क्रांति के रागिनी हम त गइबे करब/ केहू का ना सोहाला त हम का करीं

क्रांतिकारी जनगीतकार रमाकांत द्विवेदी रमता का 24 जनवरी को स्मृति दिवस है। उन पर लेखक-पत्रकार सुधीर सुमन को लेख और उनके कुछ गीत-

स्वाधीनता सेनानी और हिंदी-भोजपुरी के प्रसि़द्ध जनकवि रमाकांत द्विवेदी रमता 24 जनवरी 08 स्मृतिशेष हुये थे। आज भी परिवर्तन के प्रयास से जुड़े संस्कृतिकर्मियों की जुबान पर उनके गीत रहते हैं। उनका संघर्षमय जीवन क्रांतिकारी जनराजनीति और जनसंस्कृति के कार्यों में लगे लोगों के लिए बहुत उत्‍प्रेरक है। उनका जीवन इसका उदाहरण है कि स्वाधीनता आंदोलन ने जिन राजनीतिक आकांक्षाओं और जिस तरह के राष्ट्र के स्वप्न को जन्म दिया था, वे 1947 में पूरी नहीं हुये। उसके लिए संघर्ष 1947 के बाद भी जारी रहा और आंदोलनों के गर्भ से निकली जनसंस्कृति की परंपरा भी निरंतर जारी रही। रमाकांत रमता द्विवेदी हिंदी-भोजपुरी की जो जनधर्मी परंपरा है, उसके बहुत बड़े रचनाकार हैं, एक ऐसे रचनाकार जिनके रग-रग में जनता की राजनीति के प्रति जबर्दस्त प्रतिबद्धता थी। वह क्रांति की आकांक्षा के ही नहीं, बल्कि क्रांति के कर्म के कवि  थे। आज भोजपुर में जनसंस्कृति मंच के साथी उन्हें याद करेंगे। कल यहाँ की स्थानीय नाट्य संस्था ‘युवानीति’ और वीर कुंवर सिंह वि.वि., भोजपुरी विभाग की ओर से उनकी याद में एक काव्यगोष्ठी भी आयोजित की गई है।

30 अक्टूबर, 1917 में भोजपुर जिले के बड़हरा प्रखंड के महुली घाट में जन्मे रमता जी का पूरा जीवन आजादी और सुराज के लिए जारी संघर्षों के प्रति समर्पित रहा। उनमें क्रांति और समाजवाद के प्रति युवाओं-सी ऊर्जा, आवेग और आस्था थी। उनके विप्लवी जीवन ने कई पीढि़यों को क्रांतिकारी रास्ते पर चलने की प्रेरणा दी।

युवावस्था में ही रमता जी आजादी के आंदोलन में कूद पड़े। ‘घरे घरे चरखा चलइहें भारवसिया’ के सपने से उनके राजनीतिक सफर की शुरूआत हुई। 1932 में वह नमक सत्याग्रह के दौरान जेल गए। 1941 तक आते-आते गांधीवादी आंदोलन से उनका मोहभंग हो गया। 1941 में ही ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें फिर जेल में डाल दिया। जुलाई 1941 की एक कविता में उन्होंने ऐलान किया कि ‘क्रांतिपथ पर जा रहा हूँ/धैर्य की कडि़याँ खटाखट तोड़कर मैं आ रहा हूँ।’ 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सचमुच युवकों ने धैर्य की कडि़याँ तोड़ डालीं। रमता जी भी उस आंदोलन की अगली कतार में थे। इनके साथियों ने रेलवे पटरियाँ भी उखाड़ीं। 1943 में उनकी पुनः गिरफ्तारी हुई और उन्हें यातना भी दी गई। 1943 में ही उन्होंने अपनी एक रचना में भविष्य के अपने रास्ते का संकेत दे दिया- ‘रूढि़वाद का घोर विरोधी, परिपाटी का नाशक हूँ/ नई रोशनी का प्रेमी, विप्लव का विकट उपासक हूँ… मैं तो चला आज, जिस पथ पर भगत गए, आजाद गए/खुदीराम-सुखदेव-राजगुरु-विस्मिल रामप्रसाद गए।’

