कई संगठन फिर भी लेखकों का शोषण

पिछले दिनों सुप्रसिद्ध लेखक ज्ञानरंजन प्रगतिशील लेखक संगठन से अलग हो गए। उन्होंने जो आरोप लगाए हैं, वे बेहद गंभीर हैं। ज्ञानरंजन वर्षों से प्रगति लेखक संघ के सदस्य रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि संगठन का सांस्कृतिक पतन हो चुका है। वह यह भी कहते हैं कि जिस प्रगतिशील लेखक संघ की नींव मुंशी प्रेमचंद ने रखी, वह राजनीतिक गुटबंदी में शामिल हो गया है। उसे संपत्ति का रोग लग गया है। जब संगठन में पहले-सी विचारधारा और अनुशासन ही नहीं रहा तो यहां बने रहने का कोई मतलब नहीं है।
इसी के साथ लेखक संगठनों की प्रासंगिकता को लेकर फिर से सवाल उठने लगे हैं। इनकी नींव कब रखी गई? इन्हें बनाने का उद्देश्य क्या है? अधिकांश लेखक संगठन किसी-न-किसी राजनीतिक पार्टी से संबद्ध हैं। उन पार्टियोंं की नीतियां इन्हें किस तरह प्रभावित करती हैं? क्या किसी रचनाकर को लेखक संगठन से जुडऩा चाहिए? उसकी रचनात्मकता को संगठन किस तरह प्रभावित करते हैं? संगठन लेखकों के हितों की रक्षा करने में कितने सक्षम हैं? संगठनों की क्या भूमिका होनी चाहिए आदि मुद्दे भी अहम हैं।
लेखक संगठन की शुरुआत 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) से हुई। प्रेमचंद इसके अध्यक्ष बने। इससे पहले कुछ बड़े लेखकों ने साथी रचनाकारों के साथ मिलकर मंडल बनाए हुए थे। मसलन, भारतेंदु मंडल, द्विवेदी मंडल आदि। वैचारिक स्तर पर पहली बार लेखकों का प्रगतिशील लेखक संघ बना। इस समय जो अन्य दो वामपंथी लेखक संगठन हैं, इनका मूल प्रलेस से जुड़ा है। ये विभाजन-दर-विभाजन का परिणाम हैं। प्रलेस एक तरह से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का साहित्यिक मंच था।
तेलंगाना आंदोलन के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में मतभेद उभरने लगे। एक वर्ग सशस्त्र आंदोलन को जारी रखना चाहता था तो दूसरा कांग्रेस सरकार के साथ सहयोग करने का हिमायती था। पार्टी में पड़ रही दरार का असर प्रलेस पर पड़ा। 1962 में भारत-चीन संघर्ष के समय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की कलह सामने आ गई। 1964 में रूस या चीन को समर्थन करने के मुद्दे पर पार्टी का विभाजन हो गया। दूसरी पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) का जन्म हुआ। पार्टी के साथ-साथ लेखक संगठन में भी विभाजन हो गया। माक्र्सवादी पार्टी ने जनवादी लेखक संघ बना लिया।
नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौरान माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन हो गया। नई पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी-लेनिनवादी) अस्तित्व में आई। इसने जन संस्कृति मंच का गठन किया। संभव है कि भविष्य में पार्टी में विभाजन पर एक और लेखक संगठन का जन्म हो जाए। इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि पार्टियों में विलय होने पर ये भी एक हो जाएं।
लेखक में सही राजनीतिक सोच का होना भी जरूरी है। इसके अभाव में लेखक भाषा और शिल्प के बल पर चमत्कार तो कर सकता है, लेकिन कोई स्थाई महत्व की रचना नहीं दे सकता। दूसरा, गलत और ढुलमुल राजनीति का शिकार लेखक अपनी रचना के माध्यम से पाठकों को कैसे सही दिशा कैसे दे पाएगा? लेखक संगठन रचनाकार को राजनीतिक रूप से दीक्षित करने और उसके संशय का समाधान करने का सशक्त माध्यम हैं। समय-समय पर वर्कशाप, सेमिनार, गोष्ठियां आदि आयोजित कर लेखकों को विचार-विमर्श का मंच प्रदान करते हैं।
