एक और दिवास्वप्न : कैलाश मंडलोई 

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‘शैक्षिक दख़ल’ की समीक्षा-

शिक्षा जगत में हलचल मचाने वाली, बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का चिंतन-मनन करती पत्रिका ‘शैक्षिक दखल’, शिक्षा जगत के अंगों में लग रहे जंग को शिक्षकों के साझा प्रयास से खुरचने का प्रयास कर रही है। यह एक अनूठी पहल है। जुलाई 2016 का यह अंक ‘प्रश्न पूछने से क्यों डरते हैं बच्चे’ विषय पर केन्द्रित है। इसका प्रत्येक आलेख बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का एक प्रारूप प्रस्तुत कर रहा है। अपने बच्चों के प्रति चिंतित अभिभावकों एवं शिक्षकों के लिए यह अंक मार्गदर्शिका है। प्रारंभ के दो आलेख इस अंक की प्रस्तावना हैं। पहला आलेख ‘बच्चों के प्रश्नों को मरने न दे’ महेश पुनेठा का है, जो इस और संकेत करते हैं कि अधिकांश पालक एवं शिक्षक अपनी झूठी सत्ता को बनाए रखने के लिए बच्चों के प्रश्नों से बचते हैं। ज्यादा प्रश्न करने वाले बच्चों को नापसंद करते हैं। इस आलेख द्वारा समझाने का प्रयास किया गया है कि ‘बच्चों के प्रश्नों को मरने न दें’ क्योंकि प्रश्न ही तो हैं, जो हमें खोज-आविष्कार-सृजन की और ले जाते हैं। प्रश्न ही बच्चे में कल्पनाशीलता और रचनात्मकता का विकास करते हैं। इस विषय की प्रस्तावना को आगे बढ़ाता हुआ दूसरा आलेख है- प्रश्न न करने का मनोविज्ञान जो फेसबुक परिचर्चा पर आधारित है। इस फेसबुक परिचर्चा में लग-भग 60-65 शिक्षकों, चिंतक व लेखकों ने प्रश्न न करने के मनोविज्ञान पर अपने-अपने विचार निम्न बिंदुओं पर दिए हैं-

  1. आप बच्चे को प्रश्न पूछने के लिए क्यों प्रोत्साहित करना चाहेंगे?
  2. बच्चे प्रश्न करने से क्यों डरते हैं?
  3. यह भी एक तथ्य है कि बच्चे प्रश्न के गलत होने के डर से भी प्रश्न नहीं करते हैं,बहुत सारे बच्चों ने अपने उत्तर में यह बात कही। क्या आपको लगता है कि प्रश्न भी गलत हो सकता है? बच्चे के पास यह बात कहां से आई होगी?
  4. बच्चों में‘प्रश्न करने के प्रति झिझक’ की जड़ें क्या हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन में भी देखी जा सकती हैं? 5. क्या आपको लगता है कि भाषा में अधिकार न होना भी बच्चे को प्रश्न करने से रोकता है?
  5. क्या प्रश्न करना सिखाया जा सकता है और कैसे?
  6. बच्चों को प्रश्न करने के लिए कैसे प्रोत्साहित किया जा सकता है?

डॉक्‍टर अनिता जोशी का आलेख ‘प्राथमिक शिक्षण एक चुनौती’, प्राथमिक स्तर के बच्चों एवं प्राथमिक कक्षा के शिक्षकों को ध्यान में रखकर लिखा गया है। प्राथमिक स्तर पर बालक सृजन की प्रवृत्तियाँ रखता है। जिज्ञासा के कारण पूछताछ की प्रवृत्ति अधिक होती है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षक का कार्य संवेगात्मक विकास द्वारा बच्चों को सामाजिक सामंजस्य स्थापित करने योग्य बनाना है। अत: प्राथमिक स्तर पर अध्यापन करने वाला शिक्षक ही शिक्षा व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण स्तम्भ है।

डॉक्‍टर इसपाक अली का आलेख जनजातीय समाज, उसकी शिक्षा और समस्या की बात करता है।  ‘बचपन, कल्पनाशीलता और शिक्षा’ आलेख में आनन्द गुप्ता प्रश्न उठाते हैं कि बच्चों की कल्पनाशीलता और रचनात्मक सोच को कैसे बचाया जाए। इस बारे में सबसे बड़ी भूमिका विद्यालय और शिक्षकों को भी निभानी होगी। उनका कहना है कि शिक्षकों की सोच में भी रचनात्मकता और कल्पनाशीलता होनी चाहि‍ए तभी वे अपने बच्चों में इन गुणों का विकास कर सकेंगे। कालूराम शार्मा अपने आलेख में कहते हैं कि ‘जब जवाब पता है तो सवाल क्यों?’ कथित शिक्षा व्यवस्था चाहती है कि उसकी कक्षा के बच्चे हूबहू वहीं जवाब दें, जो अपेक्षा की जाती है। और वह अपेक्षा पाठ्य पुस्तक की सीमा से बंधी होती है। यानी सवाल भी मेरे और जवाब भी मेरे। यह कैसे हो सकता है। यहाँ वे प्रोफेसर यशपाल की बात रखते हैं। प्रोफेसर यशपाल कहते हैं कि स्कूल के सवालों और असल जिंदगी के सवालों में फर्क क्यों? वैसे इस निराशाजनक स्थिति के बावजूद ऐसे शिक्षक मिल ही जाएंगे, जो मौलिक सवाल उठाते हैं या बच्चों को सवाल करने को प्रेरित करते रहते हैं। देवेश जोशी का आलेख ‘उत्तर से मत डरिए, प्रश्‍न न पूछने से डरिए’, जब छात्र द्वारा पाठ्यक्रम को छोड़कर कोई प्रश्न पूछा जाता है, तो शिक्षक की क्या प्रतिक्रिया होती है और एक छात्र के मन पर इसका क्या प्रभाव हुआ, शिक्षकों को संदेश देता आलेख है। जब बच्चों को बार-बार चुप कराया जाता है, उन्हें आधे-अधूरे जवाब दिए जाते हैं, तो धीरे-धीरे बच्चों मन में प्रश्न के प्रति एक नकारात्मक ग्रंथि बन जाती है, जिससे वे प्रश्न करने से हिचकिचाते हैं। क्या करें कि प्रश्न के प्रति बच्चों की हिचकिचाहट दूर हो, इसे प्रस्तुत करता आलेख ‘प्रश्न करने से हिचकिचाते बच्चे’।