1947 की आजादी और उसके बाद के राजकाज से वह जरा भी संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने अपने एक भोजपुरी गीत में लिखा कि ‘हम त शुरूए में कहलीं कि सुलहा सुराज ई कुराज हो गइल/रहे जेकरा प आशा-भरोसा उ नेता दगाबाज हो गइल।’ इसके बाद लगातार वामपंथी राजनीति में उनकी दिलचस्पी बढ़ती गई। पहले वह सीपीएम में गए। सीपीएम में रहते हुए ही वह 1966 के बिहार बंद में जेल गए। उसके थोड़े दिनों के बाद ही उनका सीपीआई (एमएल) से जुड़ाव हुआ। 1980-81 में जब सीपीआई (एमएल) का बाकायदा सदस्यता अभियान शुरू हुआ तो वह भी सदस्य बन गए और जीवनपर्यंत पार्टी द्वारा संचालित आंदोलनों में सक्रिय रहे। माले के आंदोलनों के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। बिहार राज्य जनवादी देशभक्त मोर्चा और आईपीएफ के गठन में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। वह माले के केंद्रीय कंट्रोल कमिशन के भी सदस्य थे।

भाकपा-माले को वह अपना घर समझते थे। मृत्यु से एक सप्ताह पूर्व जब वे आरा आए थे तो जिद करके पार्टी के जिला कार्यालय आए कि ‘हमरा आपन घर ले चल लोग।‘ शारीरिक स्तर पर कमजोरी के बावजूद वह दिसंबर में कोलकाता में आयोजित पार्टी के महाधिवेशन में जाने के लिए अड़ गए थे। किसी तरह कामरेडों ने उन्हें मनाया। 2002 में जब झारखंड में का. दीपंकर की गिरफ्तारी के खिलाफ जनप्रदर्शन का आयोजन किया गया था तो वह भी बिहार के लोगों के साथ पहुँच गए। वह उन वरिष्ठ क्रांतिकारियों में से थे जिन्होंने भोजपुर की मिट्टी में सीपीआई (एमएल) को स्थायित्व प्रदान करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जनगीत के पहलू से देखें तो गोरख पांडेय और विजेन्द्र अनिल ने रमता जी की ही वैचारिक परंपरा को आगे बढ़ाया। कुंवर सिंह पर रचित उनका गीत जनराजनीतिक दृष्टि से बेहद धारदार है। 1857 पर चल रही राजनीतिक बहसों के मद्देनजर भी उस गीत को देखा जाना चाहिए। ‘हमनी देशवा के नया रचवइया हईं जा/हमनी साथी हई, आपस में भइया हईं जा’, ‘राजनीति सब के बूझे के, बूझावे के परी/देश फसल बांटे जाल में, छोड़ावे के परी’, ‘भारत में रंगत दिखाय दियो रे, दिल्ली वाली रनिया’, ‘काहे फरके-फरके बानीं, रउरो आईं जी/हामार सुनीं, कुछ अपनो सुनाईं जी’, ‘पेरल जाई परजा, चुआवल जाई तेल/रनिया से बीसे रही रजवा के खेल’, ‘ढेवर के बैल’, ‘अब शहरे में रहे के विचार बा’,’हरवाह-बटोही संवाद’, ‘बेयालिस के साथी’, ‘किसान’, ‘सुरजवा के कारन छैला हो गइले दीवाना’, ‘शहीदों का गीत’, ‘मैं तो नक्सलवादी’, ‘जीने के लिए कोई बागी बने, धनवान इजाजत ना देगा/कोई धर्म इजाजत ना देगा, भगवान इजाजत ना देगा’, ‘भारत जननि तेरी जय हो’, ‘लाल मंतर’, ‘नया आदमी’, ‘सरकारी हिंसा हिंसा न भवति’, ‘आजादी की लगन लगी लगी जब’, ‘अमर शहीद कवि कैलाश’, ‘विद्रोही’, ‘क्रांतिपथ’, ‘जिंदा शहीद’, ‘नक्सलबाड़ी की जय’, ‘मुक्ति का पंथ’, ‘झंडा ना कबहूं झुकाइब’, ‘नई जिंदगी’ आदि उनकी चर्चित रचनाएं हैं। उनका रचनात्मक तेवर देखने लायक है- क्रांति के रागिनी हम त गइबे करब/केहू का ना सोहाला त हम का करीं/लाल झंडा हवा में उड़इबे करब/केहू जरिके बुताला त हम का करीं।