लेखक संगठन को किसी राजनीतिक पार्टी के अधीन नहीं होना चाहिए, लेकिन हो रहा है इसका उल्टा। दक्षिणपंथी हों या वामपंथी लेखक संगठन, किसी न किसी राजनीतिक पार्टी से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। असल में राजनीतिक पार्टियां देश-विदेश की तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेती हैं। समय-समय पर परिस्थितियां बदलतीं रहती हैं और उसी के अनुरूप पार्टियों के फैसले भी। राजनीति पार्टियों के लिए यह जरूरी भी है, लेकिन लेखक के निष्कर्ष इतने तत्कालीन नहीं होते। उसका दृष्टिकोण व्यापक और दूरगामी होता है। वह जो सृजनात्मक लेखन करता है, उसकी प्रासंगिकता वक्त तय करता है।
पार्टी के नियंत्रण में चलने वाले लेखक संगठनों को पार्टी के गलत निर्णय में भी शामिल होना पड़ता है। इसका अच्छा उदाहरण इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाने के दौरान प्रगतिशील लेखक संघ का व्यवहार है। इंदिरा सरकार के संबंध सोवियत संघ से बहुत अच्छे थे। इसलिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने आपातकाल का समर्थन किया। पार्टी समर्थन कर रही थी तो प्रगतिशील लेखक संघ भी पार्टी अनुशासन के नाम पर आपातकाल के समर्थन में रहा। अगर संगठन पार्टी ने बनाया हुआ है तो लाख तटस्थता के दावे किए जाएं, लेकिन दखल तो रहेगा ही। फिर पार्टियां तो परिस्थितियों के अनुसार टूटती और बनती रहती हैं। लेखक को तो इन सबसे ऊपर होना चाहिए। लेखक के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अत्यधिक महत्वपूर्ण है। पार्टी के अनुशासन में रहकर सबसे अधिक इसी पर कुठाराघात होता है।
निश्चित तौर से लेखक संगठनों का मुख्य दायित्व सांस्कृतिक और वैचारिक प्रचार-प्रसार करना है। और यह भी सही है कि लेखक संगठन ट्रेड यूनियन नहीं हैं, लेकिन लेखक की गरिमा और उसके आर्थिक हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। लेखक संगठन सबसे पहले लेखक और पाठकों के बीच सेतु का काम करें। पाठकों तक पुस्तकें पहुंचाए बिना सांस्कृतिक चेतना नहीं फैलाई जा सकती। आज स्थिति यह है कि अधिकांश प्रकाशक सरकारी खरीद पर निर्भर हैं। उनकी पाठकों तक पुस्तकें पहुंचाने में उन्हें विशेष रुचि नहीं है। सरकारी खरीद को तुरंत बंद कराया जाए। अधिकतर लेखकों को शिकायत है कि प्रकाशक रायल्टी देने में गड़बड़ी कर रहे हैं। इसी तरह से बहुत से प्रकाशक, फिल्म निर्माता-निर्देशक लेखक की रचनाओं का मनमाना उपयोग कर लेते हैं और रायल्टी के नाम पर उसे एक पैसा भी नहीं देते। यदि नाम मात्र की राशि देते भी हैं तो वह बड़ी अपमानजनक होती है। लेखक संगठन हस्तक्षेप करें और ऐसी पारदर्शी व्यवस्था कायम करें कि लेखकों के हितों पर कुठाराघात न हो। जरूरत पडऩे पर कानूनी लड़ाई भी लड़ी जाए। कम से कम लेखक संगठन इतना दायित्व तो निभाएं ही।
वैश्वीकरण की आंधी चल रही है। सूचना क्रांति के चलते बहुत कुछ अदल-बदल गया है। लोगों के विचारों और मान्यताओं में तेजी से बदलाव आ रहा है। यह अच्छा भी है तो बहुत कुछ नकारात्मक भी है। देश और दुनिया संक्रमण काल से गुजर रही है। दुविधा की स्थिति बनी हुई। ऐसे में लेखक संगठनों का दायित्व और भी बढ़ जाता है, लेकिन जरूरी है कि लेखक संगठन राजनीतिक पार्टियों की छत्रछाया से मुक्त होकर एकजुट हों। कम से कम एक जैसी राजनीतिक विचारधारा के संगठन तो एक हो ही सकते हैं। तभी लेखक संगठन प्रभावी और सार्थक भूमिका निभा पाएंगे।

