कभी धूमिल नहीं होगी कुँवर नारायण की स्मृति 

कुँवर नारायण

नई दि‍ल्‍ली : मुक्तिबोध ने उन्हें पसंद किया और उनके दूसरे कविता-संग्रह ‘परिवेश : हम-तुम’ की समीक्षा करते हुए लिखा था कि वह ‘अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना और जीवन की आलोचना’ के कवि हैं।

इससे पहले मुक्तिबोध मस्तिष्काघात के चलते अपने अंतिम समय में दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में लगभग एक महीने तक कोमा में रहे थे।

उसके बाद आसन्न साहित्यिक इतिहास में शायद दूसरी बार उतनी दुखद और भयावह घटना घटी है कि उस समय के मुक्तिबोध के प्रिय युवा कवि और इन दिनों हिंदी के शीर्ष कवियों में अग्रगण्य श्री कुँवर नारायण का 15 नवम्‍बर 2017 को  दिल्ली के एक अस्पताल में मस्तिष्काघात के चलते लम्बे समय तक कोमा में रहने के बाद देहावसान हो गया।

स्तब्ध कर देनेवाली इस मुश्किल घड़ी में हम उनके उत्कृष्ट रचनात्मक और वैचारिक अवदान को समकालीन सन्दर्भों में बेहद प्रासंगिक और मूल्यवान् मानते हुए उनके प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि व्यक्त करते हैं और यह संकल्प कि शोक की इस वेला में हम उनकी जीवन-संगिनी श्रीमती भारती नारायण और उनके बेटे अपूर्व नारायण जी के साथ हैं।

हमारा समय बेशक कठिन है, जो कुँवर नारायण की विदाई से और कठिन ही हुआ है। लेकिन जब तक मनुष्यता रहेगी, कविता भी रहेगी और उसमें कुँवर जी के समुज्ज्वल हस्ताक्षर से हमें उसी तरह रौशनी मिलती रहेगी, जैसे कि उन्होंने स्वयं मनुष्यता में यह अविचलित आस्था व्यक्त की थी-

”कहीं कुछ भूल हो
कहीं कुछ चूक हो कुल लेनी देनी में
तो कभी भी इस तरफ़ आते जाते
अपना हिसाब कर लेना साफ़
ग़लती को कर देना मुआफ़
विश्वास बनाये रखना
कभी बंद नहीं होंगे दुनिया में
ईमान के ख़ाते।”

( ‘जन संस्कृति मंच’ की राष्ट्रीय परिषद की ओर से पंकज चतुर्वेदी द्वारा जारी)



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