रमता जी के गीत

1.
राजनीति सब के बुझे के बुझावे के परी
देश फंसल बाटे जाल में, छोड़ावे के परी

सहि के लाखों बरबादी, मिलल नकली आजादी
एहके नकली से असली बनावे के परी

कवनो वंशे करी राज, या कि जनता के समाज
जतना जलदी, जइसे होखे, फरियावे के परी

बड़-बड़ सेठ-जमींदार, पुलिस-पलटनिया हतेयार
सब लुटेरन, हतेयारन के मिटावे के परी

रूस, अमरीका से यारी, सारी दुनिया के बीमारी
अपना देश के एह यारी से बचावे के परी

कहीं देश फिर ना टूटे, टूटल-फूटल बा से जुटे
सबके हक के झंडा ऊंचा फहरावे के परी

सौ में पांचे जहां सुखिया, भारत दुनिया ऊपर दुखिया
घर-घर क्रांति के संदेशा पहुंचावे के परी
25.9.1984

2.
भारत जननि! तेरी जय, तेरी जय हो

हों वीर, रणधीर तेरी सु-संतान
तरी सभी संकटों पर विजय हो

आजाद, अस्फाक, बिस्मिल, खुदीराम
उधम, भगत सिंह का फिर उदय हो

चारू की, राजू की, किस्टा-भुमैया की
जौहर की आवाज गुंजित अभय हो

जनगण हों आजाद, कायम हो जनवाद
सत्ता निरंकुश का अंतिम प्रलय हो
18.2.1984

मैं तो नक्सलवादी
मैं तो नक्सलवादी वंदे! मैं तो नक्सलवादी रे
मुझसे तनिक सही ना जाए अब घर की बरबादी रे

लूटे मेरा देश विदेशी जंगखोर साम्राजी
साथ-साथ सामंत रिजाला, पूंजीवाला पाजी
सबके मन सहकाए, जो बैठे दिल्ली की गद्दी रे

खट-खट के खलिहान-खेत में, मिल में और खदान में
मर-मर सब सुख साज सजावे गांव-नगर-मैदान में
दो रोटी के लिए बने वह द्वार द्वार फरियादी रे

भ्रष्टाचार-भूख-बेकारी दिन-दिन बढ़े सवाई
अत्याचार विरोधी को सरकार कहे अन्यायी
यह कैसा जनतंत्र देश में, यह कैसी आजादी रे

मैं तो वंदे! अग्नि-पंथ का पंथी दूर मुकामी
मेरे संगी-साथी ये अंतिम जुझार संग्रामी
रोटी-आजादी-जनवाद हेतु जो करें मुनादी रे
30.4.85

बेयालिस के साथी
साथी, ऊ दिन परल इयाद, नयन भरि आइल ए साथी

गरजे-तड़के-चमके-बरसे, घटा भयावन कारी
आपन हाथ आपु ना सूझे, अइसन रात अन्हारी
चारों ओर भइल पंजंजल, ऊ भादो-भदवारी
डेग-डेग गोड़ बिछिलाइल, फनलीं कठिन कियारी
केहि आशा वन-वन फिरलीं छिछिआइल ए साथी