कई बड़े लेखक प्रकाशकों के पे-रोल पर, एकजुट करना टेढ़ी खीर : प्रणय कृष्ण

लेखक संगठनों की भूमिका और उनकी प्रासंगिकता पर जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण से बातचीत के प्रमुख अंश

रचनाकार के लिए किसी लेखक संगठन से जुडऩा क्यों जरूरी है। उसकी रचनात्मकता को इससे किस तरह लाभ मिलता है?
लेखक संगठन से जुडऩा किसी लेखक के लिए जरूरी नहीं है। जिस तरह मध्यकाल में धर्म की अवहेलना करके कोई रचनाशीलता संभव नहीं थी, उसी तरह आधुनिक समय में राजनीति से। राजनीतिक चेतना आज हर मनुष्य में किसी भी अन्य समय से ज़्यादा है और राजनीति किसी भी अन्य समय से कहीं ज़्यादा आज के मनुष्य की नियति और रोजमर्रा की स्थितियों को नियंत्रित करती है, भले ही आप उसके प्रति सचेत हों या न हो। पूंजीवाद के दौर में संगठन जीवन के हर क्षेत्र में प्रवेश कर गया। सचेतन और संगठित रूप में अर्थव्यवस्था, राजनीति, समाज, परिवार, संस्कृति सबका नियमन शुरू हुआ। संगठन और प्रबंधन के सिद्धांत आधुनिक समय की उपज हैं। मध्यकाल के शैक्षणिक माहौल में इनका कोई महत्व न था। संगठित होना इस युग का बुनियादी स्वभाव है, जिसे समझ कर ही लेखकों ने भी संगठित होने का महत्व पहचाना। संगठित होने से रचनात्मकता को प्रत्यक्ष कोई लाभ नहीं मिलता, लेकिन परोक्ष उसके भीतर वैचारिक रूपांतरण, जीवन के सामूहिक चरित्र के प्रति संवेदनशीलता और प्रतिरोध में संगठित होने की ज़रूरत समझ में आती है।
अधिकांश लेखक संगठन किसी न किसी राजनीतिक पार्टी से जुडे हैं। पार्टियों के अपने हित और नीतियां होती हैं। उन्हीं के अनुरूप वे निर्णय लेती हैं। संबद्ध लेखक संगठन को भी इसमें शामिल होना पड़ता है। क्या ऐसे में लेखकीय स्वतंत्रता पर अंकुश नहीं लगता।
समाज में पार्टियां वर्गों में बंटे समाज के किन्ही वर्गों का प्रतिनिधित्व करती हैं। हर इनसान के मन के भीतर समाज की वर्ग संरचना प्रतिबिंबित है। कोई वर्ग-निरपेक्ष नहीं होता। ऐसे में सोद्देश्य ढंग से समाज के शक्ति-संतुलन को किसी-न-किसी वर्ग के पक्ष में झुकाने की कोशिश ही राजनीति कहलाती है और इसी से राजनीतिक पार्टियां बनती हैं। सोद्देश्य लेखन और हर सोद्दोश्य मानवीय गतिविधि भी ऐसा ही करती है। लिहाजा राजनीति और लेखन के उद्देश्यों में एक हद तक (पूरी तौर पर नहीं) एक तरह की समानता पाई जाती है। राजनीति के संगठन अलग तरीके के होते हैं और लेखन के अलग तरह के, लेकिन दोनों में उद्देश्यगत समानता के कुछ बिंदु अवश्य होते हैं। राजनीतिक संगठन और लेखक संगठन के बीच आदर्श रिश्ता बिरादराने का होता है, न कि एक दूसरे के द्वारा निर्देशित होने का।
आपातकाल में प्रलेस की आफिशियल लाइन जो भी रही हो, लेकिन उससे जुड़े कई लेखकों ने आपातकाल का जम कर विरोध ही नहीं किया, बल्कि जेल भी गए। नागार्जुन इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। आज तो हालत यह है कि लेखक संगठन के पदाधिकारीगण जिन पार्टियों से बिरादराना रखते हैं, उनकी नीतियों से परम स्वतंत्र और आजाद हैं। भाकपा सलवा जुडुम का विरोध करती है और सलवा जूडुम रचाने वाले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और वहां के पुलिस मुखिया द्वारा प्रयोजित कार्यक्रम में प्रलेस से जुड़े तमाम लेखक न केवल भाग लेते हैं, बल्कि सार्वजनिक रूप से इसकी हिमायत करते हैं, इसका विरोध करने वालों को गाली देते हैं, रमन सिंह से सम्मानित होते हैं। अब कोई मुक्तिबोध की तरह भाकपा के महासचिव को लिखकर लेखक संगठन की हरकतों पर उनकी राय नहीं मांगता। हालात बदल चुके हैं। आप ही सोचिये कि यह लेखकीय स्वतंत्रता पर अंकुश है या चरम लेखकीय निरंकुशता? अगर कोई रमन सिंह और छत्तीसगढ़ के पुलिस मुखिया की मानवधिकार की दृष्टि से आलोचना करता है, तो ये लेखक इनकी हिमायत में खड़े होते हैं, जबकि इनकी पार्टी और समूचे वामपंथ को मीडिया में आए दिन गलत किस्म की प्रायोजित आलोचना और गाली गलौज का पात्र बनाया जाता है और इनके मुंह से बोल नहीं फूटते।
