एक बादल एक बूँद एक नाव  : रजनी गुसाईं

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गड-गड-गरड़… आकाश में बादल गरज रहे थे। चमकती धूप गायब हो गई थी। काले बादलों ने सूरज को ढक दिया था। दोपहर में ही अँधेरा छा गया। “मम्मी, लगता है, बारिश होने वाली है। बड़ा मजा आएगा।” नन्हीं हिमी ने अपना होमवर्क करते हुए कहा।

“पता नहीं ये बादल कब बरसेंगे! इतनी देर से तो बस गरज ही रहे हैं! यह उमस भरी गर्मी और बिजली भी चली गई हैं।” मम्मी हाथ का पंखा हिलाते हुए बोली और किचन में चली गई।

हिमी पहली तीन में पढ़ती हैं और अपने मम्‍मी–पापा के साथ बहुमंजिला इमारत की पंद्रहवी मंजिल के फ्लैट में रहती है। हिमी ने अपने कमरे की खिड़की खोल दी। ठंडी हवा का झोंका कमरे में ठंडक भर गया। हिमी खिड़की के पास खड़ी हो गई। उसने बाहर झांककर देखा। आकाश में बादल-ही-बादल दि‍खाई दे रहे थे। वे हवा के झोंको से इधर-उधर दौड़ लगा रहे थे। तभी हिमी की खिड़की के पास से एक बड़ा-सा काला बादल गुजरा। हिमी उसे आवाज लगाते हुए बोली, “सुनो बादल राजा, बस गरज ही रहे हो! बरसोगे कब?”

हिमी की आवाज सुनकर काला बादल रुक गया। वह बहुत उदास लग रहा था। वह बोला “मेरा मन बरसने को नहीं करता।” बादल के अंदर बैठी नन्हीं-नन्हीं बूँदें भी बादल की ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाती हुई बोलीं “हमें भी रिमझिम-रिमझिम बारिश बनकर नहीं बरसना।”

हिमी को उनकी बातें सुनकर आश्‍चर्य हुआ। अपनी आँखों को गोल-गोल घुमाते हुए वह बोली, “लेकिन तुम लोग धरती पर बरसना क्यों नहीं चाहते?”

काला बादल बोला “पहले जब में बरसता था तो बच्चे अपने-अपने घरों से बाहर आ जाते थे। गलियों में, घरों की छतों में बारिश में भीगते थे। धमाचौकड़ी मचाते थे।”

नन्ही बूँदें बात को आगे बढ़ाते हुए बोलीं, “हम जब बरसती थीं, तो हमारे पानी में बच्चे पैरों से छप-छपकर खेलते थे! रुके हुए पानी में कागज की रंग-बिरंगी नाव बनाकर तैराते थे। बच्चों की यह चुलबुली शरारतें देखकर बड़ा मजा आता था। लेकिन अब वो बात नहीं हैं।” कहते-कहते नन्हीं बूँदें उदास हो गईं।

काला बादल बोला, “अब बच्चे बारिश में घर से बाहर नहीं निकलते। बच्चों की शरारतों के बिना हमें भी बरसना अच्छा नहीं लगता।”

काले बादल और बूंदों की बात सुनकर हिमी सोच में पड़ गई। फिर धीरे से बोली, “ओ काले बादल सुन। हम बच्चे बारिश में भीगना चाहते हैं। खेलना चाहते हैं, लेकिन मम्मी-पापा हमें खेलने नहीं देते। वे कहते हैं, ‘बारिश में भीगने से जुखाम हो जाएगा। बीमार पड़ जाओगे।”

हिमी की बात सुनकर अब काला बादल सोच में पड़ गया।

“हिमी, हिमी उठो। होमवर्क करते-करते ही सो गई।” हिमी को नींद से जगाते हुए मम्मी बोली।

मम्मी की आवाज सुनकर हिमी एकदम से उठकर बैठ गई। आँखों को मींचते हुए बोली, “मम्मी, काला बादल कहाँ गया?”

“कैसा काला बादल? हिमी लगता हैं, तुमने कोई सपना देखा होगा।” कहते हुए मम्मी कमरे से बाहर चली गई!

हिमी ने खिड़की से बाहर देखा। बारिश हो रही थी। हिमी ने मम्मी को आवाज लगाई, “मम्मी मुझे कागज की नाव तैरानी है।”

मम्मी कमरे में आई! हँसते हुए बोली, “यहाँ कागज की नाव कहाँ तैराओगी?”

“मम्मी नीचे सोसाइटी के कंपाउंड में चलते हैं। वहां पानी भर गया है।” हिमी जिद करने लगी। आखिर मम्मी को हिमी की जिद के आगे झुकना पड़ा, “ठीक हैं चलते हैं, लेकिन ज्यादा देर बारिश में नहीं भीगना।” मम्मी ने हिमी से कहा। यह सुनकर ख़ुशी से उछलते हुए हिमी ने टेबल के नीचे से पुराना अखबार निकाला और मम्मी के साथ बैठकर जल्दी-जल्दी नाव बनाने लगी। नाव बनकर तैयार थी। इसके बाद दोनों सोसाइटी के कंपाउंड में आ गए! हिमी पानी में छपाक-छपाक करते हुए बारिश में भीगने लगी। कागज की नाव उसने बारिश के बहते पानी में छोड़ दी। नाव पानी में डगमग-डगमग करते हुए आगे बढ़ने लगी। यह देखकर हिमी ख़ुशी से उछलते हुए ताली बजाने लगी। हिमी को बारिश के पानी में खेलते देख सोसाइटी में रहने वाले दूसरे बच्चे भी कागज की नाव लेकर कंपाउंड में आ गए। अब बारिश के पानी में कागज की बहुत सारी नाव तैरने लगीं। नन्हीं-नन्हीं बूँदें रिमझिम-रिमझिम बरस रही थीं। सारे बच्चे पानी में छपाक-छपाक करते और ख़ुशी से चिल्लाते। हिमी आसमान की तरफ देखकर बोली, “ओ बादल राजा, ओ नन्हीं बूंदों, अब तो खुश हो।”

उसकी सहेली दि‍व्या ने पूछा, “हि‍मी कि‍ससे बात कर रही हो।”

“कि‍सी से नहीं।” कहकर हि‍मी मुस्‍कराई और पानी में छप-छप करने लगी।

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