हाथे कड़ी, पांव में बेड़ी, डांड़े रसी बन्हाइल
बिना कसूर मूंज के अइसन, लाठिन देह थुराइल
सूपो चालन कुरुक करा के जुरुमाना वसुलाइल
बड़ा धरछने आइल, बाकी ऊ सुराज ना आइल
जवना खातिर तेरहो करम पुराइल ए साथी

भूखे-पेट बिसूरे लइका, समुझे ना समुझावे
गांथि लुगरिया रनिया, झुखे, लाजो देखि लजावे
बिनु किवांड़ घर कूकुर पइसे, ले छुंछहंड़ ढिमिलावे
रात-रात भर सोच-फिकिर में आंखों नींन न आवे
ई दुख सहल न जाइ कि मन उबिआइल ए साथी

क्रूर-संघाती राज हड़पले, भरि मुंह ना बतिआवसु
हमरे बल से कुरसी तूरसु, हमके आंखि देखावसु
दिन-दिन एने बढ़े मुसीबत, ओने मउज उड़ावसु
पाथर बोझल नाव भवंर में, दइबे पार लगावसु
सजगे! इन्हिको अंत काल नगिचाइल ए साथी
8.6.53

अइसन गांव बना दे
अइसन गांव बना दे, जहां अत्याचार ना रहे
जहां सपनों में जालिम जमींदार ना रहे

सबके मिले भर पेट दाना, सब के रहे के ठेकाना
कोई बस्तर बिना लंगटे- उघार ना रहे
सभे करे मिल-जुल काम, पावे पूरा श्रम के दाम
कोई केहू के कमाई लूटनिहार ना रहे

सभे करे सब के मान, गावे एकता के गान
कोई केहू के कुबोली बोलनिहार ना रहे
18.3.83

त हम का करीं
क्रांति के रागिनी हम त गइबे करब
केहू का ना सोहाला त हम का करीं
लाल झंडा हवा में उड़इबे करब
केहू जरिके बुताला त हम का करीं

केहू दिन-रात खटलो प’ भूखे मरे
केहू बइठल मलाई से नाष्ता करे
केहू टुटही मड़इया में दिन काटता
केहू कोठा-अटारी में जलसा करे

ई ना बरम्हा के टांकी ह तकदीर में
ई त बैमान-धूर्तन के करसाज ह
हम ढकोसला के परदा उठइबे करब
केहू फजिहत हो जाला त हम का करीं

ह ई मालिक ना, जालिम जमींदार ह
खून सोखा ह, लंपट ह, हत्यार ह
ह ई समराजी पूंजी के देशी दलाल
टाटा-बिड़ला ह, बड़का पूंजीदार ह

ह ई इन्हने के कुकुर वफादार ह
देश बेचू ह, सांसद ह, सरकार ह
सबके अंगुरी देखा के चिन्हइबे करब
केहू सकदम हो जाला त हम का करीं

सौ में पंचानबे लोग दुख भोगता
सौ में पांचे सब जिनिगी के सुख भोगता
ओही पांचे के हक में पुलिस-फौज बा
दिल्ली-पटना से हाकिम-हुकुम होखता

ओही पांचे के चलती बा एह राज में
ऊहे सबके तरक्की के राह रोकता
ऊहे दुश्मन ह, डंका बजइबे करब
केहू का धड़का समाला त हम का करीं
30.1.83