समय-समय पर तीनों वामपंथी लेखक संगठनों प्रलेस, जलेस और जसम को एक करने की बात उठती रही है। क्या तीनों का एक होना लेखकों हित में और ज्यादा अच्छा नहीं होगा। इनकी एकजुटता में क्या बाधा है?
आपका सुझाव सही है और मैं इसके पक्ष में हूं कि ये तीनों संगठन एक हो जाएं। विश्वासपूर्वक कह सकता हूं कि धारणा के स्तर पर जिन राजनीतिक संगठनों से हमारा बिरादराना है, उन्हें भी इसमें कोई एतराज न होगा। लेकिन मैं दूसरे संगठनों की तरफ से ऐसा कहने का हकदार नहीं हूं। मेरी समझ से इस प्रयास में सबसे ज़्यादा बाधा ऐसे लेखकों की ओर से आएगी जो संगठन से भी ज्यादा बड़े हो चले हैं, जो अपने संगठन को ठेंगे पर रखते हैं, जो बड़े प्रकाशन-समूहों और सरकारों के बीच बिचौलियों का काम करते हैं, जो अकादमियों, सरकारी पुरस्कारों, चयन समितियों में निहित स्वार्थ विकसित कर चुके हैं, लेकिन अब भी लेखक-संगठनों को कवच और सौदेबाजी के हथियार के बतौर इस्तेमाल करते हैं।
लेखक संगठनों के बावजूद लेखक शोषण का शिकार हैं। बड़े लेखकों को भी ठीक से रायल्टी नहीं मिल रही है। काफीराइट का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है। लेखक के हितों से जुड़े ऐसे मामलों को हल करने की पहल लेखक संगठन संयुक्त रूप से क्यों नहीं करते?
सही सुझाव है, लेकिन इस मामले पर लेखकों को एकजुट करना टेढ़ी खीर है। कई बड़े लेखक तो प्रकाशकों के पे-रोल पर हैं। ये लोग प्रकाशकों की ओर से सरकारी खरीद के लिए नेताओं के साथ लायजनिंग करते हैं। अगर पुरस्कृत पुस्तकों को खरीदे जाने की पालिसी किसी सरकार ने बनाई हुई है, तो इन लेखकों का काम यह होता है कि कैसे वे इन प्रकाशकों की पुस्तकों को पुरस्कार दिलवाएं, कैसे पसंदीदा लेखकों को पहले से इन्हीं प्रकाशकों से अपनी किताब प्रकाशित कराने के लिए राजी कराएं आदि। मजे कि बात है कि ऐसे ही लोग कई बार लेखक-संगठनों पर भी काबिज होते हैं। इनके चलते ही विचारशून्य लोग भी कैरियर के चक्कर में ऐसे संगठनों में दाखिल हो जाते हैं। दूसरे, बहुत से लेखक संगठनों में आने और इन मुद्दों पर जनमत बनाने की जगह बाहर से ही उपदेश देते रहते हैं। ऐसे में यह काम मुश्किल इसलिए है कि लेखक बिरादरी ही आपस में लड़ मरेगी, दूसरों की तो बात ही क्या करना। फिर भी सुझाव सही है और प्रयास होने चाहिए।
लेखक संगठनों का खर्चा कैसे चलता है। क्या पार्टी वित्तीय सहायता करती है। यदि हां तो फिर उनके हस्तक्षेप से कैसे मुक्ति मिल सकती है?
मेरी समझ से शायद ही किसी लेखक संगठन का खर्चा कोई पार्टी उठाती हो। मैं जिस संगठन का हूं, उसका खर्चा अधिकांशत व्यक्तिगत चंदे से चलता है। कभी-कभी हमसे जुड़े कलाकार अपनी मेहनत की कमाई हमें दे देते हैं। किन्हीं कार्यक्रमों में यदि हम स्मारिका निकालते हैं तो चुनिंदा तरीके से विज्ञापन लेते हैं। कारपोरेट, सरकारी अनुदान औए एन.जी.ओ. से हम बचते हैं। बाकी संगठान कैसे करते हैं, उसका मुझे ठीक-ठीक ज्ञान नहीं है।
लेखक हित और समाज में वैचारिक तथा सांस्कृतिक प्रचार-प्रचार में क्या लेखक संगठन पर्याप्त भूमिका निभा रहे हैं? क्या आपसे इससे संतुष्ट है? यदि आपकें सुझाव हों तो बताएं।
नहीं, अभी तो समाज में लेखक संगठनों का हस्तक्षेप प्राथमिक स्तर का ही है। अभी तो बहुत कुछ करना है। संतुष्ट होने का तो सवाल ही नहीं उठता। सुझाव तो सैंकड़ों दिए जा सकते हैं, असली बात तो अमल की है।