चिंतामणि जोशीजी कि कहानी ‘और दिलबर नठ गया’, एक ड्राप-आउट बालक की कहानी है। यह दिल को छूने और मन को झकझोर देने वाली कहानी है, जो अभिभावकों एवं शिक्षकों को अपने दायित्वबोध का संदेश दे रही है कि प्रताड़ना कभी भी प्रेरणा नहीं बन सकती और न ही प्रेरणा के बिना कोई बच्चा किसी प्रकार की सफलता प्राप्त कर सकता है। इसलिए यह सत्य है कि‍ बच्चे प्रताड़ित होकर आगे नहीं बढ़ते और इसी बात को आपने सही तरीके रखा है।

‘बचपन के दिन’ स्तम्भ के तहत ‘गुड-सेकेंड लड़का’ आलेख में लेखक पद्मनाभ मिश्र ने अपने बचपन से लेकर नौकरी लगने तक के जीवन का एक ऐसा स्पष्ट चित्र प्रस्तुत किया है, जिसमें हर बार उनकी इच्छा के विपरीत हुआ। इसे पढ़ने पर लगता है कि कई बार हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ है और हम देखते है कि‍ कहीं-न-कहीं आम बच्चों के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। मिश्रजी ने अपने जीवन चरित्र के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि‍ बच्चों को उनकी रुचि के अनुसार विषय पढ़ने की व्यवस्था की जानी चहिए। लेख बड़ा है, लेकिन बहुत कुछ देने वाला है। ‘आते हुए लोग’ स्तम्भ में, ‘मैं मासाप नहीं, तानाशाह बन गया’ आलेख में लेखक तारा सिंह चुफाल शाला में भयमुक्त वातावरण की बात करते हैं। बचपन में उन्होंने जो शिक्षकों की तानाशाह झेली, उसका सतही चित्रांकन किया है, जिसे आज भी कई मासूम बच्चे झेल रहे हैं। जब उन्हें गरीबी और बेरोजगारी ने बेमन से शिक्षक बनाया, वे भी तानाशाह बन गए। जब कई वर्षों बाद उन्होंने पाया की बच्चों को सिखाने की नहीं, उनसे सीखने की आवश्यकता है। और फिर कैसे उन्होंने बच्चों को प्यार किया, अपना बनाया। वे चाहते हैं कि‍ प्रत्येक शिक्षक बच्चों से प्यार करे, दुलार करे फिर पढ़ने-पढ़ाने की बात हो। ‘डायरी के पन्ने’ स्तम्भ में रेखा चमोली का आलेख ‘बच्चों की रचनात्मकता का एक मंच- बाल शोध मेला’, जो बच्चों को सीखने- सिखाने की प्रक्रिया में एक नवाचार लिए है। क्या है बाल शोध मेला इसका वर्णन विस्तार से किया गया है। बहुत ही रोचक व गतिविधि आधारित जानकारी है। अलग-अलग विषय लेकर इसे शाला में वर्ष में एक या दो बार करवाना चहि‍ए।

‘अनुभव अपने-अपने स्तम्भ’ में उत्तम मिश्रा का आलेख ‘मैं अपने छात्रों के घर जाऊंगा’, एक शाला त्यागी बच्चे को शाला में वापस लाने से उसकी नौकरी लगने तक की सच्ची कहानी। पत्रि‍का का प्रत्येक आलेख समाज, अभिभावक एवं शिक्षकों से यही प्रश्न पूछ रहा है कि प्रश्न पूछने से क्यों डरते हैं, बच्चे? कौन से कारक हैं, जो बच्चे को प्रश्न पूछने से रोकते हैं? लेकिन एक स्कूल ऐसा भी है, जहां बच्चे स्वयं प्रश्न पत्र तैयार करते हैं। यह एक नया प्रयोग कर रहा है- अजबपुर प्राथमिक विध्यालय।

अंत में दिनेश कर्नाटक लिखते हैं कि बच्चे प्रश्न नहीं करते क्यों कि हम उनसे संवाद स्थापित नहीं करना चाहते। क्योंकि हम उनके साथ आगे नहीं बढ़ना चाहते। क्योंकि हम अपने रोजमर्रा के सुविधाजनक ढर्रे को तोड़ना नहीं चाहते। क्योंकि हम परिश्रम नहीं करना चाहते। बच्चे प्रश्न नहीं करते क्योंकि हम भी प्रश्न नहीं करते। हम प्रश्न करते तो बच्चे भी प्रश्न करते।



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