी भरेगा। वह सोचती- मैंने धारा कैसे गन्दा कर दिया। जब धारे के नीचे कपडे़ धोते हैं, नहाते हैं, बर्तन धोते हैं, तब तो धारा गन्दा नहीं होता! उसकी माँ तो कपडे़ धोने गधेरे पर ले जाती है। माँ कपडे़ धोती है और वह अपने भाई के साथ उन्हें पत्थरों पर सुखाने डालती है। बडा़ मजा आता है। गर्मियों में उनकी माँ उन्हें वहाँ नहला भी देती है।

कभी-कभी वह अपने भाई को लेकर ऊपर वाले मुहल्ले में खेलने जाती तो उसे वहाँ कोई-न-कोई ऐसा जरूर मिल जाता, जो बिना बात उनको वहाँ से डाँट कर भगा देता। वह घर आकर अपने पिता से उसकी शिकायत करती तो वह हँसकर उसकी बात टाल देते, पर वह देखती कि हँसने के बावजूद उसके पिता के चेहरे पर अजीब सा भाव आ जाता। उसके पिता दसवीं फेल थे और खच्चर चलाते हैं। उनकी बडी़ इच्छा है कि वह और उसका भाई खूब पढ़ें-लिखें और बडा़ आदमी बनें। वह कक्षा तीन में पढ़ती है और उसका भाई एक में। वह खूब मन लगाकर पढ़ती है। उसकी दोनों मैडम उससे बहुत प्यार करती हैं। जब भी स्कूल में कोई आता है, तो उसका नाम लेकर कुछ-न-कुछ बात जरूर करती हैं। उसे यह सब बडा़ अच्छा लगता है। उसे नीरा मैडम बहुत अच्छी लगती है। वह सारे बच्चों से प्यार से बात करती हैं। उनके साथ खेलती हैं और कभी-कभी उन्हें स्कूल के आसपास घूमाने भी लेकर जाती हैं। उसने सोचा है कि‍ वह भी बडी़ होकर मैडम बनेगी।

दूसरे दिन उसके पिता स्कूल में अर्जी दे आए। उसके बाद उनके घर में अक्सर उसके दादाजी और पिता में बहस होने लगी। उसके दादाजी बार-बार उसके पिता से अर्जी वापस लेने के लिए कहते, पर उसके पिता ने तो जैसे इस मामले में दादाजी की बात न मानने की कसम ही खा रखी थी। नीलिमा को अपने घर में छिडी़ इस बहस से इतना ही लेना-देना था कि खाना खाते समय अनचाहे ही उसे यह सब सुनना पड़ता था। एक बार उसने अपनी माँ से पूछा भी कि दादाजी उसको भोजनमाता क्यों नहीं बनना देना चाहते तो माँ ने ‘तेरे मतलब की बात नहीं है’ कहकर डपट दिया था। इसी तरह की बहस स्कूल में बडी़ मैडम और नीरा मैडम के बीच भी होती रहती। नीलिमा का ध्यान अपने आप इस बहस की तरफ चला जाता क्योंकि बहस के बीच में उसकी माँ को लेकर भी बातें होतीं। बडी़ मैडम नहीं चाहती थीं कि उसकी माँ भोजनमाता बने। इस पर नीरा मैडम कहती, ‘‘नियमानुसार जो ठीक है, वो ही होना चाहिए। हम जैसे पढे़-लिखे लोग सामाजिक कुरीतियों से नहीं लडे़ंगे, तो कौन लडे़गा।’’ बीच-बीच में और लोग भी स्कूल में आकर भोजनमाता बनने की बात करते। जब स्कूल में साहब आए तो बडी़ मैडम ने उनसे कहा, ‘‘आपने मुझे किस मुसीबत में डाल दिया। मैं किस-किस को समझाऊँ।’’

‘‘मैडम, हम क्या करें। नौकरी करनी है तो सरकारी आदेशों का पालन करना ही होगा। वैसे भी आपके स्कूल में अनुसूचित जाति के बच्चे बहुत ज्यादा हैं।’’ साहब ने कहा था।

नीलि‍मा को पता था कि‍ वह और उसका भाई भी अनुसूचित जाति के बच्चे हैं क्योंकि उन्हें छात्रवृत्ति मिलती है। एक बार गरिमा ने पंचगारे खेलते हुए जल्दी आउट होने पर उसे गाली भी दी थी, ‘‘तुम्हें तो छात्रवृत्ति भी मिलती है। फिर भी तुम गरीब हो! भिखमंगे कहीं के!’’ उसकी क्या गलती, अगर गरिमा को छात्रवृत्ति नहीं मिलती तो। वो भी बन जाए अनुसूचित जाति की। उसके पिताजी तो कागज बना कर लाए थे। मैडम को दिया था। ये अनुसूचित जाति क्या होता है, हम क्यों हैं अनुसूचित जाति के, सारे बच्चे अनुसूचित जाति के क्यों नहीं हैं, फिर सबको छात्रवृत्ति मिलती, गरिमा भी मुझसे नाराज नहीं होती। वह जाने क्या-क्या सोचती। जब माँ से कुछ पूछती तो माँ कहती, बडी़ होकर समझ जाएगी। उसे अपने बडे़ होने का इन्तजार होता।

कुछ भी हो नीलिमा और उसका भाई दोनों बहुत खुश थे। अब उनकी माँ भी रोज उनके स्कूल आएगी। जब वह स्कूल में उनको खाना देगी तो क्या के शर्माएँगे। दोनों भाई-बहन जाने क्या-क्या सोचते। नीलिमा सोचती- अगर उनको स्कूल में कोई बच्चा तंग करेगा तो वह उसकी शिकायत अपनी माँ से कर देगी। राहुल कितनी तडी मारता है, अपनी माँ की और उसकी माँ सब बच्चों को डाँटती रहती है। जैसे कि हमारी मैडम होगी हुँअ।

नीलिमा की माँ उठो! लो पानी पी लो। नीरा मैडम की आवाज से उसका ध्यान टूटा। नीरा मैडम उसकी माँ को उठाती हैं। उसकी माँ के नाक से खून निकल रहा है, जिसको वह अपने धोती के पल्लू से साफ करने की कोशिश कर रही है। रसोई घर के बाहर दाल-भात गिरा पडा़ है। बच्चों की थालियाँ इधर-उधर बिखरी हैं। नीलिमा अपनी माँ के पास जाना चाहती है, पर जा नहीं पा रही। उसका भाई उससे चिपक कर खडा़ रो रहा है। अचानक नीलिमा ने अपने भाई का हाथ पकडा़, अपना व उसका बस्ता उठाया और दौड़ पडी़ अपने घर की ओर। वह जल्द से जल्द अपने पिता के पास पहुँच जाना चाहती थी।



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