5 comments on “कई संगठन फिर भी लेखकों का शोषण

  1. vinod ka aanand says:

    क्या बचकानी बाते किये जाते हो ? हर कदम पर राजकीय सलाह लेनी पडे उतना लेखक ही अनपढ और गवार हो तो लिखने की क्या जरुरत है ? उसे तो सिर्फ पढ़ना चाहऐ.

  2. umesh kumar says:

    सभी लेखक एक मंच पर आएं, तभी उनका भला हो सकता है।

  3. लेखकों को अंतरात्मा की आवाज सुननी ही चाहिए। सुविधाभोगी कलमकार लेखक हो ही नहीं सकता।

  4. Yes,almost in all languages publishers are exploiting authors.So, all
    authors of all languages should unite together.I am a welknown Gujarati
    writer having written 14 Novels,3 Short Stories Collections and 5 Compilations to my credit.My many books are translated and in process of translation into English-Hindi-Marathi-Kannad languages.
    —Jayanti M Dalal

  5. अवैद्यनाथ दुबे says:

    जब तक लेखक एकजूट नहीं होंगे, उनकी समस्याओं का समाधान नहीं होगा और इनके एकजूट होने की संभावना दिखाई नहीं दे रही है। इसी का सभी फायदा उठा रहे हैं।

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