हमनी साथी हईं
हमनी देशवा के नया रचवइया हईंजा
हमनी साथी हईं, आपस में भइया र्हइंजा

हमनी हईंजा जवान, राहे चलीं सीना तान
हमनी जुलुमिन से पंजा लड़वइया हईंजा

सगरे हमनी के दल,  गांव-नगर हलचल
हमनी चुन-चुन कुचाल मेटवइया हईंजा

झंडा हमनी के लाल, तीनों काल में कमाल
सारे झंडा ऊपर झंडा उड़वइया हईंजा

बहे कइसनो बेयार, नइया होइये जाई पार
हमनी देशवा के नइया के खेवइया हईंजा
1.5.85

हामार सुनीं
काहे फरके-फरके बानीं, रउरो आईं जी
हामार सुनीं, कुछ अपनो सुनाईं जी

जब हम करींले पुकार, राउर खुले ना केवांर
एकर कारन का बा, आईं समुझाईं जी

जइसन फेर में बानी हम, ओहले रउरो नइखीं कम
कवनो निकले के जुगुति बताईं जी

सोचीं, कइसन बा ई राज, कुछ त रउरो बा अंदाज
देहबि कहिया ले एह राज के दोहाई जी

जवन सांसत अबहीं होता, का-का भोगिहें नाती-पोता
एह पर रउरो तनि गौर फरमाईं जी

अब मत फरके-फरके रहीं, सब कुछ संगे-संगे सहीं
संगे-संगे करीं बचे के उपाई जी

सभे आइल, रउरो आईं, संगे रोईं-संगे गाईं
हम त रउरे हईं, रउरा हमार भाई जी
(ये गीत समकालीन प्रकाशन से 1996 में प्रकाशित रमता जी के हिंदी-भोजपुरी गीतों के एकमात्र संग्रह ‘हामार सुनीं’ से लिए गए हैं।)

One comment on “क्रांति के रागिनी हम त गइबे करब/ केहू का ना सोहाला त हम का करीं

  1. हम त शुरूए में कहलीं कि सुलहा सुराज ई कुराज हो गइल
    रहे जेकरा प आशा-भरोसा उ नेता दगाबाज हो गइल।

    क्रांति के रागिनी हम त गइबे करब
    केहू का ना सोहाला त हम का करीं
    लाल झंडा हवा में उड़इबे करब
    केहू जरिके बुताला त हम का करीं।

    मैं तो नक्सलवादी वंदे! मैं तो नक्सलवादी रे
    मुझसे तनिक सही ना जाए अब घर की बरबादी रे

    अइसन गांव बना दे, जहां अत्याचार ना रहे
    जहां सपनों में जालिम जमींदार ना रहे

    सबके मिले भर पेट दाना, सब के रहे के ठेकाना
    कोई बस्तर बिना लंगटे- उघार ना रहे
    सभे करे मिल-जुल काम, पावे पूरा श्रम के दाम
    कोई केहू के कमाई लूटनिहार ना रहे

    केहू दिन-रात खटलो प’ भूखे मरे
    केहू बइठल मलाई से नाष्ता करे
    केहू टुटही मड़इया में दिन काटता
    केहू कोठा-अटारी में जलसा करे

    ई ना बरम्हा के टांकी ह तकदीर में
    ई त बैमान-धूर्तन के करसाज ह
    हम ढकोसला के परदा उठइबे करब
    केहू फजिहत हो जाला त हम का करीं

    ह ई मालिक ना, जालिम जमींदार ह
    खून सोखा ह, लंपट ह, हत्यार ह
    ह ई समराजी पूंजी के देशी दलाल
    टाटा-बिड़ला ह, बड़का पूंजीदार ह

    ह ई इन्हने के कुकुर वफादार ह
    देश बेचू ह, सांसद ह, सरकार ह
    सबके अंगुरी देखा के चिन्हइबे करब
    केहू सकदम हो जाला त हम का करीं

    सौ में पंचानबे लोग दुख भोगता
    सौ में पांचे सब जिनिगी के सुख भोगता
    ओही पांचे के हक में पुलिस-फौज बा
    दिल्ली-पटना से हाकिम-हुकुम होखता

    ओही पांचे के चलती बा एह राज में
    ऊहे सबके तरक्की के राह रोकता
    ऊहे दुश्मन ह, डंका बजइबे करब
    केहू का धड़का समाला त हम का करीं
    30.1.83
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    अद्भुत! लाजवाब! पर्हवइला खातिर राउर बहुते धन्यबाद! एकदम जोगा के रखे लाएक गीत- कविता!

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